सिनेमा

सिनेमा बंदी ‘दिल से हर कोई फिल्मकार है’

 

{Featured in IMDb Critics Reviews}

 

निर्देशक – प्रवीण कान्द्रेगुला
निर्माता – राज & डी के
कहानी पटकथा – वसंत मरिन्गंथी

 

14 मई नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित हिन्दी सबटाइटल के साथ तेलगु फिल्म सिनेमा बंदी फ़िल्मी प्रेमियों को बहुत ही प्यरा सन्देश देती है- दिल से हर कोई फिल्मकार है और कैमरा मानों वो दृष्टि है जिससे आप ये दुनिया देखते हैं इसलिए सिनेमा बंदी फिल्म उस मिथक को तोड़ती है कि फ़िल्म निर्माण सिर्फ ख़ास वर्ग के लोग ही कर सकते हैं। ‘एक ऑटो रिक्शावाला क्या फिल्म नहीं बना सकता’ यह संवाद इस बात की पुष्टि करता है कि फिल्म बनाना किसी का मौरूसी हक़ नहीं, जाने अनजाने नेपोटिज्म की ओर भी संकेत कर जाती है।  फिल्म हँसते हँसाते हुए कई गंभीर समस्याओं से हमे रूबरू करवाती चलती है।  दादा साहब फाल्के जैसे महत्वकांक्षी फिल्म निर्माण में लगे, जुनूनी लोगों की समस्याओं को भी सिनेमा बंदी हमारे सामने रखती है।  जिसे हम 2009 में प्रदर्शित व ऑस्कर नामित मराठी फिल्म ‘हरीश्चन्द्राची फैक्टरी’ में बखूबी देख चुके हैं।

फ़िल्मी फैंटसी के इतर फ़िल्मी व्यावसायिक ढाँचे पर भी फ़िल्म चोट करती है नायक वीरा की सोच है कि एक बार फिल्म हिट हो जाये तो गाँव की तमाम समस्याओं से हमें छुटकारा मिल जायेगा।  गांव में सरकारी स्कूल की स्थिति पर भी इशारा है, जिनका प्रशासन जर्जर बिल्डिंग की तरह जर्जर हालात में है।  जब कैमरा चार्ज करने के लिए वे मुर्गियों के फार्म हाउस में,  जहाँ 24 घंटे बिजली है,  वहाँ जाते हैं वह कहता हैं‘हमसे अच्छी तो यह मुर्गियां हैं अब किसी और के भरोसे (नेताओं) नहीं रह  सकते हमें खुद ही बिजली,  पानी,  सडक,  स्कूल,  जैसे समस्याओं  को दूर करना होगा उसकी इसी आशावादी सोच के कारण पूरा गाँव जो पहले उसका मजाक बना रहा था कैमरा टूटने के बाद,  साथ हो लेता है।  आज का दर्शक जागो ग्राहक जागो के तहत जागरूक हो रहा है उसकी रुचि और समझ भी बदल रही है अब वे अविश्वसनीय घटनाओं  और अतिरंजनापूर्ण कथानकों को छोड़ तुरंत आगे बढ़ जाता है।  यह फ़िल्म ऐसे ही वर्ग और सोच को समर्पित है।The Karnataka touch in Cinema Bandi- Cinema express

कहानी खेती-बाड़ी करने वाले गोलप्ल्ला गाँव की है, लेकिन तीन वर्षों से बारिश न होने के कारण तथा पानी बिजली की सुविधाओं के न होने के कारण किसान पलायन कर रहे है। ‘पिपली लाइव’ फिल्म जहाँ से खत्म होती है यह फिल्म मानो वहीँ से शुरू होती है गाँव छोड़कर जाने वाले एक किसान से नायक वीरा का संवाद – तुम बार-बार कहते हो शहर में काम है,  अगर हर कोई शहर चला जाएगा तो गांव को कौन देखेगा? किसान – जमीन किसके पास नहीं है गांव में,  मगर 3 साल से पानी नहीं है पानी होता तो खेती-बाड़ी करके खुश होते सारी जमीन बंजर हो रही है।   वीरा – लेकिन शहर में भी वही खाना मिलेगा ना,  जो यहाँ गांव में उगेगा।  बिजली तो 24 घंटे यहाँ होनी चाहिए ताकि सिचाईं हो… सब्र करो सब ठीक हो जाएगा। ‘पीपली लाइव’ ने जिसे मूल समस्या के रूप में देखा वहीँ यह फ़िल्म सकारात्मक रवैये से प्रारम्भ होती है।  लेकिन सिनेमा बंदी फिल्म-निर्माण और उससे जुड़ी बातों पर भी समानांतर बल्कि प्रमुखता सेहमारा ध्यान आकर्षित करती है।

कम बजट की फिल्मों का समय आ चुका है आज कोई भी फिल्म बनाने मे सक्षम है।  हम जानतें हैं, कला, संस्कृति,  लोकगायन-नृत्य,  ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न अंग रहीं हैं कहीं न कहीं वे फ़िल्मी फूहड़ता से आज भी बचे हुए हैं लेकिन उसके प्रभाव से वे अछूते नहीं।  अब क्षेत्रीय,  स्थानीय पृष्ठभूमि से जुड़े कलाकार सिनेमा की संस्कृति को समृद्धकर रहें हैं तो गाँव क्यों पीछे रहें।  फिल्म-निर्माण कला तकनीक से जुड़ी विधा है जिससे आम आदमी या एक गाँव वाला परिचित नहीं लेकिन आज जिस प्रकार तकनीक एनरोयड फ़ोन के रूप में हमारे हाथों में आ गई है किसी के लिए भी फिल्म बनाना आसान नहीं तो जटिल भी नहीं।  खासकर तब जबकि हर ह्रदय में एक फिल्मकार बसता है।  आवश्यकता आविष्कार की जननी है का एक जबरदस्त उदाहरण- एक दृश्य में ट्रॉली और क्रेन की जगह बैलगाड़ी का इस्तेमाल करके सीन लिया जाता है, जो बताता है की जूनून और लगन हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। हालाँकि फिल्म देखना और निर्माण करना दो अलग-अलग पक्ष है इसलिए भी फिल्म में हास्य उत्पन्न हो पाया है,  जब नायक के ऑटो में एक फ्रीलांसर पत्रकार अपना डिज़िटल सिंगल –लेंस रिफ्लेक्स (डी एस एल आर) कैमरा भूल जाती है।  और फिर अंत तक आपके चेहरे पर हँसी बनी रहती है। Cinema Bandi Movie Review: For the love of cinema - Nixatube

शादी ब्याह में फोटोग्राफी करने वाला गना का पूरे गाँव में टशन है,  वह हर नवविवाहित जोड़े का टाइटेनिक के पोज़ में फोटो खींचता है जो मूलतः खेतों के बीचों-बीच काकभुशुण्डि की भांति प्रतीत होता है।  वीरा सोचता है महंगा कैमरा है बेच देंतें हैं पर एक खबर से उसका विचार बदल जाता है जो वास्तव में फिल्म का मूल बिंदु है-‘छोटे स्वतंत्र फिल्मकार बड़े पर्दे पर बदलाव ला रहे हैं अब तक तो फिल्मों का मतलब होता था बड़े सितारे, महंगे सेट हिंसा लेकिन इन छोटी फिल्मों में ना मार-धाड़ वाले दृश्य हैं न बड़े सितार यह स्वतंत्र फिल्मकार एकसप्ताह में ही अपने निवेश की भरपाई कर लेते हैं’ अपनी पत्नी वीरा कहता है ‘तुम हीरोइन बन जाओ मैं हीरो पूरी जिन्दगी नाचते हुए बताएंगे’ आज भी फिल्म का मतलब सिर्फ नाच गाना मनोरंजन ही है फिल्म के माध्यम से हम समाज में परिवर्तन ला सकते हैं, इस तरह से सोचने वाले बहुत कम हैं।  क्योंकि आज भी खासकर दक्षिण भारत में फ़िल्मी नायकों को पूजने वालों का एक हूज़ूम है कारण इस संवाद में नजर आ जाता है जब एक नवयुवक एक ही फिल्म को चौथी बार देखने जा रहा है ‘कुछ काम धंधा है या नहीं चार चार बार एक ही फिल्म देखने जा रहे हो तुम्हारे जैसे फिल्मी प्रेमी ही तो निर्माता को अमीर बनाते हैं’ बेरोजगारी और मनोरंजन का भारत में बड़ा तगड़ा रिश्ता है जिस तरह से मोबाइल पर बेरोज़गार टिक-टाक जैसे वीडियोज बनाते हैं और देखने वालों की संख्या भी लाखों में है क्योंकि काम धंधा नहीं है।

फिल्म का सबसे मजेदार लेकिन असरदार पक्ष है कहानीकार की उपेक्षा। भारतीय फिल्मों में सब कुछ मिल जायेगा लेकिन अच्छी कहानी नहीं मिलती यह रोना तो खुद फिल्म निर्माता भी रोते हैं।  एक बहुत ही बुजुर्ग दद्दा जिसके मुंह में गुटखा हमेशा रहेगा जीभ लाल रहती है का कहानीकार होना अत्यंत रोचक है। वीरा के अनुसार प्रसिद्ध तेलुगु पत्रिका स्वाति में उसकी कोई 50 कविताएं और 16 कहानियां है सभी प्रेम कहानियां है फिल्मों में तो प्रेम कहानियां ही चाहिए एक बड़ा मजेदार डायलॉग है “ये बहुत प्रसिद्ध है लेकिन कोई जानता नहीं” फिल्म कितनी ही हिट हो जाए हीरो,  हेरोइन, निर्माता, निर्देशक, गायक, गीतकार सभी को कम या ज्यादा लोग जानते हैं लेकिन फिल्म की कहानी किसने लिखी कोई नहीं जनता वैसे यह फिल्म वसंत मरिन्गंथी की है।

दद्दा से म्रुद्या कहता है कि-तुम्हारे बालों को साइड में से दो पार्ट कर के बीच में से अगर गुलाबी करदे गांव की सारी दादियाँ तुम पर फिदा होंगी  यानी सीधी बात है फ़िल्मी कहानी को रंगीन होना चाहिए।  लेकिन हीरो हीरोइन ही पहली शर्त है,  जब वे हीरो खोजने निकल पड़ते हैं तो ये क्या‘अरे दद्दा को तो पीछे ही छोड़ दिया’  यानी कहानी पीछे छूट जाती है साफ है कि फिल्मों में कहानी का कोई महत्व नहीं ऐसे ही नहीं है कि दद्दा पूरी फिल्म में चुप बैठा रहता है अपनी कहानी का तमाशा-सा बनता देखता रहता है रहता है और अंत में यह प्रश्न पूछने पर दद्दा क्या ये कहानी सच में आपने लिखी तो वह दृश्य से गायब हो जाता है मुझे तो पढ़ना भी नहीं आता आवाज़ के साथ फिल्म का अंत।  जाहिर सी बात है जाने किसकी पुरानी कॉपी उठा लाया था कहानी चुराने के किस्से भी तो बहुत मशहूर होते हैं फ़िल्मी दुनियां में। सिनेमा बंदी' की समीक्षा: यथार्थवादी सेटिंग में अवास्तविक नाटक

हीरोइन ढूँढने के क्रम में गना और वीरा वहाँ पहुँचते हैं जिनकी शादी पर गना ने फोटो खींचीं थी कि उनके बच्चे हो चुके हैं गुस्से में गना कहता है इतनी जल्दी क्या थी  जनसंख्या वृद्धि के कारण भी समझ आ जाता है काम धंधा है नहीं लेकिन बाकी सभी रस्मों रिवाज़ पूरे होने ही हैं।  मृदया जो हीरो जैसा दिखता है वह कहता है हाँ मैं हीरो बन सकता हूं क्योंकि मैं स्टंट कर सकता हूं बाइक चला सकता हूं नाच सकता हूं और सुंदर तो दिखता ही हूं  इससे ज्यादा नायक कुछ नहीं। और हीरोइन,  हीरोइन को सिर्फ कमर दिखानी है लेकिन मंगा तो फ़ोटोग्राफ़र गना को मारने को दौड़ती है। क्योंकि वह एक सशक्त स्वावलंबी महिला है। फिल्म नायक नायिका की छवि तो भी तोड़ती है, जिनके नाम से फिल्म बिकती है। मंगा में हीरोइन बनने को तैयार हो जाती है क्योंकि पहली वाली हीरोइन प्यार बलिदान मांगता है  फ़िल्मी डायलॉग मारकर अपने बचपन के हीरो के साथ बाइक पर भाग जाती है। लडकी का बाप  कहता है मेरी लड़की मासूम है,  हमारे गांव की ‘शान’ चली गई तो वीरा कहता है ‘शान’ तो तब होना जब हमारे पास पर्याप्त खाना हो सुविधाएँ हों,  वस्तुतः यह फिल्मों का साइड इफ्फेक्ट भी है,  प्रेम में भाग जाना।

मंगा सशक्त सब्जी बेचती है अपने बलबूते पर अपने हिसाब से जीती है वो मृदया को डांटती है-तू कौन होता है मुझे रोकने वाला तू मेरा पति है क्या? वह गांव वालों को भी झिड़का देती है हमारे काम की बेइज्जती ना कर तुम्हें मेरे साथ नहीं देना तो ना दे’ काम का महत्व उसका जूनूनलेकिन हमारी फिल्मों या समाज में स्त्रियों की यह विडंबनात्मक स्थिति है कि एक सशक्त महिला कैसे अशक्त होना पड़ता है जिसे एक बड़े ही हास्यात्मक ढंग से फिल्माया गया है,  एक दृश्य जिसमें खलनायक हीरोइन को तंग कर रहे हैं लेकिन मंगा तो तेजतर्रार लड़की है वो खुद ही मारने लग जाती है निर्देशक कहता है अरे यह तो हीरो का काम है बेचारी चुप हो जाती है। नायिका तो छुईमुई ही अच्छी लगती है। और निर्देशक पितृसत्तात्मक कुर्सी पर विराजमान।   सिनेमा बंदी का सिनेमा तेइसिनम गीत Archives - Shiva Music

उसी कैमरा में शहरीकरण के भी दो मार्मिक दृश्य हैं-एक दृश्य है जहाँ लोग नकली बारिश का आनंद ले रहें है और डांस कर रहें हैं,  वीरा कहता है- ये पानी क्यों बर्बाद कर रहे हैं, मज़ाक में कहता-इनसे कहो की यहाँ आकर पानी बहायें इनका डांस भी हो जायेगा और हमारे सारे तालाब ही भर जायेगें  दूसरा दृश्य फायर कैंप का है-अरे ये तो हमारी ही तरह लकड़ी पर खाना बना रहें हैं वीरा जवाब देता है- शहर के लोग हमारी ही तरह देने की कोशिश कर रहे हैं जबकि हम उनकी जिन्दगी चाहते हैं यही विडंबना है वह हमारी जिन्दगी जब चाहे जैसे चाहे जी सकते हैं फॉर अ चेंज के लिए आनंद, रोमांचऔर खुशी के लिए लेकिन गाँव वालों के पास कोई साधन और सुविधाएं नहीं इसलिए उन्हें शहरों में डबल संघर्ष करना पढ़ता है। गाँव और शहरों के रहनसहन पर वीरा की टिपण्णी इस कोरोना काल की जटिलताओं में हमें सोचने पर विवश करेंगी कि हम क्यों न प्रकृति की ओर प्राकृतिक तरीके से ही लौटे,  रोमांच मात्र के लिए नहीं।

एक और लड़कियों के महत्वपूर्ण मुद्दें को मजेदार ढंग से प्रस्तुत किया है- एसएन शारदा गर्ल्स हाई स्कूल पोस्टर में जहाँ लड़कियां 80-90 और ऊपर 95 प्रतिशत तक अंक लेकर आ आती हैं, वीरा कहता है-इतने नंबर लाती कहाँ से हैं नाश्ते में किताबे खाती है क्या अंक अगर एक ओर सुकून देते हैं दूसरी ओर चिंता भी, ऐसी बौद्धिक प्रतिभाएं, अंक प्राप्त करने के बाद, इन लड़कियों का क्या भविष्य होने वाला है क्योंकि असुविधाओं से भरपूर यह गांव छोड़कर जाने वाले लड़के तो फिर भी अपना भविष्य बनाने शहर जा सकते हैं मगर यह लड़कियां?

उधर वह लड़की जिसने अपनी पांच साल की सेविंग से उसने वह कैमरा खरीदा था जब चिप अपने लैपटॉप लगा कर देखती है तो खूब हंसती है,  प्रसन्न होती है,  और एडिट करके गांव वालों को फिल्म दिखाती है अंत में लिखा आता है –गोलापल्ली गांव द्वारा निर्मित फिल्म। ‘दिल से हर कोई फिल्मकार है’ वास्तव में कैमरा सिर्फ कैमरा नहीं है पूरी दुनिया को अपने दृष्टिकोण से देखने का एक नजरिया है। न्यूनतम सुविधाओं में कैसे फिल्म बनाई जा सकती अथवा कह लो न्यूनतम सुविधाओं में कैसे आशावादी बने रहें,  फिल्म उसका अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है। फिल्म में सभी ने बेहतरीन अभिनय किया है गाँव के दृश्य खेत और शहर में तब्दील होता गाँवों के बाज़ार सबके बीच में अंत में गाँव का सहयोग की भावना का ख़ूबसूरती से चित्रण किया गया है। आप फिल्म नेटफ्लिक्स पर सपरिवार देख सकतें है एक स्वतंत्र फिल्मकार की साफ़ सुथरी फिल्म जिसमे न हिंसा है न अश्लीलता । 

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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