सिनेमा

जमीर, जिन्दगी और कुदरत की कहानी ‘करीम मोहम्मद’

 

{Featured In IMDb Critics Reviews}

 

‘करीम मोहम्मद’ यह एक ऐसे समुदाय की कहानी कहती है जो भेड़, बकरी व अन्य पालतू जानवर पालते हैं। इन जानवरों के साथ-साथ कुदरत पर इनका अटूट विश्वास है। जाड़ों के मौसम में जब ऊपरी इलाके बर्फ़ से ढक जाते हैं तो ये लोग नीचे उतर आते हैं। इस समुदाय के एक परिवार का बच्चा करीम दरिया के उस पार जाना चाहता है। जहां पड़ोसी मुल्क है। जम्मू-कश्मीर की यह कहानी जितना जमीर और जिंदगी को पर्दे पर दिखाती है उतना ही कुदरत को भी और दहशतगर्दों को भी। लेकिन बिना खून-खराबे के आतंकवाद पर्दे पर सम्भवतः पहली बार दिखाई दिया है।

भेड़-बकरी पालने वाले बकरवाल पहाड़ी चरवाहे कहलाते हैं। इस लिहाज से यह फ़िल्म बकरवाल समुदाय को केंद्र में रखती है। जब करीम कहता है कि पड़ोसी तो हमारे दोस्त होते हैं। अगर हमारे घर कोई पड़ोसी आएगा तो हम उसे मेहमान की तरह रखेंगे, मारेंगे थोड़ी। लेकिन वो नहीं जानता कि इन्हीं सरहदों की लकीरों की वजह से लाखों लोगों की जान गईं हैं। गुर्जर बाबा की काल्पनिक कहानी भी फ़िल्म में है। जिसे सुनाते हुए करीम के अब्बू बने यानी यशपाल शर्मा फ़िल्म में कहते हैं – “गुर्जर बाबा की बहादुरी के किस्से मशहूर थे, उनका सीना चौड़ा था, शेर जैसे उनके पंजे थे यानी हथेलियां, साढ़े छह फीट का शरीर, जिन रास्तों पर कोई भी गुजरने से डरता हो उन रास्तों से बेख़ौफ़ गुजर जाते थे वो। उन्होंने दहशतगर्दों को मारा और मरने के बाद उन्हें वीर चक्र दिया गया।”

नन्हे करीम की दुनिया उसके जानवरों का झुंड और उसके अम्मी-अब्बू है। अब्बू ही उसके मदरसा और मौलवी साहब हैं। उसके अब्बू इंसानियत व देशभक्ति की मिसाल हैं। जिसे करीम ने भी आत्मसात कर लिया है। उसके अम्मी-अब्बू आतंकवादी मुठभेड़ में मारे जाते हैं। और यहीं से कहानी पलटी खाती है। अनाथ हुए करीम के सिर नवजात बहन जूही की जिम्मेदारी आ पड़ती है। अपने अब्बू के दर्शन और शिक्षा से प्रेरित होकर करीम की आगे की यात्रा कैसी होगी जानने के लिए यह फ़िल्म आपको देखनी होगी।

करीम मोहम्मद ने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल्स में पुरूस्कार भी हासिल किए। जल्द ही यह किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पुनः आये तो जरूर देखिएगा। वैसे यह एक साल के लिए अमेजन प्राइम पर दिखाई गई थी। इस फ़िल्म के बनने के बाद खबरें आई थी कि फ़िल्म के लीड रोल में यशपाल शर्मा ने 20 दिनों तक कॉस्ट्यूम को पहने रखा था। उन्होंने 20 दिन तक उस कॉस्ट्यूम को बदला ही नहीं। इसके अलावा बकरियां चराते हुए भी वे पहली बार पर्दे पर नजर आए थे।

फ़िल्म एक सच को भी बताती है कि इंसानों के आने-जाने यानी जन्म लेने और यहां से रुखसत कर जाने का वक्फा तय है पहले से। इंसान का घर इस दुनिया में है ही नहीं जिसे वह तलाशता फिर रहा है। हम जीवन में भौतिक घरों की तलाश में कुदरत के सवालों को भी नजरअंदाज करते आ रहे हैं। फ़िल्म में सभी किरदार अपना अभिनय बेहतर करते नजर आते हैं लेकिन छोटा बच्चा करीम उसके अब्बू और अम्मी ज्यादा बेहतर लगे। फ़िल्म का गीत-संगीत लुभावना है। बैकग्राउंड स्कोर और प्रकाश झा की एडिटिंग, बालकृष्ण शर्मा का म्यूजिक मिलकर यह फ़िल्म देखने योग्य बनाते हैं।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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