राजस्थान

राजस्थान विधानसभा चुनाव: ऊंट किस करवट बैठेगा!

 

9 अक्टूबर 2023 को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा दिल्ली के आकाशवाणी स्थित रंग भवन सभागार में आयोजित एक पत्रकार संगोष्ठी में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार द्वारा राजस्थान सहित पांच राज्यों के आगामी विधानसभा आम चुनावों के कार्यक्रम संबंधी घोषणा की गई। जिसके अनुसार राजस्थान की सभी 200 विधानसभा सीटों पर 23 नवंबर 2023 को एक ही चरण में चुनाव आयोजित किए जाएंगे, जिनके परिणाम 3 दिसंबर 2023 को घोषित किए जाएंगे। काँग्रेस और भाजपा के आंतरिक सर्वेक्षणों में राजस्थान में दोनों प्रमुख दलों के बीच कड़ी टक्कर होने की संभावना है। पिछले चुनाव में काँग्रेस के खाते में 99 सीटें गई थीं, वहीं बीजेपी 73 सीटें जीतने में कामयाब रही। उस चुनाव में काँग्रेस को रालोद का भी साथ मिल जाने से उसकी सीटों का आंकड़ा 100 पहुंच गया और पार्टी बहुमत हासिल करने में कामयाब हो गई। लेकिन उस चुनाव के कई ऐसे समीकरण रहे जो काँग्रेस को जीत के बाद भी चिंताएं दे गए और बीजेपी को कुछ उम्मीदें मिलीं। असल में पिछले चुनाव में कई ऐसी सीटें रही जहां पर जीत का अंतर 1000 वोटों से भी कम का रहा। यानी अगर उन सीटों पर थोड़ा भी फेर-बदल हो जाता तो सत्ता में काँग्रेस की जगह बीजेपी भी आ सकती थी। बड़ी बात ये भी है कि राज्य की 10 ऐसी सीटें रहीं जहां पर 1000 से भी कम वोटों से हार-जीत तय हुई।

राजस्थान में मुकाबला जरूर बीजेपी और काँग्रेस के बीच में रहा, लेकिन कई दूसरी पार्टियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी। पिछले चुनाव में मायावती की बीएसपी को 6 सीटें, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्‍ससिस्‍ट) को 2, भारतीय ट्रायबल पार्टी को 2, राष्ट्रीय लोक दल को 1, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को 3 सीटें मिली थीं। इसके अलावा 13 निर्दलीयों ने भी एक निर्णायक भूमिका निभाई थी। यहां ये समझना जरूरी है कि वर्तमान में राजस्थान विधानसभा की स्थिति कुछ बदली हुई है। इस समय एक तरफ काँग्रेस का आंकड़ा 100 से बढ़कर 108 हो गया है, तो वहीं बीजेपी 70 सीटों पर चल रही है। राजस्थान का जैसा ट्रेंड रहा है, यहां हर पांच साल में सत्ता बदल जाती है। इस बार बीजेपी भी इसी ट्रेंड के दम पर सरकार में आना चाहती है, वहीं काँग्रेस इतिहास रच उस ट्रेंड को तोड़ना चाहती है। राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अभी तक अपने मुख्यमंत्री पद के चेहरे को घोषित नहीं किया है।

बीजेपी की नेता और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने झालावाड़ में एक जनसभा में अपने सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह के भाषण और उस पर जनता के रिस्पांस की तारीफ़ें करते हुए कहा, ‘झालावाड़ ने सांसद दुष्यंत सिंह को इतना सिखा दिया है कि अब मैं रिटायर हो सकती हूँ।’ उनके भाषण में इतनी सी बात सुनकर बीजेपी के भीतर काफ़ी हलचल होने लगी और उनका यह बयान वायरल हो गया। लेकिन वसुंधरा राजे ने अगले दिन झालारापाटन से नामांकन दाख़िल करने के दौरान कहा, ”मैं रिटायर होने वाली नहीं हूँ। सेवा का कर्म जारी रहेगा। मैंने सांसद दुष्यंत सिंह की राजनीतिक परिपक्वता से खु़श होकर माँ के नाते कहा कि वे झालावाड़-बारां में अच्छा काम कर रहे हैं।” लेकिन यह सवाल एक सहज जिज्ञासा के रूप में इस बार शुरू से ही पूछा जा रहा है कि अगर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं होती हैं तो फिर कौन?

अब तक राजस्थान में बीजेपी की रणनीति एकदम अलग थी क्योंकि बीजेपी मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा घोषित नहीं कर रही थी। इस पर चुनाव नतीजों के बाद फैसले की खबर थी। अब खबर है कि बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। राजस्थान में वसुंधरा राजे बीजेपी के लिए जरूरी हैं या मजबूरी, इस तरह के सवाल उठ रहे हैं। बीजेपी ने राजस्थान में करीब एक महीने पहले एक सर्वे कराया था। सर्वे सीक्रेट था, जिसकी रिपोर्ट भी सीक्रेट ही रखी गई। रिपोर्ट की जानकारी पार्टी के चंद बड़े नेताओं के बीच ही थी। रिपोर्ट में राजस्थान में बीजेपी की चुनावी संभावनाओं का पूरा हिसाब था। पड़ताल में यह बात सामने आई कि अगर वसुंधरा को मुख्य मंत्री का चेहरा बनाया जाए तो बीजेपी को फायदा हो सकता है, यानी वोट के मामले में बीजेपी को काँग्रेस के मुकाबले निर्णायक बढ़त मिल सकती है। बीजेपी की रिपोर्ट जैसे ही दिल्ली पहुंची, इसका असर दिखने लगा। जो बीजेपी मुख्य मंत्री के चेहरे के तौर पर किसी को स्वीकार करने से बच रही थी वो अब मॉडल के तौर पर वसुंधरा का नाम ले रही है। बीजेपी को अब राजस्थान में वसुंधरा की अहमियत का अंदाजा होने लगा है।

राजस्थान में चुनाव के कुछ ही दिन और बचे हैं, काँग्रेस की ओर से स्टार प्रचारक प्रचार अभियान में जोरों से लगे हैं लेकिन एक स्टार प्रचारक- राहुल गांधी, राज्य में किसी रैली या मंच पर गहलोत के लिए वोट मांगते अभी तक नहीं दिखे। बस इसी बात को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजस्थान के लिए स्टार प्रचारक की लिस्ट में काँग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के बाद तीसरा नाम राहुल गांधी का ही है। लेकिन सवाल यही है कि आखिर एमपी-छत्तीसगढ़ में सक्रिय  राहुल गांधी राजस्थान में दिखाई क्यों नहीं दे रहे? इससे क्या ये संकेत मिलता है कि राजस्थान में रिवाज कायम होगा और काँग्रेस सत्ता से बाहर होगी? या पायलट-गहलोत के बीच के तनाव से इसका कोई लेना देना है ? राहुल गांधी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में व्यस्त हैं, छ्त्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पहले चुनाव हैं। हालांकि राहुल गांधी राजस्थान को लेकर थोड़े निराश भी हैं, उन्होंने इस बात का पहले भी जिक्र किया था कि राज्य में इस बार तगड़ी लड़ाई है। हालांकि राहुल गांधी के अब चार दौरे पक्के हो चुके हैं। दीवाली के बाद वे चार बार राजस्थान में आएंगे। यहाँ वे जहाजपुर, जयपुर में रोड शो करेंगे, जोधपुर संभाग में भी रैली प्रस्तावित है, फिर गंगानगर में भी एक रैली में वे दिखाई देंगे। दीवाली के बाद ही राजस्थान का चुनावी अभियान उठेगा, प्रियंका गांधी और खड़गे भी चार-चार रैलियाँ करेंगे।

राजस्थान में 49 लाख नए मतदाता राज्य के 139 विधानसभा सीटों पर कई प्रमुख नेताओं का भविष्य बना या बिगाड़ सकते हैं। वजह है कि 200 विधानसभाओं में से 139 सीटें ऐसी हैं जहां मतदाताओं की संख्या पिछले चुनाव में जीत के अंतर से बढ़ गई है। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस बार विधानसभा चुनाव में 5. 27 करोड़ मतदाता राजस्थान में सरकार चुनेंगे। इनमें से इस बार 48.92 लाख मतदाता नये हैं। नए वोटरों की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछली बार बीजेपी के पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ महज 1704 वोटों से मालवीय नगर सीट से जीते थे। इसी तरह हवामहल सीट से काँग्रेस के दिग्गज नेता महेश जोशी 9282 वोटों से जीते थे. इस बार सूची में 19076 नये मतदाता हैं।

चूरू में पिछले विधानसभा चुनाव में नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ को बेहद करीबी जीत मिली थी। उनके और काँग्रेस के रफीक मंडेलिया के बीच अंतर सिर्फ 1850 वोटों का था। इस बार मतदाता सूची में 21,977 मतदाता बढ़े हैं, जो पिछली बार की जीत के अंतर से 20,127 ज्यादा हैं।

ध्यातव्य है कि राजस्थान में 119 सीटें ऐसी हैं, जहाँ वोटर्स हर बार पार्टी या विधायक को बदलते रहते हैं। इन सीटों पर मतदाता अपने क्षेत्र के मुद्दों, चेहरे, जाति, सक्रियता के आधार पर वोट देते हैं। चुनाव में पार्टियां दो स्तर पर चुनाव लड़ रहीं हैं। एक मुद्दों के आधार पर, तो दूसरा जाति पर। विधानसभा चुनावों में विकास और धर्म के मुद्दे जरूर हैं, लेकिन जातियों का दबदबा इनसे जरा भी कम होता नजर नहीं आ रहा। अधिकतर राजनीतिक दल जातिगत समीकरण को देखते हुए ही चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं।

दोनों दलों की स्थिति जानना दिलचस्प है कि किसने किस जाति को ज्यादा महत्व दिया है। राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें हैं और यहां सबसे ज्यादा जाट और एससी-एसटी का दबदबा रहा है। इसके बाद राजपूतों का नंबर आता है। काँग्रेस और बीजेपी ने इसे ध्यान में रखते हुए टिकट बाँटे हैं। भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस ने सभी 200 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। काँग्रेस ने जाट समाज से 36 प्रत्याशियों को मौका दिया है, जबकि बीजेपी ने 33 को टिकट दिया है। बात एससी  वर्ग की करें तो काँग्रेस ने 34 सीटों पर इन्हें उतारा है, तो बीजेपी ने भी इतने ही एससी को टिकट दिये हैं। काँग्रेस ने 33 एसटी उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने 30 को मौका दिया है।

काँग्रेस ने जहां 17 सीटों पर राजपूत प्रत्याशी उतारे  है, तो वहीं बीजेपी ने 25 राजपूत उम्मीदवारों को मौका दिया है। काँग्रेस ने 16 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं, तो बीजेपी ने 20 ब्राह्मणों को टिकट दिया है। बनिया समाज से 11 उम्मीदवार काँग्रेस ने उतारे हैं तो बीजेपी ने भी इतने ही प्रत्याशियों को मौका दिया है। काँग्रेस की सूची में 15 मुस्लिम उम्मीदवार हैं, जबकि बीजेपी ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है। काँग्रेस ने 11 गुर्जरों को मैदान में उतारा है,  तो बीजेपी ने 10 को। माली समाज की बात करें तो काँग्रेस ने 4 को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने 3 को। लोग बोल रहे हैं – मुद्दे सब गायब हैं, बचा है बस गाय-गोबर और हिंदू-मुस्लिम। टिकट बंटवारे में इस बार भी जाटों का ही वर्चस्व दिखाई दिया।

राजस्थान के उत्तर पश्चिम के सीकर, चूरू, झुंझुनूं, हनुमानगढ़, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, और पूर्वी राजस्थान के भरतपुर और धौलपुर जिलों में यह समुदाय सबसे ज्यादा है। प्रदेश की आबादी में इनकी संख्या करीब 12 प्रतिशत मानी जाती है। यही कारण है कि दोनों ही दल इस समुदाय के प्रत्याशियों की अनदेखी नहीं कर पाते। इस बार के चुनाव में भी दोनों ही दलों ने सबसे ज्यादा टिकिट इसी समुदाय को दिये हैं। हालांकि, यह समुदाय इससे संतुष्ट नहीं है। जाटों ने इस वर्ष अप्रैल में और इसके बाद हाल में पिछले महीने बड़ी बैठकें कर अपना प्रतिनिधित्व और बढ़ाने की माँग उठाई थी। दोनों ही दलों ने इस माँग को मानते हुए पिछली बार के मुकाबले टिकट बढ़ाए भी हैं। दरअसल, यह समुदाय लंबे समय से प्रदेश में एक जाट मुख्यमंत्री का सपना देख रहा है, लेकिन, यह सम्भव नहीं हो पा रहा है।

मुस्लिम समुदाय परम्परागत तौर पर काँग्रेस का ही वोट बैक माना जाता है। भाजपा को मुसमलानों के वोट नहीं के बराबर मिलते हैं। पिछले चुनाव की स्थिति यह थी कि जयपुर के मुस्लिम बाहुल्य बूथों पर पार्टी को दो से चार वोट ही मिल पाए थे। यही कारण है कि इस बार पार्टी ने मुस्लिम समुदाय से पूरी तरह परहेज किया है। पिछली बार वसुंधरा सरकार के मंत्री युनूस खान को टिकट मिल गया था, लेकिन इस बार तो उन्हें भी वंचित कर दिया गया। स्थिति यह तक देखने में आई कि एक प्रत्याशी के बारे में जब यह पता चला कि उसने धर्म के मामले में गलत जानकारी दी है तो उसका टिकट बदल दिया गया। ऐसा अजमेर जिले की मसूदा सीट से अभिषेक सिंह के साथ हुआ। पार्टी को दिये अपने बायोडाटा में उन्होंने खुद को रावत राजपूत बताया था, लेकिन एक सरकारी दस्तावेज में पता चला कि उनकी जाति मेहरात है जो इस इलाके में कन्वर्ट मुस्लिम माने जाते हैं। जानकारी सामने आते ही पार्टी ने टिकट बदल कर वीरेन्द्र कानावत को दे दिया। वहीं, काँग्रेस का मुस्लिम प्रेम लगातार जारी है। पार्टी ने पिछली बार इस समुदाय को 15 टिकट दिये थे। इस बार 14 टिकट दिए हैं।

इसके साथ ही अपने वोट बैंक के हिसाब से टिकट देने की परम्परा इस बार भी कायम है। भाजपा ने अपने कोर वोट बैंक माने जाने वाले राजपूत, वैश्य और ब्राह्मण समुदाय को काँग्रेस के मुकाबले ज्यादा टिकट दिये हैं। इस साल के बजट और इसके बाद की घोषणाओं से मुख्य मंत्री गहलोत ने चुनाव से पहले पूरी काँग्रेस में जान फूंकने का प्रयास किया है। चुनाव में ये घोषणाएं विपक्ष को जवाब देने के काम आ सकती हैं, लेकिन उन्हें विशेष वर्गों की नाराजगी को भी साधना होगा।

दरअसल, राजस्थान में जाति फैक्टर बहुत बड़ा है और यह कई सीटों पर नतीजों को प्रभावित करता है। बात चाहे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की हो या फिर काँग्रेस की, दोनों ही दलों ने टिकट देते वक्त जातिगत समीकरण का काफी ध्यान रखा है. जिस सीट पर जिस पार्टी का उम्मीदवार है, वहां उसी वर्ग के उम्मीदवार को तवज्जो दी गई है। विधानसभा चुनाव के एलान से पहले प्रदेश भर में राजपूत, ब्राह्मण, जाट, एससी, एसटी और वैश्य वर्ग के बड़े-बड़े सम्मेलन हुए। टिकटों में ज्यादा हिस्सेदारी पाने के लिए जातिगत गोलबंदी की गई। आइए, जानते हैं भाजपा और काँग्रेस ने किस समाज से कितने उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

चुनाव अब दिलचस्प मोड़ पर पहुच गया है। दोनों ही दलों के बागियों ने संघठन के चुनाव रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा रखे हैं। 9 नवंबर नाम वापसी की आखिरी तारीख थी। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी बागियों की मान-मनोव्वल में जुटी हुई थी। सिरोही पहुंचे भाजपा प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह ने चुनाव की रणनीति को लेकर पूछे गए सवाल पर जवाब देते हुए बताया ”जो पार्टी कार्यकर्ता, नेता नाराज थे, उनमें से ज्यादातर को मना लिया गया है। बहुत कम ऐसे लोग बचे हुए हैं जो नाराज हैं।” हाल ही में भाजपा में शामिल हुए रविन्द्र सिंह भाटी के नाराज होकर चुनाव लड़ने के सवाल का जवाब देते हुए प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह ने कहा कि उनसे बात हुई है। वहीं, हाल ही में राज्य में नए जिला बनाए गए सांचोर की सांचोर विधानसभा सीट पर भी भाजपा को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस सीट पर वर्तमान भाजपा सांसद देव जी पटेल को पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है। उन्हें काँग्रेस के सुखराम विश्नोई के सामने मैदान में उतारा है। सुखराम विश्नोई गहलोत सरकार में मंत्री है। वह इलाके के कद्दावर नेता माने जाते हैं। ऐसे में अपनों की बगावत से इस सीट पर भाजपा मुश्किल में पड़ती दिखाई दे रही है। कई बागी नेताओं ने अपना नाम वापस लिया. जिसके बाद कई सीटों पर भाजपा-काँग्रेस में आमने-सामने की टक्कर की स्थिति साफ हो गई है। पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों ने पार्टी नेताओं द्वारा मनाने पर अपना हठ त्यागते हुए पार्टी हित की बात की है। अब देखना ये है कि आखिर चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा

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शैलेन्द्र चौहान

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं। सम्पर्क +917838897877, shailendrachauhan@hotmail.com
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