प्रसंगवश

एक झारखण्डी का यूनाइटेड नेशन के आदिवासी फॉरम से रूबरू

 

झारखण्ड के मुंडारी लिटरेरी कौंसिल एवं दिल्ली इंडियन कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिजेनस एंड ट्राइबल पीपल के साथ काम करते वक्त ही 2005 मे यूनाइटेड नेशन वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजेनस पापुलेशन की मीटिंग मे जाने के लिए आवेदन देने के लिए बोला गया। उन दिनों इंटरनेट की सुविधा इतनी आसानी से फ़ोन मे उपलब्ध नही होती थी इसलिए इंटरनेट कैफ़े मे जाकर आवेदन भरा। 28 अप्रैल 2005, दिल्ली के हॉस्टल मे मेरी दोस्त ताशी ने मेरे रूम का दरवाजा खटखटाया और कहा मुंडा, तुम्हारी चिट्टी आयी है जिनेवा से। फिर उस से रहा नहीं गया और चिट्ठी खुद पढ़ने की इजाजत माँगी और जोर-जोर से पढ़ने लगी की ये इन्विटेशन लेटर तो यूनाइटेड नेशन्स से है। वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजेनस पापुलेशन की मीटिंग में तुम भारत के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करोगी, उसके लिए तुम्हारे आवेदन का चयन हुआ है। यात्रा के खर्च का वहन वॉलंटरी फण्ड करेगा। मेरे चयन पर उसकी खुशी अविश्वसनीय थी।

ताशी शेरपा को घूमना और नई जगहों के बारे में पढ़ना बहुत पसन्द था, फिर उसने जितना भी पढ़ा था जिनेवा के बारे में वह सब बताने लगी मानो वह पहले भी वहाँ जा चुकी हो वहाँ के लोग, वहाँ की मुद्रा, वहाँ की भाषा तथा विभिन्न घूमने की जगह मानो बातों ही बातों में उसने जिनेवा का का दर्शन करा दिया हो। बहरहाल, मीटिंग के लिए चयन होना एक अलग बात है असल दौड़, उसके बाद शुरू होती है क्योंकि विदेश जाने के लिए पासपोर्ट की जरूरत होती है शायद चयन होने की उम्मीद ना के बराबर थी, तो मैंने पासपोर्ट नहीं बनवाया था। उस इनविटेशन चिट्ठी के आधार पर पासपोर्ट बनवाने का आवेदन दिया और फिर दिल्ली में दौड़ शुरू हो गयी, तत्काल सेवा में 1 सप्ताह में पासपोर्ट बन गया पर उससे पहले जरूरी पेपर बनवाते एक महीना पूरा लग ही गया।

इसी बीच, मीटिंग की तैयारी भी इंडियन कॉन्फिडेरेशन फोर इंडीजीनस एंड ट्राईबल पीपल (आई.सी.आई.टी.पी) के ऑफिस में होती, किन-किन विषयों पर बात रखनी है, क्या-क्या बात करनी है, इसके साथ और भी ऑर्गेनाइजेशन के साथ मीटिंग, ताकि देश के विभिन्न आदिवासी समुदाय की समस्याओं को बराबरी से रखा जा सके।

18 से 22 जुलाई 2005 में वर्किंग ग्रुप ऑन इंडियन पापुलेशन का 23 वां अधिवेशन हुआ और इस अधिवेशन का मुख्य विषय था – इंडीजीनस पीपल एंड इंटरनेशनल एंड डॉमेस्टिक प्रोटेक्शन ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज (आदिवासियों के अन्तर्राष्ट्रीय एवं स्थानीय पारम्परिक ज्ञान प्रणाली का संरक्षण)

मीटिंग शुरू होने के एक दिन पहले ही मीटिंग हॉल में प्रवेश के लिए पहचान पत्र बनाया जाता है जो सिर्फ मीटिंग के अन्तिम दिन तक के लिए मान्य होते हैं और उस पहचान पत्र के बिना प्रवेश वर्जित होता हैं l  एक दिन पहले ही अपने-अपने महाद्वीप के लोग मीटिंग करते ताकि एक दूसरे को जान सके और एकजुट होकर काम कर सके। दिन के शुरू हो जाने के बाद हर सुबह आधे घंटे से 1 घंटे की मीटिंग होती और उसमें विषय वस्तु के हिसाब से एक संयुक्त पेपर तैयार किया जाता हैं। देश‌ मे आदिवासियों से सम्बन्धित मामलों को दस्तावेज के साथ लिखित रूप मे पेश किया जाता और मुद्दे अगर एक से होते तो अलग-अलग देशों से भी हस्ताक्षर द्वारा साथ खड़े होने की सहमति ली जाती। यह एक तरीका है एक देश का दूसरे देश के आदिवासी भाइयों  के संघर्ष में सहयोग एवं साथ देने का। मीटिंग में संयुक्त दस्तावेजों को ज्यादा महत्व मिलता क्योंकि इसमें एक ही महाद्वीप के कई  देशों के एक समान मुद्दे को समर्थन के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

स्वागत समारोह- यूनाइटेड नेशन के ऑफिस के पीछे आरियाना पार्क में पहले दिन पारम्परिक पूजा के साथ शुरुआत की गयी जिसमें प्रकृति, पृथ्वी, आकाश एवं पुरखों को याद करते सबके लिए प्रार्थना किया गया, इसमें पेरू के आदिवासीयों ने अपने पारम्परिक तरीके से पूजा की।

मीटिंग में भाग लेने वाले प्राय: सभी अपनी-अपनी पारम्परिक वेशभूषा में आए थे। मैंने भी अपना पारम्परिक परिधान, “पड़िया लांगा” (मुंडा महिलाओं का पारम्परिक परिधान) पहना था और मेरा खद्दर का “पड़िया लांगा” उस दिन मुझे बहुत ज्यादा ही अच्छा लगा ,क्योंकि उन दिनों अगर राँची में पड़िया लांगा पहन कर निकल जाते तो लोग घूम-घूम कर देखने लगते थे पर विदेश में ऐसा कुछ अलग सा महसूस नहीं हुआ, सभी अपने रंग में थे। स्वागत समारोह में हम झारखण्डीओ की तरफ से “हो” (श्रीमती सुकांति हेम्बरोम), “मुंडा”(स्व. डॉ राम दयाल मुंडा और मै), “संथाली” (श्री जोए टुडू) मिलकर एक संथाली गाना गाए एवं  श्री इमानुएल टोप्पो जी ने कुडुख डंडी प्रस्तुत की।

यूनाइटेड नेशंस की मीटिंग में 6 भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध रहता है, उनमें अरबी, चाइनीज, फ्रेंच, रशियन, स्पेनिश और इंग्लिश है। आज भी हिन्दी का अनुवाद उपलब्ध नहीं है, और हिन्दी भाषा का अनुवाद उपलब्ध नहीं होना थोड़ा दुःखद महसूस हुआ और इस कारण मैंने सुझाव के तौर पर  वॉलंटरी फण्ड की मीटिंग मे कहा की भारत एक आदिवासी बाहुल्य देश है और हिन्दी वहाँ की राजभाषा। भारत में कई मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो अँग्रेजी नहीं जानने के कारण इस फोरम तक सीधा संवाद कर पाने मे असमर्थ हैं यदि हिन्दी भाषा भी अनुवाद के रूप में उपलब्ध रहेगी तो जमीनी स्तर पर काम कर रहे कई सामाजिक कार्यकर्ता यूनाइटेड नेशन के आदिवासी फोरम में अपनी आवाज बुलन्द कर पाएँगे।

दोपहर के भोजन अवकाश के समय का भी बखूबी से इस्तेमाल किया जाता, इस दौरान कई साइड इवेंट/ संगोष्ठी एवं कॉकस मीटिंग हुआ करती। इन मीटिंग के बारे में एक-दो दिन पहले ही इंफॉर्मेशन डेस्क, पोस्टर या ई-मेल में खबर दे दिया जाता और आप अपनी पसन्द के विषय पर हो रहे साइड इवेंट में शामिल हो सकते हैं। मैं आदिवासी युवाओं से सम्बन्धित चर्चा में शामिल हुई। वहाँ विभिन्न देशों के युवाओं की समस्याओं पर बात रखी गयी।

युवा वर्ग चिंतित था -वैश्वीकरण एवं भाषा संस्कृतियों का ह्रास, पलायन, प्राकृतिक संसाधनों की लूट , अपने ही देश में नौकरी का अभाव एँव एशियाई देशों में देश हित के नाम पर जल जंगल जमीन पर हो रहे हमले, जंगलों की अंधाधुंध कटाई एवं कमर्शियल फार्मिंग के लालच में अपने पारम्परिक संसाधनों से परिपूर्ण जंगलों को खोते आदिवासी लोग। इन सब बातों को सुनते हुए बिल्कुल नहीं लग रहा था कि मैं किसी दूसरे देश का दर्द सुन रही हूँ ऐसा लग रहा था सब एक धागे से जुड़े हैं और एक ही तरह के संकट से ग्रसित हैं। इन सब में एक केन्या के युवा डॉक्टर ने अपनी बात रखी जो हमेशा याद रहेंगी।

उसने बहुत ही साधारण बात कही उस मंच पर,  ऐसी बात बोलने से पहले शायद मैं दो बार सोचती, पर सहजता से उसने कहा कि “आज हम आदिवासी अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे हैं और अपनी पहचान बचा कर रखने के लिए हर जतन प्रयास कर रहे हैं और इस प्रयास के बीच हम इतने व्यस्त हैं कि आज अपने गांव में गोबर से लिपै हुए आंगन की खुशबू कहीं गायब हो गयी और हमे इसका एहसास तक नहीं हुआ”। इस साधारण बात में  बहुत अनूठा संदेश था। 2005 भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे ऑर्गेनाइजेशंस में से इंडियन कॉन्फ़िडिरेशन इंडिग्नेशन ट्राईबल पीपल्स, झारखण्डी ऑर्गेनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स, वर्ल्ड आदिवासी काउंसिल ने एक साथ अपनी बात रखी और उसमें असम के चाय बागान में काम कर  रहे झारखण्ड के आदिवासियों को “टी-ट्राईब” के नाम से पुकारा जाना और अनुसूचित जनजाति की कैटेगरी में नहीं रखे जाने पर आपत्ति जताई।

सार्वजनिक हित एवं विकास के नाम पर स्थानीय लोगों का विस्थापन, पर्यावरण विकास और वन उत्थान के नाम पर जमीन की लूट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अनुबन्ध किए जाने पर, औषधीय पौधों की खेती के नाम पर स्थानीय पारम्परिक चिकित्सकों को वंचित होने पर चिन्ता जताई, खनिज के खनन में बहुराष्ट्रीय निवेशको द्वारा भारतीय एवं स्थानीय रूढ़ि कानून की अवहेलना का नतीजा,  संथाल परगना झारखण्ड के पछुवारा कोल माइनिंग, नगरनार छत्तीसगढ़ के स्टील मिल, नेतरहाट झारखण्ड की बॉक्साइट माइनिंग, मेघालया यूरेनियम माइनिंग में आदिवासी समुदाय का पुरजोर विरोध यह दर्शाता है की खदान की नीलामी से पहले वहाँ रह रहे आदिवासी समुदाय से या ग्राम सभा से किसी प्रकार की कोई वार्तालाप यह सहमति नहीं ली गयी। आदिवासी शिक्षा में मातृभाषा का महत्व एवं आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ मातृभाषा का समागम शिक्षा पद्धति को बहुत ही आसान बना सकता है।

कई विकसित देशों ने भी मातृभाषा को केन्द्र बिन्दु में रखकर शिक्षा प्रणाली को बहुत उम्दा स्तर पर पहुँचाया और मेरा विषय भी यही था कि, यदि झारखण्ड में आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में मातृभाषा मैं पढ़ाया जाए तो आदिवासी बच्चों की प्रतिभा निखर कर सामने आएगी और रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे, लोक साहित्य को संरक्षण मिलेगा, पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली को महत्व मिलेगा और इस ज्ञान का सफर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मे मातृभाषा के द्वारा ही संभव है।

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मीनाक्षी मुंडा

लेखिका एशिया यंग इनडिजीनस पीपुल्स नेटवर्क (फिलीपींस) की अध्यक्ष हैं। सम्पर्क - 7004807051, meenakshipalo@gmail.com
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