सिनेमा

तीन लड़की, तीन रुपये और तीन पुलिसवाले – संदीप वसंत नाईक

 

  • संदीप वसंत नाईक

 

तीन लड़कियों की कहानी 3 रुपयों  से शुरू होती है और तीन पुलिसवालों की इर्द-गिर्द घूमती है, भारतीय संविधान की तीन मूल बातें – समानता,  स्वतन्त्रता और भ्रातृत्व जैसे तत्वों से भरा भारतीय संविधान आज भी देश के 98% लोगों को मालूम नहीं है, असल में संविधान अपने आप में इतना पेचीदा है कि उसे समझना उसकी क्लिष्ट भाषा को अर्थ सहित पचा पाना और उसका इंटरप्रिटेशन कर पाना इस देश के सिर्फ 2% लोगों के ही बस में है – इसमें 1% कानून वाले हैं और दूसरा 1% पुलिस वाले हैं जो इसका दुरुपयोग करते हैं शेष 98% लोग इस किताब के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं और एक तरह के संजाल में फंसे रहते हैं और लोकतन्त्र में अशोक चक्र का पहिया उनकी लाश न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के चारो ओर ढोता रहता है – जिसे हम “हम सम्प्रभु लोगों का संविधान” कहकर सबसे पवित्र मान बैठे है

यह संविधान इन 2 प्रतिशत लोगों के बाप का माल बनकर रह गया है जिसे यह जब चाहे अपने पक्ष में करके सारे फैसले न्याय के नाम पर सुना देते हैं और शेष 98% लोग अपनी लाश को अपने सलीब पर ढोते हुए न्याय के मंदिरों, वैधानिक संस्थाओं के आसपास चक्कर लगाते रहते हैं – एक है पुलिस, एक है जाति व्यवस्था,  एक ही राजनीति और एक है धर्म – देश का पूरा समाज और पूरा तन्त्र इस चतुर्भुज पर टिका है और आम लोग संविधान में प्रदत समता, स्वतन्त्रता और भ्रातृत्व के त्रिभुज में फंसकर न्याय नामक चौथा कोण ढूंढते रहते हैं|

इसी संविधान का आर्टिकल 15 सिर्फ आर्टिकल नहीं, बल्कि इस देश के लोगों को बाबा साहब अंबेडकर द्वारा दिया गया एक बड़ा हथियार है परन्तु ना लोग इसे आज तक समझ पाए ना राज्य नामक व्यवस्था उन्हें किसी भी प्रकार की शक्तियां हस्तांतरित करने को तैयार है,  आर्टिकल में लिखा है राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा – परन्तु सीबीआई अफसर हो ब्रह्मदत्त जैसा पुलिस अधिकारी या कोई दलित नेता जो एक महंत के कंधों का सहारा लेकर अपनी ही जाति के लोगों को मरवाने का षडयंत्र कर रहा है,  ठेकेदारों के साथ इन तीनों का गठजोड़ इतना स्ट्रांग है कि तीन लड़कियां मात्र 3 रुपये की मजदूरी बढ़ाने के लिए अपहृत कर ली जाती है और उनके साथ बुरी तरह से सामूहिक बलात्कार होता है, सौभाग्य से एक लड़की भाग निकलने में कामयाब होती है परन्तु अपनी किस्मत को रोते हुए ऐसे जंगल में जाकर धंस जाती है जहाँ 4 दिन से उसे खाने पीने के लिए कुछ नहीं मिल रहा, दो लड़कियां ना मात्र सामूहिक रूप से बलात्कृत की जाती है बल्कि उनकी जाति को और पूरे समुदाय को जो तथाकथित रूप से पिछड़ा है और नीची जाति का है, को सबक सिखाने के लिए पेड़ पर टांग दिया जाता है गोया की इस तरह से कोई भी आगे से मजदूरी बढ़ाने के लिए मांग नहीं करेगा|

देश की वास्तविक स्थिति इससे ज्यादा खराब है दलितों में तो आज जागरूकता इतनी है कि वह भले ही मार खा रहे हो,  मानव मल उठा रहे हो या सड़कों पर मेनहोल उठाकर अंदर के सीवेज से गन्द निकाल रहे हो परन्तु आदिवासी समाज तो बहुत ही ज्यादा पीछे है, पिछले दिनों मैंने एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था के लिए छोटा सा शोध का कार्य किया था जहाँ मैंने देखा कि कुक्षी मनावर के क्षेत्रों में प्रभावशाली समुदाय और जाति के लोग इन आदिवासियों के छोटे बच्चों से कपास तुड़वाने का काम करवाते हैं , लगभग 6000 बच्चे बंधुआ मजदूर है,  उनकी स्त्रियों का शोषण करते हैं और बदले में उन्हें 1 माह में 10 से 20 किलो अनाज देते हैं और घर के काम,  जानवरों का गोबर, कूड़ा – कचरा उठाना, साथ ही खेती के भी सारे काम लगभग निशुल्क करवाते हैं – साथ-साथ भी किशोरी लड़कियों का दैहिक शोषण कई प्रकार के लोग करते हैं ; मंडला, डिंडोरी से लेकर बालाघाट, अलीराजपुर, झाबुआ, छिंदवाड़ा में यदि आर्टिकल 15 के संदर्भ में बात की जाए तो लगता है कि हम अभी आदिम युग में जी रहे हैं – जहाँ ना कोई व्यवस्था है , ना तन्त्र, ना राजनीति और ना उनकी देखभाल करने वाला महिला ट्रैफिकिंग जबरजस्त है|

आर्टिकल 15 मूवी सीन

इस फिल्म में एक युवा अधिकारी है जो दिल्ली से एक विभागीय सचिव के साथ में झगड़ कर आया है और उसका ईमानदाराना कन्फेशन है कि उसे पनिशमेंट के तहत एक पिछड़े इलाके में भेजा गया जहाँ उसे अब बरसों से बजबजाते तन्त्र से जूझना है – इस तन्त्र में विधायक है, धर्म है, महंत है, भगवा- हरे-नीले-पीले झण्डे हैं, ब्राह्मणवाद हैं, दलितवाद है, यहाँ अंबेडकर, गाँधी और पूरी सत्ता है – दिल्ली का खौफ और मोबाइल के कनेक्शन जिनसे आजकल व्यवस्था चलती है, यह इतना बड़ा संजाल है कि देश का 70% वंचित तबका पूरी तरह से इसमें लगातार 72 वर्षों से फिसल रहा है; इस अफ़सर की बीवी है जो बेहद शालीन है और वह लगातार एक मोरल सपोर्ट के रूप में उस अफसर को नाममात्र काम करने के लिए प्रेरित करती है, बल्कि स्त्री होने के नाते सूझबूझ से दिशा दिखाने का काम करती है, फिल्म में दूसरी प्रेम कहानी गौरा और निषाद की है जो आमतौर पर आपको डकैत या नक्सलवादी प्रभावित इलाकों में देखने को मिल जाएगी – जहाँ प्रेमिका गांव में रहकर संघर्ष कर रही है और प्रेमी कहीं दूर बैठकर संगठित गिरोहों का सरगना है और सारे आंदोलन खुफिया तौर पर चलाता है ये दोनों समुदाय में अपेक्षाकृत पढ़े लिखे लोग हैं जो अपने अधिकारों को तो जानते हैं,  प्रक्रियाओं को भी जानते हैं परन्तु इनके बीच में फँसकर रह जाते हैं , इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है पर ज्यादा नहीं है , परन्तु यह संगठनों के झोल में उलझे रहते हैं और इनका अन्त निश्चित ही किसी एनअकाउंटर में होता है|

फिल्म में जाति को लेकर बहुत ज्यादा फोकस किया गया है क्योंकि जिस इलाके का पूरा वर्णन है जिस प्रान्त विशेष की बात की गयी है  बहुत ही वह बहुत ही प्रतीकात्मक रूप से उल्लेखनीय है, शुरुवात में ही अफ़सर का ड्राइवर कहता है यह तिराहा आकर्षक है – जिसका एक रास्ता लखनऊ जाता है, एक अयोध्या जाता है और एक कश्मीर जाता है पर जय भीम और धर्म की जय के नारों में रास्ते खो जाते है और तरक्की कही खड़ी अपनी किस्मत पर अफसोस कर रही है |

आर्टिकल 15 मूवी सीन

अन्त के दृश्य में जब पूरी व्यवस्थापिका अर्थात पुलिस जो तीसरी लड़की को ढूंढने का काम करती है – भयानक दलदल में है, कीचड़ में सनी है – तब वह युवा अधिकारी अपने मातहतों से पूछता है कि आपने किस को वोट दिया – 10वीं 12वीं पास या हद से हद ग्रेजुएट पुलिस वाले अपनी समझ के हिसाब से जवाब देते हैं कि पंजा, फूल, साइकिल, लालटेन या मोमबत्ती या बहुत कंफ्यूज हो गए थे और जो हंसी अन्त में पर्दे के साथ-साथ दर्शकों में फैलती है – वह घृणा ही नहीं, बल्कि वीभत्स रस का एक उदाहरण है जो हम सब के मुँह पर 70 साला कीचड़ का कालिख पोत कर जम जाता है एक झन्नाटेदार तमाचे की तरह

आर्टिकल 15 एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सवाल है – एक बड़ा सवाल जो व्यवस्था से है और जिसका खूबसूरत अन्त जरूर है परन्तु वह युवा अधिकारी जब सीबीआई के बुजुर्ग अधिकारी से कहता है कि “आप को हिन्दी से बहुत प्यार है जबकि हिन्दी आपकी पहली भाषा भी नहीं है और दिल्ली में यदि आप ना कह देंगे तो आपका खून हो जाएगा”  फिल्म तो यहीं खत्म हो गयी थी क्योंकि नायक जब सारे सबूत सीबीआई के अधिकारी को देकर कमरे से बाहर निकलता है परन्तु बाद में लड़की को ढूंढना और हैप्पी एँड करना तो दर्शकों को संतुष्ट करने जैसा है

वस्तुतः यह फिल्म भारतीय फिल्म समाज के इतिहास में एक तरह का मील का पत्थर तो नहीं परन्तु वास्तविक दृश्य और उन “लीचड़, गंदे और कलुषित लोगों के बीच में दृश्याई जाने से थोड़ी सी अलग लगी है,  थाने से लेकर पूरे शहर में हड़ताल के दौरान कचरा फेंकना एक तरह का रिबेलीयन व्यवहार है जो लेखक और निर्देशक पूरे स्वच्छता अभियान पर सवाल खड़ा करते हुए भारतीय जनता के पसीने से कमाए गए टैक्स को लेकर कर रहे हैं और साथ ही सीवेज साफ कर रहे एक व्यक्ति पर लगभग डेढ़ मिनट का फिल्माया गया दृश्य अंदर से झुनझुनी पैदा कर देता है कि कैसे कोई इतनी गन्दगी में उतर कर नाक-मुँह बन्द करके पूरे समाज का कचरा ऊपर ढोलता है और निषाद कहता है कि “बॉर्डर से ज्यादा तो सफाई कर्मचारियों की मृत्यु हर साल देश में हो जाती है परन्तु कहीं कोई हलचल नहीं होती” असल में फ़िल्म हमारे 70 – 71 साल के पूरे विकास में वंचित तबके, खास करके दलित और आधी आबादी के अस्मिता का प्रश्न उठाती है – यह प्रश्न और उनके आजीविका, गरिमा और सम्मान के साथ आर्टिकल 15 के आलोक में भारत जैसे विशाल देश में जीने के संदर्भ में है जहाँ मंदिर प्रवेश भी एक मुद्दा है,  पुलिस वालों का राजनीति, धर्म और ठेकेदारों के साथ घुल मिल जाना भी परन्तु आश्वस्ति सिर्फ इतनी है कि अभी भी अयान रंजन जैसे युवा अधिकारी और लाखों युवा हैं, हम इस समय विश्व के सबसे ज्यादा यानी 55% युवा भारत में रखते है और ये युवा चाहे तो जाति, संप्रदाय, धर्म, ध्वजायें और राजनीति के दायरे तोड़कर वास्तव में समाज बदलाव में एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं|

बड़े बेटे मोहित के साथ गौरव सोलंकी रुड़की से पढ़े हैं जब मैं आईआईटी जाता था तो चार सालों में कभी मिल नहीं पाया – संदेश और फोन पर बात हुई है परन्तु यही लगता है कि एक किशोर या एक युवा में कितनी संभावनाएँ होती है, कितना जोश और जुनून होता है कि वह बहुत थोड़े वर्षों में ही अपनी मेधा और मेहनत का इस्तेमाल करके सुव्यवस्थित तरीके एवं सूझबूझ के साथ अपना बेहतरीन दे सकता है, यद्यपि गौरव का अभी बेहतरीन आना बाकी है पर कहानियों के बाद एक नए माध्यम में डंके बजाते हुए खंबे गाड़ने की यह कहानी अप्रतिम है|

आयुष्मान खुराना और अनुभव सिन्हा

कम लागत और भौंडे प्रदर्शन ना करते हुए निर्देशक अनुभव ने बेहतर काम किया है, फिल्म में बदलाव का गीत भी है और बेटियों की विदाई का भी बस अफसोस इतना है की विदाई गीत पोस्टमार्टम की लाश को ढोते हुए गाया गया है और बाकी तो दृश्य संयोजन, प्रकाश, संवाद बहुत अच्छे हैं फिल्म का फ्लो अच्छा है, निर्देशन काफी सधा हुआ है;  गौरव के साथ अनुभव भी बधाई के पात्र हैं और सारे कलाकार भी – एक बात मैं यह कहना चाहता हूं कि जब मैं इन कलाकारों को देख रहा था तो मुझे हबीब तनवीर का नया थियेटर याद आ रहा था – जिसके सारे कलाकार एकदम देसी बीड़ी पीने वाले और जमीनी थे जो नाटक के बाद में बाहर आकर लोगों से सहज मिलते थे पता ही नहीं चलता था कि वह किसी बड़े नाटक समूह के हिस्से हैं

बहरहाल फ़िल्म देखिए बहुत ज़्यादा अपेक्षा के साथ ना जाये पर देश की हालत यहाँ तक पहुंचाने वालों को देखने और 70 % हिस्से का दुख दर्द देखने जरूर जाएँ कम से कम एक विचार भी दिमाग़ में खटके या आप संविधान का आर्टिकल 15 गूगल भर कर लें तो देश प्रेमी तो मैं आपको कह ही दूँगा भले राष्ट्रवादी ना कहूँ।

#खरी_खरी

लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं एवं स्वतन्त्र लेखन करते हैं|

सम्पर्क- +919425919221, naiksandi@gmail.com

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *