राजनीति

सामाजिक न्यायवादी दृष्टि और काँग्रेस

 

लोकसभा चुनाव 2024 का परिणाम आ चुका है और महाबली मोदी ने बैसाखियों के सहारे फिर से सरकार बना ली है। स्वाधीनोत्तर भारत के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चुनाव में विपक्ष ने कैसे अप्रतिरोध्य भाजपा के खिलाफ हैरतंगेज प्रदर्शन किया, इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका और आगे भी यह क्रम जारी रहने की उम्मीद है। मैंने इस चुनाव परिणाम का संकेत 2023 में प्रकाशित अपनी एक किताब ’सामाजिक न्याय की राजनीति के नये आइकॉन: राहुल गाँधी’ में ही कर दिया था।

कन्याकुमारी से कश्मीर तक चली जिस भारत जोड़ो यात्रा ने भाजपा द्वारा हजारों करोड़ खर्च करके राहुल गाँधी की अगम्भीर, बेपरवाह, कमअक्ल और पार्ट टाइम पॉलिटिशियन के रूप में बनाई गयी छवि को खण्ड-खण्ड कर नये जमाने के गाँधी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था, उस के समापन के बमुश्किल तीन सप्ताह बाद ही लोकसभा चुनाव 2024 की पृष्ठभूमि में 24-26 फरवरी, 2023 तक रायपुर में काँग्रेस का 85वां अधिवेशन आयोजित हुआ, जहाँ पार्टी ने पहली बार सामाजिक न्याय का पिटारा खोलकर देश और दुनिया को चौका दिया था। कोई सोच नहीं सकता था कि काँग्रेस जैसी सवर्णवादी पार्टी सामाजिक न्याय से जुड़े क्रान्तिकारी प्रस्ताव पास कराने में एक इतिहास रच देगी। किन्तु रायपुर अधिवेशन में काँग्रेस ने खुद में परिवर्तन करते हुए अपने को एक सामाजिक न्यायवादी दल के रूप में तब्दील कर लिया, जिसे समझने में आज भी अधिकांश बुद्धिजीवी व्यस्त हैं। अपने 85 वें राष्ट्रीय अधिवेशन में काँग्रेस ने सामाजिक न्याय से जुड़े जो प्रस्ताव पारित किए, उसी को आधार बनाकर उसने आगे का चुनावी एजेंडा स्थिर किया, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा।

भारतीय राजनीति की यह परीक्षित सच्चाई है कि चुनाव के सामाजिक न्याय पर केन्द्रित होने से भाजपा हार वरण करने के लिए विवश रहती है, इसलिए वह हेट पॉलिटिक्स को हिमालय सरीखी ऊँचाई देकर भी कर्नाटक चुनाव हार गयी। उसी कर्नाटक चुनाव में राहुल गाँधी ने कोलार में ‘जितनी जिसकी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा उछालकर दुनिया को न सिर्फ हैरान दिया, बल्कि दीर्घ काल के लिए ‘जितनी आबादी-उतना हक’ को अपनी राजनीति का मूलमन्त्र भी बना लिया था। कर्नाटक में जिस शिद्दत के साथ चुनाव को सामाजिक न्याय पर केन्द्रित करते हुए राहुल गाँधी ने ऐतिहासिक सफलता अर्जित की, उसे देखते हुए दलित बुद्धिजीवियों ने उन्हें सामाजिक न्याय के नये आइकॉन के रूप में वरण किया।

रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के एजेंडे का कर्नाटक में सफल प्रयोग के बाद काँग्रेस ने उस प्रयोग को 2023 के प्रायः शेष में 5 राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव में आजमाने का मन बनाया। किन्तु 3 दिसम्बर को जब चुनाव परिणाम आया देखा गया कि तेलंगाना को छोड़कार बाकी राज्यों में वह कर्नाटक की सफलता को दोहराने में विफल रही। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ में तमाम विश्लेषकों ने काँग्रेस के जीत की भविष्यवाणी कर दी थी,पर भीतरघात के चलते पार्टी की नैया किनारे जाकर डूब गयी। किन्तु, राहुल गाँधी इससे हताश होने के बजाय रायपुर से निकले विचार को आगे बढ़ाने के लिए दूने उत्साह के साथ 14 जनवरी 2024 से फिर भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़े। इस बार भारत जोड़ो के साथ उन्होंने ‘न्याय यात्रा’ को भी जोड़ लिया।

भारत जोड़ो न्याय यात्रा में आर्थिक और सामाजिक न्याय बना सबसे बड़ा मुद्दा

14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होकर 16 मार्च को मुम्बई में समाप्त हुई 63 दिवसीय ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में राहुल गाँधी का अधिकतम जोर रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के बुनियादी विचार को विस्तार देने पर रहा। आर्थिक और सामाजिक न्याय सबसे बड़ा मुद्दा है, यह बात राहुल गाँधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान लगातार उठाते रहे। यह आजाद भारत में किसी भी नेता ने राहुल जैसी स्पष्टता और शिद्दत के साथ नहीं उठाया। ऐसा करते हुए राहुल गाँधी बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की याद दिलाते रहे। यह डॉ. अम्बेडकर थे, जिन्होंने भारत का संविधान राष्ट्र को सौंपने के एक दिन पूर्व 25 नवम्बर, 1949 को संसद के सेंट्रल हॉल से चेतावनी देते हुए कहा था कि हमें निकटतम समय के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतन्त्र के उस ढाँचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने बहुत मेहनत से बनाया है।

किन्तु अपनी वर्णवादी सोच के हाथों मजबूर होकर स्वाधीन भारत के शासकों ने इस दिशा में ठोस कदम उठाया ही नहीं और विषमता की खाई उत्तरोत्तर बढ़ती रही। आज आर्थिक और सामाजिक विषमता के मामले में भारत ने शीर्ष देशों में अपनी जगह बना ली है, पर देश के नेता ही नहीं, बुद्धिजीवी तक इस पर मुँह खोलने से बचते रहे हैं। जहाँ तक सामाजिक न्याय का सवाल है अधिकांश नेता और बुद्धिजीवी इसे सरकारी नौकरी, शिक्षा और प्रमोशन में आरक्षण इत्यादि तक सीमित रखे। किन्तु राहुल गाँधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान इसे नौकारियों से आगे बढ़कर धन- सम्पदा और संस्थाओं के बँटवारे तक प्रसारित करने का प्रयास किया।

वह सड़कों पर लाखों की तादाद में उमड़ी वंचित जनता से लगातार पूछते रहे कि देश में जो शीर्ष की 500 कम्पनियाँ हैं उनमें कितनों के मालिक और मैनेजर दलित, आदिवासी और पिछड़े हैं? कितने हॉस्पिटल, अखबार और मीडिया संस्थान इत्यादि दलित, आदिवासी और पिछड़ों के हैं? आजाद भारत के इतिहास में जनता के बीच जाकर ऐसे सवाल उनसे पूर्व किसी ने नहीं उठाये थे। राहुल गाँधी यह बात समझ गये हैं कि आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करा कर ही भारत को बेहतर देश बनाया जा सकता है। इसलिए जब उन्होने यह कहा- हमारा उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक: दोनों तरह का न्याय सुनिश्चित कराना है और जाति जनगणना इस दिशा में पहला कदम है, तो सामाजिक अन्याय के सदियों के शिकार तबकों ने उनपर विश्वास किया।

आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित कराने के क्रम में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के शेष होते-होते पाँच न्याय और 25 गारंटियों का विचार सामने आया जिसका परिष्कृत रूप 5 अप्रैल को 5 न्याय, 25 गारंटी और 300 वादों से युक्त ‘न्याय पत्र’ के नाम से जारी काँग्रेस के 48 पृष्ठीय घोषणापत्र में सामने आया। तमाम राजनीतिक विश्लेषकों ने एक स्वर में इसे क्रान्तिकारी करार देते हुए माना कि ऐसा घोषणापत्र इससे पहले कभी नहीं आया। जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि यह चुनाव महज एक औपचारिकता है और मोदी के नेतृत्व में एनडीए 400 पार कर लेगा, ऐसे लोगों की धारणा में काँग्रेस के घोषणापत्र ने रातोंरात बदलाव ला दिया।

वास्तव में काँग्रेस का घोषणापत्र सामाजिक न्याय का परमाणु बम था, जिसकी अनुगूँज पूरे देश में सुनाई पड़ी और भाजपा दहल गयी। आरक्षण का 50 प्रतिशत दायरा तोड़ने, महिलाओं को नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने, अमेरिका की भाँति ही भारत में डाइवर्सिटी कमीशन (विविधता आयोग) गठित करने, राष्ट्रव्यापी आर्थिक- सामाजिक जनगणना कराने, एससी,एसटी,ओबीसी के लिए आरक्षित सभी रिक्त पदों को एक साल में भरने,सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में संविदा की जगह स्थायी नौकरी देने, एससी,एसटी वर्ग के ठेकेदारों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक खरीद का दायरा बढ़ाने, सामाजिक न्याय का सन्देश फैलाने के लिए बहुजन समाज सुधारकों की जीवनी और उनके कार्यों को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने, शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव को खत्म करने के लिए रोहित वेमुला अधिनियम बनाने सहित ढेरों ऐसी बातें काँग्रेस के घोषणापत्र में थीं, जिससे चुनाव अभूतपूर्व रूप से सामाजिक न्याय पर केन्द्रित हो गया: ऊपर से राहुल गाँधी द्वारा संविधान और आरक्षण बचाने की घोषणा ने सामाजिक न्याय के मुद्दे को और ऊँचाई दे दी।

2015 में बिहार और 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में और दोनों ही बार भाजपा हारने के लिए विवश रही। लेकिन 2024 का लोकसभा चुनाव 2015 के बिहार और 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव से भी ज्यादा जोरदार तरीके से सामाजिक न्याय पर केन्द्रित हुआ।

इसकी काट ढूँढने में मोदी पूरी तरह असफल रहे। लोगों को उम्मीद थी कि भाजपा के घोषणापत्र में काँग्रेस के न्याय पत्र का योग्य जवाब मिलेगा, किन्तु संकल्प- पत्र के रूप में आया भाजपा का घोषणापत्र खोदा पहाड़ निकली चूहिया साबित हुआ। मोदी इसकी काट न ढूंढ पा कर उद्भ्रांत ही नहीं हुए, ऐसा लगता है उनका मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया। इसी मानसिक स्थिति ने उन्हे मुसलमान, मंगलसूत्र, मटन, मछली, मुजरा की ओर बढ़ने के लिए विवश कर दिया। इस चुनाव में वह बुरी तरह एक्सपोज होकर जाहिलों की जमात में शामिल हो गये तो उसके लिए जिम्मेवार सामाजिक न्याय का परमाणु बम बना काँग्रेस का घोषणापत्र ही रहा। प्रधानमन्त्री की बौखलाहट ने साबित कर दिया कि विपक्ष यदि चुनाव को सामाजिक न्याय पर खड़ा कर दे तो भाजपा असहाय बनने के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकती।

काँग्रेस घोषणापत्र

काँग्रेस के घोषणापत्र ने जहाँ मोदी-शाह-योगी को बुरी तरह बौखला कर रख दिया, वहीं इसने इण्डिया गठबन्धन में नयी जान फूँक दी। सभी ने माना है कि इस चुनाव में जनता साधनविहीन इण्डिया की ओर से लड़ रही थी और ऐसा हुआ भी। ज्यों-ज्यों घोषणापत्र का कंटेन्ट जनता तक पहुंचते गया, जनता इण्डिया की सभाओं में अधिक से अधिक मात्रा में जुटने लगी। अगर चुनाव के आखिरी दो तीन चरणों में भीड़ भाजपा के गढ़ उत्तर प्रदेश में बैरिकेड तोड़ कर राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के पास पहुचने का प्रयास करने लगी तो उसके पीछे सामाजिक न्याय की कर्मसूचियों से लबालब भरा काँग्रेस का घोषणापत्र ही था। इस भीड़ को देखकर बहुतों ने सवाल उठाया कि क्या यह वोट में तब्दील होगी? लेकिन सवाल उठाने वालों को भ्रांत प्रमाणित करते हुए यह भीड़ इस कदर वोट में तब्दील हुई कि हिन्दुत्व की हृदय स्थली यूपी में भाजपा की कमर ही टूट गयी। यदि यहाँ जांच एजेंसियों, केचुआ और खासकर मायावती की बसपा का सपोर्ट नहीं मिलता तो भाजपा 10-12 पर सिमट जाती और देश में इण्डिया गठबन्धन की सरकार नजर आती। अब सवाल सवाल पैदा होता है लोकसभा 2024 का चुनाव तो खत्म हो गया और भाजपा ने गठबन्धन की सरकार भी बना ली, पर आगे क्या होगा!

जहाँ तक भविष्य की राजनीति का सवाल है जिस तरह काँग्रेस पार्टी ने अपनी पूरी राजनीति सामाजिक न्याय पर केन्द्रित की है, उससे आने वाले दिनों में ब्राह्मणों को छोड़कर उसके कोर वोटर: दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एक बार फिर नये उत्साह से उसके साथ जुड़ेंगे। ब्राह्मणों की जगह पिछड़े भी उसके साथ लामबन्द होंगे। फलतः इसका नये सिरे से भारतीय राजनीति पर उसी तरह वर्चस्व स्थापित होगा, जैसा आजादी के बाद के दशकों में हुआ। यह वर्चस्व लम्बा इसलिए खींचेगा क्योंकि काँग्रेस की सामाजिक न्यायवादी राजनीति तबतक सर्वशक्ति से क्रियाशील रहेंगी जबतक हिन्दू धर्म के जन्मजात वंचित तबकों की कम्पनियों, शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, मीडिया, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी इत्यादि हर जगह में वाजिब हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं हो जाती।

चूँकि ऐसा होने में समय लगेगा, इसलिए वंचित उसे लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने का अवसर देते रह सकते हैं। इस चुनाव के शेष होते-होते जो राहुल गाँधी प्रधानमन्त्री के रूप में जनता की पसन्द के मामले में मोदी को पछाड़ चुके है, वह कर्नाटक के बाद इस चुनाव में पार्टी की सफलता से उत्साहित होकर काँग्रेस में घोषणापत्र में आए सामाजिक न्याय के एजेंडे को एक-एक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए देश के चप्पे-चप्पे को नापेंगे। इससे स्वतन्त्र बहुजन राजनीति का उभार बाधित होगा और एम के स्टालिन, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन इत्यादि सहित बाकी सामाजिक न्यायवादी नेता काँग्रेस के साथ मिलकर सत्ता में भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ेंगे। मायावती भी अपनी पार्टी का वजूद बचाने के लिए काँग्रेस के साथ जुड़ने के लिए बाध्य हो सकती हैं। कुल मिलाकर आने वाले वर्षों में राहुल गाँधी के नेतृत्व में देश में आर्थिक-सामाजिक क्रान्ति घटित होने जा रही है। चूँकि यह परीक्षित सच्चाई है कि क्रान्ति के साथ प्रतिक्रान्ति भी होती है, इसलिए आने वाले दिनों में भारत में प्रतिक्रान्ति भी होगी, जिसका नेतृत्व करेगी भाजपा!

क्रान्तियों का इतिहास बताता है कि जब क्रान्तिकारी परिवर्तन के हालात बनते हैं तो मौजूद वयवस्था से लाभान्वित तबका उस पर रोक लगाने के लिए लामबन्द होता है। ऐसा तबका नितांत रूप से रूढ़िवादी होता है और यथास्थितिवाद को बनाये रखने के लिए यह धर्म और परम्पराओं को हथियार बनाता है। भारत में भाजपा इसकी मिसाल कायम कर चुकी है! 7 अगस्त , 1990 को प्रकाशित मण्डल रिपोर्ट के जरिए जब वर्ण-व्यवस्था के वंचितों- दलित, आदिवासी और पिछड़ों- के जीवन में क्रान्तिकारी बदलाव के हालात बने, वह रांमजन्मभूमि मुक्ति के नाम पर धर्म और परम्पराओं को बचाने का आन्दोलन छेड़ दी, जिसमें उसके संगी बने सुविधाभोगी वर्ग के छात्र और उनके अभिभावक, लाखों साधु-सन्त, लेखक-पत्रकार और धन्ना सेठ।

उसी आन्दोलन के जोर से वह न सिर्फ सत्ता पर काबिज होकर अप्रतिरोध्य बनी, बल्कि उससे मिली राजसत्ता का इस्तेमाल उसने दलित- बहुजनों को उस स्टेज में पहुँचाने में किया, जिसमें बने रहने का निदेश हिन्दू धर्मशास्त्र देते हैं। तो मण्डल उत्तरकाल में प्रतिक्रान्ति के जोर से सत्ता पर एकाधिकार का भोग कर चुकी भाजपा आने वाले दिनों में राहुल के अभियान के खिलाफ फिर से धर्माधारित आन्दोलन खड़ा करने की दिशा में अग्रसर हो सकती है, जिसमें उसके संगी बन सकते है केजरीवाल, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक इत्यादि जैसे तमाम सवर्ण नेता! इस क्रम में भाजपा अयोध्या के बाद काशी- मथुरा सहित गुलामी के अन्य प्रतीकों की मुक्ति का आन्दोलन छेड़ने के दिशा में आगे बढ़ सकती है, लेकिन वह सफल नहीं होगी। जिस तरह इस चुनाव में काँग्रेस के सामाजिक न्यायवादी घोषणापत्र के समक्ष नरेंद्र मोदी उद्भ्रांत हुए हैं, आगे भी वही होगा।

अगर काँग्रेस का प्रदेश और जिला नेतृत्व काँग्रेस के घोषणापत्र के सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने में 50 प्रतिशत भी रुचि ली होती, चुनाव परिणाम कुछ और होता। चुनाव के दौरान जो ढेरों सवर्ण नेता भाजपा में शामिल होकर पार्टी का मनोबल तोड़ने का काम किये, उसके पृष्ठ में उनके अन्दर क्रियाशील प्रतिक्रियावादीवादी तत्त्व ही मुख्य रूप से जिम्मेवार रहा। आने वाले दिनों में राहुल गाँधी जिस एजेंडे को लेकर आगे बढ़ने जा रहे हैं, उसमें न्यायप्रिय व विवेकवान सवर्ण नेता ही पार्टी का साथ दें सकते हैं और ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम है। ऐसे में राहुल गाँधी यदि सामाजिक न्याय की राजनीति की जोर से महात्मा गाँधी, अम्बेडकर, नेहरू इत्यादि के समतामूलक भारत निर्माण के सपनों को आकार देना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले काँग्रेस संगठन में ‘जितनी आबादी- उतना हक’ का सिद्धांत लागू करना होगा!

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एच एल दुसाध

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्क- 9654816191, hl.dusadh@gmail.com
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