जयंती फिल्म
सिनेमा

जयंती के मायने बताती फिल्म

 

नवम्बर 2021 में थिएटर में आई मराठी फ़िल्म ‘जयंती’ ओटीटी प्राइम अमेज़न पर हिंदी में भी रिलीज़ हो चुकी है और पसंद की जा रही है। फिल्म अम्बेडकरवादी  अभिव्यक्ति की पहली ऐसी फिल्म बन गई है जहाँ कोई सवर्ण उनका उद्धारक नहीं। हम जानतें है सिनेमा में समाजशात्र से अधिक अर्थशास्त्र का महत्व रहता है जहाँ एससी, ओबसी,एसटी, आदिवासी दलित कमजोर वंचित बहुजन समाज के लिए कोई केन्द्रीय स्थान न था लेकिन इस फ़िल्म ने प्रमाणित कर दिया कि आज यह समाज सिनेमा के माध्यम से खुद अपनी कहानी कहने में समर्थ है। फ़िल्म अपने हीरोज़ का खोखला महिमामंडित करने में यकीन नहीं करती जैसे कि पिछले कुछ वर्षों से नए-नए महानायक ख़ोज उनकी बायोपिक बनाने का चलन बढ़ चुका है। निर्देशक स्थापित करना चाहता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर जैसे महामानव किसी एक जाति या धर्म के उत्थान की बात नहीं करते थे बल्कि वे सबके हैं उनके विचार आज भी सभी के विकास के लिए हैं। इन महामानवों को श्रद्धांजलि देनी हैं तो स्मारक या जयंती पूजन से कहीं अधिक बेहतर है इनकी पुस्तकें पढ़े और इनके बताएं मार्गों पर चलें।

‘अछूत कन्या’ से लेकर ‘आरक्षण’ तक हिंदी सिनेमा अस्पृश्यता पर संदेश तो देता आया है लेकिन कोई वैचारिक जागृति न कर पाया संभवत: इस प्रकार का कोई इरादा था भी नहीं, वैसे भी दलित समाज के उत्पीड़न के प्रति विरोध दर्ज करवाने वाले विचारक बाबा भीमराव अम्बेडकर से हिंदी सिनेमा बचता रहा, क्योंकि वो सिनेमा की ताकत से वाकिफ था और सिनेमा का पितृसत्तात्मक चरित्र समावेशी समाज के निर्माण की इच्छाशक्ति रखता था संदेह है। वास्तव में हिंदी सिनेमा में अंबेडकरवादी विचारधारा या उनके विचारों से प्रभावित चरित्रों का हमेशा ही अभाव रहा है, अथवा कहें कि प्रभाव नज़र तो आता है लेकिन उसके लिए उन्हें कभी श्रेय नहीं दिया गया। पिछले दशकों में हम भारतीय सिनेमा के परम्परागत ढाँचे में बदलाव देख रहें हैं। बाबा साहेब की वैचारिकी से प्रभावित फिल्मों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवानी आरंभ कर दी है। (आप सबलोग में मेरा लेख अम्बेडकर की वैचारिकी यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं) क्षेत्रीय सिनेमा में विशेषकर मराठी और दक्षिण भारतीय फ़िल्में बाबा साहब के सामाजिक और संवैधानिक अवदान को महत्व देतें हुए उन्हें प्रचारित प्रसारित भी कर रहें हैं।गोंडाने,डोंगरे,रामटेक,टेकम जैसे सरनेमज़ का प्रयोग और इन समुदायों के मुद्दे फ़िल्म को विश्वसनीय बनाते हैं।

इस संदर्भ में ‘जयंती’ फिल्म पूर्णतया जातीय विमर्शों का एक्स्टेन्शन है जहाँ ‘जय भीम’ सिर्फ नारा नहीं, उनकी तस्वीर या मूर्ति या जयंती एक दिन का त्यौहार भर नहीं कि ऐतिहासिक गौरव से ही खुश होकर बैठ जायें! बल्कि हर परिस्थिति में उनके विचारों को पढ़े-समझे जीवन में उतारें स्वयं भी आगे बढ़े और सबका सहयोग करें ताकि समाज के लिए उनके कार्य सिद्ध हो सकें। फिल्म में पहली बार ‘हू वेयर शुद्राज? गुलामगिरी, शाहू महाराज की जीवनी,और शिवाजी कौन थे? नामक किताबें अपने संघर्ष की गाथा बताती हैं जिनसे नायक की कायाकल्प होती है। फ़िल्म में इनके लिए महामानव शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य है कि इन्हें भगवान न बनाएं,हम मूर्ति के गले में फूल हार डाल देने से इनका महत्व निर्धारित नहीं कर सकते, जरूरत है इनके विचारों को अपने कार्यों द्वारा आगे बढ़ाना। स्वतंत्रता मिल गई, संविधान में अधिकार मिल गये लेकिन उसके जश्न को जयंती के रूप में कब तक बनाते रहेंगे। फिल्म में मास्टरजी जयंती पर चंदा नहीं देता और नायक संत्या से कहता है “मैं किसी भी जयंती के लिए चंदा नहीं देता, क्या जो चंदा नहीं देते वे बाबा साहब को नहीं मानते, और नेता ने पैसा दिया तो क्या बाबा साहब को मानता है क्या?” हाँ कहने पर मास्टरजी कहतें हैं “थोड़ा सोच कर बोलेगा तो एहसान होगा शिवाजी महाराज पर,स्कूल का विरोध करने वाला महाराज शिवाजी का सिपाही कैसे हो सकता है?”  फिल्म का गीत अपने उद्देश्य को प्रकट करता है ‘जयंती का मकसद निभा नहीं पाया, कर्ज जय भीम का चुका नहीं पाया, कैसे बन जाता मैं तेरा तेरा अनुयायी… अभी काबिल नहीं हूं कि करूं, तेरी आराधना”। यानी  महामानवों के कर्मक्षेत्र को अपने जीवन का कर्मक्षेत्र बनाकर ही जय भीम कहने के अधिकारी हो,यही उनका वास्तविक सम्मान है। 

फ़िल्म शिक्षा से वंचित अज्ञानता में डूबे बेरोजगार, नशे में लिप्त निम्न वर्ण के युवा संतोष (ऋतुराज वानखेड़े) की कहानी है,उसके जीवन में नया मोड़ जेल में रहकर आता है जब एक ओबीसी मास्टर माली सर (मिलिंद शिंदे) उसकी बेल करवाने के बजाय जेल में रहते हुए उसे शिवाजी,अम्बेडकर,ज्योतिबा फुले की पुस्तकें पढ़ने के लिए देते हैं और नायक संघर्ष कर सम्मानजनक जीवन की ओर अग्रसारित होता है उसके संवाद शानदार तरीके से प्रभावित करतें है उसका चरित्र स्वाभाविक ढंग से विकासमान होते हैं ये एक दिन अचानक का हृदय परिवर्तन की तरह फ़िल्मी नहीं लगता साथ ही अपने जैसे वंचितों को भी अपने बिजनेस से जोड़ता है नौकर नहीं सहयोगी बना कर।

कूड़े का पहाड़ के दृश्य से फिल्म का आरंभ होता है जो एक दलित बस्ती में है जहाँ ओबसी,एससी,आदिवासी समुदाय रहतें हैं। नायक संतोष ओबीसी है इसलिए उसकी माँ अपने बेटे के दलित दोस्तों को पसंद नहीं करती, अम्बेडकर जयंती में भाग लेने और उनकी पुस्तकें पढ़ने से भी मना करती है,न मानने पर उसे घर से निकाल देती है। दूसरी और नेता आमदार यानी क्षेत्रीय विधायक(किशोर कदम) संत्या जैसे बेरोजगार युवकों का इस्तेमाल करता है, राजनीति युवाओं में साम्प्रदायिक घृणा,धार्मिक जातिवादी समीकरण निर्मित कर इन्हें गुमराह करती है।   संत्या खुद को रयतेचा राजा यानी जनता के राजा शिवाजी का सैनिक मानता है। इसलिए मुसलमान लड़के से कहता है कि शिवाजी जयंती और तेरा कोई लेना देना नहीं तो वह कहता है “हमने ऐरो-गेरो से शिवाजी महाराज को नहीं सीखा है अपने पूर्वजों से सीखा है जो सच जानते थे इसलिए पता है कि महाराज सिर्फ तुम्हारे नहीं थे हमारे भी थे”

नेता उसे जेल करवा देता है जहाँ मास्टर के कहने पर उसे अखबार और महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़ने को दी जाती है। शिक्षा ही वो हथियार है जो आपको आपकी पहचान करवाती है आप खिलौना बनने से इनकार कर देते हैं जिसे बाबा ने ‘शेरनी का दूध’ कहा है संत्या इसका उदाहरण बनता है। हमारे सभी स्वतंत्रता संग्राम  सेनानी जेलों में अध्ययन करते थे और लिखा करते थे और खुद को परखते थे और संघर्ष के साथ फिर संग्राम में उतर आते थे तब गुलामी से मुक्ति पानी थी तो आज हमें सामाजिक रुढ़ियों,बेड़ियों से जातिवाद छुआछूत भेदभाव से मुक्ति चाहिए। इसके लिए जरूरत है शिक्षा के अपने भीतर झांकने की तभी हम आगे बढ़ सकते हैं विकास कर सकते हैं।जेल में ‘काबिल नहीं हूं कि करूं तेरी आराधना’ गीत बहुत ही सुंदर बन पड़ा है जो आज के राजनितिक धार्मिक ‘अंध भक्तों’ पर भी यह गीत बहुत सूट करता है। ‘भीम सैनिक आए’ आह्वान गीत भी चिंतन के मार्ग खोलता है  और मास्टर का विश्वास सफल होता है कि “एक बात का मुझे पूरा विश्वास था कि जैसे इंसान को बुरी आदतें लगती है वैसे अच्छी आदतें भी लगती हैं”

इसी बस्ती में रेखा नामक स्त्री घरों में काम करके अपने बेटे को अफसर बनाना चाहती है तो नायक उसका मजाक बनाता है कि ‘झाड़ू पोंछा करती है और टशन देखो!’ तो वो कहती है “झाड़ू पोंछा बर्तन काम नहीं होता! और टशन क्या सिर्फ मर्दों में होता है अगर औरत ने अपना टशन दिखा दिया तो देखना दुनिया बदल जाएगी।” फिल्म की नायिका पल्लवी (तितिक्षा तावड़े) भी सशक्त और निडर वो  शिक्षित और स्वतंत्र बाबा की अनुयायी है। नायक का दोस्त कहता है “बाबा साहब को मानने वालों की खासियत यही है कि उनकी जात पता नहीं लगती…पढ़ी-लिखी लड़कियां किसी का सुनती नहीं संतया” संत्या जो हमेशा उसके साथ छेड़छाड़ करता है कहता है कि ‘कल उसे बोलूँगा ज्यादा पढ़ने-लिखने की जरूरत नहीं’ मतलब उससे शादी भी करनी है ताउम्र रोब भी जताना है यह वास्तव में पितृसत्तात्मक मानसिकता है।

उधर कुकरेजा (अमर उपाध्याय) कमजोर आदिवासी रेखा का बलात्कार के बाद करंट लगाकर उसकी हत्या कर देता है। उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है लेकिन 10 लाख़ के लालच में उसका पति मोर्चा निकालने से मना कर देता है कि “पत्नी थी मगर अब नहीं रही” स्पष्ट है कि वंचित वर्ग की महिलाओं की स्थिति अधिक शोचनीय है। जब संत्या कहता है वो तो आदिवासी थी न! तब दोस्त कहता है “आदिवासी किसको बोलता है? वो हम सब की बहन थी, तेरी भी”। यह संवाद वास्तव में कमजोर और वंचितों के संगठन पर जोर देता है कि अन्याय होने पर सभी एकजुट होकर सामना करो। मास्टर जी समझा रहें हैं “एक अन्याय सहता है  तो दूसरे पर होता है फिर तीसरे पर चौथे पर। हमें अन्याय के सहने की आदत होती है, हमें अन्याय सहने की आदत नहीं बनानी है बल्कि पहली ही बार में अन्याय का प्रतिकार करना है” तभी उनकी शिष्या पल्लवी पर जब संत्या हाथ उठता है तो रोक देती है और कहती है “गुलामों से डर नहीं लगता है मुझे… ‘मालिक को खुश करने के लिए अपने ही लोगों की जान लेने वाले सिर्फ गुलाम होते हैं…और गुलाम पर हम थूकते भी नहीं”। रेखा के आन्दोलन को रोकने में संत्या की भूमिका यानि नेता से दलाली के पैसे लेने पर उसे लज्जित करती है उसमें यह साहस शिक्षा के माध्यम से ही आया है।

बाबा की जयंती पर पल्लवी का एक लंबा संवाद है जो भाषण-सा होकर भी बोर नहीं करता जो बहुजन समाज पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है कि वे ‘जय भीम’ का नारा जरूर लगातें है लेकिन उनके विचारों को समझने उन्हें पढ़ने का प्रयास नहीं करते, जयंती पर केवल नाच-गाना, खाना-पीना करके अपना कर्तव्य निभा देते हैं। जयंती के दिन संत्या कहता है ‘मेरे से बड़ा ‘भक्त’ महाराज का नहीं वो मुसलमानों के लिए ‘ कहर’  था’। तब पल्लवी कहती है “बस इतना ही जानता है ‘कहर’ थे महाराज! कहर थे, मगर किसी एक समाज के लिए नहीं, बल्कि पूरी नियत और धर्म के अंधों के लिए। अगर वे सिर्फ मुसलमानों के दुश्मन थे तो दौलत खान को उन्होंने शस्त्रागार का प्रमुख नहीं बनाया होता। मदारी मेहतर महाराज का सबसे वफादार अंगरक्षक था। क़ाज़ी हैदर उनका वकील था, महाराज का बड़ा भक्त मानता है ये बता, किसानों की क्या नीतियां थी, ये पता है औरतों के बारे में उनके क्या विचार थे! ये पता है! क्यों लोग उनके लिए मर मिटने को तैयार हो जाते थे, ये पता है? ऐसे महान राजा को बनाने वाली माताजी जीजा बाई कितनी महान थी यह पता है।…. नहीं न! अगर यह सब नहीं पता तो कौन से शिवाजी महाराज को तू जानता है ?… जय भीम कहने की औकात नहीं है तुम्हारी ! शिवाजी महाराज के काम और बाबा साहब के विचारों का प्रचार करने के लिए नालायक भक्तों की जरूरत नहीं है”। एक सांस में ये संवाद संत्या के साथ साथ दर्शकों को भी  झंझोड़कर जगा देता है, वास्तव में हम भी कितना पढ़ते हैं महामानवों की  पुस्तकों को?

फिल्म में कई संवाद सूक्ति की तरह आते हैं “इधर हम कंकड़ पत्थर की पूजा कर रहे हैं वह दुनिया कितनी आगे निकल गई है”;”बाबा साहब नाम का एक अनमोल हीरा मिला है तुम लोगों को उसका अपमान मत करो”; “नसीब से कुछ नहीं होता, पढ़ो, शिक्षित बनो, मेहनत करो”’ “बाबा साहब के विचार पारस के जैसे हैं जो भी उन्हें छू लेता है वह सोने का हो जाता है” ; “शुद्ध भाषा में भाषा जैसा कुछ नहीं होता जैसा हम बोलते हैं वही बोलो अपनी भाषा से शुद्ध और कोई भाषा नहीं हो सकती” ; एक संवाद अम्बेडकरवादी दर्शन का महत्त्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है कि “कोई अपन के एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल आगे कर देना है यह अपन को शिवाजी महाराज ने नहीं सिखाया” और यह किसने सिखाया था यह बताने की जरूरत नहीं है।

हम जानतें हैं कि जयंतियों के नाम पर कितना पैसा फूँका जाता है उनके आदर्शों को यदि स्थापित करना है तो स्कूल बनाओं लेकिन यहाँ तो स्कूलों के बदले मॉल बनाए जा रहें हैं। मास्टरजी के अनुसार “स्मारक उनके बनाने चाहिए जिन्हें लोग भूल सकते हैं ये तो वे हैं जिनके बगैर यह दुनिया चलेगी नहीं। लेकिन नेताओं को ये विचार अच्छे तो लगतें पर इनसे वोट नहीं मिलते। इसलिए “बाबा साहब को भी इलेक्शन में दो बार हराया गया।” हम देखतें हैं कि बाबा सब बोले ‘शिक्षित बनो’, लेकिन माली साहब का नाईट स्कूल कभी खुलने ही नहीं दिया, ‘संघर्ष करो’, पर  नेता इन संघर्षों को खरीद लेते हैं गुलाम बनाते हैं और संघर्ष शुरू होने से पहले ही खत्म कर देते हैं; संगठित हो, लेकिन नेताओं की वजह से हर गली में बाबा साहब की जयंती अलग-अलग जातिसमुदाय द्वारा बनाई जाती है ताकि कभी ये कभी संगठित ना हो पाए।

फिल्म के अंत में पल्लवी बाप से लड़ककर संत्या के पास आती है। संत्या सफल बिजनेसमैन हो गया है सिर्फ इसलिए नहीं बल्कि वह वंचितों को सहारा भी दे रहा है इसलिए पल्लवी उससे विवाह के लिए स्वयं प्रस्ताव रखती है मास्टर जी के घर पल्लवी बैठी है और संत्या रो रहा है उस पल आपकी आंखें भी नम हो जाएंगी प्यार के इजहार का यह अदभुत दृश्य आपको कहीं नहीं मिलेगा। समाज सेवक के रूप में युवा सम्मान मिलने पर संत्या सन्देश देता है “अगर हमें उन्हें नमन करने की इतनी ही इच्छा है ना,तो हम सब हमारी जिंदगी को फूल जैसी खूबसूरत बनाकर उनको अर्पित करें, अपने काम को इतना बड़ा बनाए कि पूरी दुनिया में हमारे महामानव पहचान सबसे पढ़े-लिखे प्रगतिशील रूप में हो हम जिम्मेदार समाज का हिस्सा बने’।

सभी कलाकारों की मेहनत दिखाई पड़ती है निर्देशक शैलेश बलिराम नरवाडे अपने लक्ष्य में सफ़ल हुआ है लॉकडाउन के बाद यह थिएटर में प्रदर्शित पहली फिल्म थी और लोकप्रिय सिनेमा को पीछे छोड़कर आगे निकल गई यही इसकी सफलता का परिचायक है, IMDb पर इसे 9.8 की रेटिंग मिली। फ़िल्म के महेश धाकड़े और रूही का गीत संगीत चाहे रोमांटिक हो या आह्वान करने वाले कर्णप्रिय हैं। फ़िल्म देखने और समझने लायक है जिस उद्देश्य से प्रेमचंद सिनेमा से जुड़े थे इस तरह की फिल्में उस उद्देश्य को पूरा करतीं है  

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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