देश

और कठिन है आगे की डगर

 

जिस रास्ते पर देश को ले जाया जा रहा था, उसी रास्ते पर उसने कुछ और महत्वपूर्ण कदम उठा लिए हैं। जो खतरा पहले से ही महसूस किया जा रहा था, वह और गहरा हो गया है। जो लोग देश के हालात से चिंतित थे, उनकी चिंताएं सहज ही बढ़ने वाली हैं। सामाजिक स्तर पर जो बँटवारा धीरे-धीरे जमीन पर अपनी धुंधली लकीर बना रहा था, वह अचानक और गहरी होने वाली है। राष्ट्रवाद, परम्परापोषकता, अतीत के प्रति गौरव और सत्ता की व्यक्तिकेंद्रीयता को और ताकत मिलने वाली है। नरेंद्र मोदी और मजबूत हुए हैं, विरोधियों, खास तौर पर कांग्रेस के हाथ में आते-आते एक बार फिर कई राज्यों की सत्ताएं फिसल गयीं हैं। तेलंगाना को छोड़कर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भारतीय जनता पार्टी की झोली में चले गए हैं। तेलंगाना में कांग्रेस को विजय मिली है।

ये परिणाम चौंकाने वाले हैं भी और नहीं भी। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका यह अनुमान लगा रहा था कि पांच राज्यों के ये चुनाव भाजपा को सबक सिखाने वाले होंगे। यह अगले लोकसभा के चुनाव की भूमिका भी बनेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर ऐसा होता तो भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में ज्यादा कठिनाई होती। एक मनोवैज्ञानिक झटका लगता, जो पार्टी को भविष्य के प्रति संशयग्रस्त करता और इस संशयग्रस्तता का लाभ विपक्ष को मिल सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जाहिर है, इस जीत से भाजपा का मनोबल बढ़ेगा और वह अपने एजेंडे पर और ताकत से अमल करने की कोशिश करेगी। बेशक इससे लोकतान्त्रिक आजादी का स्पेस कम होगा, इस आजादी के जायज इस्तेमाल पर और सख्त अंकुश लगेगा। धार्मिक और सांप्रदायिक बंटवारे और तीखे होंगे, उग्र राष्ट्रवाद का मार्ग प्रशस्त होगा, अभिव्यक्ति की सीमाएं और संकुचित होंगी। बुद्धिजीवियों, लेखकों और वाम चिंतकों का अपनी अभिव्यक्ति, रचनात्मकता और समाज के भगवाकरण की चिंता करना अस्वाभाविक नहीं है। आज के समय में भी कम खतरे नहीं हैं। बहुत सारे लोग केवल सत्ता के विरोध और आलोचना की सजा भुगत रहे हैं, एक सीमा रेखा खींची जा चुकी है, जिसके पार खतरे का इलाका है। पूरी निगरानी है और उस दायरे को पार करते ही पूछताछ शुरू हो जाती है। तमाम लोगों ने तो तौबा कर लिया है। छोड़ो यार, मौसम पर लिखो, फूलों, पहाड़ों पर लिखो, शौर्य गान लिखो। कुछ लोग जो अब भी लिख-बोल रहे हैं, उन्हें सोचना पड़ेगा कि वे डटे रहें और हर परिणाम भुगतने को तैयार रहें या चुप्पी साध लें। यही वर्ग है जो चुनाव के बारे में अपने आकलन में सबसे ज्यादा गलती करता है। विरोध और असहमति जायज है लेकिन अपने विरोधी की शक्ति का आकलन घृणा से जन्मे दुराग्रह के साथ संभव नहीं हो सकता। मेरे कई मित्र बार-बार कह रहे थे कि पाँचों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जायेगा। अब उनके अंत का आरम्भ शुरू हो गया है। यह कहना बहुत आसान है, कभी इस पर एतराज कीजिये तो वे आपको भाजपाई घोषित करने में देर नहीं लगाएंगे। अगर कोई अपने विरोधी, अपने शत्रु की ताकत का गलत अंदाजा लगता है तो उसके मारे जाने की संभावना से कैसे इंकार किया जा सकता है। अब आप कहें कि ईवीएम गड़बड़ है, हेरा-फेरी हुई है, धांधली हुई है तो कोई रोकेगा नहीं लेकिन ऐसा करके आप अपना पक्ष और कमजोर करेंगे, अपने को भ्रम में रखकर भविष्य में और कमजोर होने के अंदेशे को ही सही साबित करेंगे। यह समय है, इस बात के चिंतन का कि वास्तव में कहाँ गड़बबड़ियाँ हुईं हैं, परिस्थितियों को समझने में क्या गलती हुई है। यह अवसर इस चिंतन का भी है कि एक ताकतवर विरोधी को पराजित करना है तो वास्तव में क्या करना चाहिए।

दरअसल मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा जैसे नकली जीवन जीता है, वैसे ही वह नकली राष्ट्रभक्ति, नकली हिंदुत्व, नकली अतीत और नकली कौम के सिद्धांत से भी बहुत प्रभावित रहता है। उनकी बड़ी संख्या है। यही लोग हिन्दू राष्ट्र की मांग करते हैं, यही अपने पुरखों के अनावश्यक महिमामंडन और उन्हें जातियों से जोड़कर देखने में भी गर्व का अनुभव करते हैं। यही लोग थाली बजाते हैं और यही भारतीयता को खंडित करते हैं, हिन्दू-मुस्लिम के भेद का झंडा उठाकर विभाजन के नारे लगाते हैं। यही हैं जो हिंसा, उपद्रव में भी शामिल रहते हैं। ऐसा ही एक तबका मुसलमानों में भी है, जो अपने अस्वीकार्य बयानों और कार्रवाइयों से इस बंटवारे को और मजबूत करने का काम करता है। ये दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत मुफीद हैं। यही उनके सच्चे सहयोगी हैं। इस चुनाव से पता चला है कि महिलाओं, युवकों और आदिवासियों के बड़े वर्ग पर भाजपा का प्रभाव कायम है। भाजपा सरकारों ने महिलाओं को प्रभावित करने के लिए कुछ योजनाएं जरूर चलाईं हैं लेकिन यही पर्याप्त कारण नहीं है। बाबरी विध्वंस के बाद आयी युवकों की पीढ़ी पर भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद का प्रभाव ज्यादा है। वे अपने मोबाइलों और कम्प्यूटरों में चमकते भारत को आसानी से देख पाते हैं, अँधेरे से भरा हिन्दुस्तान उन्हें बहुत कम नजर आता है। जाहिर है नरेंद्र मोदी उनके लिए श्रेष्ठतम नायक होंगे। इस बार के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवक, युवतियों की बड़ी संख्या रही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। युवा, महिलाएं और आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में हैं। अल्पसंख्यकों का रुख स्पष्ट रहा है लेकिन ये तीनों वर्ग उसके प्रभाव को कम करने में समर्थ हुए हैं, ऐसा लगता है।

विपक्ष की रणनीति भी सुचिंतित नहीं दिखी। यह मान भी लिया जाए कि इन विधानसभा चुनावों में विपक्ष एक नहीं था तो भी उन्हें अपने अंतर्विरोधों की खुली अभिव्यक्ति से बचना चाहिए था। विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पर इसका भार सबसे ज्यादा है। सबसे ज्यादा आत्मावलोकन का अवसर इन चुनावों ने कांग्रेस को ही दिया है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद एक बार लगा था कि उनमें थोड़ी संजीदगी आयी है लेकिन वह इन चुनावों में दिखाई नहीं पड़ी। न ही उन्होंने जरूरी सक्रियता दिखाई, न ही उनके भाषणों, बयानों में विविधता थी। वे प्रचार के लिए जहाँ भी गए, कुछ खास घिसी-पीटी बातों पर ज्यादा जोर देते रहे। सत्ता दल को घेरने और स्थानीय मुद्दों पर अपने कार्यककर्ताओं को पूरी ताकत से जुटाने में कांग्रेस असफल रही। हार का एक बड़ा कारण सांगठनिक कमजोरी भी रही। बुनियादी स्तर पर कांग्रेस के पास वैसा मजबूत सांगठनिक ढांचा नहीं है जो अपने नेताओं के संदेशों को आखिरी आदमी तक पहुंचा सके, जैसा भाजपा के पास है। दूसरी सहयोगी पार्टियों की मदद इसलिए नहीं मिली क्योंकि वे या तो स्वयं लड़ रहीं थीं या लगभग निष्क्रिय थीं। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता में रहते हुए भी कांग्रेस या तो अति आत्मविश्वास से ग्रस्त रही या फिर मोदी और भाजपा को अपनी पूरी शक्ति से अपने घर में घेरने में नाकाम रही। एक बड़ी गलती कांग्रेस ने हिंदुत्व की भाजपाई राह की नकल करके भी की। पूजा-पाठ, जनेऊ, प्रवचन, भगवा, मंदिर, मूर्ति में फंसने की जगह उन्हें अपने पुरखों की धर्म-निरपेक्ष और जनोन्मुख राजनीति पर ही भरोसा करना चाहिए था।

भारतीय जनता पार्टी को एक बार और यह कहने का मौका मिल गया है कि मोदी हैं तो मुमकिन है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की राजनीति में नरेंद्र मोदी एक कुशल, चतुर और छल-बल से भरे अत्यंत प्रभावशाली नेता के रूप में लगभग स्थापित हो चुके हैं। उनका पूजा-पाठ, उनका गंगा में डुबकियां लगाना, उनका झाड़ू उठा लेना, उनका बच्चों, श्रमिकों या महिलाओं से वीडियो काल पर बात करना इस देश के एक बड़े वर्ग को बहुत प्रभावित करता है। भाषण की कला भी उन्हें आती है। कहते हैं कि कुशल वक्ता वही है जो झूठ-सच की परवाह नहीं करता, जो गलत-सही के बारे में सोचे बगैर धारावाह बोलता है, जो श्रोताओं से सम्बन्ध बनाना जानता है, जो उन्हें फुसलाना जनता है। यह सारे गुण नरेंद्र मोदी में हैं। उनके जैसा निर्भय वक्ता विपक्षी दलों में आज के समय में तो कहीं दिखाई नहीं पड़ता। यह कला कभी बदनाम करती है तो कभी काम भी आती है। कहना न होगा कि उन्होंने इन चुनाव में अकेले ही भाजपा को जिताने की जिम्मेदारी संभाली। उन्हें यह भी पता रहा होगा कि अगर भाजपा हार जाती तो उनके प्यारे समर्थक इसकी जिम्मेदारी उन पर नहीं डालते। ठीकरा फोड़ने की कोई न कोई जगह ढूंढ ली जाती।

आगे का समय बहुत कठिन है। जनवरी आने वाली है। राम मंदिर जनता के लिए खोला जाने वाला है। यह सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है। मथुरा में कॉरिडोर बनने वाला है। कई दशकों से वहां अपनी जीविका चलने वालों के उजड़ने का समय आ रहा है। उनकी आवाजें भी उसी तरह अनसुनी कर दी जाएंगी, जैसे काशी में कर दी गयीं थीं। अयोध्या, काशी और मथुरा की मुक्ति के आश्वासन पर अमल करने का वादा भाजपा बहुत पहले से करती चली आ रही है। इसे और परवान चढ़ाने का अभियान छेड़ा जाएगा। उग्र साम्प्रदायिकता के रास्ते चलकर ही हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण संभव है। हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे को और गहरा करने का प्रयास किया जायेगा। अतीत के महिमामंडन की प्रक्रिया और तेज होगी। आगामी समय में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता की प्रयोग भूमि बनने वाला है। यह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने पर हो सकने वाली प्रतिक्रिया के परीक्षण का आधार बनेगा। भाजपा समझ गयी है कि विरोधी जनता के मूल मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाने में विफल रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार कहाँ मुद्दा बन सका ? ऐसे में लोकसभा के चुनाव में वह धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय मुद्दों को हवा देने का प्रबल अभियान छेड़ सकती है। हिंसा और अराजकता से कोई परहेज नहीं होगा। अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश और कसेगा। ज्ञान के केंद्रों, न्याय प्रणालियों और चुनाव तंत्र पर प्रभाव और दबाव बढ़ाने की पुरजोर कोशिश की जाएगी। जिन वर्गों ने इस बार भाजपा को मत दिया है, उन्हें अपने पक्ष में और संगठित करने और अन्य मत-वर्गों को लुभाने के नए तरीके खोजने के प्रयास भी भाजपा करेगी। यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी साख बनाने के लिए कोई काम नहीं किया है। यह ठीक है कि महंगाई, बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है, गरीबों पर खुलकर इसकी मार पड़ी है, शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता का आलम पैदा हुआ है, स्वास्थ्य सुविधाओं का कोई विस्तार नहीं हुआ है लेकिन डाइरेक्ट ट्रांसफर से बड़ी संख्या में लोगों को कई तरह के लाभ मिले हैं, देश में अच्छी सड़कों का जाल बिछा है, लोगों को घर मिले हैं। इस प्रक्रिया को और तेज करने का भाजपा का विचार और दृढ़ होगा। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पराजय से विपक्ष को सबक लेना चाहिए। विजयी पार्टी का मत प्रतिशत चाहे जो हो, वह कहीं भी 40 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। स्पष्ट है कि 60 प्रतिशत लोग या तो निष्क्रिय हैं, नाराज हैं या विरोधियों के साथ हैं। यह सारा वोट एक साथ, एक जगह कभी नहीं जाता। विपक्ष को अगले चुनाव में अखंड एकजुटता का परिचय देना होगा। सारे अंतर्विरोधों को भुलाकर एकमेव संयुक्त दल की तरह एकजुट होना होगा। कांग्रेस पर सबसे ज्यादा जिम्मेदारी होगी। बड़ी पार्टी के नाते उसे हो सकता है, ज्यादा खोना पड़े, ज्यादा त्याग करना पड़े लेकिन इसके लिए उसे तैयार रहना पड़ेगा

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सुभाष राय

लेखक जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक हैं। संपर्क- raisubhash953@gmail.com,+919455081894
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