राजनीति

 भारत की राजनीति में उभरता तथा मजबूत होता परिवारवाद अथवा वंशवाद

  • दीपक भास्कर 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ, भारत, अब लगभग एक शतक पुराना लोकतंत्र भी बनने के करीब है. इन तमाम सालों में, जहाँ एक तरफ भारतीय लोकतंत्र ने लगातार सफलतापूर्वक चुनाव की प्रक्रिया के तहत “सरकार-गठन” करने का मुकाम हासिल किया है. वहीं दूसरी तरफ, भारतीय लोकतंत्र उन तमाम तरह की परेशानी के साथ आगे बढ़ रहा है जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है और लोकतंत्र को लगातार कमजोर करता है. भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान बने “संविधान” ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को पर विशेष बल दिया और किसी भी समाज, वर्ग, क्षेत्र, परिवार एवं व्यक्ति के “एकाधिकार” को नकारते हुए, ‘लोकतान्त्रिक संस्थानों’ के निर्माण की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दिया। लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती उसके अंदर विस्तारित लोकतान्त्रिक संस्थानों की मजबूती पर निर्भर करता है. लोकतंत्र में संस्थानों का कमजोर होने का मतलब,  व्यक्ति, परिवार, धर्म, क्षेत्र, विशेष समाज का “एकाधिकार ” स्थापित होना है.  संवैधानिक संस्थानों की गरिमा कम होने का साफ़ मतलब है कि देश के अन्य संस्थान जैसे (व्यक्ति, परिवार, धर्म, क्षेत्र, विशेष समाज) मजबूत हो रहे हैं.
बहरहाल, भारत के लोकतंत्र की यात्रा को समझना बहुत आवश्यक है, यह शुरू हुआ “लोकतान्त्रिक संस्थानों” के निर्माण से और फिर यह “परिवार” जैसे ‘अलोकतांत्रिक संस्थानों’ से होते हुए, वर्तमान में ‘व्यक्ति” पर केंद्रित होता जा रहा है. बहरहाल, इस लेख का विषयवस्तु, वंशवाद अथवा परिवारवाद है इसलिए इस समस्या को समझना ज्यादा जरुरी है.  भारत की राजनीति में वंशवाद अथवा परिवारवाद, एक उभरती, बढ़ती, और सहज होती राष्ट्रीय समस्या बन गयी है.  भारत की राजनीति के इतिहास में, दूसरी राजनीति का प्रादुर्भाव परिवारवाद के खिलाफ से ही हुआ है. लेकिन परिवारवाद की समस्या के खिलाफ राजनैतिक हस्तक्षेप करने वाले लोग अब खुद ही इस समस्या के पोषक बन गए हैं. परिवारवाद, वंशवाद की समझ, असल में सारी राजनितिक सत्ता का “कुछ परिवार” में सीमित हो जाने से है. लेकिन सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी वजह से क्या समस्या खड़ी हो रही है, लोकतंत्र में अगर सबको अपने हिसाब से अवसर चुनने का हक़ है तो फिर ये सवाल ही क्यों किया जा रहा है. ऐसे ढेरों सवाल हैं जिन्हें राजनीति में परिवारवाद की समस्या के परिपेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है और इन पहलुओं को समझने की आवश्यकता है. इस कड़ी में सबसे पहले, हमें परिवार को समझना चाहिए.
भारत में परिवार का सिद्धांत: परिवार सबसे पहले भारत परिवारों का देश है. ऐतिहासिक काल से, भारत में व्यक्ति की व्यक्तिकता के ऊपर परिवार को रखा गया. आम चलन में भी अक्सर ये माना जाता है कि परिवार सर्वश्रेष्ठ है और परिवार से पहले कुछ भी नहीं है इसलिए भारत में ‘फॅमिली फर्स्ट’ आम जनमानस के जुबान पर होता है. बहरहाल, परिवार की समझ राजनैतिक संस्थानों से अलग है. जहाँ एक तरफ राजनैतिक संस्थान प्रत्येक व्यक्ति को बराबर मानकर, उसे राजनैतिक अधिकार मुहैया कराता है वहीं दूसरी तरफ भारतीय परिवार की समझ में लोकतंत्र कहीं भी नहीं है. यहाँ औरतें, बच्चे, दुसरे दर्जे की नागरिक माने जाते हैं और परिवार का मुखिया मूलतः पुरुष ही होते हैं जो पितृसत्तात्मक सामाजिक सरंचना के पोषक और लीडर भी है. परिवार के अंदर उठने वाले तमाम तरह के विरोध को भी नैतिकता के नाम पर दबा देना तो आम बात है. तो यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि परिवार में “समानता एवं स्वतंत्रता” जैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों की कोई ख़ास जगह नहीं है. भारतीय परिवारों में, समाज की एक महत्वपूर्ण इकाई होने के बावजूद , सामजिकता का अभाव साफगोई से दीखता है वो इसलिए भी क्यूंकि यहाँ “परिवार सबसे पहले” का सिद्धांत का दबदबा रहता है. इसके उलट, भारतीय संविधान की प्रस्तावना ही व्यक्ति की समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे एवं न्याय के सिद्धांतों पर टिका हुआ है. भारतीय संविधान “परिवार” के ऊपर “भाईचारे” को विशेष महत्व देता है. ऐसे में जहाँ परिवार की अवधारणा समाज के मूल सरंचना का हिस्सा हो वहां राजनीति में “परिवारवाद” का होना कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है. इसी कारणवश,भारत की राजनीति में परिवारवाद की सहज स्वीकृति लाजिमी है.
भारतीय राजनीति एवं परिवारवाद: एक ऐतिहासिक विश्लेषण परिवारवाद एवं वंशवाद की आधारभूत सरंचना पर ही राजतन्त्र खड़ा होता है. भारत के इतिहास के पन्ने, राजतन्त्र में वंशवाद के उदाहरण नहीं बल्कि सामान्यता से भरे पड़े हैं.खैर, राजतन्त्र में वंशवाद का होना सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का इतिहास है. वंशवाद तथा परिवारवाद के खिलाफ संघर्ष का उदहारण प्राचीन समय में तो नहीं मिलता लेकिन आधुनिक भारत में इसकी खिलाफत जोर-शोर से की गयी है. शायद इसलिए भी यह माना जाता है कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष भी दो तरफ़ा था. जहाँ एक तरफ अंग्रेजों के बर्बर शासन से आजादी के लिए संघर्ष हो रहा था वहीं दूसरी तरफ अंदर के अनगिनत राजाओं से भी आजादी का संघर्ष चल रहा था. १५ अगस्त १९४७ को भारत अंग्रेजों से मुक्त हो गया और संविधान की स्थापना के साथ राजतन्त्र का भी खात्मा हो गया और इसी के साथ लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था की स्थापना हुई. अब भारत में, भारत को, भारत का कोई भी व्यक्ति नेतृत्व प्रदान कर सकता था. यह अब किसी “राज-परिवार” तक सीमित नहीं रह गया था. किसी राज-परिवार के भी सदस्यों को नेतृत्व के लिए लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा ही बनना पड़ रहा था. हालाँकि भारत की संसद ने, राज-परिवारों के सदस्यों की बहुत बड़ी संख्या कभी नहीं देखी। इसे भी लोकतंत्र की जीत के तौर ही देखा जाना चाहिए. भारत के लोकतंत्र ने परिवारवाद अथवा वंशवाद के खिलाफ मुहीम तो छेड़कर इसे खत्म तो किया लेकिन समय के साथ वंशवाद अथवा परिवारवाद ने भारत के लोकतंत्र को फिर से अपने गिरफ्त में ले लिया. परिवारवाद का के नए रूप में राजतन्त्र ने खुद को पुनर्स्थापित किया.
परिवारवाद अथवा वंशवाद एवं भारतीय राजनीति: परिवारवाद की पुनर्स्थापना भारत में वंशवाद की पुनर्स्थापना का समय १९८० के दशक के साथ शुरू होता है. हालाँकि बहुत से विद्वानों का मानना है कि परिवारवाद का दौर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री चुनने के साथ शुरू होता है लेकिन चूँकि इंदिरा गाँधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संघर्षशील रही हैं इसलिए उनका इस देश का प्रधानमंत्री के पद काबिज होना वंशवाद की शुरुआत कहना उनके द्वारा किये गए राजनैतिक संघर्ष की बेमानी होगी. हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्हें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री होने का फायदा अवश्य मिला. मसलन, १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद, कांग्रेस पार्टी द्वारा श्री राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित करने को परिवारवाद अथवा वंशवाद की पुनर्स्थापना के तौर पर देखा जा सकता है. वो इसलिए कि क्यूंकि श्री राजीव गाँधी के जीवन में किसी भी तरह का कोई राजनैतिक संघर्ष उनके नाम नहीं है, उनकी राजनीति में कोई विशेष दिलचस्पी भी नहीं थी, वो पेशे से पायलट थे लेकिन श्रीमती इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद, श्री राजीव गाँधी को सिर्फ इसलिए प्रधानमंत्री बना दिया गया क्यूंकि वो इंदिरा गाँधी के बेटे थे. श्री राजीव गाँधी सफल या असफल प्रधानमंत्री साबित हुए, वो एक अलग विश्लेषण का विषय है.  लेकिन भारत के जनमानस अब यह बात साफ़ हो गयी थी कि भारत का नेतृत्व करने के लिए अब एक विशेष परिवार में पैदा होना जरुरी हो गया था. कांग्रेस पार्टी पर पारिवारिक पार्टी होने के आरोप लगने शुरू हो गए थे और इसका नतृत्व करने वाले परिवार का नाम था “नेहरू-गाँधी परिवार”. यह उस स्वतंत्रता संग्राम की मूल-संघर्ष की अनदेखी थी जिसमें यह सुनिश्चित किया गया था कि भारत में सत्ता किसी एक जाति, धर्म, परिवार एवं व्यक्ति के हाथ में नहीं होगी. भारत की राजनीति अब, देश में व्यापत तमाम समस्याओं के परे, लोकतंत्र में हुए पुनर्स्थापित “वंशवाद-परिवारवाद” की समस्या पर केंद्रित होने लगा था. परिवारवाद की जड़ें अब सिर्फ गहरी ही नहीं बल्कि फैलती भी जा रही थी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामान्य नेता के पुत्र-पुत्री भी अब इस पौधे को खाद बीज दे रहे थे. हालाँकि विभिन्न राजनैतिक पार्टियों ने परिवारवाद को राजनैतिक हथियार के तौर पर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ उपयोग किया. क्षेत्रीय दलों का जन्म ही परिवारवाद-वंशवाद की खिलाफत के साथ हुआ. भारत के तमाम राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस पार्टी को वंशवादी-परिवारवादी पार्टी कहकर, जनमानस के लोकतंत्र को राजतन्त्र अथवा कुलीनतंत्र में तब्दील होने से बचाने की गुहार लगाई.
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की राजनीति में लोकतंत्र को परिवारवाद-वंशवाद के दंश से बचाने की मुहीम में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सर्वोपरि है. जनमानस ने क्षेत्रीय दलों की इस मुहीम को समर्थन दिया, फलस्वरूप क्षेत्रीय दल विभिन्न राज्यों में सत्ता पर काबिज हुए. लेकिन क्या परिवारवाद की जड़ें अब बस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तक ही सीमित रह गई?
भारतीय राजनीति में परिवारवाद एवं क्षेत्रीय दल: खिलाफत से स्वीकृति तक परिवारवाद की खिलाफत से उभरने वाले क्षेत्रीय दल अब लोकतंत्र की आवाज बन गए थे. एक समय में ऐसा लगा मानों लोकतंत्र के बीमार होने से बच गया. साल दर साल, सत्ता पर काबिज हो रहे थे. प्रोफेसर अतुल कोहली के अनुसार, यह भारत के लोकतंत्र की सफलता थी क्यूंकि भारत में सत्ता का विकेन्द्रीकरण शुरू हो चुका था. इस मुहीम में भारत को नया नेतृत्व मिला, नए दल मिले लेकिन तब शायद  ही किसी ने यह सोचा होगा की भारत को अब कई नए राजनेता ही नहीं बल्कि नए राजनीतिक परिवार भी मिल चुके थे. समय आगे बढ़ा लेकिन नए राजनैतिक परिवारों के जन्म के बदले अब उन्हीं राजनीतिक परिवारों में नए राजनेता पैदा होने शुरू हो गए. अब सिर्फ भारत में ‘गाँधी-नेहरू परिवार’ नहीं बल्कि बिहार और उत्तरप्रदेश में ‘यादव परिवार’, हरयाणा में ‘चौटाला परिवार’, पंजाब में ‘बादल परिवार’, मध्यप्रदेश में ‘सिंधिया परिवार’, आँध्रप्रदेश में ‘नायडू परिवार’, तमिलनाडु में ‘करूणानिधि परिवार’, कश्मीर में ‘अब्दुल्ला परिवार’ जैसे कई नए राजनैतिक परिवार अब भारत की राजनीति में सक्रिय थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों भारत में परिवार की सत्ता का विकेन्द्रीकरण हुआ था, सत्ता अब विभीन परिवारों में बंट चुकी थी.  लगभग एक दशक में ही, परिवारवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले  क्षेत्रीय दल अब धीरे-धीरे परिवारवाद के “पोषक” बन चुके थे. प्रख्यात विद्वान रोबर्ट मिशेल ने अपने सिद्धांत “आयरन लॉ ऑफ़ ओलिगारकी” में कहा कि कोई भी शासन-व्यवस्था शुरू चाहे किसी भी चीज से हो लेकिन अंत में वह कुलीन-तंत्र (वह शासन-व्यवस्था जिसमें सत्ता कुछ ही लोगों के हाथ में होती है) में तब्दील हो जाती है. यह सिद्धांत भारत के परिदृश्य में फलीभूत हो रहा था. क्षेत्रीय दल अब परिवारवाद के खिलाफ संघर्ष में नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा में थे. अब इनकी परिवारवाद की खिलाफत नहीं बल्कि स्वीकृति थी.
बिहार में “यादव परिवार” के शिरोमणि बने परिवारवाद एवं सामंतवाद के मुखर विरोधी श्री लालू प्रसाद यादव, इनके बारे में यह कहा जाता है कि यह एक ऐसी मुखर आवाज थी जिसने बिहार में सामंतवाद एवं परिवारवाद की जड़ें हिला दी. जनता ने इस आवाज को ही अपनी आवाज बनाया और लालू जी बिहार की सत्ता पर काबिज हुए. १९९७ में लालू यादव जी को चारा घोटाले में आरोपित होने की वजह से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। यह कदम बिलकुल अप्रत्याशित था क्यूंकि राबड़ी देवी जी का न तो कोई राजनैतिक संघर्ष था न ही राजनीति में दिलचस्पी, शायद लालू जी किसी भी कीमत पर सत्ता अपने परिवार से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे. अब परिवारवाद पर उनकी खिलाफत करने वालों ने ‘ओके, टेस्टेड’ का मुहर लगा दिया था. लालू जी की बड़ी बेटी पेशे से डॉक्टर थी लेकिन वो भी राज्य सभा सांसद बनीं. लालू जी के साले साधू और सुभाष यादव बिहार की राजनीति के पुरोधा बनें। लालू जी अब पार्टी एवं राजनीति की बागडोर अपने दोनों बेटों को सौंपी। दोनों बेटों में से किसी का कोई भी राजनैतिक संघर्ष न होने के बावजूद दोनों ही विधान सभा के सदस्य चुने गए और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री और तेजप्रताप यादव स्वास्थ्य मंत्री बनें. लालू जी ने अपने बेटों के समर्थन में जबाब दिया कि डॉक्टर, इंजीनयर, अधिकारी का बेटा-बेटी जब वही बनता है तो राजनीति करने वालों के पुत्र-पुत्री राजनीति करें तो क्या दिक्कत है. लालू जी का जबाब सामान्य रूप से सही लगता है लेकिन क्या राजनीति भी अब डॉक्टरी की तरह व्यवसाय बन गयी है. अगर ऐसा है तो फिर परिवारवाद से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. लेकिन राजनीति व्यवसाय नहीं जहाँ सब कुछ लाभ अथवा हानि के हिसाब से देखा जाए बल्कि    राजनीति तो समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे तथा न्याय की समझ है जहाँ सब कुछ न्याय के सन्दर्भ में देखा जाता है. अब किसी भी नेता को परिवार से अब कोई दिक्कत नहीं रह गई थी. परिवारवाद को इतनी सहज स्वीकृति मिल चुकी थी कि अब यह भारत की ‘राजनीतिक सरंचना’ का प्रमुख हिस्सा बन चुका था या फिर यूँ कहें की “परिवारवाद ही भारत की राजनीतिक सरंचना बन गई है”.
इसी तरह उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव परिवार उभरा और २० से ज्यादा परिवार के सदस्य सक्रिय राजनीती में हैं. पिता ने पुत्र के लिए सिंहासन खाली किया और अखिलेश यादव चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव सांसद बनीं. अब परिवारवाद एक “न्यू नार्मल” (नयी तरह की सामान्यता थी. इसी तरह लगभग सभी राज्यों में परिवारवाद एक नयी सामान्य स्थिति हो गई क्यूंकि इसके खिलाफ राजनीती करने वाले ही अब इसको स्वीकार कर चुके थे.
भारत की राजनीति में एक बार फिर परिवारवाद का मुद्दा सामने आया जब भारतीय जनता पार्टी ने इसको चुनावी मुद्दा बनाया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रीय दलों पर बीजेपी ने परिवारवाद के पोषक होने का आरोप लगाया। लेकिन यह सब कुछ उसी तरह का था जब शुरुआत में बाकी क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस पर आरोप तो लगाया लेकिन बाद में उसी के पुरोधा बन गए. बीजेपी ने पंजाब में “बादल परिवार” को साथ लिया, जम्मू और कश्मीर में “मुफ़्ती परिवार” को साथ लिया। बीजेपी राजनीतिक तौर पर नई पार्टी थी, १९८२ में अस्तित्व में आयी और सत्ता में आने का मौक़ा भी काफी बाद में मिला सो दूसरी पीढ़ी के नेता अभी बन ही रहे थे. अब  वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी के पहले क्रम के नेता के साथ-साथ दुसरे क्रम के नेता भी आने लगे हैं. मसलन परिवारवाद की झलक भारतीय जनता पार्टी में साफ़ दिखाई देने लगी है. एक लम्बी फेहरिस्त यहाँ भी बनती जा रही है, राजनाथ सिंह, वसुन्धरा राजे, कैलाश विजयवर्गीय, यशवंत सिन्हा, प्रेम कुमार धूमल, प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे जैसों सैकड़ों नाम हैं जिनके बेटे-बेटियां सक्रिय राजनीती में हैं, विधान और लोकसभा सदस्य हैं. मतलब साफ है कि परिवारवाद भारत की राजनीती में सैद्धांतिक मुद्दा नहीं बल्कि चुनावी मुद्दा है. यह भी आश्चर्यजनक है कि भारत में अब चुनावी मुद्दे वही बनते हैं जिसमें किसी  सैद्धांतिक तौर पर कोई विशवास साफ़ तौर नहीं दीखता है.  भारतीय जनता पार्टी भी अब बाकि दलों की तरह परिवारवाद जैसे “न्यू नार्मल”  को स्वीकृत कर चुकी है. अब सवाल उठता है परिवारवाद के इस न्यू-नार्मल की कठिनाई एवं परेशानी क्या है.
भारतीय राजनीति एवं परिवारवाद: समस्याएं एवं फायदे परिवारवाद की समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं बल्कि अब यह समस्या बनता जा रहा है. नार्थ कोरिया, फिलीपींस जैसे देशों में भी इस तरह की समस्या दीख रही है. इस बाबत दुनिया भर में इस समस्या पर शोध कार्य हो रहे हैं. इसी कड़ी में, एशियाई मैनेजमेंट संसथान के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रोनाल्ड मेंडोजा का अध्ययन बताता है कि वंशवाद अथवा परिवारवाद की वजह से आये नेता “अंडर परफॉर्मर” होते हैं. वो बहुत कुछ  अच्छा नहीं कर पाते क्यूंकि उन्हें दुबारा न चुने जाने का डर बिलकुल भी नहीं होता. लगातार सत्ता में रहने की वजह से परिवार एक अपनी वोटर की कोंस्टीटूएंसी का निर्माण कर लेता है जो बहुत लाजिमी है क्यूंकि जो भी सत्ता में होता है लोग उसके साथ जुड़ना पसंद करते हैं. भारत में यही हुआ है, भारत में जाति-व्यवस्था के कारण, सामान्यतः कोंस्टीटूएंसी बनाने की दिक्कत नहीं होती है बल्कि वो खुद बना ही हुआ होता है. चूँकि अब सभी पार्टियां परिवारवाद की पोषक हैं इसलिए कोई ख़ास दिक्कत भी नहीं होती है. लेकिन इसकी वजह से मतदाता के पास चॉइस की कमी हो जाती है. मतदाता का चॉइस लिमिटेड रहता है.  न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर कंचन चंद्र कहती हैं कि लोकतान्त्रिक संस्थानों के कमजोर होने की वजह से परिवारवाद का जन्म होता है और सत्ता स्टैगनैंट मतलब स्थिर हो जाती है. यह सही है कि सत्ता की स्थिरता, राजनीति की गतिशीलता को खत्म कर देता है. जैसे ही राजनीति में गतिशीलता खत्म होती है वह राजतन्त्र की तरफ रूख कर लेता है.  भारत की राजनीति में अब कोई अनिश्चितता नहीं बच गयी है, जबकि अनिश्चितता राजनीति की खूबसूरती होती है. छात्र राजनीति का दौर भारत से खत्म हो चूका है क्यूंकि नेता अब विश्विद्यालयों में नहीं बल्कि स्थायित्व पाए हुए राजनितिक परिवारों में पैदा हो रहे हैं. एक दो उदहारण बस अपवाद हो सकते हैं वर्तमान राजनीति का चरित्र नहीं। बहरहाल, भारत की राजनीति में परिवारवाद ने भारत के राजनैतिक चरित्र के साथ आर्थिक चरित्र को भी बदल दिया है. भारत जो कभी कल्याणकारी राज्य इसलिए बना था ताकि लोककल्याण का काम किया जा सके अब वह लोककल्याण की अवधारणा परिवारकल्याण की वास्तविकता में परिणित हो चूका है. भारत को परिवारवाद की राजनीति ने फिर से सामंतवादी/जमींदारी प्रथा में धकेल दिया है.
कई विद्वान कहते हैं कि परिवारवाद की वजह से वंचित तबके जैसे महिलाओं, दलितों, पिछड़ों को भारतीय राजनीती में जगह मिली है. उनका मानना है कि वंचित एवं शोषित भारत की राजनीति में खुद के बल पर राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते। ऐसे में परिवारवाद से उनको मदद मिलती है और वह राजनीतिक संस्थानों में अपनी जगह बना पाते हैं. यह शायद इस हिसाब से सही भी हो लेकिन राजनीति का काम ऐसे तबकों इतना मजबूत बनाना भी है जिससे राजनीति के दरवाजे सभी के लिए खुल सकें. और फिर जो शोषित किसी राजनीतिक परिवार लिए हों तो उनके लिए राजनीति के दरवाजे सदा के लिए बंद ही रहेंगे. असल में राजनीति का मुख्य उद्देश्य “न्याय” की स्थापना है और परिवारवाद न्याय की संकल्पना के बिलकुल विरुद्ध है इसलिए भारत की राजनीति अब न्यायोन्मुखी नहीं रह गई है. संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र की स्थापना “एक व्यक्ति-एक मत” के सिद्धांत पर किया था वो इसलिए ताकि हर व्यक्ति को बराबर अवसर और अधिकार मिले। लेकिन परिवारवाद ने इस सिद्धांत को ही खत्म कर दिया है. अंततः इसमें कोई विरोधाभास नहीं हो सकता कि भारतीय राजनीति लोकतंत्र का चरित्र खो चुकी है.
निष्कर्ष भारत की राजनीति में परिवारवाद अब एक सहज प्रक्रिया बन गया है. परिवारवाद के पक्ष में तमाम तर्क गढ़े जा चुके हैं, कई बातें सही भी है जैसे कि उम्मीदवार के जीतने की सम्भावना। यह देखा गया है कि राजनीतिक  परिवार से सम्बन्ध रखने वाले उम्मीदवार के जीतने की सम्भावना ज्यादा होती है लेकिन क्या लोकतंत्र बस चुनाव में जीतने अथवा हारने तक सीमित रह गया है. परिवारवाद तो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, भारत की राजनीति में कैंसर की तरह बढ़ते परिवारवाद लोकतंत्र को ही लीलने के कगार पर है. राजनीतिक सत्ता अब संसद ऐसे संस्थानों से निकलकर कुछ परिवारों में केंद्रित होती जा रही है जो बहुत खतरनाक स्थिति पैदा करा रहा है. परिवावरवाद की वजह से भारत आर्थिक प्रगति को भी नुकसान पहुँच रहा है. बढ़ता भ्रष्टाचार भी इसी कड़ी का अगला बिंदु है. असल में, लोकतंत्र से न्याय की समझ गायब हो रही है. जब न्याय ही नहीं तो लोकतंत्र किस बात का रह जायेगा. असल में परिवारवाद, लोकतंत्र से निकलकर सामंतवाद, जमींदारी प्रथा एवं राजतन्त्र के तरफ जाने की सीढ़ी है जो भारत में लगातार मजबूत होती जा रही है.


डॉ दीपक भास्कर, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति पढ़ाते हैं।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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