देश

कौन निर्मूल करे जहरीला पेड़ – नूर ज़हीर

 

  • नूर ज़हीर

 

इलेकशन के परिणाम आ गए हैं; देश ने भारी बहुमत से भाजपा को पाँच साल के लिए चुन लिया है| कहा तो ये भी जा रहा है कि इस जीत के पीछे न उनकी आर्थिक नीतियाँ हैं, न विकास, न प्रधान मन्त्री की अनगिनत विदेश यात्रा और न ही संघियों की जन सभाओं को अपने बस मे कर लेने वाली सम्मोहन शक्ति! तथ्य तो यह भी है कि अन्य कारणों के साथ मुसलमानों के लिए घृणा और पाकिस्तान का भय वे दो मूल कारण हैं जिन्होंने हिन्दुत्व वादी ताकतों को जिताया है ।

जब यही सत्य है कि मुसलमान इस देश मे बिलकुल अलग थलग पड़ गये हैं तो रुक कर के एक जायज़ा लेने की ज़रूरत है कि कब और कैसे ऐसे हालात पैदा हुए या किए गए कि मुसलमान फटे दूध से पानी कि तरह निथर कर अलग हो गये। क्योंकि अगर ज़रा पीछे नज़र डालें तो हम पाते हैं कि केन्द्र मन्त्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, रफी अहमद किदवाई, हुमायूँ कबीर, नुरुल हसन से लेकर अब्दुल गफ़ूर, मुख्य मन्त्री बिहार, मोहम्मद कोया, मुख्य मन्त्री केरल, एम॰फारूक, मुख्यमन्त्री पॉण्डिचेरी, बरकतुल्लाह खान, मुख्य मन्त्री राजस्थान और अब्दुल रहमान अंतुले, मुख्य मन्त्री महाराष्ट्र हुए हैं। फिर क्या कारण है कि अब रविश कुमार भी ये कहने पर मजबूर होते हैं कि, मुसलमानों को चुप रहना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा की गई आलोचना ही भाजपा का मूल अस्त्र बनती है, हिन्दूओं को डराने मेँ, कि मुसलमान उनके विरुध हैं। इतने पर रविश चुप नहीं होते और कहते हैं कि आखिर आपको कश्मीर के अलावा तो कहीं का मुख्यमन्त्री बनना नहीं है ।

उनके इस तर्क से दो बातें सामने आतीं हैं, मुख्यमन्त्री हमेशा बहुसंख्यक समुदाय का ही हो सकता है, और मुसलमान चुप रहे चाहे इस देश कि जितनी भी क्षति क्यों न होती रहे। सवाल उठता है कि लोकतन्त्र मे क्यों जाति, धर्म, समुदाय मुख्यमन्त्री तय करे? याद कीजिये जब सिक्किम भारत मे शामिल हुआ था तब एक शर्त उन्होने यह भी रखी थी कि मुख्यमन्त्री सदा सिक्किम का मूल निवासी ही होगा। इसपर लम्बी बहस चली थी; एक तर्क यह था कि यदि भारत के किसी और इलाक़े का कोई व्यक्ति जाकर सिक्किम मेँ काम करे, उस क्षेत्र को अपना समझे, वहाँ रच बस जाये तो भी उसकी तीसरी चौथी पीढ़ी क्यों वहाँ की शुभचिन्तक नहीं होगी और इस नाते क्यों उसे राज्य का कार्य भार नहीं सौंपा जाना चाहिए?

दूसरे यह बात कि इस देश के जिम्मेदार नागरिक होते हुए भी मुसलमान क्यों देश को बरबाद होते देखें और चुप रहें? क्यों मार खाए और खामोश रहे? क्यों उनसे नफरत की जाये और वे अपना राष्ट्रवाद प्रमाणित करने पर मजबूर रहें? अगर रविश कुमार इस तरह की बात कह रहे हैं तो वे उसी जुमलेबाजी का शिकार हो रहे हैं जिसका जाप संघ परिवार निरंतर करता है। यह तो बिना कहे ही मुसलमान को दूसरे दर्जे कि नागरिकता खुद ही स्वीकार कर लेने पर मजबूर करना हुआ ।

लेकिन इस जुमलेबाजी और उससे उत्पन्न होने वाले हालात के लिए क्या केवल संघ परिवार ही जिम्मेदार है? क्या ये उनके ही दिमाग़ कि उपज है? थोड़ा सत्तर के दशक मे लौटिए। संजय गाँधी का बोल बाला है और भारत को गुंडा राज का नया नया स्वाद मिल रहा है। इस गुंडागर्दी को कामयाबी से चलाने के लिए संजय गाँधी का दायाँ हाथ हैं लाल कुआँ (पुरानी दिल्ली) के मुसलमान गुंडे। फिर अचानक, जगमोहन के कहने पर संजय गाँधी तुर्कमान गेट के आस पास की बस्ती पर बुलडोजर चलवाने का फैसला लेते हैं । लाल कुआँ के गुंडे उनके इस फैसले का विरोध करते हैं; ज़्यादातर के अज़ीज़ रिश्तेदार तुर्कमान गेट पर रहते हैं या छोटा मोटा धंधा करते हैं। दबाव मेँ  आकर खिचरिपुर मे इन उजड़ने वाले लोगों को बसाने का फैसला होता है, जहां न पानी, न बिजली न रोजगार। मुसलमान विरोध करते हैं, बुलडोजर के सामने खड़े हो जाते हैं, पुलिस गोली चलाती है, चार लोग मारे जाते हैं। संजय गाँधी बयान देते हैं, “मुसलमानों का भरोसा नहीं किया जा सकता” अखबार सुर्खियों मेँ ये बयान छापते हैं। खैर, शायद इन्दिरा गाँधी के समझाने पर वो बयान के लिए माफी मांगते हैं लेकिन छूटा तीर वापस नहीं होता; युवा नेता मुसलमानों पर विश्वास नहीं करता यह बात आम जनता के दिलों मे घर कर जाती है।

फिर आता है राजीव गाँधी का दौर, जो थे तो पायलट लेकिन करने लगे राजनीति। जो पहली बड़ी समस्या आई वह थी ‘शाह बानो केस’। सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाह बानो के हक़ मे जा रहा है लेकिन क्योंकि मुसलमान मर्दों को इससे मुश्किल है, इसलिए युवा प्रधान मन्त्री हड़बड़ी मे फैसले को बदलने की साजिश मे मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड का गठन करते हैं। जो फैसला मुसलमान औरतों के जीवन की दिशा बदल सकता था उसे उलट कर राजीव गाँधी साबित कर देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को लोक सभा की बहुमत चुनौती दे सकती है। इस मामले मे वह किसी मुसलमान, गैरधार्मिक स्कॉलर, से परामर्श नहीं करते, जबकि प्रो॰नुरुल हसन, प्रो॰इरफान हबीब, मोहसिना किदवाई सामने मौजूद थे।

जब हिन्दुत्ववादी देखते हैं कि छीन झपट से मुसलमानों ने अपनी बात मनवा ली और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी नकारा गया, तब वे बाबरी मस्जिद के दरवाजे खोले जाने और राम मंदिर का आँदोलन शुरू करते हैं। ये मामला भी सबज्युडिस था और इसे भी राजीव गाँधी लोकसभा के बहुमत के बल पर बदल देते हैं। यानि लोक सभा मेँ बहुमत, जल्दी जल्दी देश के अहम फैसले निबटाने के लिए के लिए नहीं, स्थापित संस्थाओं को किनारे करने के लिए, अपनी मनमानी मे इस्तेमाल करना शुरू हो जाता है। वैसे इन्दिरा गाँधी भी ऐसा कर चुकी थी जब हाइकोर्ट ने उनके खिलाफ फैसला दिया था।

इसलिए जो पेड़ आज लहलहाता हुआ संघ परिवार को अपने फल और छांव दोनों से सराबोर कर रहा है उसका बीज संघियों और काँग्रेस दोनों ने मिलकर बोया था। हाँ, उसकी देखभाल, सिचाई, छटाई, खाद वगैरह चाहे संघियों ने ज़्यादा की हो लेकिन उसकी मौजूदगी के लिए जिम्मेदार तो नर्म और सख्त हिन्दुत्व दोनों ही हैं; एक को काँग्रेस अपनाती है तो दूसरे को भाजपा|

बर्तोल्ट ब्रेक्त की एक कविता है उनके नामी नाटक ‘एक्सेप्शन एण्ड दी रूल’ मेँ, जिसकी दो पंक्तियाँ यूं हैं:

जिसे बोलकर शासक रोपे

पावनता का पेड़ घना

वो सचमुच हैं बीज जहर के,

आतंक काल फैलाये तना

अब देखना यह है इस जहरीले पेड़ को निर्मूल करने की नीयत किस विचारधारा मेँ जन्म लेती है और कौन इसे जड़ से खतम कर पाता है!

लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी हैं|

सम्पर्क- +919811772361, noorzaheer4@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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