राजनीति

तिपहिया पर सवार सरकार

 

 चार जून को आम चुनाव के परिणाम आ गये। परिणामों ने दस सालों से बहुमत की कार में सवार मोदी सरकार को एक झटके में तिपहिया पर सवार एनडीए की सरकार बना दिया। एनडीए को कूड़ेदान में डालकर 282 और 303 के दम पर हुंकारें भरने वाली मोदीजी की सरकार 240 पर अटक गई तो अचानक याद आ गये भुला दिए गये एनडीए के घटक। दस साल में किसी ने एनडीए या उसकी एक भी बैठक के बारे में कभी नहीं सुना। अहंकार और किसे कहते हैं।

“रहिमन देखी बड़ेन को,लघु न दीजिए डार।

जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवार।।”

     2024 के चुनाव परिणामों के निहितार्थ तो आप आसानी से समझ और बता सकते हैं कि जनता ने निरंकुश शासन को उखाड़ दिया। यह तो हुआ सतही निष्कर्ष। इसको हम समग्रता से समझने का प्रयास करेंगे। इसके लिए हमें 2001 के बाद के इतिहास के पन्नों को पलटने की ज़रूरत है।

      कहावत है, जैसी करनी वैसी भरनी। अनुभव से पैदा कहावतें व्यावहारिक जीवन में अक्सर भुला दी जाती हैं। आज तिपहिया पर सवार दिल्ली की सरकार के मुखिया ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि कभी हमारा भी हाल महाराष्ट्र जैसा होगा जहां उन्हीं की मेहरबानी से 2022 से तिपहिया सरकार चल रही है।

    समय बहुत बलवान होता है और जो इस सार्वभौम सत्य को भूल जाता है उसे समय पटखनी जरूर देता है। महाराष्ट्र लोकसभा सीटों के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा बड़ा राज्य है लेकिन केंद्र सरकार को कर देने में पहले नंबर का राज्य है। महाराष्ट्र पर कब्जा करने के लिए दिल्ली से जो साजिशें हुई वह सर्वविदित है। मुख्यमंत्री का शपथ समारोह एक आयोजन होता है जिसमें पक्ष,प्रतिपक्ष के सदस्यों के अतिरिक्त मीडिया आदि भी आमंत्रित रहते हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार देवेन्द्र फड़नवीस को मुंह अंधेरे बिना किसी की जानकारी के, गुपचुप तरीके से जिस तरह मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई वह केवल महाराष्ट्र ही नहीं देश की राजनीति का काला अध्याय है। दिल्ली के दो बड़े नेताओं के इशारे पर हुई इस कार्रवाई में महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भी शामिल थे।  

     वैचारिक रूप से करीब और बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना की मदद से ही बीजेपी महाराष्ट्र में पैर जमा पाई। राज्य पर सत्ता जमाने के लिए मोदीजी-शाह ने उसी शिवसेना को खरीद-फरोख्त से तोड़ दिया। सत्ता तो पा ली लेकिन महाराष्ट्र की जनता का विश्वास खो दिया जो लोकसभा चुनावों के परिणामों में साफ दिखाई दिया। दिल्ली के दोनों बड़े नेताओं ने बहुत महंगा सौदा किया।

मुंबई महानगर पालिका निगम के चुनाव का भी यही हाल है। इसका वार्षिक बजट साठ हजार करोड़ है जो देश के आठ राज्यों के वार्षिक बजट से भी अधिक है। देश की व्यावसायिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई के महानगर पालिक निगम का चुनाव, लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र दिल्ली के इशारों पर दो साल से लंबित है। आशा है कि शायद अब हो जाए।

       बीजेपी के इन दोनों बड़े नेताओं की राजनीति कुर्सी से शुरू होती है और कुर्सी हथियाना और उस पर बने रहना ही इनका अंतिम लक्ष्य है। इसके लिए जो भी करना पड़े सब जायज है। इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं। गुजरात में जिस तरह सत्ता हासिल की और तेरह साल तक जिस तरह चलाई वह अब सारा देश जानता है। उन तेरह वर्षों में गुजरात में अधिकांश मानव सूचकांको में 2001 के मोदी जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद गिरावट ही देखी गई। आर्थिक विकास की बात करें तो गुजरात हमेशा से ही आर्थिक रूप से विकसित राज्य रहा है। कार्पोरेट मित्रों के लिए सरकारी जमीनों और खजाने की लूट भी उसी दौर में शुरू हो चुकी थी जिसका भंडाफोड़ अब हुआ है। तब वह खबरें राज्य की सीमाओं से बाहर नहीं पता थीं। गुजरात में सफलता हिंदुत्व, मुसलमानों के प्रति नफरत और कार्पोरेट मित्रों के धनबल के दम पर थी। केबिनेट, दिल्ली की ही भांति, सजावट की चीज़ थी। सभी फैसले मोदीजी ही लिया करते थे। दिल्ली की राजनीति में प्रवेश के लिए “गुजरात के विकास मॉडल” का गुब्बारा खूब फुलाया और सफलतापूर्वक प्रचारित भी किया गया एक विदेशी एजेंसी के जरिए। देश की जनता को विश्वास दिला दिया कि देश को कुशासन और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाकर विकास के मार्ग पर एक ही नेता ले जा सकता है और वह नेता है, नरेंद्र दामोद रदास मोदी। खूब प्रचार हुआ मोदी लहर का जिसमें हिन्दी पट्टी और पश्चिम भारत के राज्य ही डूबे लेकिन उत्तर, दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्य अछूते रहे। बावजूद इसके चक्रवर्ती सम्राट के रूप में मोदीजी की “लार्जर देन लाइफ” छवि जनता के सामने पेश की गई।

      सरकार तो बना ली लेकिन 240 सीटों से सत्ता की छांह देने वाला तंबू नहीं बनता। घटक दलों की सुइयों से थिगड़े सिल-सिलकर सरकार बन तो गई पर कब कौन से थिगड़े उधड़ जाएं और सिर से सत्ता की छांह उड़ जाए इसका भरोसा नहीं।

      यह सब अचानक नहीं हुआ। विगत दस सालों में सत्ता के मद में शासक भूल गये कि जो जनता वादों पर भरोसा कर सत्ता सौंपती है वही जनता वादाखिलाफी पर सत्ता छीन भी सकती है। सत्ता, अब्राहम लिंकन ने दी लोकतंत्र की परिभाषा तो भूली ही साथ में लिंकन का कथन भी भूल गई कि “आप कुछ लोगों को हमेशा बेवकूफ बना सकते हैं। सभी लोगों को कुछ समय के लिये बेवकूफ बना सकते हैं। लेकिन आप सभी लोगों को हमेशा के लिए बेवकूफ नहीं बना सकते।”

      नफरत, सांप्रदायिक जहर और हिंदुधर्म की रक्षक बनकर सत्ता हासिल करने वाली बीजेपी और उसके नेता इतिहास के सबक भूल गये। जो इतिहास भूलता है उसका भविष्य बिगड़ता है। चुनावों में जीत के मद्देनज़र शंकराचार्यों और अन्य धर्माचार्यों के विरोध के बावजूद राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का मेगा इवेंट आयोजित किया। बहुत भरोसा था कि राम एक बार फिर चुनावी वैतरणी पार लगा देंगे। लेकिन यह इतिहास का सबक भूलने की बड़ी भूल थी। इसीलिए आज सरकार, गोदी मीडिया और चुनावी पंडित, अयोध्या और उसके आसपास के संसदीय क्षेत्रों में बीजेपी की हार पर हैरान हैं क्योंकि वे 1993 के चुनाव में जनता ने सिखाए सबक भूल गए। दिसंबर, 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की बीजेपी सरकार थी। एक साल बाद दिसंबर 1993 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सिर्फ अयोध्या, फैजाबाद ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की जनता ने राम के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति को ठुकरा दिया था। जहां ध्वंस करके बीजेपी ने पूरे देश को धर्म की आग में झोंका, वहां के लोगों ने धर्म की राजनीति के खिलाफ वोट दिया। उन चुनावों में अयोध्या, फैजाबाद की पांच विधानसभा सीटों में से तीन पर सपा, एक पर सीपीआई और केवल एक सीट पर बीजेपी का उम्मीदवार जीता था। लोकसभा चुनाव में सांसद भी सीपीआई का जीता था। बीजेपी सर्वाधिक 174 सीटें जीतने के बाद भी 241 के बहुमत के आंकड़े से बहुत पीछे रह गई थी।

      2024 के चुनावों में क्या किसी ने मोदीजी को बीजेपी के संकल्प पत्र पर बोलते सुना? हर भाषण में मोदीजी केवल कांग्रेस के न्यायपत्र के बारे में ऐसे झूठ बोले कि कोई मंदबुद्धि भी उन बातों पर यकीन नहीं कर सकता। मोदीजी के उन भाषणों को सुनकर एक करोड़ से भी ज़्यादा लोगों ने कांग्रेस का न्यायपत्र गूगल से डाउनलोड कर पढ़ा। स्वयं कांग्रेस के लिए भी सीमित साधनों के चलते उसके चुनावी मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाना संभव नहीं था। यह काम मोदीजी ने उनके भाषणों से कर दिया। आश्चर्य होता है कि मोदीजी जैसा अनुभवी और चतुर नेता इस गलती को क्यों नहीं समझ पाया? उनके किसी भी सलाहकार ने क्या इस गलती की ओर उनका ध्यान आकृष्ट नहीं किया? यह भी संभव है कि अहंकार के कारण मोदीजी ने ही किसी से सलाह नहीं ली हो या सलाह पर ध्यान नहीं दिया। जो भी हुआ उससे कांग्रेस को जरूर लाभ हुआ। कांग्रेस को इस बिना खर्च प्रचार के लिए मोदीजी का आभारी होना चाहिए।

      2024 के चुनावों को 2014 और 2019 के चुनावों की रोशनी में देखें तो पता चलेगा कि बीजेपी कभी भी खुद के मुद्दों के दम पर नहीं जीती। 2014 में यूपीए सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ शोर मचाकर बीजेपी चुनाव जीती। उसके अलावा जो भी चुनावी वादे थे वे मुद्दे नहीं बल्कि चुनावी जुमले थे। इस बात को तो खुद गृहमंत्री अमित शाह ने भी माना था। 2016 की नोटबंदी ने आम जनता को बड़ा धक्का लगा लेकिन कालाधन बाहर नहीं आया। इसके अलावा मनमाने प्रावधानों वाली जीएसटी के तानाशाही कदम ने जनता को महंगाई की आग में झोंक दिया। इन दोनों को मोदीजी का मास्टरस्ट्रोक कहकर प्रचारित किया गया जिसका ज़िक्र खुद मोदीजी ने दुबारा कभी नहीं किया। 2018 तक बीजेपी की लोकप्रियता को बहुत कम कर दिया था। 2018 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ विधानसभा चुनाव के परिणाम बतलाते थे कि हिन्दी पट्टी में भी बीजेपी की लोकप्रियता ढ़लान पर थी। हरियाणा में भी जोड़तोड़ से ही बीजेपी की सरकार बनी थी।

      इसके बावजूद आईटी सेल, सरकारी नियंत्रण से पालतू बन चुके प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए “मोदी है तो मुमकिन है”, “मोदी नहीं तो कौन” “मोदी मैजिक” का रंगीन मायाजाल बिछाकर सच्चाई को बहुत गहरे दफन कर दिया गया। किसी ने नहीं सोचा कि मैजिक क्या केवल हिन्दी बेल्ट को भाता है? यह नहीं सोचा कि अगर यह मैजिक है तो यह दक्षिण भारत के राज्यों, आंध्र से लेकर केरल तक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में क्यों नहीं चलता? दरअसल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा जैसे गरीबी, भूख, बेरोज़गारी से ग्रस्त राज्यों में झूठे सपने आसानी से मैजिक बताकर बेचे जा सकते हैं। यही किया भी। परिणाम सकारात्मक ही रहा। बीजेपी की कुल सीटों में इन राज्यों से मिलने वाली सीटों की संख्या इस बात का सबूत है।

      लेकिन 2019 के पुलवामा हादसे और जवानों की शहादत ने बीजेपी को राष्ट्रवाद का मुद्दा थमा दिया। मोदीजी और बीजेपी ने शहादतों को भुनाकर पहले से भी 21 अधिक सीटें हासिल कर ली। इस जीत के बाद तो जैसे अधिनायकवाद को पंख लग गए। सदन के अंदर और बाहर भी विपक्ष के अपमान और तिरस्कार की सभी सीमाएं लांघ दी। उनकी भाव,भंगिमा और भाषा दोनों प्रधानमंत्री पद की गरिमा को गिराने वाली हैं। पश्चिम बंगाल की चुनाव सभा में उनका महिला मुख्यमंत्री का उपहास, दीदी ओ दीदी लोग भूले नहीं हैं। किसान आंदोलन में शहीद हुए किसानों के लिए उनका कहना कि “वे क्या मेरे लिए मरे” भी लोगों को याद है। 2020 में “नमस्ते ट्रंप” की इवेंट बाजी के चक्कर में तमाम चेतावनियों के बावजूद कोविड महामारी की उपेक्षा की भारी कीमत देश ने चुकाई। तमाम विशेषज्ञ सलाहों के दरकिनार कर अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगाने ने देश में तबाही मचा दी। लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों को बिना रोज़गार एक ही रात में सड़क पर ला खड़ा किया। गांव लौटने के लिए भूखे,प्यासे मजदूरों ने सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल तय किया।

      भ्रष्टाचार के खिलाफ सख़्त कार्रवाई का जनता को दिखाया सपना भी जल्द ही टूट गया। बीजेपी को लोग वाशिंग मशीन कहते हैं जिसमें घुसकर भ्रष्टाचारी बीजेपी का सदाचारी सदस्य बन जाता है।

      2024 के चुनाव की तुलना हम 1977 के चुनावों से कर सकते हैं जिसमें जनता सत्ता के खिलाफ लोकतंत्र और संविधान को बचाने की खातिर चुनाव लड़ी थी।

     मोदीजी के तानाशाही शासन तथा 400 पार का नारा और उससे लोकतंत्र और संभावित खतरे के कारण जनता ने बीजेपी के खिलाफ वोट दिया यह सच है पर यह अकेला सच नहीं है। उससे बड़े सच हैं गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई और बीजेपी का भ्रष्टाचार।

      मोदीजी ने इस चुनावी परिणाम से कुछ सबक सीखा है ऐसा नवगठित मंत्रिमंडल को देखकर नहीं लगता। 72 मंत्रियों वाले भारी-भरकम मंत्रिमंडल में सिख,बौद्ध और ईसाई हैं लेकिन मुस्लिम एक भी नहीं है। मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत और तिरस्कार का खुलेआम प्रदर्शन किया है। भारतीय राजनीति में बेशर्मी का प्रदर्शन टीडीपी और पलटूराम नीतीश बाबू ने मोदीजी की सांप्रदायिक सरकार का समर्थन करके किया है। चुनाव पूर्व गठबंधन और चुनाव बाद गठबंधन जनता के साथ धोखे के सिवाय कुछ नहीं जो चंद्राबाबू और नीतीश बाबू ने किया है।

      पहले के अनुभव बतलाते हैं कि जिस पार्टी ने बीजेपी को सहयोग दिया मोदीजी-शाह की जोड़ी ने उसी को तोड़ दिया। नीतीश- नायडू वही गलती कर रहे हैं। राजनीति धैर्य का खेल है जिसमें तात्कालिक लाभों के लिए दीर्घकालिक लाभों की बली नहीं चढ़ाई जाती। राजनीति में इक़बाल की बड़ी अहमियत होती है। भारतीय राजनीति में अटल बिहारी बाजपेई, आडवानी, इंद्रजीत गुप्त, मधु दंडवते, मुलायम सिंह यादव, जार्ज फर्नांडिस जैसे कई नेता हुए हैं जो सत्ता में रहें या न रहें ,राजनीति में उनका इक़बाल हमेशा बना रहा। जनता में उनकी स्वीकार्यता प्रचार से नहीं उनकी योग्यता से थी। इन चुनाव परिणामों ने मोदीजी के प्रचार से पैदा इक़बाल को लगभग खत्म कर दिया है। मोदीजी को यही लगता है कि तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर नेहरू की बराबरी कर ली। लेकिन नेहरू जैसा राजनीतिक इक़बाल वे कहां से लाएंगे

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श्रीकांत आप्टे

लेखक व्यंग्यकार, स्तम्भकार, नाटककार एवं चित्रकार हैं। इनके दो व्यंग्य संग्रह, तीन नाटक और लगभग एक हजार व्यंग्य रचनाएं प्रकाशित हैं। सम्पर्क +91 9179990388, shrikant1953@gmail.com
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