सिनेमा

थप्पड़ हो या कोड़े चलते हैं गुलामों पर ही 

 

थप्पड़ यानी हिंसा। हिंसा माने अपमान। अपमान माने अस्वीकार। अस्तित्व का अस्वीकार। किसी मनुष्य के लिए प्रखर पीड़ा का पल। गहन अन्धकार।

थप्पड़ मारने का अधिकार। प्रेम के रास्ते चाहिए यह अधिकार। पुरुष ले लेता है यह अधिकार। लेता आ रहा है यह अधिकार सहज ही। पुश्तैनी अधिकार की तरह। करता है दावा। करता है प्यार।

कहीं कोई प्रतिकार नहीं। सहती आ रही हैं औरतें। माँ ने सिखाया है। सहो। माँ को उनकी माँ ने सिखाया है। सहो। माँ की माँ को सिखाया है उनकी माँ ने। सहो। सहती हैं औरतें। क्यों सहती हैं औरतें? कि टूट जाएगी गृहस्थी। जिन औरतों को नहीं पड़ता है थप्पड़, वे भी मारती हैं अपना मन। घर खुश। सब खुश। सब मगन। कोई नहीं सोचता , जो मार रहा है मन , क्या चाहता है उसका मन। औरत का मन। पत्नी का मन। माँ का मन। बहन का मन?

क्यों उठ ही जाता है हाथ पुरुषों का औरतों पर? क्योंकि माँ ने नहीं सिखाया है अपने बेटों को कि मत उठाओ हाथ औरत पर  यानी पत्नी पर। यह सरलीकरण निष्कर्ष दिया है अनुभव सिन्हा ने। लिखी है इन्होंने कहानी थप्पड़। बनाई है फिल्म थप्पड़। निर्देशन किया है अनुभव सिन्हा ने। एक चुस्त फिल्म है थप्पड़। लेकिन अगर फिल्म को जरा गौर से देखेंगे तो दिखेगा कि थप्पड़ अनायास ही नहीं उठते हैं। उसके पीछे होती है सोच की पृष्ठभूमि।

आइए, इस सोच का रेखांकन करने वाले दो – तीन संवाद देखते हैं :

पहला : पहले दिन जब गाड़ी आफिस के लिए निकलती है, एक क्रासिंग पर रुकती है। बगल में किसी  एक गाड़ी के हठात ब्रेक लगाने की हल्की सी आवाज आती है। और तब एक संवाद आता है :

– नहीं संभाल सकती तो क्यों निकलती है। या इससे मिलता जुलता हुआ संवाद

दूसरा :  दूसरे दिन गाड़ी के निकलने के दृश्य में संवाद देखें

– करती क्या है?

– मेहनत। मैं भी गाड़ी चलाना सीख लूं?

– पहले पराठे बनाना सीख लो

इन दो दृश्यों के संवाद से पुरुष की सोच और थप्पड़ की तैयारी का पता चलता है।

थोड़ा सा और देखिए, जरा महीन तरीके से लड़की मायके से अपने पति के साथ लौट रही है। माँ पूछती है :

– क्या हुआ पाँव में?

– थोड़ी चोट लग गयी।

कट टू बेडरूम। यहाँ कोई संवाद नहीं। दृश्य बतलाता है। बतलाने में सहायक है परिधान भी। लड़की चोट लगे पाँव में मलहम लगा रही होती है।

कट टू मार्निंग

शॉट ऐसा कि बताता है कि संभोग सम्पन्न हुआ है। इस सिक्वेंस के दो अर्थ हैं। एक पाँव में चोट होने के बावजूद बिस्तर की ड्यूटी और दूसरा यह रेफरेंस प्वाइंट बनता है प्रेग्नेंट होने का।

अगर आपने यह सब गौर नहीं किया है तो भी फिल्म का आनन्द लेने में या कथ्य समझने में कोई बाधा नहीं है। लेकिन देखा है, तो आनन्द बढ़ जाता है। कथ्य का रेशा रेशा खुलता है।

विचार और कथ्य के स्तर पर फिल्म थप्पड़ विवाह संस्था पर भी  विचार करती है। विवाह संस्था की आधुनिक व्याख्या से असहमति जताती है यह फिल्म। आधुनिक व्याख्या यह है कि विवाह एक डील है। कॉन्ट्रैक्ट है। निवेश है। अनुभव सिन्हा इस सोच से असहमत हैं। सही भी है यह मानवीय सोच नहीं है। यह बाजार व्यवस्था से उपजी दृष्टि है। इसके बरक्स उनकी माँग है कि विवाह की आधार भूमि प्रेम होनी चाहिए। सहयात्री होने की एकमात्र शर्त सम्मान होगी। यह बुनियादी और न्यूनतम माँग है। दिक्कत तब होती है जब हम देखते हैं कि तलाक के लिए सोच – भिन्नता को काफी माना गया है। स्त्री के अपमान को सामान्य मान लेने की प्रवृत्ति को यह फिल्म नहीं मानती।

फिल्म देखना केवल कहानी देखना नहीं है। या निर्देशक की दृष्टि जानना भर नहीं है। निर्देशक के लिए यह चुनौती होती है कि वह कहानी में गुंथे विचार को स्क्रीन पर कैसे संप्रेषणीय बनाता है। उसकी यह रचनात्मकता ही सिनेमा – दर्शकों के लिए  अनुभव बनती है। यह अनुभव ही फिल्म देखना होता है।

फिल्म की सामान्य पद्धति है, आरम्भ में पात्रों और विषय से दर्शकों का परिचय कराना। थप्पड़ का आरम्भ कोलाज सिक्वेंस से होता है। इस सिक्वेंस के माध्यम से फिल्म अपने किरदारों से केवल परिचय नहीं कराती है, फिल्म के केन्द्रीय विषय में भी दर्शकों को उतार लेती है। क्या है केन्द्रीय विषय इस फिल्म का? थीम है स्त्री के प्रति पुरुष का व्यवहार, स्त्रियों को उनके हिस्से का श्रेय और सम्मान न देना और अगर कुछ ऋणात्मक है तो उसके लिए स्त्री को जिम्मेदार ठहराना।

कोलाज के बाद फिल्म विधिवत  शुरू होती है। पहला दृश्य देखिए : एक युवक अपने कंप्यूटर पर प्रेजेंटेशन तैयार कर रहा है और वह अपनी पत्नी को पुकार कर कहता है , तुम्हारा प्रिंटर काम नहीं कर रहा है। यह वाक्य सुनते ही भारतीय परिवार का जाना पहचाना दृश्य और वाक्य  कौंध जाता है। अगर कुछ सराहनीय हुआ तो बेटा मेरा है और कुछ ऐसा किया है जिससे मान कम हो रहा है तो बेटा माँ का। प्रिंटर अगर काम कर रहा तो वह उसका है और प्रिंटर काम नहीं कर रहा तो उसका नहीं, उसकी पत्नी का है।

वर्किंग लेडी जब उन्नति करती है तो पुरुष- दृष्टि क्या होती है। दृश्य और संवाद देखिए :

दो परिवार एक दूसरे के पड़ोस में रहते हैं। एक परिवार का पुरुष नौकरी करता है दूसरे परिवार की स्त्री। नौकरीशुदा युवक की सुबह बेड टी से दफ्तर जाने के लिए गाड़ी में बैठने तक सहायक की तरह लगी रहती है पत्नी। ठीक उसी समय जब वह युवक आफिस के लिए भाग रहा होता है, पड़ोस की स्त्री भी आफिस जाने के लिए निकलती है। उसके पति की कुछ वर्ष पहले मृत्यु हो चुकी है। उसने दूसरी शादी नहीं की। उसकी एक बेटी है। दोनों एक ही समय में आफिस जाते हैं मगर स्त्री – पुरुष की स्थिति की भिन्नता को दृश्य चुपचाप बताता है।

एक और सुबह इस दृश्य की पुनरावृत्ति होती है। थोड़े से अन्तर के साथ। स्त्री की गाड़ी बदल चुकी है। अब पहले से कीमती गाड़ी है। आफिस जानेवाला युवक इसे नोटिस करता है। नयी गाड़ी देखकर अपनी पत्नी से वह पूछता है, करती क्या है ? अनुभव सिन्हा ने इतने भर से यह बता दिया है कि अकेली स्त्री की उन्नति को पुरुष किस आंख से देखता है। युवक की पत्नी जवाब देती है, ” मेहनत”। इस उत्तर के लिए वह तैयार नहीं था। अनुभव सिन्हा ने ऐसे कई छोटे छोटे अर्थपूर्ण दृश्य बना कर फिल्म को मूल्यवान बना दिया है।

इस फिल्म का एक प्रसंग है स्त्री के प्रेगनेंट होने का। सांकेतिक शॉट्स के माध्यम से इस प्रसंग को बखूबी पेश किया गया है। अनुभव सिन्हा ने केवल तीन या चार शॉट्स में यह प्रसंग पूरा किया है। आपको शॉट्स याद दिलाता हूँ। पहला शॉट : कार सिग्नल पर रुकती है। कार में पति – पत्नी हैं। कैमरा ड्राइवर की ओर है। बैकग्राउंड में है बस स्टैंड। बस स्टैंड पर प्रेगान्यूज का विज्ञापन। दूसरा शॉट : कैमरा शिफ्ट बस स्टैंड पर। फोर ग्राउंड में सबजैक्ट कार। इस कार के ड्राइवर वाली दिशा में, बगल में  एक कार आकर रुकती है। उस कार में एक बच्चा है। वह बच्चा दूसरी कार की ओर आकर्षित होता है। तीसरा शॉट : समयांतर के बाद : इस शॉट में लड़की टेस्ट के लिए हड़बड़ी में बाथरूम में जाती है और वह प्रेगान्यूज का पैकेट फाड़ती है। इस तरह सिनेमेटिक भाषा में यह अभिव्यक्त हुआ है।

एक खूबसूरत दृश्य और : इस फिल्म का थीम प्रसंग। थप्पड़ वाला। बिल्कुल अप्रत्याशित। जिसे थप्पड़ लगा है , वह सन्न है। पूरा परिवेश सन्न। सन्न परिवेश का  सृजन जितना सघन किया गया है , वह अप्रतिम है। निश्चय ही यह  कैमरा और संपादन की रचनात्मकता का उत्कर्ष है।

इस फिल्म के अधिकांश दृश्य या तो सुबह के हैं या रात के।  प्रकाश संयोजन फिल्म के विषय में योगदान करता है। बताता है, यह फिल्म जिस विषय पर रौशनी डाल रही है वहाँ अँधेरा है और अँधेर भी। अँधेरा और अँधेर इतना सघन है फिल्म देखते हुए मन औना जाता है। इसे झेलता हुआ दर्शक इस अँधेरा और अँधेरे के खात्मा के लिए प्रार्थना पढ़ने लगता है ।

थप्पड़ देखना मन को अच्छा नहीं लगा। यह है फिल्म देखने का अनुभव। इस फिल्म का मन को अच्छा न लगना ही फिल्म का अच्छा होना है। इस फिल्म के कई शॉट्स देखकर न भुलाई जा सकने वाली महेश भट्ट की  फिल्म अर्थ के कई शॉट्स याद आ जाते हैं।

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मृत्युंजय श्रीवास्तव

लेखक प्रबुद्ध साहित्यकार, अनुवादक एवं रंगकर्मी हैं। सम्पर्क- +919433076174, mrityunjoy.kolkata@gmail.com
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