बुलबुल-ए-राष्ट्रवाद
सिनेमा

बॉलीवुड का बुलबुल-ए-राष्ट्रवाद

 

मुख्यधारा का सिनेमा अथवा लोकप्रिय सिनेमा यानी बॉलीवुड पूरे भारत की विचारधारा का प्रतिनिधित्व भले ही न करे लेकिन पूरे भारत में क्या, आज विश्व भर में लोकप्रियता के शिखर पर है। जब से फिल्मों में आवाज़ आई, फ़िल्मी गीतों ने अपनी एक अलग ही पहचान बना ली और लोकप्रियता के प्रतिमानों को लांघकर ये फ़िल्मी गीत आज हमारी सोच समझ और विचार में भी घर कर चुके हैं, हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुके हैं।

इन गीतों को समाज साहित्यिक कविता-सा गंभीर भले ही न माने लेकिन ये गीत भी समाज के दर्पण है और समाज की धड़कन है जिसे हर पल गुनगुनाया जाता है। विदेशों तक में भी भारतीय रेस्तरां आदि में इन गीतों का अपना महत्व और लोकप्रियता है। लेकिन लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हमारा बॉलीवुड और उसके गीत शिवशम्भू के ‘बुलबुल’पालने के शौक से आगे नहीं बढ़ता, तो हो सकता है कई लोग मेरी इस धारणा से इत्तेफाक़ न रखें। लेकिन बॉलीवुड के इस बुलबुल-ए-राष्ट्रवाद की तुलना मुझे शिवशम्भू की उस कल्पना से जोड़ती है जिसमें वे पूरे संसार को बुलबुलमय पाते हैं।

हमारी फिल्मों में हर भावना या कहें जीवन के हर रस से जुड़े गीत मिल जाएँगे। देशभक्ति या राष्ट्रभक्ति गीत भी हमें सिनेमा के प्रारम्भिक काल से ही मिल जाते हैं जिन्हें हम राष्ट्रीय पर्वों पर पूरे जोश और उत्साह से गाते गुनगुनाते हैं। ये गीत हमारी राष्ट्रभावना को कुछ पल के लिए ही सही उत्तेजना से भर जाते हैं, सिर्फ ‘उत्तेजना भर’ यानी ये हमारी राष्ट्रभावना के संचारी भावों को साबुन के बुलबुलों के समान बिखरा देते हैं,जब सफेद स्वच्छ झाग समतल हो जाते हैं तो सब रफूचक्कर!

शिवशम्भु हो या हमारा बॉलीवुड का दर्शक दोनों एक ही से खुमार में रहते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर हमारी राष्ट्रभक्ति के जज्बातों को वाणी देने वाले गीत हमें कुछ क्षणों के लिए ही सही सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त बना देते हैं, हमें प्रतीत होता है सारा संसार देश के लिए बलिदान देने को अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर है, घर-बाहर, रेल,बसों में मैदानों,स्कूल,कॉलेजों में हमारा बालसुलभ मन कुछ देर उन भावनाओं से आनंदित होता है मनोरंजन करता है पर फिर अचानक स्वपन टूटता है,जैसे बुलबुलें कभी शिवशम्भू के हाथों पर, कंधें पर, बहुत पास में आकर पंख फड़फड़ा कर रिझा रहीं थी अचानक फ़ाख्ता हो गई।

ये राष्ट्र-भक्ति का मनोराज्य भी समाप्त हो जाता है जैसे ही ख्याल आता है कि मेरा घर-बार है ज़िम्मेदारियाँ हैं और वह कोई सैनिक नहीं अदना-सा आम इंसान है जो रोजी–रोटी से आगे सोच नहीं पाता, राष्ट्रभक्ति का सुख-स्वप्न भंग हुआ और वह कुलबुलाकर मनोरंजन से सीधे यथार्थ के धरातल पर आ गिरता है। सम्भवत: इसलिए ही फ़िल्मी गीतों को साहित्य की कोटि में अभी तक शामिल न किया गया, जिसे भावाभास या रसाभास तक मानना चाहिए। जब तक यह राष्ट्रभक्ति फ़िल्मी गीत ‘मनोरंजन-ए-बुलबुलें’ बने रहे तब तक ठीक था लेकिन अब इन बुलबुलों को ‘वाद’ में कैद किया जा रहा है और वाद हमेशा विवाद उत्पन्न करते हैं।

मैं मानती हूँ कि फ़िल्मी गीतों की यह राष्ट्रभक्ति भावना शिवशम्भु की कल्पना में आने वाली उस बुलबुल पंछी जितनी भी कोमल तो नहीं है, काफी दृढ़ है। सिनेमा ने राष्ट्रवाद को न केवल अपनी आवाज़ दी अपितु नित नया रूप-स्वरुप प्रदान किया है,चाहे स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष की गाथा हो अथवा पाकिस्तान-चीन से युद्ध का समय हो अथवा आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ़ उपजा राष्ट्रवाद। अपनी राष्ट्रभावना को फिल्मी गीतों के माध्यम से ही हम गुनगुनाते हैं, महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्कूल कॉलेजों में बजने वाले राष्ट्रभक्ति गीत हिंदी फिल्मों से ही होते हैं, रेडियो टेलीविजन में आज़ादी का उत्सव इनके बिना अधूरा और बेमानी सा है।

हमारे ये गीत सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता की गुहार लगाते हैं जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,एक ही सुर-ताल में गाते गुनगुनाते हैं- तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। (धूल का फूल-1959) स्वतंत्रता से पूर्व सिनेमा में चित्रित राष्ट्रवाद एक ओर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को दर्शाता है “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो ए दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है” (किस्मत-1943) तो समाज उद्धार में भी अपनी भूमिका निर्धारित करना चाहता है (अछूत कन्या 1936), यह वह समयकाल है जब गांधीजी स्वतंत्रता संग्राम के केन्द्रीय परिदृश्य में आते हैं उनके विचार हमको इन फिल्मों में राष्ट्र की संकल्पना के साथ ही जोड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं जिसमें कि राजनीतिक स्वतंत्रता के समानांतर सामाजिक समानता, स्त्री-पुरुष समानता को कथानक से जोड़ता है तो और दूसरी ओर नये भारत की नई तस्वीर की कल्पना करता है, साझा संस्कृति की विरासत, धर्मनिरपेक्षता पारस्परिक सद्भावना और सौहार्द की भावना को मुखरित करता रहा है। “छोड़ो कल की बाते कल की बात पुरानी… नया खून है नई उमंगे और है नई जवानी हम हिन्दुस्तानी” (हिन्दुस्तान हमारा है 1961)

इसके साथ ही अपने देश का गौरव गान भी करता है “हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा रहती है होंठों पे सच्चाई रहती है जहाँ दिल में सफाई रहती है… जो चीज से मिला सीखा हमने गैरों को भी अपनाया हमने मतलब के लिए अंधे होकर रोटी को नहीं पूजा हमने। (जिस देश में गंगा बहती है 1961) “मेरा जूता है जापानी यह पतलून इंगलिस्तानी सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” (श्री420-1955) ”जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा जहाँ हर बालक मोहन है और राधा इक इक बाला (सिकंदर-ए-आजम 1965) और यही भारत देश विदेशों में आई लव माय लव इंडिया में बदल गया “लंदन देखा पेरिस देखा और देखा जापान माइकल देखा एल्विस देखा सब देखा आई लव माय इंडिया” (परदेस 1997) “विश्व में भारत का गुणगान करता है “है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहाँ के गाता हूं” (पूरब और पश्चिम 1970)

इस नव निर्माण भारत में बच्चो की भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका को बताने की भरपूर कोशिश रही “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है बलिदान की” (जागृति 1954) “नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं… शांति की नगरी है मेरा यह वतन, सबको सिखाऊंगा प्यार का चलन दुनिया में गिरने ना दूंगा कहीं बम” (सन ऑफ़ इंडिया 1954) इंसाफ की डगर पर बच्चों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के (गंगा जमुना 1961) नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है, मुट्ठी में है तकदीर हमारी (बूट पॉलिश) “दे दी हमें आजादी बिना खडक बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़ा मजदूर चल पड़ा था और किसान चल पड़ा हिंदू मुसलमान सिख पठान चल पड़ा।

“(जागृति 1954) लेकिन यही बच्चे मानों अपने चाचा नेहरु से प्रश्न करते भी नज़र आते हैं” हमने सुना था एक है भारत सब मुल्कों से नेक है भारत, लेकिन जब नजदीक से देखा, सोच-समझकर ठीक से देखा, हमने नक़्शे और ही पाए, बदले हुए सब तौर ही पाएं, एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है, आपने हमको जो है पढ़ाया वह तो कहीं भी नजर आया…” (दीदी फिल्म) तो प्यासा फिल्म में भी साहिर कुछ इसी प्रकार का प्रश्न करते हैं “जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ है” लेकिन वास्तव में देश के प्रति प्रेम का ही उद्गार और चिंता नज़र आती है इनमें। इन्ही के बीच भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने शहीद से लेकर पूरब और पश्चिम, उपकार, क्रांति रोटी कपडा और मकान आदि फिल्मों में महेंद्र कपूर को देशभक्ति गायक का तमगा पहनाया जो अंत तक बना रहा।

1962 भारत–चीन युद्ध सीमा विवाद पर भारत की हार ने पूरे देश को निराश कर दिया और जब इस पर हकीकत फिल्म आई तो बॉलीवुड की राष्ट्रभक्ति में गाढ़ा खून शामिल हो गया जिसका रंग देख सबका ह्रदय मर मिटने व मारने की ऊर्जा से भर उठा। “कर चलें हम फ़िदा जानों तन साथियों अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों” (हकीकत 1964) राष्ट्रभक्ति देश सीमा लांघने वाले का सिर काट भी सकते है सिर कटवा भी सकती है “अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं” (लीडर 1964) देश भक्ति इस भावना को अगर किसी गीत ने आज तक हमारे भीतर की आँच को जलाए रखा है तो वो है लता मंगेश्कर जी द्वारा गया गीत “ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आँख में भर लो पानी…जब अंत समय आया तो कह गए कि अब मरते है,खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफर करते हैं” इस गीत ने राष्ट्रभक्ति की लोकप्रियता के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए और आज भी ऐसा कोई गीत नजर नहीं आता। युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में यह गीत सैनिकों को अमर कर गया।

साठ के दशक से पूर्व तक सिनेमाई राष्ट्रवाद की संकल्पना न केवल राजनैतिक, संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक था बल्कि देश की आतंरिक व्यवस्था पर भी आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखता था, हकीकत 1964 फिल्म ने पड़ोसी देशों के धोखे से आहत राष्ट्रवाद की भूमिका तैयार की, जिसमें युद्ध अनिवार्य हो गया इसके अलावा विकल्प भी क्या था? 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद ये विचार और पुख्ता हो गये। और देश के भीतरी सामाजिक मुद्दे जिसमें सामाजिक छुआछूत, गरीबी, भुखमरी, धार्मिक-सांप्रदायिकता (‘धरतीपुत्र’ 1961), भ्रष्टाचार, जैसे विषय अब राष्ट्रप्रेम से बेदखल-से हो गए, हाशिये पर चले गये।

पहले का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिसमें समाज के हर उस निचले से निचले तबके के विकास की भी बात होती थी तो सांझा संस्कृति की भी, जो राष्ट्रीय उत्सवों में पूरे जोश के साथ मिलजुलकर मनाया जाता है पर अलग-अलग समय में राष्ट्रवाद की अवधारणा संकल्पना बनती है अब राष्ट्रभक्ति यानी सरहदों की सुरक्षा हेतु सिर पर कफ़न बाँधना। “ऐ वतन ऐ वतन, हमको तेरी कसम तेरी राह में जां तक लुटा जायेंगे…सर पर बंधे कफ़न हम तो हँसते हुए, मौत को भी गले से लगा जायेंगे” (शहीद फिल्म 1965) “ताकत वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है (प्रेम पुजारी 1970)।

पिछले कुछ वर्षों से जिस राष्ट्रवाद का बोलबाला है वह राजनीति से प्रेरित है अथवा राजनीति सिनेमा का लाभ उठा रही है वैसे ये तथ्य भी झुठलाया नहीं जा सकता कि फिल्में और गीत लोकप्रिय होकर व्यापारिक लाभ के लिए बनाए जाते है निर्माता कोई सरहद पर खड़े सैनिक नहीं हैं।

वर्तमान राष्ट्रवादी गीत उत्तेजनापूर्ण उग्र भावना को आंदोलित करते हैं, सैनिक के प्रति सहानुभूति है लेकिन तब जब वो शहीद हो जाएगा “ऐ वतन ऐ वतन आबाद रहे तू, या …तेरी मिटटी में मिल जाँवा गुल बनके खिल जाँवा…” अनिवार्यत: युद्धोंन्मत ये गीत हम सभी को मोहित करते हैं ललकारते है, पुकारते हैं लेकिन समस्या तब आती है जब ये किसी खास विचारधारा की स्थापना कर किसी दूसरी खास जाति धर्म की विचारधारा को खारिज करना चाहते हैं, देश के वास्तविक प्रश्नों को दरकिनार कर यह राष्ट्रवाद उन्माद या प्रमाद में भारतीय संस्कृति के ताने बाने में गुँथी साझा संस्कृति की उधेड़-बुन में लगा है।

1962 में जो शहीद कह गये कि कह गए “सर हमारे कटे तो कुछ गम नहीं…तुम सजाते ही रहना नये काफ़िले, खींच दो अपने खून से जमी पर लकीर, इस तरफ़ आने पाए न रावण कोई”। उसे आज नए सिरे से गीतों में भुनाया जा रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी फिल्म उरी का गीत, मैं लड़ जाना, है लहू में इक चिंगारी जिद से जुनूं तक है जाना, हर क़तर बोल रहा ..मैं लड़ जाना ..” परमाणु फिल्म का गीत, “जोश में जला, ज़लज़ला चला, अब रुकेंगे न हम दर मिटा चला सर उठा चला अब झुकेंगे न हम” गीतों सिलसिला थमने वाला नहीं है, बालक शिवशम्भू की तरह हम उत्साहित होते रहेंगे गीत गाते रहेंगे आनंदोत्सव मनाते रहेंगे

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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