प्रासंगिक

तानाशाह और शब्द की शक्ति

 

तात्कालिक राजनीति हमेशा क्षुद्र होती है लेकिन सौ-पचास साल बाद वही इतिहास बन जाती है और गम्भीर अध्ययन का विषय मानी जाती है!

जैसे तात्कालिक घटना नीरस वृत्तान्त होती है लेकिन शताब्दियों बाद उसपर जब विश्वास की परतें लग चुकी होती हैं तब  वह मिथक बन जाती है और अध्ययन के लिए चुनौती पेश करती है।

विचित्र बात है कि तात्कालिक राजनीति पर विचार करते हुए लेख लिखना अच्छा नहीं समझा जाता लेकिन उसी समय उसका वर्णन उपन्यास में करना या उसका चित्रण कविता में करना प्रशंसनीय माना जाता है।

इसका कारण शायद यह है कि साहित्य उन घटनाओं, चरित्रों को एक तो संवेदना की आँख से देखता है, दूसरे उन्हें निर्वैक्तिक, निर्जीव तथ्य के रूप में अंकित नहीं करता; मानवीय गतिविधियों के प्रसंग में अंकित करता है। मतलब यह कि किसी पात्र को अकेले-अलबेले रूप में न दिखाकर लोगों के साथ, उनके बीच, उनकी भूमिका के सन्दर्भ में चित्रित करता है। किसी ‘नायक’ के कार्यकलापों का लोगों पर किस तरह का असर होता है, नायक क्या सोचता है और लोगबाग क्या सोचते हैं, जीवन में मौजूद सामग्री से नायक किन्हें अपने कार्यकलाप का माध्यम बनाता है और लोगबाग किन पहलुओं को आवश्यक समझते हैं, यह सब साहित्य में आता है; न समाजशास्त्र में आता है, न इतिहास में।

फिर भी साहित्यिक अध्ययन में दूसरी विद्याओं का सहयोग लिया जाता है जबकि दूसरी विद्याएँ साहित्य को दोयम दर्ज़े की चीज़ मानती रही हैं। इधर जब से साहित्य का उपयोग इतिहास के अध्ययन के लिए होने लगा है तबसे कुछ नयी विश्लेषण पद्धतियाँ उभरी हैं, हालाँकि उनके लिए साहित्य केवल स्रोत है, इससे ज्यादा उसका कोई महत्त्व नहीं है।

मुझे लगता है कि अगर ऐतिहासिक सत्य जानने के लिए साहित्य का उपयोग किया जाता है तो उसकी साहित्यिकता का भी ध्यान रखना चाहिए। मतलब यह कि साहित्य केवल अपने समय के सामाजिक (बाह्य) तथ्यों का वृत्तान्त नहीं होता, उसमें मनुष्य के सोचने-विचारने का ढंग भी अभिव्यक्त होता है, उसके विश्वासों और सपनों की दुनिया भी रहती है। इतिहास के लिए अगर तोल्स्तोय या प्रेमचन्द का उपयोग हो सकता है तो मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए दॉस्तोएव्स्की या जैनेन्द्र कुमार का उपयोग क्यों नहीं हो सकता?

लेकिन क्या तोल्स्तोय या प्रेमचन्द के साहित्य में केवल समाज और इतिहास की सामग्री है, मनोविज्ञान की नहीं? क्या प्रेमचन्द के साहित्य में मौजूद इतिहास को उनके समकालीन जयशंकर प्रसाद या विश्वम्भर नाथ कौशिक के साहित्य में मौजूद इतिहास से जोड़कर देखने पर अधिक सुसंगत, वस्तुनिष्ठ इतिहास बोध प्राप्त नहीं होगा?

जहाँ बात शुरू हुई थी, वह प्रश्न था तात्कालिक राजनीति को क्षुद्र मानने और विगत राजनीति को इतिहास का गौरव समझने की। इस सम्बन्ध में उदाहरणों की कमी नहीं है। औरंगजेब के समय उसके कार्यकलापों पर पक्ष में बोलना पुरस्कृत होना और विरोध में बोलना जान गँवाना था। अभी किसी सत्ताधारी नेता ने कहा कि कश्मीर के लिए पहला बलिदान श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिया था! लेकिन क्या इन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग से मिलकर बंगाल में सरकार नहीं बनायी थी?

राजनीति के लिए पक्ष-विपक्ष के अनुसार उक्त नेता का एक कार्य प्रशंसनीय और दूसरा निंदनीय होगा; साहित्य के लिए दोनोँ वास्तविक होंगे। इसीलिए साहित्य अपने अध्येताओं को व्यापक दृष्टि देता है। यह व्यापक दृष्टि अपने स्रोता-पाठक-दर्शक को औरों से बेहतर मनुष्य बनाती है। यही कारण है कि प्लेटो कहते थे कि दार्शनिक तो शासक को आदर्श बनने की शिक्षा दे सकता है लेकिन नागरिक को आदर्श बनाने में साहित्य की सहायता ज़रूरी है!

प्लेटो खुद कवि रह चुके थे, वे दार्शनिक थे, वे साहित्य की प्रकृति और उसकी चालक शक्ति को समझते थे। लेकिन विभिन्न तथ्यों में से अपने अनुरूप तथ्य को चुनकर और अन्य तथ्यों की अवहेलना करके अपना ‘नरेटिव’ बनाने वाले राजनीतिज्ञ साहित्य को बर्दाश्त नहीं कर पाते। जो राजनीति जिस सीमा तक सीमित तथ्यों से, यानी कुछ सचाइयों के इस्तेमाल और शेष के दमन से अपना ‘नरेटिव बनाती है, वह उतना ही साहित्य-संस्कृति के विरुद्ध होती है।

इसीलिए तानाशाही सत्ताएँ साहित्य को सहन नहीं करतीं। उस बात को यों भी कह सकते हैं कि जो सत्ताएँ साहित्य-संस्कृति के प्रति जितना अहिष्णु होती हैं, उनमें तानाशाही की प्रवृत्तियॉं उतनी ही अधिक होती हैं।

हम यह कह सकते हैं कि कला के अन्य रूपों की अपेक्षा साहित्य के प्रति तानाशाही सत्ताओं का रवैया ज़्यादा नकारात्मक होता है क्योंकि कविता, नाटक, उपन्यास आदि साहित्य के रूप भाषा पर निर्भर हैं और भाषा में विचार भी व्यक्त होते हैं, भावनाएँ अधिक परिभाषित रूप में आती हैं; जबकि संगीत में केवल स्वर हैं जो संवेदनाएँ जगा सकते हैं, विचार नहीं; नृत्य में मुद्राएँ हैं जो भावोद्वेलन ला सकते हैं, सामाजिक जीवन के अंतर्विरोधों को उजागर नहीं कर सकते। संक्षेप में, कलाएँ जितनी भी हैं, वे मनुष्य के सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति हैं, वे संस्कृति की धरोहर हैं लेकिन विचार की दृष्टि से सबसे समर्थ या सशक्त सहित्य है क्योंकि वह भाषा पर निर्भर है और भाषा के बिना विचार की सत्ता नहीं हो सकती।

अपनी सृजनात्मक क्षमता के कारण कलाएँ दमनकारी सत्ताओं के निशाने पर होती हैं; अपनी व्यापक दृष्टि और विचार-क्षमता के कारण साहित्य न केवल अधिक निशाने पर होता है बल्कि प्रतिरोध का अधिक सबल माध्यम भी बनता है। यही कारण है कि तात्कालिक राजनीति चाहे जितनी क्षुद्र हो, उसी समय उसका वर्णन या चित्रण करने वाला साहित्य मूल्यवान होता है क्योंकि वह सत्ताओं के रुख से नहीं, जनता के हितों से परिचालित होता है।

 

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अजय तिवारी

लेखक हिन्दी के प्रसिद्द आलोचक हैं। सम्पर्क +919717170693, tiwari.ajay.du@gmail.com
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