प्रेस की स्‍वतन्त्रता
मीडिया

प्रेस की स्‍वतन्त्रता बनाम बाध्‍यता

 

हमारे जीवन में प्रेस का बहुत ही महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। आज भी अधिकांश लोग दिन की शुरूआत अखबारों से ही करते हैं। समाज में सजगता और जागरूकता बनाये रखने में इसका उल्‍लेखनीय योगदान है। इसीलिए प्रेस को लोक प्रहरी के रूप में रेखांकित किया जाता रहा है। यह समाज में लोकतन्त्र के एक मजबूत खम्भे के रूप में स्‍थापित है। पत्रकारों ने समाज को बचाये रखने में सदैव सराहनीय भूमिका निभाई है। किन्तु, पिछले कुछ दशकों से प्रेस और पत्रकारों की स्‍वतन्त्रता और सुरक्षा का मुद्दा भारत तथा कुछ अन्‍य देशों में बेहद ज्‍वलंत बना हुआ है।

पत्रकारों पर बढ़ते हमले और हत्‍या की वजह से पूरी दुनिया में पत्रकारों की सुरक्षा का मामला तूल पकड़ने लगा है। कई तरह के नियम-कानून के बावजूद कुछ सेलिब्रिटी प्रकार पत्रकारों को छोड़कर, आज भी अधिकांश पत्रकारों का जीवन दयनीय ही बना हुआ है। दिन-रात की ड्यूटी करने के बाद भी उन्‍हें इतना गुजारा भत्‍ता नहीं मिल पाता, जिससे वे अपने परिवार को एक अच्‍छा जीवन दे सके। साथ ही प्रकृति के विपरीत आधी रात तक की नौकरी से कई शारीरिक दिक्‍कतें भी होने लगती है।

एक पत्रकार सिर्फ अकेले प्रकृति से नहीं लड़ता है, बल्कि पूरे परिवार को भी उसके साथ लड़ना पड़ता है। समय से सोना-जागना, परिवार के साथ समय बिताना, यह सबकुछ उनके लिए सपने जैसा हो जाता है। इन सबके बावजूद वे अपनी जान जोखिम में डाल कर जब सच्‍चाई सामने लाता है तो उन्‍हें पुरस्‍कार नहीं मिलता, बल्कि यातनायें मिलती हैं। या फिर उन्‍हें अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ती है। हमले और मौत के खतरे के बीच उन्‍हें सुरक्षा तक मुहैया नहीं कराया जाता।

प्रेस अथवा पत्रकारों की इन्‍हीं मुद्दों के मद्देनजर आज पूरी दुनिया में ‘वर्ल्‍ड प्रेस फ्रीडम डे’ मनाया जा रहा है। इसकी शुरूआत 1991 में विण्डहोक में हुई यूनेस्को कॉन्फ्रेंस से हुई थी। यह कॉन्फ्रेंस 3 मई को खत्म हुई थी, जब स्वतन्त्र, आत्मनिर्भर और बहुलवादी प्रेस के लिए ऐतिहासिक विण्डहोक घोषणा पत्र अपनाया गया था। यूनेस्को साल 1997 से प्रतिवर्ष इसे मना रहा है, जिसका मुख्‍य उद्देश्‍य पत्रकारों की स्‍वतन्त्रता की रक्षा है। यह दिवस, स्वतन्त्र, मुक्त और बहुलवादी प्रेस के विकास के लिये ऐतिहासिक ‘विण्डहोक घोषणापत्र’ पारित किये जाने की याद दिलाता है, जोकि नामीबिया की राजधानी में 1991 में, संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को के एक सम्मेलन में पारित किया गया था।

मीडिया लोकतांत्रिक मूल्‍यों को बचाये रखने में बेहद महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह लोकतन्त्र के सबसे मजबूत स्तम्भ के रूप में जनता के साथ कमोवेश सदैव खड़ा रहा है। प्रेस की ताकत का ही नतीजा था कि ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए सबसे बेहतर हथियार के रूप में पत्रकारिता का इस्‍तेमाल किया गया। प्रेस से बढ़ते संकट को देखते हुए ही ब्रिटिश सरकार ने गला घोंटू अधिनियम, क्षेत्रिय भाषा अधिनियम, आदि जैसे कई क्रूर कानूनों के माध्‍यम से प्रेस की आजादी को छीनने की कोशिश की। यही कारण था कि कभी पत्रकारों देशद्रोह और राजद्रोह की सजा सुना दी जाती थी, तो कभी फांसी और कालापानी की। किन्तु तमाम रूकावटों और काले कानूनों के बावजूद सरकार अपने उद्देश्‍य में सफल नहीं हो पायी। आज ब्रिटिश सरकार तो नहीं है, किन्तु पत्रकारिता को जो स्‍वतन्त्रता मिलनी चाहिए वे आज भी नहीं मिली है। काले कानून का साया आज भी पत्रकारों के माथे पर निरन्तर मंडराते रहता है। सरकार तो बदल गई लेकिन शोषण एक नये स्‍वरूप के साथ आज भी जारी है।

प्रेस की आजादी में आने वाली रूकावटों के संकट से उबरने और पत्रकारों की स्‍वतन्त्रता तथा सुरक्षा के लिहाज से ही ‘वर्ल्‍ड प्रेस फ्रीडम डे’ मनाया जाता है। इस दिवस पर प्रेस से सम्बन्धित एक खास थीम की भी घोषणा की जाती है। इस वर्ष का थीम है, Journalism under Digital Siege अर्थात् डिजिटल घेरेबंदी के तहत पत्रकारिता। वर्तमान परिदृश्‍य के लिहाज से पत्रकारिता के लिए यह थीम बहुत महत्‍वपूर्ण है। डिजिटलाईजेशन ने मार्शल मैकलुहान के ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा को साकार कर दिया है। इससे पत्रकारों को स्‍वतन्त्र और निष्‍पक्ष पत्रकारिता करने का मौका भी मिला है। किन्तु, इसके दुष्‍प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। कोरोना के बाद से पत्रकारिता में निरन्तर बदलाव हो रहा है। एक तरफ पत्रकारिता का तेजी से डिजिटलाईजेशन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर फेक न्‍यूज और इंफोडेमिक जैसी समस्‍यायें भी बढ़ती जा रही हैं। सबसे तेज और अलग बने रहने की होड़ ने पत्रकारिता के पूरे परिदृश्‍य को ही बदल कर रख दिया है और जो इसके साथ तालमेल नहीं बैठा पाता, उसका यहाँ टिकना मुश्किल हो जाता है।

पत्रकारिता का प्रारम्भ ही एक खास उद्देश्‍य के साथ हुआ था। यह एक मिशन था। किन्तु, मिशन से प्रोफेशन तक के बदलते समीकरण और बाजार की मांग तथा विज्ञापनों की होड़ ने पत्रकारिता के पूरे परिवेश पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। विज्ञापनों पर ही अधिकांश मीडिया उद्योगों की नींव टिकी होती है। इसकी वजह से मीडिया मालिकों द्वारा  संपादकों पर तथा संपादकों द्वारा अपने अधीनस्‍थों पर विज्ञापन लाने का दबाव बना ही रहता है। ऐसी स्थिति में वैचारिक और निष्‍पक्ष पत्रकारिता पर संकट आना स्‍वाभाविक है। विज्ञापन और व्‍यवसाय दोनों का आधार लाभ अर्जन ही होता है। ऐसी स्थिति में स्‍वतन्त्रता स्‍वत: ही दम तोड़ने लगती है। विज्ञापन वहीं दिया जा सकता है, जिसका बाजार अच्‍छा हो। विज्ञापन और बाजार की शर्तों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण ‘संवाद कौमुदी’ तक बंद हो गया था। इस बाजारीकरण ने प्रेस के पूरे स्‍वरूप को ही बदल कर रख दिया है। लाभ की अंधी दौर ने मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

प्रेस की स्वतन्त्रता के सम्बन्ध में भारत के संविधान में स्पष्ट रूप से उल्‍लेख नहीं किया गया है, लेकिन यह अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत संरक्षित है, जिसमें कहा गया है कि- “सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार होगा।” किन्तु, कुछ बाध्‍यता के साथ। कानून इस अधिकार के प्रयोग पर केवल उन प्रतिबन्धों को लागू कर सकता है, जो अनुच्छेद 19 (2) के तहत आता है। इसमें भारत की संप्रभुता और अखण्डता से सम्बन्धित मामले, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, न्यायालय की अवमानना के सम्बन्ध में, मानहानि या अपराध को प्रोत्साहन आदि जैसे मुद्दे शामिल हैं।

लेकिन इन सभी नियमों, कानूनों और प्रावधानों के बावजूद भारत में पत्रकारों की स्‍वतन्त्रता खतरे में है। वर्ल्‍ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्‍स 2021 के अनुसार 180 देशों में, भारत पत्रकारों की स्‍वतन्त्रता के मामले में 142वें स्थान पर है। वर्ष 2020 में भी भारत 142वें स्थान पर ही था। यानि पत्रकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं पाया गया। यहाँ तक की अपने पड़ोसी देशों से भी भारत का प्रदर्शन ज्‍यादा खराब रहा है। इस सूचकांक में नेपाल 106वें, श्रीलंका 127वें और भूटान 65वें स्थान पर है, जबकि पाकिस्तान 145वें स्थान और भारत के बेहद करीब है। इस प्रकार भारत को पत्रकारिता के लिये ‘खराब’ वर्गीकृत देशों में रखा गया है। इस सूचकांक में नॉर्वे लगातार पाँच वर्षों से प्रथम स्थान पर है, इसके अतिरिक्त फिनलैंड दूसरा और डेनमार्क तीसरे स्थान पर है। इरीट्रिया, सूचकांक में सबसे निचले स्थान पर है। वहीं चीन 177वें स्थान पर है।

यह रैकिंग प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता के गैर-लाभकारी संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी किया जाता है। हालांकि इस रैंकिंग के संदर्भ में कई सवाल भी उठते रहे हैं। यह सूचकांक बहुलवाद के स्तर, मीडिया की स्वतन्त्रता, मीडिया के लिये वातावरण और स्वयं-सेंसरशिप, कानूनी ढाँचे, पारदर्शिता के साथ-साथ समाचारों और सूचनाओं के लिये मौजूद बुनियादी ढाँचे की गुणवत्ता के आकलन के आधार पर तैयार किया जाता है। इस पत्रकारिता सूची के अनुसार लगभग 73% देश स्वतन्त्र मीडिया से पूरी तरह से या आंशिक रूप से अवरुद्ध हैं। केवल 12 देशों (7%) में पत्रकारिता के लिये अनुकूल वातावरण मौजूद है। यह रैकिंग बेहद चिंतनीय है, खासतौर पर भारत जैसे विकासशील देशों के लिए।

भारत पूरी दुनिया में एक बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में स्‍थापित है। किन्तु, इस रैकिंग के हिसाब से यहाँ लोकतांत्रिक मूल्‍यों की हालत बेहद कमजोर प्रतीत होती है। यहाँ प्रेस अथवा पत्रकारों की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने के लिए देशद्रोह जैसे मुकदमे लगा दिए जाते हैं। इस भययुक्त वातावरण में स्‍वतन्त्र, निष्‍पक्ष पत्रकारिता की बातें निरर्थक महसूस होती है। पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि किस प्रकार सत्‍ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों को मीडिया घरानों से या तो बेदखल कर दिया गया या फिर उन्‍हें नौकरी छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया गया या कोई मुकदमा ठोक कर उनको और उनके परिवार वालों को परेशान किया गया।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में लोकतन्त्र के रक्षकों का जब यह हाल है तो लोकतन्त्र कब तक बचा रहेगा, यह गहन अध्‍ययन का विषय है। ‘वर्ल्‍ड प्रेस फ्रीडम डे’ के अवसर पर ‘गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम’ पुरस्कार भी दिया जाता है। यह पुरस्कार उस व्यक्ति या संस्थान को दिया जाता है, जिसने प्रेस की आजादी के लिए सराहनीय कार्य किया हो। किन्तु आश्‍चर्य की बात है कि लोकतन्त्र का डंका पीटने वाले हमारे देश को यह पुरस्‍कार अब तक नहीं प्राप्‍त हुआ है।

लोकतन्त्र की रक्षा के लिए प्रेस को संवेदनशील, सक्रिय और भयमुक्‍त होना चाहिए, जिसके लिए स्‍वतन्त्रता सबसे आवश्‍यक तत्‍व है। मीडिया को पक्ष या विपक्ष के साथ खड़ा न होकर, निष्‍पक्ष होना चाहिए। आज के समय में मीडिया ओपिनियन लीडर की तरह कार्य करती है। लोगों की सोच-समझ, दिनचर्या आदि कहीं-न-कहीं मीडिया से  प्रभावित हो रही है। पत्रकारिता के माध्‍यम से दुनिया में कई न्‍यायिक लड़ाईयां लड़ी गई, सामाजिक भेदभाव को मिटाया गया, कुप्रथाओं पर प्रहार किया गया, वंचितों को उनके अधिकार दिलाये गये। इन सभी कार्यों के लिए पत्रकारिता की स्‍वतन्त्रता जरूरी है। किन्तु, स्‍वतन्त्रता के नाम पर किसी की निजता का हनन, सामाजिक एकता, अखण्डता पर प्रहार, निर्दोषों को दोषी करार देना भी गलत है। लेकिन सच्‍चाई पर परदा डालने के लिए पत्रकारों की हत्‍या कराना और हमले कराना या फिर उन्‍हें राजद्रोही, राष्‍ट्रद्रोही करार देना भी स्‍वतन्त्रता के हनन का अनुचित तरीका है।

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कई कानून विद्यमान हैं। कई राज्‍य भी पत्रकारों के संरक्षण, सुरक्षा और हित के लिए कानून लागू कर रहे हैं। किन्तु, यह सब कागजों पर ही सीमित रह जाता है। इनका कठोरता से कभी पालन नहीं किया जाता और ना ही उसे व्‍यवहार में शामिल किया जाता है। इस दिवस के अवसर पर हमें उनके बलिदान को पुन: स्‍मरण करने की जरूरत है, जिन्‍होंने चौथे स्तम्भ के कर्तव्‍यों के निर्वहन हेतु अपना सर्वस्‍व न्‍योछावर कर दिया। अपने मिशनरी पत्रकारिता के कारण जिन्‍हें कई बार जेल जाना पड़ा, फांसी तक की सजा से गुजरनी पड़ी, किन्तु उन्‍होंने अपनी पत्रकारिता नहीं छोड़ी। पत्रकारिता को बेजुवानों अथवा वंचितों, शोषितों की आवाज मानी जाती है। इसलिए स्‍वतन्त्रता के उस अहमियत को जरूर ध्‍यान रखना चाहिए, जिसके सहयोग के बिना हम ब्रिटिश शासन के गुलामी की दासता से शायद ही कभी आजाद हो पाते थे। यदि सरकार लोकतन्त्र की रक्षा चाहती है तो प्रेस को स्‍वतन्त्रता और सुरक्षा के लिए सार्थक कदम उठानी चाहिए। पत्रकारों को एक अच्‍छा जीवन देने की पहल करनी चाहिए ताकि वे अपने पेशे के साथ न्‍याय कर सके

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लेखिका गुरू घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) में सहायक प्राध्यापक हैं | सम्पर्क- +919406009605, amitamasscom@gmail.com

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