सामयिक

नागरिक सुविधाओं के लिए कारगर संघर्ष

 

पुलिस द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के क्रेन के माध्यम से गाड़ी खीचकर थाना ले जाने  की घटना  भागलपुर के नागरिकों और सामाजिक संगठनों को नागवार लगी है, इसीलिए 10 जुलाई को भागलपुर कोतवाली के सामने तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. योगेन्द्र के नेतृत्व में भागलपुर के नागरिकों ने इस घटना के विरोध में धरना दिया।

घटना 9 जुलाई की है। भागलपुर के खलीफाबाग चौक के पास आइसक्रीम की दुकान के सामने गाड़ी खड़ी कर एक परिवार के कुछ सदस्य आइसक्रीम खरीदने गये। गाड़ी जब  खड़ी की जा रही थी तो  वहाँ न तो ‘नो पार्किंग’ की कोई सूचना थी और न ही वहाँ मौजूद तक़रीबन 15 पुलिस के जवानों ने वहाँ गाड़ी खड़ी करने से मना किया। आश्चर्यजनक रूप से जैसे ही कार सवार उतरकर आइसक्रीम की दुकान तक पहुँचे, ट्रैफिक पुलिस की क्रेन गाड़ी उठाने पहुँच गयी।

कार मालिक ने निवेदन किया कि मुझे मालूम नहीं था। गलती हो गयी है। गाड़ी जाने दीजिए। दुबारा ऐसा नहीं होगा। पुलिस का उत्तर था- “सुबह उद्घोषणा कर दी गयी है कि यहाँ गाड़ी नहीं रोकनी है।”
कार मालिक ने फिर अनुरोध किया कि “आप कानूनन जो जुर्माना कहें मैं भरने के लिए तैयार हूँ।”  लेकिन पुलिस गाड़ी को थाना ले जाने के लिए आमदा थी। पुलिस की इस मनमानी के विरोध में कार मालिक कार के सामने ही जमीन पर बैठ गये। लेकिन पुलिस के जवानों ने बल प्रयोग और हाथापाई कर वहाँ से कार मालिक को हटाया और कार टोचन कर थाना ले गये। इस दौरान कार मालिक को ठेहुने में चोट लगी और उनके परिवार के महिला सदस्यों के साथ भी पुलिसकर्मियों ने अभद्रता की।

सवाल यह है कि किसी नये यात्री को यह कैसे पता चलेगा कि सुबह पार्किंग के बारे में  क्या घोषणा हुई है? नो पार्किंग का बोर्ड भी नहीं है। इसके बाद कार मालिक गाड़ी हटाने के लिए तैयार थे लेकिन पुलिस तो जनता के लिए होती नहीं है। उन्हें तो जनता पर अपना रौब दिखाना होता है।

ज्ञात हो कि शहर में कोई भी पार्किंग जोन नही है और न ही कहीं नो पार्किंग का बोर्ड लगा है। लेकिन जिला प्रशासन  शहर को जाम से बचाने के नाम पर तुगलकी फरमान जारी कर देता है। अगर प्रशासन कहीं पार्किंग से रोकता है तो उसे रोकने से पहले यह बताना चाहिए कि शहर और बाजार में पार्किंग की जगह कहाँ है?

अक्सर देखा गया है पुलिस नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार करती है। थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाने में, बाजार में यातायात नियमों में या अन्य मामलों में। वह गाली भी उगलती है। मौका पड़ने पर शारीरिक रूप से प्रताड़ित भी करती है। नागरिक शक्ति कमजोर होने से वे पुलिस का प्रतिरोध नहीं कर पाते। कई बार तो ऐसा होता है कि जो प्रतिरोध में खड़ा है, उस पर ही आरोप मढ़ दिये जाते हैं। क्या यह सही है?

यहाँ यह जिक्र करना प्रासंगिक है कि अगर आपका मोबाइल, पर्स या और कुछ सामान रेलवे स्टेशन से चोरी हो जाता है और आप सनहा (एनसीआर) दर्ज कराने रेल पुलिस के पास जाते हैं तो वे सनहा में चोरी का जिक्र आपको करने ही नहीं देंगे लेकिन अगर आप जिद पकड़ते हैं कि हमारा सामान चोरी ही हुआ है। तब इसपर उनके पास दो जवाब होता है कि या तो हम आपका सनहा दर्ज नही करेंगे या करेंगे तो गुम हो जाने के शर्त पर। पर इस नोक-झोंक में ये पुलिसकर्मी आम जनता को परेशान करने या मारने को उतारू हो जाते हैं और नागरिक पुलिस की बात मानने के लिए विवश हो जाते हैं।

पुलिस में कई अच्छे अधिकारी भी होते हैं। वे नागरिकों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। वे नागरिकों को परेशान करने के बजाय उनका सहयोग करते हैं। उनके अन्दर देशभक्ति और देशसेवा का जज्बा होता है। अपने लिये गये शपथ और दायित्वों का वे भलीभांति निर्वहन करते हैं। लेकिन नागरिकों के मन में पुलिस की अच्छी इमेज नहीं है। बात वही है कि बार पुलिस  आपको परेशान करे और एक बार आपके साथ अच्छा वर्ताव करे तो ज्यादा बार हुई घटना आपको ज्यादा याद रहेगा।

इन सब से पुलिस की ट्रेनिंग पर भी सवाल उठता है कि क्या पुलिस को  अमानवीय बनने की ट्रेनिंग दी जाती है?  और क्या सरकार को उनकी ट्रेनिंग के तौर तरीके को लोकतन्त्र और मनुष्यता के पक्ष में बदलने के लिए विचार नहीं करना चाहिए ?

सर्वविदित है कि प्रतिरोध करना आसान नहीं होता। और अहिंसक और विवेकपूर्ण प्रतिरोध ज्यादा कठिन है।जब पानी सर से ऊपर होने लगता है तो ही लोग प्रतिरोध का मार्ग अपनाते हैं। लोकतन्त्र में इस तरह के नागरिक विरोध की जगह बनी रहनी चाहिए, यही लोकतन्त्र की ताकत है। ऐसे विरोध का सम्मान प्रशासन को करना चाहिए और नागरिक समाज को भी।

शान्तिपूर्ण तरीके से दिए गए इस धरने का अच्छा असर हुआ। एक तो कार सवार भी अब जहाँ तहाँ पार्किंग करने से हिचकेंगे और प्रशासन ने धरना के दूसरे दिन ही 21करोड़ 93 लाख रुपये की लागत से शहर में चार पार्किंग के लिए टेंडर की घोषणा कर दी है।

नागरिक पहल की यह प्रारम्भिक उपलब्धि है, उम्मीद है कि भविष्य में अन्य जरूरी नागरिक सुविधाओं के लिए भी आवाज उठेगी और उस आवाज पर प्रशासन समुचित कार्रवाई करेगा।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One response to “नागरिक सुविधाओं के लिए कारगर संघर्ष”

  1. Tejas Poonia says:

    उपलब्धि आपके लिए प्रारंभिक है लेकिन आपके समाज के लिए यह भविष्य में कई सुविधाओं के दरवाजे खोलेंगी। सभी को शुभकामनाएं

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