राजनीति

बंगाल की पराजय के साथ ही मोदी काल का अन्त

 

सच कहा जाए तो बंगाल के चुनाव के साथ ही भारत की राजनीति का पट-परिवर्तन हो चुका है। दार्शनिकों की भाषा में जिसे संक्रमण का बिंदु, event कहते हैं, जो किसी आकस्मिक अघटन की तरह प्रकट हो कर अचानक ही प्रकृति के एक नये नियम की तरह खुलने लगता है, बंगाल के चुनाव से वह क्षण प्रकट हो चुका है। कहा जा सकता है कि यह भारत की राजनीति में मोदी नामक एक फैंटेसी के अन्त की तरह का अघटन है।

दार्शनिक स्लावोय जिजेक का एक सूत्र है कि कोई भी फैंटेसी एक पूर्ण पारदर्शी पृष्ठभूमि में ही जिन्दा रहती है, अर्थात् जिसके पार कुछ नहीं दिखता, सिर्फ शून्य हुआ करता है। जैसे ही इसकी पारदर्शिता व्याहत होती है, उसी क्षण वह मर जाती है। जैसे हमारी कोई जघन्य गोपनीयता प्रकट हो जाने पर जिन्दा नहीं बचती है। सचमुच, अब सिर्फ समय का इंतजार है। भाजपा के बारे में अरुंधती राय की ये सारगर्भित चार पंक्तियां किसी आकाशवाणी से कम नहीं है कि –

“भाजपा को एक उथले गड्ढे में गाड़ तो / कोई प्रार्थना नहीं / सिर्फ एक / अलविदा!”

यूपी के चुनाव को लगभग सात महीने बाकी हैं। और फिर उसके बाद! एक के बाद एक चुनाव – और फिर, देश की राजनीति पर लगे हुए एक बदनुमा दाग का अन्त। अब यही होने जा रहा है, बशर्ते ऐसे ही चीजों को चुनाव के माध्यम से क्रमिक रूप में बदलने दिया जाता रहेगा। यह भी तय है कि अगर इसमें कोई अस्वाभाविक बाधा डाली गयी, तो उसी के अनुपात में इस अन्त का अन्त भी उतना ही विध्वंसक और दुर्भाग्यपूर्ण होगा। एक तीखे ढलान की ओर लुढ़क चुकी इस चट्टान को गिर कर पूरी तरह से बिखर जाने से अब कोई रोक नहीं सकेगा।

आप यूपी चुनाव के बारे में किसी भी कथित राजनीतिक विश्लेषक से चर्चा कीजिए, वह हिन्दी भाषी प्रदेशों में जातिवाद और साम्प्रदायिकता के असाध्य रोग के गणित के ढेर सारे समीकरणों को आपके सामने परोसने लगेगा, और अमित शाह सरीखे सौदेबाज व्यापारी की चतुराई पर अगाध आस्था जाहिर करते हुए आपको विश्वास दिलायेगा कि ‘आयेगा तो मोदी ही’ — संघी आइटी सेल की प्रयोगशाला से निकाला हुआ, उनके कमजोर लोगों, अर्थात् भक्तों के जाप का मन्त्र। इसके अलावा इन जहर बुझे दिमागों को 2019 वाले पाकिस्तान-पुलवामा पर भी अभी कुछ भरोसा है।

लेकिन जीवन का सच यह है कि 70 साल में पहली बार भारत के लोग यह साफ महसूस कर पा रहे हैं कि असली दरिद्रीकरण किसे कहते है? जो तबका अब तक पीढ़ियों के बदलने के साथ पैदल से साइकिल-मोटर साइकिल-कार के बदलाव को देखता रहा, वह अब फिर साइकिल-पैदल की दिशा में लौटने लगा है। पेट्रोल-डीजल के दामों ने मध्य वर्ग और किसानों की कमर तोड़ दी है। कोरोना से कहीं अधिक अर्थ-व्यवस्था का चक्का जाम करने में इनकी भूमिका को समझना बहुत कठिन काम नहीं है। घर की स्त्रियों के रुपयों पर डाकाजनी के नोटबंदी (2016) के कदम के बाद भी जो नहीं समझे थे, वे बाद के इन पाँच सालों में समझ गये हैं कि मोदी क्या बला है! भारत के आम लोगों के अस्तित्व मात्र की रक्षा के लिए इस बला से मुक्ति ज़रूरी है।

बंगाल में भी बंगाली अस्मिता के साथ ही दरिद्रीकरण की इस सामान्य अनुभूति ने चुनाव के निर्णायक अन्तः सूत्र की भूमिका अदा की है। हर बीतते दिन के साथ, मोदी की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट की खबरें बताती है कि आगे के सभी चुनाव इसी सूत्र पर निर्णीत होने वाले हैं। इसीलिए यह कहना गलत नहीं है कि हमारी राजनीति के पूर्ण पट-परिवर्तन के पहले का अघटन घट चुका है। किसी भी ईमानदार और सक्षम विश्लेषक के लिए इसके आगे का नक्शा बनाना अब बहुत कठिन काम नहीं रह गया है।

यूपी में आज बंगाल की तरह ही उस सिंड्रोम के सारे लक्षण साफ नजर आ रहे हैं जो कभी सिर्फ अल्पसंख्यकों के मत को तय करने में प्रमुख भूमिका अदा किया करता था। आज यूपी के मतदाताओं के सभी तबकों के अधिकांश  वोट सिर्फ़ उसे मिलने वाले हैं जो उन्हें भाजपा को पराजित करने में सक्षम नजर आयेगा। हर सीट पर इसी आधार पर मतों का ध्रुवीकरण होगा। किसान आन्दोलन का भी यही आह्वान है और हाल के पंचायत चुनाव के भी यही संकेत है। जिस प्रदेश से मोदी खुद सांसद चुने जाते हैं, उसी में भाजपा के चुनाव प्रचार से मोदी की तस्वीर को निकाल बाहर करना कम गहरे इंगित नहीं देता है।

ऐसे में कुछ लोग योगी-मोदी के बीच की तनातनी के किस्सों के कूड़े  में से चुनावी संभावनाओं के सूत्र बीनने की उधेड़-बुन में लगे हुए हैं। वे यह नहीं देख रहे हैं कि चुनाव तो सात महीनों बाद है। इन सात महीनों की अवधि में केंद्र सरकार और भाजपा भी यूपी में हजारों करोड़ रुपये फूंकने वाली है। ऐसे में क्यों नहीं योगी-मोदी की तनातनी की बातों को चुनावी मुद्दा के बजाय, इन हजारों करोड़ की बंदर बांट का मुद्दा समझा जाए! केरल, बंगाल और बाकी जगहों पर भीभाजपा केंद्र से भेजे गये करोड़ों रुपयों की लूट के कई किस्से इसी बीच सामने आ चुके हैं। इसके अलावा केंद्रीभूत भाजपा में बहुत कुछ केंद्रीभूत है! इनके कमीशनखोर भी। इसीलिए यदि तनातनी इस धन की लूट को लेकर होगी, तो उसका सीधे मोदी-योगी की तनातनी के रूप में जाहिर होना स्वाभाविक ही है। योगी-मोदी प्रकरण में वही हो रहा है।

हठयोगी आदित्यनाथ इस कमीशनखोरी पर किसी मोदी दूत ए पी शर्मा की खबरदारी को इसीलिए नहीं मान सकते हैं क्योंकि तब डूबते जहाज के साथ ही खुद भी डूब जाने के अलावा उनके अपनेहाथ और क्या लगेगा? इसी प्रकार का एक दूसरा पहलू विजय त्रिवेदी की तरह के भाजपा-योगी विशेषज्ञ बता रहे हैं। वह राज्य में भाजपा के पुराने अपराधी गिरोहों से जुड़ा हुआ पहलू है।योगी के पहले यूपी में वे ही मोदी और भाजपा के लोग हुआ करते थे। पर योगी ने इधर अपने राजपूती उत्साह में ऐसे कई गिरोहों को बुरी तरह से परेशान कर रखा है, कई गिरोह के लोगों का एनकाउंटर भी कराया है। आज वे सब चाहते हैं कि कम से कम इस आखिरी समय में तो उनकी पुरानी वफादारी का सहारा मिलें! और, योगी उनके लाभ में सीधा अपना नुकसान भांप रहे हैं।

वैसे तो योगी हठयोगी बनते है! पर उनकी दिक़्क़त है कि वे ऐसे नाथपंथी हठयोगी हैं जिनकी परम्परा के इतिहास में शिव से समरसता के बजाय शुद्ध काया-साधन की कामना की उत्पत्ति की भी चर्चा की जाती है। अर्थात् इस योगी की धातु में भी खोट है! चुनाव के ऐन सात महीने पहले मोदी-योगी की तनातनी में इसे भी एक और प्रमुख कारण क्यों नमाना जाए!

किस्सागो विश्लेषक यूपी में अमित शाह के जातिवादी समीकरणों की भी खूब चर्चा कर रहे हैं। कुछ जातिवादी नेताओं की हलचलें भी बढ़ी हुई है। पर सबका अभी एक ही लक्ष्य है वर्तमान अनिश्चय की स्थिति का यथासंभव निजी लाभ उठा लिया जाए।

जो भी हो, अंगों में तेज़ी से चरम शिथिलता के लक्षण किसी की भी निश्चित आसन्न मृत्यु के साफ संकेत होते हैं और यूपी में भाजपा की राजनीति में ये लक्षण बिल्कुल साफ हैं। योगी जैसों का बाल भी बाँका न कर पाना यही बताता है कि वहाँ भाजपा अभी से पंगु हो चुकी है ; बस अपने दिन गिन रही है।

मोदी शासन की इस करुण दशा के बारे में हमारी इन सब बातों में कुछ भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में पिछले सात साल का इनका शासन इसका प्रमाण है। इन्होंने यही दर्शाया है कि  इनके पास अपने चुनिंदा लोगों को लाभ पहुँचाने के अतिरिक्त शासन का दूसरा कोई लक्ष्य नहीं है। जहाँ तक हिंदुत्व के मुद्दों का सवाल है, वे तो मूलत: सत्ता हासिल करने के उनके साधन हैं। कायदे से सत्ता पाने साथ ही उनकी कोई शासकीय उपयोगिता नहीं रहनी चाहिए थी। पर जब किसी के लिए साधन ही अकेला साध्य हो जाता है तो उसकी नियति है कि वह कोल्हू के बैल की तरह अपने ही वृत्त मैं घूमता रह जाता है। उसी में अपने निजी लोगों के स्वार्थों को साधना तो शामिल हो जाता है, पर शासन के दूसरे पाशुपत दायित्वों से वह कभी नहीं जुड़ पाता है; जन-जीवन के हर क्षेत्र में चरम पतन का कारक बनता है।

शिक्षा, चिकित्सा, ही नहीं, यहाँ तक कि सीमाओं की रक्षा में भी मोदी की विफलता चरम पर जा चुकी है। दुनिया जानती है कि चीन ने हमारी सीमा में घुस कर सीमा से लगे हुए सामरिक महत्व के ढेर सारे ठिकानों को अपने कब्जे में कर लिया है, पर मोदी, चीन से इस विषय में वार्ता के साथ ही अपनी लज्जा को छिपाने के लिए कहते जा रहे हैं कि चीन ने कुछ भी कब्जा नहीं किया है। उधर चीन और दुनिया हंस रही है।

जॉक लकान का एक महत्वपूर्ण कथन है कि “ज्ञान ‘अन्य’ का आनन्द होता है।” अर्थात्, जिस देश या समाज में अज्ञान का आदर होता है, वह देश व समाज ज्ञान की वध-भूमि बन जाता है। मोदी ने खुद अब तक इतनी मूर्खतापूर्ण बातें की हैं कि उनके वीडियों कॉमेडी वीडियो के बाजार के सबसे लोकप्रिय माल बने हुए हैं। उनके मंत्रिमंडल के सारे मन्त्री इस मामले में जैसे परस्पर से होड़ कर रहे हैं। भारत में शिक्षा के प्रसार का नहीं, अर्थ-व्यवस्था की तरह ही तीव्र संकुचन का दौर चल रहा है।

इस कोरोना काल में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था तो सारी दुनिया के लिए हंसी का विषय बन चुकी है। ‘प्रधानमन्त्री राष्ट्रीय राहत कोष’ एक बड़ा आर्थिक घोटाला साबित हो रहा है, जिससे अस्पतालों में घटिया गुणवत्ता के वैंटिलेटर की आपूर्ति से लोगों की जान से खेला गया है।

अभी जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में सभी निजी अस्पतालों को टीके के स्टॉक को सरकार को लौटा देने के लिए कहा है ताकि मुफ़्त टीकाकरण की केंद्र की घोषित नीति पर अमल हो सके, उसी समय हर कोई देख सकता है कि तमाम निजी अस्पताल अखबारों में बाकायदा टीकों की बिक्री के विज्ञापन जारी कर रहे हैं। सच कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष के दबाव से सबको मुफ़्त टीके की नीति की घोषणा में मोदी का निजी योगदान इतना सा ही है कि उन्होंने निजी अस्पतालों को 25% टीके अतिरिक्त दाम पर बेचने का अधिकार दे कर अभाव में ब्लैकमार्केटिंग की संभावना बनाए रखा है!

अर्थजगत की चर्चा इसलिए बेकार है क्योंकि इस क्षेत्र में इस सरकार का एक मात्र लक्ष्य आम लोगों से रुपये खींच कर अपने मित्रों के घर तक पहुंचाने के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है। जीडीपी में गिरावट का सिलसिला कहीं थमता नहीं दिखाई देता है, पर विकास के नाम पर प्रधानमन्त्री नये संसद भवन और प्रधानमन्त्री निवास के निर्माण में लगे हुए हैं।

जिसका चित्त अपनी ही छवि में अटका होता है, जोन किसी और की ओर ताकता है, न समय के किन्हीं संकेतों को समझता है, वही मरा हुआ मन ‘सेंट्रल विस्ता’ की तरह के क़ब्रों पर निर्मित स्थापत्यों में अपनी अमरता के सपने देख सकता है! दो दिन पहले ही जीएसटी कौंसिल की डिजिटल बैठक में मोदी के मंत्रियों ने बंगाल के वित्त मन्त्री अमित मित्रा की लाइन को म्यूट करके उनकी भागीदारी को रोक दिया और बहाना बनाया कि श्री मित्रा का कनेक्शन स्थिर नहीं था! यह है डिजिटल इंडिया का सच!

इस प्रकार पृष्ठ दर पृष्ठ इस सरकार की चौतरफा विफलताओं के न जाने कितने तथ्य रखे जा सकते हैं। यूट्यूब पर पूण्य प्रसून वाजपेयी हर रोज इनकी निकम्मई के आंकड़ें बांचते रहते हैं। फिर भी ‘आएगा तो मोदी ही’, कहने वाले प्रतिप्रश्न करते हैं कि इतनी महंगाई, भ्रष्टाचार और दमन के बावजूद लोग चुप क्यों हैं? दरअसल, वे नहीं जानते कि प्रतिवाद में अनायास ही फट पड़ना अन्ततः हमेशा प्रभु वर्गों को ही बल पहुँचाता है। जरूरी होता है क्रमिक रूप में लोगों के मन में चल रहे मौन विमर्श के तारों से जुड़ने की, और उसी की अभिव्यक्ति अभी बंगाल में हुई है। अन्य सब जगह भी इसके सिवाय और कुछ नहीं होगा।

बंगाल में भाजपा के 77 विधायकों की स्थिति अभी पहले के तीन विधायकों की ताकत से भी बदतर दिखाई देती है। पूरी भाजपा ऊपर से नीचे तक भरभरा कर टूट रही है। उसका राष्ट्रीय उप-सभापति मुकुल राय जिस ठाठ से टीएमसी में शामिल हुआ है, उस पर मोदी-शाह के पास कहने के लिए एक शब्द नहीं है। यह उनकी ही अब तक की तमाम राजनीतिक क्रियाओं की न्यूटन के नियम वाली स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही है! सचमुच, ‘चाणक्य की राजनीति’ का इससे बड़ा परिहास और क्या होगा!

बहरहाल, इतनी तमाम चीजों के बावजूद चैनलों पर प्रचारक का रूप ले चुके कुछ भाजपा विशेषज्ञ ऐंकरों की दशा को देख कर कहना पड़ता है कि उनकी विडम्बना है कि उन्हें हमेशा बेहद सड़े हुए कच्चे माल से अपनी चीज़ बना कर पेश करनी पड़ती है। इसीलिए अपने उत्पाद को उसकी सड़ांध से वे कभी बचा नहीं पाते हैं। इस दुर्गंध को कोई लल्लन टॉप की तरह के लोकप्रिय यूट्यूब चैनलों के कार्यक्रमों से भी यदा-कदा पा सकता हैं।

वाटरलू में नेपोलियन की पराजय के साथ नेपोलियन युग का अन्त हो गया था, वही बात मोदी पर लागू होती है। बंगाल में इनकी पराजय के साथ ही इनके समय का अन्त हो चुका है। अब ये घिसटते हुए कुछ दिन और बितायेंगे, कुछ कमजोरों को सतायेंगे, पर इन चंद दिनों को इन्हें असल में शक्तिविहीन होकर ही जीना होगा।

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अरुण माहेश्वरी

लेखक मार्क्सवादी आलोचक हैं। सम्पर्क +919831097219, arunmaheshwari1951@gmail.com
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