प्रसंगवश

प्रभु! तेरे ‘रामलिंगम’ के देस में ‘कितनी शांति कितनी शांति!’

 

यह कहानी नहीं है। इसे लेख कहना भी कितना युक्तियुक्त होगा मैं नहीं जानता। वैसे यह पूरी तरह से संस्मरण भी नहीं है। इसमें विरोधाभासों से युक्त जीवन की आलोचना भी है और वर्तमान समय–संदर्भ में जीवन को देखने की नयी दृष्टि भी। वास्तव में, यह एक ‘अतिसाधारण’ व्यक्ति का कुछ हद तक संस्मरण है और उस व्यक्ति के बहाने ‘जीवनोपयोगी’ आलोचना है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘साहित्यकारों का दायित्व’ में लिखा है –“हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगलमयी–विधायिनी बन सकेंगी जब कि हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्राहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।”

यद्यपि यह कथन राजनीतिक पराधीनता के उपरांत मिली स्वतंत्रता और उसके माध्यम से सुविधाओं को लोकहिताकांक्षी बनाने के संदर्भ में उल्लिखित है, तथापि इसमें प्रस्तुत तात्विक शब्द – ‘उदार हृदय’, ‘संवेदनशीलता’, ‘बौद्धिक सूक्ष्मता’ और ‘सारग्राह्यता’, ‘संकल्प की महानता’ और ‘कल्याणकारिता’ (शुभ) प्रकारान्तर से विचारणीय और अनुकरणीय हैं। ये तात्विक गुण जीवन को सहज और सुघड़ बनाने में अत्यंत लाभप्रद हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि हम जीवन को बहुत जटिल बना कर जीने के आदी हो गये हैं। उसे सहज जिया जा सकता है परन्तु सहज जीने के लिए सहज होना आवश्यक है। आप समझ रहे होंगे कि ‘सहज जीवन’ सबसे ‘टेढ़ा काम’ है। परन्तु रामलिंगम जैसे सहज, संवेदनशील, उदार हृदय व्यक्तित्व से मिलने–जानने–समझने के पश्‍चात् यह टेढ़ा काम अत्यंत सहज, सीधा और सरल जान पड़ता है। इसी राह से गुज़र कर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा निर्देशित उपरोक्त तात्विक गुण चरितार्थ होते हुए दिखायी देते हैं।

मराठी संत तुकाराम अपने एक ‘अभंग’ में कहते हैं, “बोले तैसा चाले, त्याची वंदावी पाऊले” अर्थात् जो अपने वचनानुसार (कथनी के अनुसार) चलता है, उसको वंदन (गुण–कीर्तन) करना चाहिए। प्रायः अधिकतर लोग अपने वचनानुसार नहीं चलते अपितु इसके विपरीत आचरण करते हैं। इस आचरण–व्यवहार के मद्देनज़र थोड़ा चिंतन करने से पता चलता है कि हम विरोधाभासों से युक्त जीवन जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्‍चात् साम्यवाद–समाजवाद की बातें सुनियोजित रूप में घुट्टी में पिलायी गयी हैं। अतः यहाँ ग़रीब, किसान, मजदूर, वंचित इत्यादि की ‘बात’ करना ‘स्वाभाविक धर्म’ समझा जाता है। हम सब जानते हैं कि सिद्धांत रूप में साम्यवाद–समाजवाद अत्यंत आकर्षक (फैन्सी) है, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से अनेकानेक कारणों से अननुकरणीय है।

इसकी अव्यावहारिकता के कारण ही वह सारे संसार में निस्सार माना गया और बेदखल भी हुआ। आज जो भी इसकी बात करता है, वह अन्य लोगों की ही भाँति अपने जीवन के लिए सुख–सुविधाएँ जुटाने में मशग़ूल रहता है। हर क्षण यह प्रयास करता रहता है कि कैसे अपने ‘हालात’ सुधरेंगे अर्थात् संपन्नता आयेगी। अपने विश्‍वविद्यालयीन जीवन से लेकर अब तक मैंने देखा–जाना–पाया कि साम्यवाद–समाजवाद की बात करने वाले मित्र इस दृष्टि से अधिक चिंतित दिखायी देते हैं। बहुतों ने उसी धारा में अपना करियर ‘सेट’ भी कर लिया है। ऐसे साम्यवादी–समाजवादी प्रभुता संपन्नताकांक्षी लोगों का जीवन त्रिकोणीय है। अर्थात् तीन डब्ल्यू (www) के इर्द–गिर्द इनका जीवन रूपाकार ग्रहण करता है। डब्ल्यू–डब्ल्यू–डब्ल्यू माने वर्ल्ड–वाइड–वेब नहीं, ‘वेल्थ–वाइन–वुमेन’!

ऐसे स्वनामधन्य विद्वान लोग किसी सभा–संगोष्ठी में आमंत्रित किये जाते हैं तो केवल हवाई यात्रा से ही शिरकत कर पाने की संभावना व्यक्त करते हैं। आप भलिभाँति जानते हैं कि ‘व्यस्तता’ के नानाविध बहाने ऐसे विद्वानों के पास होते हैं। आख़िरकार संगोष्ठी संयोजक निमंत्रण हेतु वार्ता कर चुकने के बाद शिष्टाचार को दृष्टिगत रखते हुए कोई–न–कोई जुगत भिड़ा कर उन्हें आमंत्रित कर लेते हैं। ऐसे संपन्नताकांक्षी साम्यवादी–समाजवादियों की अटैची, बैग (लैपटॉप, हैंडबैग) इत्यादि में यात्रा की समाप्ति के उपरांत कई दिनों तक हवाई यात्रा का प्रमाण देते ‘टैग’ टँगे दिखाई दे जाते, जो उनकी संपन्नताकांक्षा और ‘एलीट’ को यों ही जगजाहिर कर जाते थे। इधर सभी हवाई कंपनियों ने ‘टैग’ वाला प्रचलन बंद कर इनकी ‘कुलीनता’ (एलीट) को जबरदस्त धक्का पहुँचाया है।

बीच में हवाई यात्रा का किराया सेंसेक्स की तरह गिरा और साधारण से साधारण व्यक्ति भी हवाई यात्रा करने लगा तो कुछेक विद्वानों के विचार भी सुनने को मिले कि “हवाई यात्रा का तो मजा ही ख़त्म हो गया है। अब जिसे देखो हवाई उड़ान भर रहा है।” बहरहाल, अटैची, बैगों में टँगे हुये वे ‘टैग’ बारंबार हमारे विद्वत समाज की सच्चाइयों (मानसिकता और विरोधाभास) को उजागर करते थे। उपरोक्त कथन से भी उनकी मानसिकता का सहज ही आकलन किया जा सकता है। इसीलिए कहना पड़ा कि हम विरोधाभासों से युक्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आप भलीभाँति जानते होंगे कि ‘राजनीतिक वाम’ के वर्तमान गढ़ केरल का आम आम भी वाम वाम जपता है। वहाँ भी ऐसे नानाविध विरोधाभास सहज ही दृष्टिगोचर होते हैं। कहना न होगा कि सारा संसार ‘एलीट’ (कुलीन) बनने की कवायद कर रहा है।

अस्तु, देश के लगभग सारे शिक्षा संस्थान तथा भिन्न–भिन्न प्रकार के प्रतिष्ठान आज भी इस ‘फैन्सी’ विचारधारा के प्रवाह में प्रवाहमान हैं। यहाँ स्पष्ट कर देना उचित होगा कि इस कटु सत्य को लिखते हुए ‘संपन्नता की आकांक्षा’ (उच्चाकांक्षा?) और उसकी पूर्ति करने वाली प्रवृत्ति को मैं क़तई ग़लत साबित नहीं करना चाहता। मनुष्य का स्वभाव ही है कि वह राजा मिडास की तरह सबकुछ ‘स्वर्णमयी’ चाहता है और स्वर्णमयी करने (पाने?) के लिए नानाविध तौर–तरीक़ों से प्रयासरत रहता है। आप भलीभाँति जानते हैं कि राजा मिडास तो मनुष्य की अतीव आकांक्षा के एक प्रतीक मात्र हैं। हममें कहीं–न–कहीं एक मिडास सुप्तावस्था में जीवित रहता है। हम चाहते हैं कि पैदल हो तो साइकिल मिल जाए, साइकिल मिल जाए तो स्कूटर आ जाए, फिर स्कूटर से कार और कार हो गई तो और अच्छी कार, फिर अच्छा घर, सुंदर (गोरी!) पत्नी और फिर राजा बेटा और बिटिया! उच्चाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं। वास्तव में हम अपने समय (जीवन?) के विरोधाभासों पर बात करना ही नहीं चाहते, न आत्मालोचन ही करना चाहते हैं। यों ही नहीं कि हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सम्पूर्ण मानव समाज को ‘सचेतन’ बनाने की परमावश्यकता पर बल दिया था। (मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है)

कभी–कभी यों ही सोचने–विचारने पर लगता है कि ‘अध्यात्म’ से दूर निकल जाने के कारण तो नहीं कि हममें आत्मालोचन का पूर्णतः अभाव होता गया है? यह निश्‍चय ही विचार का विषय है। मुझे न जाने क्यों लगता है कि इस पर चिंतन किया जाना आवश्यक है। मुझे लगता है कि ‘बोले तैसा चाले, त्याची वंदावी पाऊले’ में संत तुकाराम ने उसी अध्यात्म–दर्शन को प्रस्तुत किया है। परन्तु, विरोधाभासों से युक्त जीवन के प्रवाह में, वर्गों में बाँटने वाली वैचारिकी और समतामूलक समाज की मृगतृष्णा में हमने अपनी सहजता, सामाजिकता और अच्छाइयाँ खो दी हैं।

तथाकथित ‘छोटे’ (वंचित) लोगों के बारे में ‘बड़ी–बड़ी’ बातें करने वाले भी जब भिखारियों को भीख देते हैं तो रेजगारी (छुट्टे) खोजते हैं और सबके सामने वह रेजगारी देकर मिथ्याभिमान से भर उठते हैं। आप स्वीकार करेंगे कि जिस प्रकार समतामूलक समाज पर बात करना ‘फैशन’ हो गया है, उसी प्रकार आज के समय में भीख देना भी ‘फैशन’ है। पढ़ा–लिखा और तथाकथित ‘वंचित’ समुदाय का नौकरीपेशा युवक भी किसी भिखारी को भीख में रेजगारी देता है तो इतनी एहतियात बरतता है कि कहीं उस भिखारी के हाथ से उसका स्पर्श न हो जाए। मुझे अनायास याद आती है बाबा नागार्जुन की काव्य–पंक्तियाँ – “जी तो नहीं कढ़ता है? घिन तो नहीं आती है?” ये हमारे समय के विरोधाभास हैं। इसमें ‘उदार हृदय’ और ‘संवेदनशीलता’ का लोप दिखाई देता है।

ऐसे विरोधाभासों से युक्त समय में मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिलता हूँ, जो अपने ‘साधारण जीवन’ को ‘असाधारण’ तरह से जी रहा है। कभी किसी ‘अतिसाधारण’ व्यक्ति से मिलिए और बातचीत करके देखिए। उसके अतिसाधारण जीवन में जो असाधारणत: अतिविशिष्ट है, उसका सहज ही साक्षात्कार होगा। अनायास ही अनुभव होगा कि जीवन में कुछ भी (आर्थिक दृष्टि से) ठीक न होने के बावजूद पूरी प्रसन्नता के साथ केवल पाँच–छह हजार रुपए प्रतिमाह की तनख्वाह पर लगभग चौदह–पंद्रह घंटे की असाधारण ‘ड्यूटी’ (निःसंकोच) करते हुए किस तरह ‘आनंद का अनुभव’ किया जा सकता है। जीवन के ऐसे ही अतिसाधारण क्षणों में रामलिंगम से मेरा सहज ही मिलना हुआ। उम्र लगभग साठ वर्ष। पेशे से, अनियमित पद पर ‘सुरक्षाकर्मी’ और अवकाश (रविवार) के दिनों में एक दिहाड़ी मज़दूर!

जब उनसे यों ही मिलना हुआ तो ‘जीवन के लिए काम’ को अनिवार्य मानते हुए कुंभकोणम् (तमिलनाडु) के एक कॉलेज में ‘सिक्योरिटी गार्ड’ का दायित्व निर्वहन कर रहे थे और विधाता का तहेदिल से शुक्रिया अदा कर रहे थे। कदकाठी से अत्यंत साधारण व्यक्ति! काव्यात्मक अंदाज़ में यदि परिचय दिया जाए तो ‘जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीर’ – पर्याप्त है! पहली बार संवाद किया तो भरी–पूरी मुस्कान के साथ आवभगत की और फिर लगभग साढ़े–तीन घंटे हर बात पर उसी भरी–पूरी मुस्कान (सहज) के साथ मेरे साथ अकारण ही बने रहे। जब परिचय हुआ तो पता चला कि पुत्तुर ग्राम (तंजावुर) के निवासी हैं। सन 1961 ई. में (किसी माह में) उनका जन्म हुआ था। वे बताते हैं कि उनके जन्म का कोई दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है और जन्म तिथि भी स्मरण नहीं है। बोले, कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी! पहले कौन इतना ध्यान रखता था? कहा कि ‘हैप्पी बर्थ डे’ भी कभी हुआ नहीं तो तिथि विस्मृत ही होती रही और बहुत समय पहले स्मृति से मिट गयी। ऐसा कहते हुए उनकी मुस्कान और भी चौड़ी हो गयी।

आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की परन्तु परिस्थितियों ने आगे पढ़ने के मार्ग और अवसर अवरुद्ध कर दिए तो खेती और मजदूरी में लग गये। इनके पिताजी स्व. शन्मुखम अतिसाधारण खेत–मजदूर थे। माताजी श्रीमती शिवकामी पहले अपनी किशोरावस्था में और फिर विवाह के पश्‍चात् भी गृहकाज के साथ–साथ खेत में मजदूरी करती रहीं। पति के अचानक स्वर्गवास के बाद अब बुढ़ापे में जर्जरित होते हुए भी अपने पोते–पोती में सुखानुभूति के विराट स्वरूप का दर्शन पाती हैं। वे मानती हैं कि जीवन में आनंद की अपनी विशेष भूमिका होती है। हमें किसी भी विकट घड़ी में ‘आनंद’ को नहीं छोड़ना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में आनंद ही जीवन के लिए सबसे बड़ा संबल होता है। बातों–से–बातें बढ़ती गयीं तो मैंने भी कहा, मुझे भी छोड़ने वाले लोग रास नहीं आते। आनंद का मूल्य न समझने वाले जीवनपर्यंत अस्त–व्यस्त–त्रस्त ही रहते हैं।

उदार हृदय एवं संवेदनशील श्री रामलिंगम ने अपनी माँ के ‘आनंद’ विषयक आदर्श विचार को अपने जीवन में हू–ब–हू उतारा है। वे कई बार कहने से नहीं चूकें, “मैं सुखी और आनंदित हूँ!” इन्हें पुरखों से एक एकड़ भूमि विरासत में मिली है। वही संपत्ति–रूपा विरासत इनके पिताजी के जीवन का भी आधार रही। जीवन भर हर विकट परिस्थिति में उस भूमि को बचा कर रखते हुए माता शिवकामी ने उसे ‘पूँजी’ स्वरूप माना और उसे बचाए रखना अपना विशेष दायित्व समझा। रामलिंगम यह बताते हुये थोड़ा भावुक भी हुए कि उनकी माँ शिवकामी उन्हें अपने ‘जीवन की पूँजी’ बताती हैं। आगे बोलते चले कि “अब मैं अपने बच्चों को अपने जीवन की अमिट पूँजी मानता हूँ।” इनके एक लड़की है भुवनेश्‍वरी। आयु सत्रह वर्ष की है और एक लड़का है शिवलिंगम। आयु में चौदह वर्ष का है। बेटी वाणिज्य में बारहवीं की पढ़ाई कर रही है और बेटा दसवीं की पढ़ाई कर रहा है।

वे कहते हैं, “सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। ग़रीबों की ओर आज तक कभी भी, किसी भी सरकार का ध्यान नहीं गया।” संवाद बढ़ता गया तो उन्होंने कहा कि “सबको केवल शहर और महानगर का ध्यान रहता है। सरकारें भी शहर ही बनाने में विश्‍वास करती रही हैं और अब भी उसी दिशा में लगी हुई हैं। ‘गाँव वाले भारत’ से किसी को न प्यार है, न लगाव ही!” वे सहज ही कह गये। ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं उभरा। चेहरे पर एक अज़ीब तरह की स्थिरता थी।

एक घनघोर विडम्बना को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि “अब तो गाँव के लोग भी गाँव में रहना पसंद नहीं करते। जो नौकरी या किसी–न–किसी कामकाज के लिए गाँव छोड़ कर चले जाते हैं, वे लौट कर वापस गाँव आना ही नहीं चाहते।” परन्तु बताते रहे कि वे गाँव में अत्यल्प साधनों में आनंदित हैं। कहते रहे कि “बाकी का जीवन बच्चों को देखते–देखते खुशी में गुज़र जाएगा। कोई बीमारी नहीं है। न कोई ऐसा–वैसा शौक है, न खर्चा ही!” कॉलेज के मालिक को धन्यवाद करते हुए बोले कि इनके कारण यह नौकरी बनी हुई है और सब अच्छा चल रहा है। कहा कि “संसार में ऐसे लोगों के कारण ही हम जैसों का जीवन सहज बन पड़ा है। एक–दूसरे का आधार ही जीवन को गतिशील बनाता है।” रामलिंगम को सुन कर मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्द ‘सर्वमंगलमयी–विधायिनी’, ‘उदार हृदय’ और ‘संवेदनशीलता’, ‘सूक्ष्म और सारग्राहिणी बुद्धि’ अनायास ही स्मरण आते हैं।

मैंने उन्हें गले लगाया तो आँखें आनंदाश्रुओं से भर आयीं। बोले, “हम जैसों का इतना आदर कौन करता है?” मुझे चाय भी पिलायी और बोले कि “कॉलेज की ओर से हमें दो वक़्त की चाय मुफ़्त में मिलती है। इतना अधिकार भी है कि यदि कोई हमसे मिलने आता है तो उन्हें भी हम चाय पिला सकते हैं। उसके हमसे कोई पैसे नहीं लिये जाते।” ऐसा कहते हुए वे गदगद हुए जा रहे थे। संवाद के दौरान वे कई बार बोलते रहे, “आपसे मिलकर अच्छा लगा बेटा! कभी–कभी भूले–भटके मुझसे बात कर लिया करना। किसी दिन बच्चों के साथ घर आना।” मैं लौट कर आया तो शाम को फोन करके मेरी यात्रा का कुशल–क्षेम भी पूछ लिया।

उनके साथ हुई अचानक भेंट, सहज संवाद और विचारोत्तक बातों ने मुझे बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया। मैंने अनुभव किया कि बिना किसी कारण और किसी शर्त के आपकी चिंता और कद्र करने वाले कम ही मिलेंगे। बहुतों के पास तो इस मामले में आँकड़ा ‘शून्य’ होगा। अब लगता है कि इस मामले में मैं धनी व्यक्ति हूँ।

बहरहाल, सच! पाँच–छह हजार रुपये कमाने वाला यह अतिसाधारण व्यक्ति हमारे शिक्षा संस्थानों एवं विश्‍वविद्यालयों के अहंकारी, दम्भी, अयोग्य, चापलूसी और विचित्र क़िस्म की चतुराई से भरे प्रोफेसरों से कितना अलहदा और जीवन का सच्चा पाठ पढ़ाने वाला रहा! मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में यह एक विशेष साक्षात्कार जुड़ गया है। भारत में न जाने ऐसे कितने ही रामलिंगम होंगे, जो ‘अतिसाधारण’ जीवन जीते हुए हम जैसों को विशेष पाठ पढ़ा जाते हैं।

रामलिंगम से बात करते–करते कॉलेज परिसर में कुछ सफ़ाईकर्मी महिलाएँ भी मिलीं। मैंने सभी महिलाओं को नमस्कार किया। उनसे संवाद किया तो एक बात सामान्य रूप से सामने आयी कि वे सुबह सात बजे से कॉलेज में सफ़ाई काम में जुट जाती हैं और प्रतिदिन सुबह उन कमरों को चॉकलेट, च्युइंगमों के ‘रैपर’ और पेपर के रॉकेटों से भरा पाती हैं। वे कहती हैं, “कितना ही साफ़ कर लें, कोई लाभ नहीं। हमारा देश गंदगी से नहीं, गंदों से भरा हुआ है।” ऐसा कहते हुए वे सब ठहाका मार कर हँसने लगीं। अंत में कहा, “हमें पैसे कम मिलते हैं परन्तु गर्व है कि हम गंदों की सोच को हर दिन सुबह से शाम तक स्वच्छ करने में अथक जुटे रहते हैं। इसी सोच के साथ कि कभी तो सोच बदलेगी और किसी दिन सुबह–सुबह जब हम पहुँचेंगे तो कमरे स्वच्छ मिलेंगे।”

वाह! क्या बात कही और किस दिलचस्प अंदाज़ में कही। उनकी बातों से प्रभावित हुए बिना नहीं ही रहा जा सकता। सच, समस्या देश के साथ नहीं, देशवासियों के चरित्र के साथ है। इस क्रम में कहने को बहुत कुछ है, जो झकझोर रहा है परन्तु वह पुनः जागरण वक्तव्य–सा होगा और इधर बहुतांश भारतीय ‘जागरण’ से ऊबते ही नहीं बल्कि चिढ़ते–कुढ़ते भी हैं। अस्तु, रामलिंगम और सफ़ाईकर्मी महिलाओं की बातें सुन कर मुझे दूरदर्शन का एक विज्ञापन स्मरण हो आया : “मेरा देश बदल रहा है। आगे बढ़ रहा है।” कितनी भारी विडम्बना है! वैसे निस्संदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि देश सरकारों से नहीं अपितु जनता के महान एवं शुभ संकल्पों से चलता है और विकसित होता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्द स्मरण आते हैं – “हम लोग एक कठिन समय के भीतर से गुजर रहे हैं। आज नाना भाँति के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ ऐसा अन्धा बना दिया है कि जाति–धर्म–निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव–सा हो गया है। ऐसा लग रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ से प्रेम ने मनुष्यता को दबोच लिया है। दुनिया छोटे–छोटे संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर अनेक दलों में विभक्त हो गई है।” (मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है)

यह भी पढ़ें – मैं और महाराज : स्मृतियों से एक कथांश

हमें इस स्थिति से (संकीर्णता, मोहग्रस्तता, पथभ्रांतता, वैचारिक कठमुल्लापन, अंतर्विरोध) उबरने की नितांत आवश्यकता है। ‘अच्छे आदमी’ के सम्बन्ध में ओशो ने कहा था – “अच्छे आदमी की मेरी परिभाषा है, ऐसा आदमी जो खुद से तृप्त है, आनंदित है। जो किसी के आगे खड़े होने के लिए पागल नहीं, किसी के पीछे खड़े होने में जिसे कोई तकलीफ़ नहीं। जहाँ भी खड़ा हो जाए, वहीं आनंदित है।” हम सब जानते हैं कि ऐसे ‘अच्छे आदमी’ संसार में अत्यल्प होंगे। रामलिंगम उन्हीं अच्छे आदमियों में से एक व्यक्ति हैं। ऊपर ‘जीवन और अध्यात्म’ की ओर मैंने यों ही संकेत नहीं किया था। हमें अपने लोक जीवन एवं ज्ञान–परम्परा से जीवनोपयोगी अनमोल विचार प्राप्त होते हैं। हम उसी का अनुसरण करें तो देश का भला हो सकता है। थोड़ा ध्यान देंगे तो देखेंगे कि लोक में ‘भाग्य’ को ही ‘संतोष’ का माध्यम बनाया गया है। लोक में समतामूलक समाज का काल्पनिक ‘टंटा’ दृष्टिगोचर नहीं होता। हमारा ‘लोक’ रामलिंगम की तरह सहज है। मराठी का एक लोकप्रिय भक्ति गीत इस संदर्भ में बारंबार स्मरणीय एवं अनुकरणीय है, जो जीवन को देखने–समझने की ‘दृष्टि’ देता है। इसी व्यापक ‘लोक–दृष्टि’ के साथ विराम :

“जगी जीवनाचे सार घ्यावे जाणुनी सत्वर,
जैसे ज्याचे कर्म तैसे फळ देतो रे ईश्‍वर।।
क्षणिक सुखासाठी आपुल्या कुणी होतो नीतीभ्रष्ट
कुणी त्यागी जीवन आपुले दु:ख जगी करण्या नष्ट
देह करि जे–जे काही आत्मा भोगितो नंतर
जैसे ज्याचे कर्म तैसे फळ देतो रे ईश्‍वर॥”

भावार्थ, “जीवन का सार शीघ्रातिशीघ्र जान लेना चाहिए। जैसे आपके कर्म होंगे, ईश्‍वर वैसे ही फल देते हैं। क्षणिक सुख के लिए कोई नीतिभ्रष्ट हो जाता है। कोई अपना सम्पूर्ण जीवन दुनिया के दुःखों को दूर करने हेतु निःस्वार्थ लगा देता है। हमारे शरीर के द्वारा जो–जो कर्म होते हैं, कालान्तर में आत्मा उसी का प्रतिनिधान करती है। जैसे आपके कर्म होंगे, ईश्‍वर वैसे ही फल देते हैं।”

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लेखक युवा आलोचक, राजनीति विमर्शकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं तथा तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919486037432, anandpatil.hcu@gmail.com

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