एतिहासिक

असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जाएँगे

 

जेपी की जो रचनाएँ शुरुआती दौर में पढ़ी उससे एक बात दिमाग में घुस गयी थी कि क्रान्ति का गहरा असर पड़ता ही पड़ता है। कोई क्रान्ति ऐसी नहीं होती जिसका कोई असर ना हो। और कोई भी क्रान्ति ऐसी नहीं होती जिसका बिल्कुल ही वैसा हो और तब हो जब और जैसा क्रान्ति के वाहक चाहते हों। हर क्षेत्र में तत्काल पड़े, बिल्कुल जैसा चाहें वैसा पड़े, यह जरूरी नहीं। प्रिय कवि दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल की चन्द लाइनें याद आ रही हैं जो उसी दौर में लिखी गयी थीं:

“हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौन्दे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जाएँगे

हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीड़ा में दहते हैं
अब जो धाराएँ पकड़ेंगे इसी मुहाने आएँगे’’

हम समाज बदलने के लिए या बनाने के लिए जो कुछ भी करते हैं, उसका असर पड़ता है: व्यक्ति पर, समाज पर, सरकार पर और व्यवस्था पर भी। उन्होंने कहा था कि यह आन्दोलन सिर्फ 10-12 माँगों की पूर्ति का आन्दोलन नहीं है, यह समाज परिवर्तन का आन्दोलन है, समाज के पुनर्गठन का मुहीम है। गाँधीजी ने भी आजादी के राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कहा था आजादी का मतलब अँग्रेजी हुकूमत से आजादी नहीं, समाज के ज़ुल्मों से भी आजादी है। यह सही मायने में सामाजिक पुनर्गठन का आन्दोलन है जिसमें ज़ुल्म और ज़्यादतियाँ ना हों, गैर बराबरी ना हो, हिंसा और नफरत ना हो। अँग्रेजी हुकूमत खत्म हो तो हम बाकी के मोर्चे सम्हालेंगे।

पाँच जून 1974 को पटना के गाँधी मैदान में सहज ही उनके मुँह से सम्पूर्ण क्रान्ति शब्द निकल पड़ा था। उन्होंने बताया था कि पहले से सोचा समझा नहीं था, समाज की ज़रूरत से सहज ही निकाल पड़ा था। इसके उद्देश्य दूरगामी हैं। भारतीय लोकतन्त्र को वास्तविक बनने, सुदृढ़ करने, जनता का सच्चा राज्य कायम करने और अन्ततोगत्वा एक नया बिहार और नया भारत बनाने का यह आन्दोलन है। व्यक्ति बदले और समाज भी, दोनों का विकास हो। इसलिए सम्पूर्ण क्रान्ति कहा है। आप चाहें तो इसे सप्त क्रान्ति भी कह सकते हैं। विस्तार में जाएँगे तो यह कुछ कुछ डॉ लोहिया के सप्त क्रान्ति जैसा ही है।

अपनी कारावास कथा यानी जेल डायरी में उन्होंने लिखा था ग्राम स्वराज से अहिंसक क्रान्ति होने वाली नहीं। तो मैं दूसरे रास्ते तलाश करने लगा। मार्क्सवाद समाजवाद और गाँधीवाद के विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए वे सम्पूर्ण क्रान्ति के व्यावहारिक दर्शन तक पहुँचते हैं जो जीवन के हर पहलू को समेटता है। क्रान्ति का मतलब सिर्फ सत्ता का बदलाव नहीं। ये हम खूब अच्छी तरह समझ भी गये। लेकिन यह बात नहीं समझे कि क्रान्ति का मतलब जीवन मूल्य और सृजनात्मक परिवर्तन का समावेश हो। हम संघर्षों को जीवन में उतारने की कोशिश करते रहे। जेपी के गुजर जाने के कुछ सालों तक हमारे उपर सम्पूर्ण क्रान्ति का असर अच्छा खासा रहा। हम स्वाध्याय करते रहे। सोचते समझते रहे। विमर्श करते रहे। लड़ते रहे। बढ़ते रहे। हार-जीत, सफलता-असफलता के पीटे-पिटाए खाँचे से बाहर निकाल कर अपना ही आकलन करते रहे। कभी जुड़े, कभी टूटे, कभी बिखरे भी। लेकिन बैठे नहीं। चलते रहे। जेपी ने ही तो कहा था सम्पूर्ण क्रान्ति एक सतत प्रक्रिया है, जो कभी पूरी नहीं होगी, लेकिन कभी रुकेगी भी नहीं। सार्थक दिशा में निरन्तरता ही इसकी सफलता है। और, शायद इसीलिए हमें आज भी, जब समाज का चक्का उल्टा घूमता हुआ तानाशाही के लाल निशान से उपर जाकर हिटलरशाही के खतरे के निशान तक पहुँच चुका है; हमारा विश्वास बना हुआ है। हम बेहतरी के लिए जूझ रहे हैं। हारे नहीं हैं।

व्यवस्था परिवर्तन की वैचारिकी

सम्पूर्ण क्रान्ति की निरन्तरता का अहसास उस आन्दोलन के गर्भ से निकले अन्य आन्दोलनों में महसूस किया जा सकता है। इस सिलसिले में सबसे पहले बोधगया आन्दोलन याद आता है। शायद इसलिए भी कि इसमें शुरुआती दौर से भूमिका मैंने भी ली थी। अगर पूरी तरह संघर्ष के मन्त्र को अमल में नहीं ला सके तब भी इतना तो सच है ही कि नेतृत्व में दलितों, किसानों, महिलाओं की अग्रणी भूमिका रही। आन्दोलन शान्तिमय रहा। “हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा” पर हमने अपने ही यकीन से आगे जाकर अमल किया। दुनिया की निगाहें भी इस आन्दोलन पर लगातार रहीं। दुनिया के कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में इस आन्दोलन को शामिल किया गया। बीसियों विद्यार्थियों ने इस आन्दोलन का अध्ययन करके अपनी पी-एच डी थीसिस लिखी। आज भी कैलिफोर्निया के दो छात्र इस पर अध्ययन के लिए मुझसे जुड़े हुए हैं। जब छात्रों के सवाल आते हैं तो मुझे ताज्जुब होता है कि नौजवानों द्वारा एक छोटे से पॉकेट में चलाया गया आन्दोलन वक्त और भूगोल के दायरों को पीछे छोड़ अपनी व्यापक छाप छोड़ गया है!

शिक्षा भी एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था/है सम्पूर्ण क्रान्ति का। शिक्षा स्वास्थ्य के सवाल पर हस्तक्षेप तो खूब रहा। लेकिन ये क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ आम जन बहुत असहाय हो जाता है? बड़ी पूँजी और सरकारों का दबदबा बहुत ही ज़्यादा बढ़ता चला गया। फिर भी इस क्षेत्र में कई क्रान्तिकारी प्रयोग हुए। लेकिन प्रयोग तक ही रह गये। क्रान्ति नहीं हो पायी। याद करने की कोशिश करूँ तो सबसे पहले शंकर गुहा नियोगी की अगुआई में चलने वाला छत्तीसगढ़ मुक्ति आन्दोलन याद आता है। संघर्ष और सृजन का नायाब नमूना। भले ही शंकर गुहा नियोगी सीधे सीधे जेपी आन्दोलन की ऊपज ना हों, लेकिन उसके प्रभाव क्षेत्र से अछूता भी नहीं है। एक ही साथ जाति और पूँजी के दबदबे के खिलाफ मजदूरों की एकजुटता, शान्तिमय रास्ते, छोटे छोटे स्कूल और इसके बीच निर्माण का अद्भुत नमूना पेश करता शहीद अस्पताल। मजदूरों द्वारा अपनी कमाई और कौशल से डेढ़ सौ बिस्तरों वाला अस्पताल बना लेना, चला लेना, चलते ही जाना और विस्तार भी करते जाना अपने आप में एक अद्भुत आन्दोलन रहा जो आज भी जारी है। भीमा कोरे गाँव सिलसिले में बेवजह 6 माह जेल गुजारने के बाद सुद्धा भारद्वाज ने बातचीत में बताया कि शाहीद अस्पताल ने उन्हें समाज काम करने और उसके लिए छतीसगढ़ को चुनने के लिए प्रेरित किया। मुझे इन गतिविधियों में सम्पूर्ण क्रान्ति की छाया नजर आती है। महाराष्ट्र में भी राष्ट्र सेवा दल और समाजवादी आन्दोलन के कई साथियों ने संघर्ष और रचना को एक साथ लेकर चलाने की कोशिश की। शिक्षण संस्थान और सहकारी बैंक भी चला रहे हैं। जेपी ने इसीलिए कहा था सम्पूर्ण क्रान्ति को सप्त क्रान्ति से समझिए।

हमारे सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन का केन्द्रीय लोकतन्त्र के उलटे पिरामिड को सीधा करना था। लेकिन हमने ना उतनी कोशिश की, ना ही कुछ ऐसा कर सके जो उल्लेखनीय हो। हमारा लोकतन्त्र सचमुच में लोकतन्त्र हो, कैसे हो यह 1974 आन्दोलन या बाद में सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन में कोई पहली बार चिन्ता का विषय नहीं बना था। आजादी की लड़ाई के आन्दोलन में भी यह चिन्ता जाहिर होती रही है। गाँधी जी ने संसदीय राजनीति के इस मोडेल में संसद को खरीद बिक्री का केन्द्र कहा था। उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि संसद को समाज पर हावी नहीं होने देना चाहिए। संसद के पास सिर्फ सीमा और सीमा सुरक्षा से जुड़े मसले, विदेश नीति, मुद्रा और आपात स्थति से जुड़े मसले होने चाहिए। बाकी तमाम मसले ग्राम सभा का विषय होने चाहिए। “लोक सभा ना राज्य सभा: सबसे ऊँची ग्राम सभा”।

आपातकाल की घोषणा

संसद और सरकार का कद और ताकत इतनी बढ़ गयी है कि वह जनता को जनता रहने ही नहीं दे रही। सिर्फ मतदाता बनाकर छोड़ रखा है। जनता जब कभी जनता बनने की कोशिश करती है, सत्ता में हस्तक्षेप की कोशिश करती है, नियन्त्रण की कोशिश करती है तो उसे देशद्रोह का नाम देकर कुचल दिया जा रहा है। न्याय माँगना भी देशद्रोह और सरकारी कामकाज में रोड़ा अटकना माना जाने लगा है। चाहे बलात्कारी सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती हुई आन्दोलनरत पहलवान लड़कियाँ हों या हाथरस में हुए ज़ुल्म को कवर करने जा रहा वह मलयाली पत्रकार कप्पन, हो या शान्ति की अपील करता हुआ उमर खालिद (अभी भी यूएपीए में बन्द) हो, सब के सब यातना के दौर से गुजर रहे हैं।

सिर्फ ज़ुल्मों के खिलाफ बोलना ही नहीं, अपने लिए कुछ बना लेना, अपनी जमीन अपना मकान बचा लेने की गुहार लगाना भी ज़ुल्म ही नहीं, राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आ गया है। राष्ट्रभक्ति का यह नशा मनुष्यता का हत्यारा बन कर आम जन के जीवन के खिलाफ खड़ा हो गया है। जो तब समाज बदलने निकले थे, तानाशाही के खिलाफ खड़े थे वही आज भी हिटलरशाही के खलाफ़ लड़ रहे हैं। तब जो इन्दिरा जी की तानाशाही में अवसर ढूंढकर आज तानाशाह बने बैठे हैं उन्हीं के विरुद्ध संविधान बचाने की लड़ाई वही जनता लड़ रही है जो कल लड़ी थी। इतना ही नहीं, आज संविधान और जनता को बचाने की इस लड़ाई में आज के नौजवान भी शामिल है, यही निरन्तरता सम्पूर्ण क्रान्ति है।

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मणिमाला

लेखिका गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पूर्व निदेशक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। manimala.gsds@gmail.com +919868261159
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