सिनेमा

अपने-अपने ‘शाहीन बाग़ी’

 

{Featured In IMDb Critics Reviews}

 

निर्देशक – मुस्तजाब मलिक
स्टार कास्ट – संदीप करतार सिंह, प्रियंका शर्मा, सलीम शाह, गुलशन वालिया, गजेंद्र राठी, भूपेंद्र त्यागी, चंदन झा, दानिश इक़बाल, रईस अमरोही, गिरधर कुमार बघेल, मालिक, शमशाद क़ासमी, हम्माद इक़बाल आदि

साल 2019-2020 में दिल्ली में हुए नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन इतने विकराल रूप ले चुके थे कि इससे देश की छवि पूरी दुनिया में खराब हुई किसी की नजर में, तो किसी की नजर में अच्छी। एक जागरूक प्रजातंत्र के रूप में भी देखा दुनिया ने भारत को। वर्तमान निवृत सरकार द्वारा एक कानून लाया गया कि पड़ोसी मुल्क में जो अल्पसंख्यक लोग हैं वे भारत आ सकते हैं उन्हें नागरिकता दी जाएगी। कुछ का मानना है कि देश में पहले से रह रहे लोगों को भी नागरिकता साबित करनी होगी। अब नागरिकता किस आधार पर तय हो, क्या पैमाना हो, और नागरिकता साबित करनी ही क्यों जब हमारे पुरखे तक इस देश में रहकर जा चुके हैं। हालांकि यह एक राजनीतिक बहस का मुद्दा है। और इसी राजनीतिक बहस से निकलकर एक फ़िल्म आई है पिछले दिनों नाम है – शाहीन बाग़ी।

यूं तो यह फ़िल्म राजू नाम के एक शख़्स की कहानी कहती है। उसके अलावा भूमि अधिग्रहण तथा अन्य मोर्चों की कहानी भी इसमें निहित है। लेकिन दिल्ली का शाहीनबाग तथा उसके आस-पास का इलाकों को भी समेटती है। राजू है तो बैंड बजाने वाला एक गैर मामूली सा आदमी। लेकिन उसके विचारों के भीतर देश के संविधान निर्मात्री प्रमुख अंबेडकर बसते हैं सम्भवतः इसीलिए वह कहता है – ‘मेरी बाइबल, मेरी कुरान, मेरा संविधान।’ यह युवा राजू दलित समाज से है। लेकिन उसकी चाहतें अलग है। वह कुछ अलग करना चाहता है। क्या अलग करता है वह और कितना कामयाब हो पाता है यह तो फ़िल्म देखकर दर्शक ही तय करेंगे।

राजू जो गांव के ही एक बैंड में गाता-बजाता है। उसकी लोकप्रियता प्रतिदिन बढ़ती जाती है। लड़कियां राजू की व उसके गाने की दीवानी हो जाती है। इसलिए कुछ मुस्लिम धर्मावलंबियों का मानना है कि वह उनकी बहन-बेटियों की ज़िंदगी से खेल रहा है। इस बात से लोग राजू से जलने,चिढ़ने-कुढ़ने भी लगते हैं। वह छोटे से गांव से निकलकर बड़े शहर में जाकर अपना झंडा भी गाड़ना चाहता है। दोस्तों के साथ मिलकर अब वह अपना अलग बैंड भी चलाता है। लेकिन तभी कुछ लोगों की नजर में वह चुभने लगता है। बैंड की आवाज से अजान में खलल पड़ने का हवाला देकर खाप पंचायत बैठ जाती है। बैंड को बंद करने का फरमान सुनाया जाता है। दूसरी ओर सड़क बनाने के नाम पर करीब 17 गांव खाली करने का आदेश जारी होता है जिनमें सभी गांव दलितो के हैं। राजू का गांव भी उसमें शामिल है।

दलित अपने पुरखों की जमीन नहीं छोड़ना चाहते। तो आस-पास के गांव में रहने वाले मुस्लिम अपनी जमीन और अपनी पहचान के लिए पुख्ता कागज तैयार कर रहे होते हैं। देश में सीएए, एनआरपी , एनआरसी लागू किये जाने के बाद मुसलमान अपने वजूद को तलाशते फिरते नजर आते हैं। क्योंकि उन्हें कागजी तौर पर खुद को साबित करना है।

शाहीन बाग़ी फ़िल्म में जहां एक ओर कानून छाया रहता है उसी के समानांतर चलती है कहानी मियां जी की, मुखिया की और राजू की प्रेम कहानी, बलात्कार, दंगे इत्यादि की भी। राजू जब अपनी प्रेमिका से कहता है – ‘ख़ामोशी भी तो अहसास की आवाज़ होती है। अल्फ़ाज़ तो सिर्फ़ अल्फ़ाज़ होते हैं।’ तब ख़ामोशी (1969) में आई फ़िल्म में गुलज़ार के लिखे गीत, लता मंगेशकर की आवाज़ में पुनः हमारे ज़ेहन में गूंजने लगता है।

वो गीत है –

‘हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।’

ख़ैर मुरादाबाद से अमरोहा में बदल रहे प्रांतों में देश कब भूखा नंगा सो जाता है पता ही नहीं चलता। और फ़िल्म के अंत का पता चलता है ‘नासिर काज़मी’ की लिखी कविता – ‘ज़ुल्म बस ज़ुल्म है’ से। इस सबमें थाने सोते रह जाते हैं और रात की काली स्याह रातों में राहें रुसवा होती नजर आती हैं। राजू जिस लोहार टोला का है उसकी बस्ती उत्तर भारत की एक पुरानी किसी तहसील शेखपुरा में लोहार टोला नाम से थी। जिसे उसके पूर्वजों ने बसाई थी। लेकिन राजू के साथ-साथ नई नस्लों का मानना है कि वे यहां के मूल निवासी हैं। इस वजह से खेत , जंगल भी उनके अपने हैं।

शाहीन बाग़ी फ़िल्म में म्यूजिक को शिर्क बताने वाली कौम के कुछ नुमाइंदे असल जीवन में भी नजर आते हैं। लेकिन क्या वही कौम अपने आम जीवन में गीत-संगीत को बिल्कुल तवज्जो नहीं देती? क्या उनके पुरखों ने कभी उसे तवज्जो नहीं दी? क्या उस कौम में कभी कोई गवैया नहीं हुआ? और अगर हुआ तो वो फिर उस कौम के लिए गद्दार, काफ़िर, या शिर्क करने वाला क्यों नहीं कहलाता? शाहीनबाग जो कुछ समय लोगों के लिए पांच सौ रुपए और बिरयानी खाने का पिकनिक स्पॉट बना हुआ था वहां की असलियत से कितने लोग वाकिफ हैं। इससे भी देश-दुनिया का बड़ा तबका ना-महरम नहीं है।

फ़िल्म का गीत-संगीत बेहद प्रभावी है। हालांकि कुछ एक जगह यह कॉपी किया हुआ भी साफ नजर आता है। लेकिन इसमें जिस तरह से गजलें, कविताएं, शायरियों आदि का छौंक भी लगा है। वह फ़िल्म देखने का मज़ा बढ़ाता है। ‘जिंदगी खूबसूरत है’ , ‘कोई उम्मीद’ गाने सुनने में कर्णप्रिय लगते हैं। यह फ़िल्म इससे पहले कई फेस्टिवल्स में भी तारीफ़ें बटोर चुकी हैं। ‘कांस’ फ़िल्म फेस्टिवल इसमें प्रमुख है। हालांकि कांस फेस्टिवल में यह ‘टकीला’ नाम से प्रदर्शित की गई थी।

अभिनय के मामले में थियरेट के मंझे हुए कलाकार संदीप करतार सिंह सबसे अधिक प्रभावी रहे। प्रियंका शर्मा, हम्माद इक़बाल, शमशाद क़ासमी का काम भी तारीफ बटोरता है। लेकिन बाकी साथी कलाकारों में कोई ज्यादा उम्दा नजर नहीं आता। क्राउड फंडिंग से बनी यह फ़िल्म इस जरूरी हो जाती है क्योंकि यह शाहीनबाग नहीं शाहीन बागियों को भी पर्दे पर खूब दिखाती है। इस फ़िल्म के निर्देशक मुस्तजब मलिक अपनी अगली फिल्म ‘गॉड मस्ट डाई’ के साथ जल्द ही दोबारा पर्दे पर वापसी करने आ रहे हैं। उसमें भी संदीप करतार सिंह के अभिनय को देखने का मौका पुनः मिलने वाला है।

शाहीन बाग़ी फ़िल्म जुल्मों, आगाज़ और उसके अंजाम, खून, दहशतगर्दी, प्रेम, भाईचारे, सौहार्द , आज़ादी के नारों से मिलकर कई रंगों में नजर आती है। जिसे दोनों विचारधारा के दर्शक नकार नहीं सकते। फ़िल्म की खासियत इसके रंगों को लेकर भी नजर आती है। कहीं-कहीं ब्लैक एंड वाइट नजर आने वाली शाहीन बाग़ी उतनी ही रंगीनियत तथा उतनी ही स्याह जिंदगियों को भी हमारे सामने लाकर रखती है। फिल्म को यहाँ क्लिक कर एमएक्स प्लेयर पर देखा जा सकता है।

अपनी रेटिंग – 3 स्टार

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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