स्त्रीकाल

वैदिक वांग्मय में महिलाओं का योगदान

 

संस्कृत वांग्मय का इतिहास पाश्चात्य विचार तथा अनुसंधान की देन है। भारतीय मस्तिष्क इस विषय के अध्ययन की ओर उस समय आकर्षित हुआ। जब मुख्यतः जर्मन विद्वानों ने इस पर ग्रंथ लिखे। संस्कृत साहित्य का यथा तथ्य इतिहास देने में मुख्य कठिनाई यह है कि संस्कृत का कार्य विशेषकर वैदिक तथा उत्तर वैदिक, अपने निर्माण की तिथि तथा स्थान को निर्दिष्ट नहीं करता, समय तथा स्थान इतिहास के मूल तत्व हैं।

मैकडोनल वैदिक काल तथा संस्कृत काल- इन दो कालों में संस्कृत साहित्य के इतिहास का विभाजन करते हैं। वैदिक साहित्य की भाषा को संस्कृत के अतिरिक्त अन्य नाम नहीं दिया जा सकता। भारतीय आर्य पंजाब में प्राचीन आर्यों की भाषा की एक शाखा को अपने साथ लाये, जिसे यथार्थ में थोड़े अंतर से संस्कृत कहा जा सकता हैं। यह नाम बाद में तब सामने आया। जब प्राकृत भाषा अस्तित्व में आई सामान्य जन की भाषा प्राकृत से उल्टे, संस्कृत का अर्थ होता है। संस्कारित लोगों की भाषा परन्तु उस नाम को वैदिक काल में ले जाना चाहिए। यदि संस्कृत ऐसा नाम है। जो पतंजलि के काल की भाषा तक ही सीमित है। तब वैदिक साहित्य संस्कृत साहित्य की श्रेणी में नहीं आ सकता, हम वैदिक भाषा को वैदिक संस्कृत, पाणिनि के समय की भाषा को वेदकाल के पश्चात की संस्कृत, पतंजलि के समय की भाषा को शास्त्रीय संस्कृत और शंकराचार्य तथा बाद के काल की भाषा को आधुनिक संस्कृत के नाम से पुकार सकते हैं।

वेदकाल की सामान्य जनता की वैदिक भाषा को अवश्य ही वैदिक संस्कृत के नाम से व्यवहृत  किया जाना चाहिए। श्रुति या वैदिक काल का साहित्य स्वभाविक रुप से दो भागों में विभक्त हो जाता है, वेद शब्द से तात्पर्य मंत्र तथा ब्राह्मण अर्थात मंत्र और उनकी व्याख्याएं ही हैं।

‘मंत्र ब्राह्मण योब्रेदनामधेयम् ‘ वेद संख्या में चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थववेद। जिस प्रकार प्रत्येक भाषा में साहित्य मूलतः धार्मिक है, इसी प्रकार संस्कृत में भी वेद प्राचीनतम साहित्यिक ग्रंथ थे। जिनमें प्रार्थनाए, यज्ञ सम्बन्धी विधि तथा भारतीय आर्य लोगों के स्त्रोत ग्रंथ समाविष्ट थे। वैदिक संस्कृति जिसे हम “विश्ववारा संस्कृति ” कहते हैं, इसमें समर्पण का महत्वपूर्ण स्थान है, साधारण तौर पर समर्पण का अर्थ देना या भेंट करना ले लिया जाता है।  मगर यह अर्थ इसका मात्र शाब्दिक ही है। दूसरा इसका गूढ़ अर्थ है। जिसका सम्बन्ध हमारे संस्कारों से है। वैदिक संस्कृति धर्म प्रधान संस्कृति है, जिसका प्राण धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत है। इसी धार्मिक भावनाओं के माध्यम से ही हमारा विश्वास उस परम सत्य अर्थात उस शक्ति की ओर जाता है, जो पूरे संसार में किसी न किसी रुप में व्याप्त है। मनुष्य के जीवन को यज्ञ की भाँति माना गया है। और उसके सारे संस्कार इस यज्ञ की भाँति ही सम्पन्न होते हैं। इस यज्ञ के सम्पन्न होने पर हम आहुति देते हैं। जिसमें हम उस शक्ति के प्रति समर्पण के रुप में देवताओं को उसका भाग देते हैं। इस भाग के बँटवारे का आधार व्यक्ति के जीवन पद्धति में प्राणरुप जो विश्वास चौबीस घंटे में जितनी बार लेता है। उसका दशान्श भाग वह भगवान को यानि अपने इष्ट अथवा सर्वशक्तिमान सत्ता को हवन के द्वारा अर्पित करता है, अत: भगवान को समर्पण के द्वारा हम उसका अंश देते हैं।

कवि फास्ट ने ठीक ही कहा है-

कठिन परिश्रम करके मैंने,
किया अध्ययन गहरा दर्शन, वैधक, न्याय, धर्म का
किन्तु खड़ा हूँ। ज्ञान के लिए मैं
निपट अनाड़ी और दरिद्र
पहले सा ही
जाना केवल यही सत्य है।
नहीं जान सकते हम कुछ

वेद शब्द वैदिक युग में वांग्मय के पर्यायवाची शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता था। जिस प्रकार आज़ भी शास्त्रों के नाम पर धर्मशास्त्र, व्याकरणशास्त्र, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र आदि से अनेक विषयों का बोध होता है। और शास्त्र शब्द किसी विशिष्ट अर्थ का प्रतिपादन न करके अपने पूर्व में जुड़े हुए शब्द की सम्पूर्णता का ही द्योतन करता है, उसी प्रकार ‘वेद’ शब्द का प्रयोग प्राचीन समय में सामान्य रुप से सम्पूर्ण वांग्मय के लिए किया जाता था। जैसे ब्रह्मण-युगीन सारा साहित्य ब्रह्मण-ग्रंथों के नाम से अभिहित हुआ, जिस प्रकार सूत्र-युग में श्रोत सूत्र, धर्म सूत्र, गुह्य सूत्र, व्याकरण और यहाँ तक कि दर्शन की प्रतिपादन शैली का नाम भी ‘सूत्र’ ही कहा गया। जैसे स्मृतियों के नाम से अभिहित हुई। जिस प्रकार पौराणिक युग के अनेक ग्रंथ पुराणों के नाम से अभिहित हुई और जिस प्रकार पौराणिक युग के अनेक ग्रंथ पुराणों के नाम से प्रचलित हुए ठीक उसी प्रकार, वैदिक युग में ‘वेद’ शब्द के अन्तर्गत ब्राह्मण-ग्रंथों तक का समावेश किया गया। मंत्रब्रह्मणयोवेदना; धेयम् अर्थात मंत्र और ब्रह्मण दोनों का नाम वेद है।

यद्यपि वेद और ब्रह्मण आदि वेद के व्याख्यान ग्रंथ; आज़ पृथक रुप में परिचित है और वेद शब्द से हम केवल चार मंत्र-सहिन्ताओ को ही स्मरण करते हैं; फ़िर भी इतना निश्चित है कि हमारी सारी क्रियाओं का मूल उक्त वेद ही हैं। उनकी नींव वेदों पर टिकी है।

इसीलिए मनु ने वेदों को सर्वज्ञानमय कहा है। और यही कारण है। कि मैक्समूलर तथा स्वामी दयानंद सरस्वती प्रभृति आधुनिक युग के वेदज्ञ विद्वानों ने वेद के उक्त सर्वज्ञानमय स्वरूप को स्वीकार किया है।

वेद शब्द की व्युत्पत्ति-

अति प्राचीन समय से लेकर आज तक हिन्दू जाति का वेदों पर एक जैसा विश्वास है। वेद, हिंदु-जाति के सबसे पुराने और पवित्र ग्रन्थ हैं। ये न तो ‘कुरान’ की तरह एकमात्र धर्म-पुस्तक है। और न ही ‘बाइबिल’ की भांति अनेक महापुरुषों की वाणियों के संग्रह मात्र हैं। वह तो एक पूरा साहित्य है। पुराने आचार्यों ने ‘वेद’ शब्द से उस युग के समग्र ग्रंथों को अभिहित किया है। वेद चार हैं।  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। और इन चारों की चार सहिंताए हैं। ऋग्वेद सहिंता, यजुर्वेद सहिंता, सामवेद सहिंता और अथर्ववेद सहिंता। ‘वेद’ शब्द की व्युत्पत्ति पर सहिंताओं से लेकर उपनिषद, आयुर्वेद, नाट्यशास्त्र, कोश, कल्प और मनुस्मृति आदि ग्रंथों तक व्यापक रूप से प्रकाश डाला गया है। ‘वेद’ शब्द चार धातुओं से निष्पन्न होता है। विद्-ज्ञाने विद्-सत्तायाम्, विद्लृ-लाभे और विद्-विचारणे। 

ऋग्वेद-भाष्य भूमिका के स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘वेद’ शब्द का निर्वचन इस प्रकार किया है।
विदन्ति जानन्ति, विद्यते भवन्ति विन्दन्ति

अथवा

विन्दन्ति, लभन्ते, विन्दन्ति विचारयन्ति,
सर्वे मनुष्या: सत्य विद्याम येर्येषु वा
तथा विद्वांशचभवन्ति ते वेदा:।

अथवा विचारते हैं।  अथवा विद्वान होते हैं। अथवा सत्य-विद्या की प्राप्ति के लिए जिनमें प्रवृत्त होते हैं। वे वेद हैं।

विषय-विचार की दृष्टि से वेद और वैदिक साहित्य दोनों ही अलग-अलग श्रेणियां हैं। ‘वेद’ शब्द से जहां चार मन्त्र-सहिन्ताओं का ही ज्ञान होता है। ‘वैदिक’ शब्द से वहां वेद विषयक बहुविध सामग्री का बोध होता है। यह बहुविध सामग्री ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् की है। जो मन्त्र-सहिन्ताओं से भिन्न है। किन्तु जिसका मन्त्र-सहिन्ताओं से अटूट सम्बन्ध है। यही वैदिक साहित्य के ग्रन्थ हैं। उपनिषद् ग्रंथों के बाद परिगणित होने वाले षडवेदांग भी, सम्बन्ध की दृष्टि से, वैदिक साहित्य के अंतर्गत आ जाते हैं।

संसार में किसी को सदा तृप्ति नहीं मिलती। आशा निराशा, तृप्ति-अतृप्ति, सुख-दुःख आदि सभी होते हैं। यद्यपि जीवन संग्राम में मनुष्य निराशा, अतृप्ति और दुःख को मूल से उखाड़ फेंकना चाहता है। पर वे पुन: उसे आ घेरते हैं। जितने वेग से आकार वह उनको हटा देना चाहता है। उतने ही वेग से आकर वे उससे लिपट जाते हैं। इन सब से संतृप्त हो जाने की खोज में वह निकलता है। जो शाश्वत सुख देने वाला हो, जो सदा-सदा एक सा हो, जो पूर्ण हो और हो जो नित्य।

आर्य साहित्य का प्राचीनतम ग्रन्थ वेद है। वेदका एक नाम श्रुति भी है। कहा जाता है कि परमात्मा से ऋषियों ने समाधि दशा में वेद का श्रवण किया। इसलिए वेद का नाम श्रुति पड़ा।

वेद क्या है?

श्री मद्भागवदगीता में कहा गया है-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।

इस भगवदुक्ति के अनुसार जब-जब वैदिक सत्य विधा अज्ञान-धूम से आवृत्त होने लगती है। और मोहवश जनता का विश्वास हटने लगता है। तब-तब परमेश्वर की प्रेरणा से कोई न कोई शक्ति प्रकट होकर सत्य-विधा व सत्य-धर्म को राहू ग्रास से मुक्त कर अज्ञान का नाश कर देती है।

वेद की उत्पत्ति-

विश्वभर के सभी धर्मशास्त्रों में शब्द या वाक् से सृष्टि का होना कहा गया है। वेद कहता है। “वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे” – वाक् से ही समस्त सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। वेद आर्य जाति के सर्वस्व है। भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान-विज्ञान सब कुछ वेद मूलक है। वेद का स्वरूप तो बहुत पहले ही निर्णीत हो चुका है। आपस्त्म्भ श्रौतसूत्र में लिखा है- ‘मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयं’ अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थ ही वेद हैं। मीमांसको ने माना है- ‘अपौरुषेय वाक्यम वेद:’ अर्थात् पुरुष प्रयत्न के बिना स्वयं प्रादुर्भूत वाक्य राशि ही वेद है। ऐसी स्थिति में वेद-स्वरूप के विचार की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है।

‘वेद’ शब्द ‘विदज्ञाने’ धातु से घञ् प्रत्यय होकर बना है। घञ् प्रत्यय भाव अर्थ में कर्तृ भिन्न कारकों के अर्थ में होता है। भगवान पाणिनि ने तो ‘वेद’ शब्द में चार धातुओं का समावेश किया है।

  1. विद् ज्ञाने
  2. विद् सत्तायाम्
  3. विद्रलृ लाभे
  4. विद् विचारणे

वैदिक स्त्री ऋषि (ऋषिकाएं) सूक्तों के साथ उल्लिखित पुरुषों ऋषियों की भांति स्त्री ऋषि अथवा ऋषिकाएँ भी या तो अपने पूर्व ऋषियों से वेद के रहस्यार्थ का बोध, सूक्तों एवं मंत्रो के रूप में करने वाली “श्रुत ऋषि” हैं। अथवा ये वे विदुषी एवं ज्ञानवती महिलाएं हैं। जिन्होंने तपश्चर्या द्वारा स्वयं वेद मंत्रो के रहस्यों का साक्षात्कार करके लोकमंगल की भावना से दूसरों के लिए वेद मंत्रों का व्याख्यान एवं प्रकाशन किया। साथ ही इन स्त्री ऋषियों को वैदिक कवि द्वारा वर्ण्य विषय के अनुरूप ही कल्पितनाम वाली कविनिबद्ध प्रवक्ता भी कहा जा सकता है। जो भी हो इन ऋषिकाओं का वैदिक साहित्य में अद्भुत योगदान है। और इनके द्वारा दुष्ट एवं प्रकाशित सूक्तों एवं मन्त्रों में निहित जीव-जगत् एवं ब्रह्म विषयक गूढ़ ज्ञान का अवलोकन करके हमारा मस्तक श्रद्धा से इनके चरणों में झुक जाता है।

वैदिक स्त्री ऋषिकाओं की संख्याओं की दृष्टि से यदि अकेले ऋग्वेद को ही लें तो उसमें कुल मिलाकर लगभग 23 ऋषिकाएँ है। जिनके नाम क्रमश: है- “ अदिति, देवजामि, सर्पराज्ञी, दक्षिणा, इन्द्राणी, शची, सूर्या, यमी, वाक्, श्रधा, लोपामुद्रा, अगस्त्यस्वसा, शाश्वती, इन्द्रस्नुषा, जुहू, रोमशा, ममता, अपाला, विश्ववारा,घोषा, कक्षीवती, उर्वशी, रात्री तथा गौरवीति।”

इनमें 18 महिलाएं दशम मंडल के विभिन्न सूक्तों की ऋषि हैं। शाश्वती तथा अपाला अष्टम मंडल के सूक्तों (8/1/34 तथा 8/91) की द्रष्टा हैं। लोपामुद्रा एवं रोमशा प्रथम मंडल के सूक्तों (1/126/7) से सम्बद्ध हैं। और विश्ववारा आत्रेयी केवल पंचम मंडल के एक सूक्त (5/28) की ऋषि है।

ऋग्वेद की ये समस्त महिला ऋषि किसी न किसी वैदिक परिवार से सम्बद्ध बताई गई हैं। प्रत्येक ऋषिका किसी न किसी ऋषि की पुत्री, पत्नी व बहन आदि है। इनमें से कुछ स्त्रियाँ देवताओं व ऋषियों की माताएं भी हैं।

वैदिक स्त्री ऋषियों के नामों पर विचार करने से विदित होता है। कि ये नाम प्राय: देवता अथवा प्रतिपाद्य विषय के अनुरूप ही रखे गये हैं। उदाहरणार्थ- ऋग्वेद के दशम मंडल के 151 वें सूक्त की ऋषि “श्रद्धा” है। और इसकी देवता भी “श्रद्धा” है। इसमें श्रद्धा की महत्ता का चित्रण है। श्रत् कहते हैं- सत्य को। और सत्य के धारण करने वाली दृढ़ इच्छाशक्ति अथवा धारणा शक्ति का नाम श्रद्धा है। ‘श्रत् सत्यं दधातीति श्रद्धा।’ वस्तुतः सत्य पर ही समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व प्रतिष्ठित हैं। ऐसे सत्य को ह्रदय में धारण करने वाली दिव्यशक्ति “श्रद्धा” वस्तुतः वंदनीया है। और श्रद्धा की महत्ता का बखान करने वाली ऋषिका का नाम भी श्रद्धामय अथवा साक्षात् श्रद्धा स्वरूप होना नितांत समीचीन एवं युक्ति युक्त है। श्रद्धा के महत्व का चित्रण करते हुए मन्त्र में श्रद्धा ऋषि कहती है।

“ श्रद्धयाग्नि: समिध्यते, श्रद्धया हूयते हवि:।

श्रद्धां भगस्य मूर्धनि, वचसा वादयामसि।।

प्रियं श्रद्धे ददत: प्रियं श्रद्धे दिदासत:।

प्रियं भोजेषु यज्वसु इदं म उदितं कृधि।।

ऋग्वेद से यह नहीं मालूम होता कि सप्तसिन्धु की आर्य-स्त्रियों की स्थिति उतनी हीन थी, जितनी पीछे देखी गयी।

युद्ध के बाद सबसे महत्व था ऋचाओं (पदों) की रचना का, जिसके कारण उन्हें ऋषि, ऋषिका कहा जाता था ऋषिकाओं की संख्या ऋग्वेद में दो दर्जन से कम नहीं है। पर विश्लेषण करने पर उनमे से अधिकाँश को मानुषी नहीं कल्पित ही देखा जाता है। केवल घोषा और विश्ववारा को ही ऐतिहासिक ऋषि माना जा सकता है। ऋषिकाओं के नाम से जो ऋचायें ऋग्वेद में संगृहित हैं। उनकी रचयित्रियाँ स्त्रियाँ ही रही होंगी। यह कहना मुश्किल है।  हाँ, इन ऋचाओं से ऋग्वेदिक आर्य-स्त्रियों के जीवन के बारे में कितनी ही बातों का पता जरुर लगता है।

 अदिति- ऋग्वेद के दसवें मंडल का 72वां सूक्त बृहस्पति अथवा अदिति का बनाया बतलाया जाता है। इसमें अदिति का नाम (10/72) आया है। शायद इसीलिए इसे अदिति का बनाया सूक्त कर दिया गया। अदिति (द्यो) दक्ष की पुत्री कही गयी है। और दक्ष (सूर्य) को भी अदिति का पुत्र बतलाया गया है।

“ उत्तानपाद (वृक्ष) से भूमि उत्पन्न हुई, भूमि से दिशायें उत्पन्न हुई। अदिति से दक्ष, दक्ष से अदिति उत्पन्न हुई” ।। (4) ।।

“ हे दक्ष, जो तेरी दुहिता अदिति है, उसने देवों को जन्म दिया। उसके पीछे महान् अमृतबन्धु (अमर) देव उत्पन्न हुए” ।। (5) ।।

“ शरीर से अदिति के जो आठ पुत्र उत्पन्न हुए। (उनमें से) सात के साथ वह देवताओं के पास गयीं। (पर) मार्तंडको परे स्थापित कर दिया” ।। (8) ।।

इसमें दिव्य अदिति (द्यो) का वर्णन हैं। वह सप्त सिन्धु की ऋषिका नहीं थी।

वेदों में ऋग्वेद की रचना सर्वप्रथम हुई है। वैदिककालीन नारी का प्राचीनतम रूप भी ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में स्त्रियों की श्रेष्ठ स्थिति का परिचय मिलता है। इस काल की कन्याओं का बालकों की भांति ही उपनयन आदि संस्कार होते थे। और वे संध्यापूजन की विधि भी पूरी करती थी। बाल-विवाह की प्रथा न होने से यौवनावस्था में पदार्पण करने के पूर्व ही उनको शिक्षा प्राप्ति का पूर्ण अवसर प्राप्त होता था। ऋग्वेद के अनेक सूक्त नारियों द्वारा ही आविष्कृत हैं।

ब्रहमवादिनी घोषा ने दशम मंडल के 39 वें एवं 40 वें सूक्तों का साक्षात्कार किया। इन्द्रदेव की पत्नि इन्द्राणी ने ऋग्वेद के दशम मंडल के सूक्त की रचना की थी। नारी अपनी उपार्जित उपयोगी विद्या से सनातन परिवार निकट के पर्यावरण एवं समाज को पूर्ण लाभ प्रदान करती थी। नारी का वैदिककालीन समाज में अत्यधिक सम्मान था और उसे पारिवारिक संगठन में पूर्ण स्वतंत्रता थी।

वैदिक युग में यथावसर स्त्रियाँ सभाओं में भाषण आदि भी दिया करती थीं। नारी कृषि कार्यों में भी सहयोग देती थीं। अपाला को ऋग्वेद में अपने पिता के खेतों में अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु इंद्र से याचना करते हुए चित्रित किया गया है।

वैदिक साहित्य का अनुशीलन करने पर तत्कालीन समाज में चित्रित नारियों का महत्वपूर्ण स्थान दृष्टिगोचर होता है। वैदिक वांग्मय में नारी कहीं पुत्री, कहीं भगिनी, तथा अन्यत्र पत्नि एवं माता रूप में तथा इसके अतिरिक्त वह ऋषिका के पद गौरव को प्रतिष्ठित दृष्टिगोचर होती है।

ऋग्वेद में पुत्री अपने पिता के दीर्घायु का कारण मानी गयी है। ऋग्वेद के आठवें मंडल में एक स्थान पर मनु वैवस्वत ने अपने विचार व्यक्त किये हैं।

“ पुत्रिणा ता कुमारिणा विश्वमायुव्यश्नुत: उभाहिरण्य पेक्षता”

“गृहिणी गृहमुच्यते” द्वारा वैदिक युग में नारियों का गृहस्थि में अत्यंत महत्व बताया गया है। “जाया को ही गृहिणी ” ग्रह की संज्ञा दी गयी थी, इसके अतिरिक्त वैदिककालीन नारियों के शैक्षिक धरातल का भी परिचय प्राप्त होता है। कक्षीवान की पत्नि योधा ने अपनी तपस्या से ऋग्वेद के दशम मंडल के दो सूक्तों (39-40) के दर्शन किये, जी कि अतिदीर्घ हैं। तथा उसकी अध्यात्म-दृष्टि का परिचय देते हैं। ‘स्त्री’ शब्द नारी के लिए सर्वाधिक प्रचलित शब्द रहा है। वैदिक युग में यह प्रसिद्धि प्राप्त था। ‘स्त्री’ शब्द ‘स्त्यै’ धातु से बना है। यास्क के अनुसार ‘स्त्यै’ का अर्थ लज्जा से सिकुड़ना है। स्त्री को स्त्री इसलिए कहा जाता है। क्योंकि वह लजाती है।

दुर्गाचार्य ने इसकी टीका पर लिखा है

“ल्ज्जार्थस्य लज्जन्ते पि हि ता:” अर्थात नारी की स्त्री संज्ञा उसके लज्जाशील प्रकृति के कारण है। किन्तु पाणिनि के धातु पाठ के अनुसार करना है। पतंजलि ने भी अष्टाध्यायी के “स्त्रियाम्” सूत्र के भाष्य में ‘स्त्री’ शब्द पर अनेक दृष्टि से विचार किया है। लोक में शारीरिक सरंचना के आधार पर ‘स्त्री’ के इस अर्थ की उपेक्षा कर ‘स्त्यै’ धातु को ही आधार मानकर स्त्री का अर्थ किया है- “स्त्यायति अस्याम गर्भ इति स्त्री’ अर्थात गर्भ की स्थिति (पिंड) उसके भीतर होने के कारण वह ‘स्त्री’ है।

पतंजलि ने स्त्री शब्द की एक दूसरी व्युत्पत्ति दी है – “शब्द स्पर्श रुप रस गन्धानाम गुणानाम सत्यानाम स्त्री” वेद में स्त्री को ब्र्ह्मा भी कहा गया है। और नारी,वामा, अबला, योधा, मेना, ग्ना: (वैदिक) सुन्दरी, प्रमदा, ललना (लालसा,इच्छा,चाह रखने वाली) मानिनी, महिला, दुहिता, जाया अनेक नाम से सम्बोधित किया गया है । इमरसन कहते है “Men are what their mother’s made them”

“तज्याया जाया भवति यदस्याम जायते पुनः” जाया जाया इसलिए है। कि पुरुष स्वयं उसमें पुत्र रुप में जन्म लेता है। ऋग्वेद में जाया के प्रति बड़े ही मधुर उदगार व्यक्त किये गये हैं।

इन सभी महान नारियों के श्री चरणों में नमन करते हुए आप सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं।

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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