सामयिक

कोरोना के बाद आवश्यक है जनसंख्या प्रबन्धन

 

कोरोना काल के शुरुआती दौर में जब पहली बार घर आया तो सड़क पर बच्चों को सूटकेस, सब्जी के ठेलों और कंधों पर लादे पैदल चलते बहुत से मज़बूर माता-पिताओं को देखा। टीवी, अखबार और सोशल मीडिया में ट्रेन की पटरियों पर सो रहे मज़दूरों की ट्रेन से कटने के बाद बिखरी चप्पलों की तस्वीरें, वीडियो वायरल थे। किसी समाचार चैनल में अपनी मृत माँ के पल्लू से खेल रहे बच्चों की वीडियो देखी। नैनीताल और हल्द्वानी के बीच बाइक से जाते दिल्ली से पैदल अल्मोड़ा आ रहे किसी भारतीय नागरिक से मिला जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया का एक तबका आईएलओ की परिभाषा के विपरीत चींख-चींख कर प्रवासी कह रहा था। नैनीताल में बिहार के कुछ मज़दूरों को घर वापसी के लिए रोज़ ट्रेन टिकट कार्यालय के खुलने के इंतज़ार में चक्कर लगाते देखता था। कौन थे यह लोग जिन्हें हमने और हमारी अब तक की सरकारों की नाकाम नीतियों ने सड़क पर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया था?

कोरोना के बाद जिस तरह से हम अपनी आबादी को प्रवासी के रूप में सम्बोधित करते रहे और घर बैठ टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, अखबारों में उनके कष्टभरे दिनों की कहानी सुनते रहे वह एक ऐसे भारत की कहानी बयां करता है जो तीन हिस्सों में बंट गया हैं। जहाँ गरीब गरीब ही होता जा रहा, मध्यमवर्गीय अपने लिए रोटी का इंतज़ाम करने भर से खुश है और अमीर इन दोनों को लूटखसोट कर अपनी सम्पत्ति बढ़ाता ही जा रहा है।

सुशांत की आत्महत्या के बाद ड्रग्स सिंडिकेट के भंडाफोड़, बिहार चुनाव में बीजेपी की जीत का जश्न और उसके बाद अब क्रिकेट की तड़कभड़क में हम वह सब भूल चुके हैं। हमें यह लग तो रहा है कि वैक्सिनेशन शुरू होने के बाद स्थिति अब धीरे धीरे सामान्य हो रही है पर क्या पूरी तरह से खत्म हुए रोज़गार इतनी जल्दी फिर से शुरू हो पाना सम्भव है और क्या इस बेतहाशा बेरोज़गारों की भीड़ को संभालने, संवारने के लिए हमारी सरकार के पास कोई ठोस योजना है? जनसंख्या नियंत्रण कानून लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गयी है

यह बात सत्य है कि गाँवों में बढ़ती आबादी और खेती के लिए कम होती जमीन के बाद वर्षों से रोज़गार की तलाश में शहरों का रुख करने वाली ‘जनसंख्या’ के पास पहला लॉकडाउन लगने के बाद तीन हफ़्तों तक की भी बचत नही थी। आज भी चार सौ रुपए प्रतिदिन दिहाड़ी के हिसाब से हमारी अधिकतर ‘आबादी’ अपना पेट पालती है। कोरोना के बाद से सैंकड़ो युवाओं ने बेरोज़गार हो अवसाद की वज़ह से आत्महत्या कर ली। ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी’ (जो देश की एक प्रमुख व्यवसायिक सूचना कम्पनी है) के आंकड़ों के अनुसार मई 2020 को भारत में बेरोज़गारी दर 21.73 प्रतिशत पहुंच गयी थी जो दिसम्बर 2019 में 7.60 प्रतिशत थी।

कोरोना काल मे हमने भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं को लड़खड़ाते हुए देखा। भारत की जनसंख्या के अनुसार हमारी स्वास्थ्य सेवा ऐसी महामारी झेलने में सक्षम नही थी। आबादी और पलायन की वज़ह से दिल्ली या अन्य मुख्य शहरों में ट्रैफिक की समस्या अब आम हो चली है। दिल्ली की वायु अब प्रदूषण की वजह से जहरीली हो गयी है। सम-विषम फार्मूले जैसे नये प्रयोग से इस प्रदूषण और ट्रैफिक को कम करने की कोशिश तो की गयी है पर इस प्रकार के अधिक से अधिक नये प्रयोगों की आवश्यकता है।

बढ़ती आबादी रोज़गार के अवसर कम कर रही है। भारत का स्थान सर्वाधिक बेरोजगारी वाले देशों की सूची में अव्वल रहता है। बेरोज़गारी की वजह से अपराध बढ़ते हैं और अपराध बढ़ने से न्याय व्यवस्था का चरमराना भी स्वाभाविक है। कोर्ट में फैसले आते आते वर्षों लग जाते हैं। बड़ा परिवार होने की वजह से उपभोक्तावाद हावी रहता है और इससे भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है। बढ़ती आबादी आधी से ज्यादा सरकारी योजनाओं को ध्वस्त कर देती हैं।

कोरोना जब पूरे विश्व में अपने पांव पसारने में लगा था। तब हमें अपनी आबादी को देख कर ही यह डर था कि अगर इटली, अमरीका जैसे विकसित देशों में कोरोना से यह हाल है तो हमारे देश में क्या होगा। वह तो भला हो सरकारी आंकड़ो का जो हम उन पर विश्वास कर अब कोरोना से निडर हो बिन मास्क और सामाजिक दूरी के घूम रहे हैं।

आज़ादी के बाद भारत की जनसंख्या नीति

बढ़ती जनसंख्या हमारे लिए हमेशा से खतरा थी इसी वजह से भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने सबसे पहले 1952 में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाया।  तभी से विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में जनसंख्या नियन्त्रण के लिए कोशिश की जाती रही है।

जनसंख्या नियन्त्रण के लिए अटल बिहारी सरकार की ओर से 2000 में गठित वेंकटचलैया आयोग ने जनसंख्या नियन्त्रण कानून बनाने की सिफारिश की थी। इस आयोग के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया थे जबकि जस्टिस सरकारिया, जस्टिस जीवन रेड्डी और जस्टिस पुन्नैया इसके सदस्य थे।

सितंबर 2019 में जनसंख्या नियन्त्रण को लेकर दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि हम सरकार के कार्यों को अंजाम नहीं दे सकते। जनसंख्या नियन्त्रण कानून पर अमल करवाना अदालत का कार्यक्षेत्र नहीं है। बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी।

वर्तमान भाजपा सरकार संसद में जनसंख्या नियन्त्रण बिल लाकर कानून बना सकती है। सम्भव है कि इस बिल में दो संतान का प्रावधान रखा जाए। दो से अधिक संतान होने पर माता पिता और उनकी संतानों को किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाए।

जनसंख्या नियन्त्रण कानून आवश्यक है या जनसंख्या का प्रबन्धन

यूएन के मुताबिक, “यदि प्रतिस्थापन स्तर की फर्टिलिटी पर्याप्त रूप से लम्बे समय तक बनी रहती है तो देश के अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्थापन द्वारा जनसंख्या को संतुलित करने के लिए कुछ भी करने की जरूरत के बिना ही प्रत्येक पीढ़ी खुद को पूरी तरह बदल देगी।” भारत अब इसके बहुत करीब है, क्योंकि कई राज्यों में कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे है। इसका मतलब है कि भारत की आबादी अब प्रतिस्थापन स्तर पर पहुंचने ही वाली है या अब संभवतः कोई प्रभावी जनसंख्या वृद्धि नहीं होगी।  जनसंख्या वृद्धि नही होगी तो इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि अब हमें जनसंख्या नियन्त्रण करने की कोई आवश्यकता नही है और न ही इसके लिए कोई कानून बनाना अब जरूरी रह गया है। अब अगर हम जनसंख्या प्रबन्धन की बात करें तो हमारे पास अभी एक शक्तिशाली युवाशक्ति है।

जियो युग के बाद से भारत में इंटरनेट के दाम तो गिरे है पर भारतीय युवा तकनीक के प्रयोग और उसका लाभ लेने की जगह उसका गुलाम बन रहा है। विकसित देश एक बाज़ार की तरह हमारे युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। टिकटोक, पब्ज़ी के दुख में डूबे युवा को वाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक की आभासी दुनिया से बाहर निकलने की फुर्सत ही नही है। अगर हमें विश्वगुरु बनना है तो कोरोना के इस झटके से बाहर निकल यह समय अपनी आबादी और युवाशक्ति के सदुपयोग का है।

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हमें कोरोना के बाद घरवापसी कर रहे लोगों की भीड़ और रोज़ ठूंस कर रेलों में यात्रा कर रही जनता को याद कर बुलेट ट्रेन से पहले लोकल ट्रेनों की संख्या बढ़ानी होगी । इसके साथ ही परिवहन के अन्य सार्वजनिक साधनों को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। बुजुर्गों के लिए अभी से टाइम बैंक खोले जाने चाहिए ताकि भविष्य की तैयारी अभी से की जा सके। कोरोना की वजह से बेरोज़गार हो चुके युवाओं के बूढ़े होने से पहले उनके लिए रोजग़ार के अवसरों पर बात शुरू करनी चाहिए।

शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की आवश्यकता है। कोरोना काल में विद्यार्थियों के सामने शिक्षा ग्रहण करने की गम्भीर समस्या खड़ी हो गयी है। विद्यालय तो ऑनलाइन पढ़ाई के बहाने पूरी फीस वसूल कर रहे हैं पर हमें उन छात्रों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन्होंने स्मार्टफोन सिर्फ अपने सपनों में ही देखा है। ऐसे विद्यार्थियों का भविष्य कोरोना की शुरूआत से ही अंधकार में चल रहा है। बढ़ती आबादी जिस तेज़ी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही है उसे देखते हुए हमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग भी समझदारी से करना होगा। ईंधन से चलने वाली गाड़ियों की जगह बिजली चालित गाड़ियों को बढ़ावा तो दिया जा रहा है पर दाम अधिक होने की वजह से आम आदमी की पहुंच से वह अब भी दूर है।

सौर ऊर्जा का प्रयोग भी अभी इतना लोकप्रिय नही हुआ है जितना होना चाहिए। चीन ने जिस तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक प्रयोग कर अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रयोग करना सीखा है हमें भी अब अतिशीघ्र उस ओर ध्यान देना होगा।

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लेखक उत्तराखण्ड से हैं और पत्रकारिता शोध छात्र हैं। सम्पर्क +919720897941, himanshu28may@gmail.com

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