आवरण कथा

लोकवृत्त और आधुनिक संस्थाएं

 

व्यक्ति का उभार इधर की परिघटना है। तक़रीबन बारह हज़ार साल पहले मनुष्य कृषि युग में आया। कृषि ने सामूहिकता और सहयोग की ऐतिहासिक परिघटना की नई इबारत विकसित की। हालाँकि परिवार संस्था का उदय कृषि के पूर्व हो चला था, लेकिन कृषि की सामूहिकता ने आधुनिक परिवार को जन्म दिया। हम कह सकते हैं कि परिवार समाज की प्राथमिक संस्था है। परिवार संस्था और कृषि ने मनुष्य को घुमन्तू जीव से स्थायी निवासी में बदल दिया। एक घर का होना मूलभूत आवश्यकताओं में शुमार हो गया। ग्राम समाज और स्थायी बाज़ार का उद्भव हुआ। शासन और नियंत्रण की नई जरूरतें इस संरचना के अंतर्गत विकसित हुयी।

आधुनिकता के उभार तक कमोबेश यह संरचना अपने अन्तर्विरोधों के बावजूद स्थायी तौर पर बनी रही। यातायात के साधन भी इतने तीव्र गति के नहीं थे कि मनुष्य का स्थायी और स्थानीय हो चला चरित्र परिवर्तित हो जाए। परन्तु 16 वीं शताब्दी के इर्द गिर्द यूरोप का सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश बदलने लगा। लोग धर्म और संस्कृति को अलग-अलग कर देखने लगे। कला, संस्कृति, साहित्य आदि की एक अधिक खुली और विस्तृत दुनिया विकसित होने लगी। हालाँकि इटली में इसकी शुरुआत 14 वीं शताब्दी के इर्द गिर्द होने लगी थी। 16 वीं सदी आते-आते समाज पर इसका यथेष्ठ प्रभाव भी दिखाई देने लगा। सबका परिणाम यह हुआ कि समाज की संरचना में भी बुनियादी परिवर्तन के लक्षण विकसित होने लगे। लोग स्थायित्व और स्थिरता के ही पक्षधर नहीं रह गये, बल्कि वे अपने प्रदेश से बाहर के संसार से भी जुड़ने लगे। साहसिक यात्रियों के नये दल विकसित हुए। जहाजी बेड़े नये देशों की खोज में लग गये।

1789 में फ्रांस में क्रान्ति हुयी। फ़्रांसीसी क्रान्ति के परिणामस्वरुप दुनिया वही नहीं रह गयी, जो वह तीन सौ वर्ष पूर्व थी। पुनर्जागरण से होते हुए प्रबोधन तक की तीन सौ वर्षों की यात्रा ने दुनिया को न सिर्फ बदल दिया, बल्कि भविष्य के संसार की सम्भावनाएं भी प्रस्तुत कर दी।

इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि फ़्रांसीसी क्रान्ति के मूल्यों का जो विश्व-व्यापी प्रभाव समूचे संसार पर पडा- उसके प्रमुख कारण क्या थे?

अगर हम सूक्ष्मता से देखें, मनुष्य की स्वतन्त्रता की अवधारणा का आधुनिक सन्दर्भ इस क्रान्ति में विन्यस्त था। पहली बार स्वतन्त्रता की मानवीय परिकल्पना को उसने अपना लक्ष्य बनाया।

फ़्रांसीसी क्रान्ति ने व्यक्ति को केन्द्र में ला दिया। व्यक्ति और समाज के नये सम्बन्ध विकसित हुए। व्यक्ति और सत्ता के नये अन्तर-सम्बन्धों के विकसित होने की दृष्टि का विकास हुआ। अब शासक वर्ग या सत्ता के लिए व्यक्ति के हितों को नकारना सम्भव नहीं रह गया था। व्यक्ति के अधिकारों की नई व्याख्याएं सामने आने लगी। उन्हें फ़्रांसीसी क्रान्ति की रौशनी में देखा जाने लगा। व्यक्ति, समाज और सत्ता का नया त्रिकोण विकसित हुआ। यह स्वीकार किया जाने लगा कि बहुत से लोग सत्ता से एक सामान अपेक्षाएं रखते हैं। ऐसे में परिवार संस्था के बाहर व्यक्तियों के नये समूह विकसित हुए जो सत्ता की स्वतन्त्र आलोचना कर सकते थे। समाज का अर्थ व्यक्ति की परस्परता और भलाई के सामूहिक लक्ष्य विकसित करना भी हो गया। यही वह बिन्दु है जहाँ आधुनिक संस्थाओं का उद्भव हुआ। व्यक्ति की स्वतन्त्र चेतना ने न सिर्फ समाज का पुनर्गठन किया, अपितु सत्ता और व्यक्ति के सम्बन्ध भी बदल गये। अब राजसत्ता की व्यक्ति और समाज के प्रति जवाबदेही पर बात होने लगी।

स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व के आधारभूत मूल्यों को मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकताओं में शुमार किया जाने लगा। व्यक्ति और समाज के प्रति स्वतन्त्रता, समानता और न्याय के मूल्यों को सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक संस्थाओं का उदय हुआ। ये संस्थाएं जहाँ एक ओर व्यक्ति की मूलभूत अधिकारों को सुनिश्चित करती थीं, वहीँ उन अधिकारों के प्रति आम जन को जागरूक करने की जिम्मेदारी भी विकसित करती थीं। न्यायालय, शिक्षण संस्थान, सुरक्षा संस्थान, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय आदि संस्थाओं का नया चरित्र और नई भूमिकाएं विकसित हुयी। इन भूमिकाओं के मूल में लोकवृत्त की अवधारणा विद्यमान थी।

इसने मध्यवर्ग की विशिष्ट परिकल्पना को रचने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। मध्यवर्ग ने अपने अधिकारों की अभिव्यक्ति के लिए नये स्थलों की तलाश की, मसलन कॉफ़ी-हाउस, सैलून, साहित्यिक पत्रिकाएं, पुस्तकालय आदि। ये इलाके दो अर्थों में स्वतन्त्र थे। प्रथम यह कि उनमे सहभागिता का प्रश्न व्यक्ति का अपना निर्णय था, दूसरे यह कि वे आर्थिक और राजनीतिक बन्धनों से एक हद तक मुक्त थे। यह स्पष्ट है कि वे बुर्जुआ चेतना के वर्गीय दायरे में ही महदूद थे, लेकिन हेबरमास का मानना है कि वे वर्गीय दायरे के भीतर मौजूद अन्तर-विरोधों को गहरा कर सकने में सक्षम थे और यही उनकी सार्थकता थी।

कहना न होगा कि अठारहवीं सदी की यह परम्परा आज भी मौजूद है। ऐसा भी नहीं है कि यहाँ पर हो रही तमाम गतिविधियों के प्रति राज्य का नज़रिया आँख मूँद लेने का ही होता है, बल्कि इसके विपरीत हम पाते हैं कि अधिकांश कॉफ़ी हाउस बन्द होने के कगार पर नज़र आते हैं। जहाँ एक तरफ इन्हें बन्द करने की कोशिशे हो रही हैं, वहीँ दूसरी तरफ इस तरह की संस्थाओं की पैरोडी बनाने की भी कोशिश होती रही है। मसलन कैफ़े कॉफ़ी डे सरीखे पूर्णतः व्यावसायिक संस्‍थान। लोकवृत की अवधारणा इस तरह की कोशिशों को अठारहवीं सदी में अर्जित स्वतंत्रता, समानता और न्याय की परिकल्पना के विरोध में देखती है। अगर हम लोकवृत्त की अवधारणा पर विचार करें तो लोकतान्त्रिक मूल्य और लोकतान्त्रिक राज्य की सार्थकता को समझ सकेंगे। साथ ही उस लोकतन्त्र को सुनिश्चित करने में संस्थाओं की भूमिका की भी ठीक-ठीक व्याख्या कर सकेंगे।

इन अड्डों पर होने वाली बहसें, परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, असहमति का साहस सार्थक मूल्य थें। ये निजी लोभ और लालच के बुर्जुआ मूल्यों को कमजोर करते थे। लोकवृत की अवधारणा बुर्जुआ जीवन में मौजूद द्वन्द्व को गहरा करती थी और इस तरह पूंजीवाद के सामाजिक विरोध का वातावरण निर्मित होता था। इन्हें सिर्फ वर्गीय अवधारणा के सामान्यीकरणों के तहत नहीं समझा जा सकता है।

लोकवृत्त की अवधारणा के महत्व को देखना हो तो हाल ही में एक राज्य में सम्पन्न हुए चुनावों में उनकी भूमिका हम देख सकते हैं। जहाँ सत्ता वर्ग को अपनी निरंकुशता, असमर्थता और झूठ के प्रति जवाबदेह होना पड़ा और सत्ता गंवानी पड़ी।

आज भी एक सामान्य भारतीय नागरिक शिक्षा संस्थानों को, न्यायालय को, पुलिस को बहुत उम्मीद से देखता है। वह यह मान कर चलता है कि जब भी राज्य द्वारा उसके मूलभूत अधिकारों को नकारा जाएगा ये संस्थाएं उसका बचाव करेंगी। उसके पक्ष में निर्णय देंगी। सत्ता और सरकार को बार-बार इन संस्थाओं के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। पिछले कुछेक वर्षों में हम सबने न्यायालय द्वारा सरकार की स्पष्ट और कड़ी आलोचना देखी। बहुत सी सांस्कृतिक संस्थाएं आये दिन जन हित में सरकार की आलोचना करती हैं। मानवाधिकार की संस्थाएं सरकार पर मुकदमा करती हैं। ये सारे अधिकार लोकवृत्त की स्वतन्त्र आलोचना की दृष्टि को अपने में समाहित किये रहती हैं।

यहाँ यह भी जोड़ना महत्वपूर्ण लग रहा है कि पिछले तीस चालीस वर्षों में समूची दुनिया में लोकतान्त्रिक मूल्यों का हास् हुआ है। लोकवृत्त का दायरा संकुचित हुआ है। प्रेस या प्रकाशन संस्थाएं या विश्वविद्यालय पहले की अपेक्षा अब स्वायत्त रूप में काम नहीं कर रहे। वे सत्ता वर्ग की स्वतन्त्र आलोचना का साहस प्रदर्शित करने की बजाय सत्ता के प्रति लोगों को सहिष्णु और स्वीकार्य बनाने की भूमिका अदा कर रही हैं।

एक तरह से आज अधिकांश लोकवृत्त की संस्थाएं विपरीत और नकरात्मक भूमिकाएं अदा कर रही हैं। वे सत्ता के मुखपत्र की भूमिका में आ गयी हैं। ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कॉर्पोरेट पूंजी ने इन संस्थाओं को व्यवसायिक संस्थाओं में बदल दिया। इनका मुख्य उद्देश्य समाज में आलोचनात्मक विवेक की निरन्तरता को बनाये रखना था, ताकि वे सरकार और सत्ता का जनपयोगी मूल्यांकन कर सके। लेकिन ज्योंही इन संस्थाओं में कॉर्पोरेट पूंजी का आगमन हुआ, ये संस्थाएं व्यवसायिकता के नियमों के तहत कार्य करने लगीं। जाहिर है ऐसा करने के लिए उन्हें सत्ता और सरकार की खुल कर तारीफ करने की भूमिका में बदल दिया गया।

लोकवृत्त के दायरे के सीमित होने ने कमोबेश संस्थाओं को भी कमजोर किया है। सत्ता अगर आज जनविरोधी और निरंकुश होती प्रतीत हो रही हैं, तो हमे नये अर्थों में लोकवृत्त की अवधारणा को विकसित करने की जरुरत पर विचार करना चाहिए। पूंजी के दायरे के बाहर मनुष्य, समाज और स्वतन्त्रता के नये बोध की तलाश की जानी चाहिए ,तभी सही अर्थों में लोकतन्त्र को सुनिश्चित किया जा सकेगा। लोकतन्त्र का सही और सकारत्मक अर्थ है- समाज में आलोचनात्मक विवेक की रचनात्मक भूमिका को सुनिश्चित करना। ऐसा करके ही हम लोकवृत्त की प्रासंगिकता को और संस्थाओं की स्वायत्त चेतना को बचा सकेंगे

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अच्युतानंद मिश्र

लेखक कवि,आलोचक और प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919213166256, anmishra27@gmail.com
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