देशस्त्रीकाल

8 मार्च, महिला दिवस का सच

  • राकेश रंजन
आज 8 मार्च है, महिला दिवस। बधाइयों और शुभकामनाओं का तांता लगा है यह एहसास दिलाने के लिए कि तुम महिला हो, बराबर नहीं, अलग हो। सही मायने में अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए तो सदियों से लड़ रही हूँ उस समाज में जहाँ सत्ता तो बदलती है, लेकिन व्यवस्था नहीं बदलती। चेहरे बदलते हैं, चरित्र नहीं बदलता। मुखौटे बदलते हैं, विचार नहीं बदलता। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता इस देश में राजा रावण हो या राम। मैं तो बेचारी अबला महिला हूँ। राजा रावण हुआ तो वनवास से अपहरण कर ली जाऊँगी और यदि राजा राम हुआ तो अग्नि परीक्षा के बाद फिर वनवास भेज दी जाऊँगी।
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता इस देश में राजा कौरव हो या पांडव, मैं तो बेचारी महिला ही रहूँगी। यदि राजा कौरव हुए तो चीरहरण के काम आऊँगी और यदि राजा पांडव हुए तो जुए में बाज़ी लगाने के काम आऊँगी, जुए में हार दी जाऊँगी। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि समाज आधुनिक है या प्राचीन। यदि समाज प्राचीन है तो तो समाज की हार छुपाने के लिए मुझे जलती आग में ज़िंदा जलकर सती होना पड़ेगा, और यदि समाज आधुनिक है तो दहेज के लिए ज़िंदा जला दी जाऊँगी। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं शहर में रहूँ या गावं में! यदि शहर में रहती हूँ तो वैलेंटाइन डे के दिन पार्कों में दौड़ा-दौड़ा कर पीटी जाती हूँ, और यदि गावं में रहती हूँ तो ज़बरजस्ती किसी के भी खूँटे में बाँध दी जाती हूँ। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मै ग़रीब हूँ या अमीर! यदि मै ग़रीब हूँ तो घर चलाने के लिए बेच दी जाती हूँ, और यदि अमीर हूँ तो परिवार के अहंकार और अरमानों के भेंट चढ़ जाती हूँ। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं अपनी शिकायत मंदिर में ले जाना चाहूँ या मस्जिद में! यदि मंदिर में जाना चाहूँ तो भगवान अपवित्र होता है, और यदि मस्जिद में जाना चाहूँ तो इस्लाम ख़तरे में आ जाता है।
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता चाहे व्यवस्था लोकतांत्रिक हो या तानाशाही। यदि व्यवस्था लोकतांत्रिक हुई तो घर के चारदीवारी में रहूँगी, और यदि व्यवस्था तानाशाही हुई तो दासी बना ली जाऊँगी।
न पुरुषों की अकड़ ख़त्म होगी ना हमारी शालीनता/कोमलता। मर्दों की मर्दानगी और महिला स्वतंत्रता में उलटा सम्बन्ध है। जैसे-जैसे महिलाओं की स्वतंत्रता बढ़ती है उसी अनुपात में मर्दों की मर्दानगी घटती है। समाज में महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, बलात्कार आदि मर्दानगी बढ़ाने की टॉनिक है। पति का परमेश्वर बने रहना तो हमारी संस्कृति की पहचान ही है।
क्या फ़र्क़ पड़ता है यदि मैं बलात्कार के बाद भी हिम्मत करके कोर्ट जाऊँ या समाज के डर से घर में चुप बैठ जाऊँ। यदि कोर्ट गयी तो इज़्ज़त और न्याय दोनों नीलाम होगा, और यदि चुप रह जाऊँ तो अपना ज़मीर और पहचान नीलाम होगा।
आज जगह-जगह पर महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकार के नाम पर संगोष्टि और भाषण भी हो रहा होगा, लेकिन जिस वक़्त मैं अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए उठ खड़ी हो जाऊँ उसी वक़्त मुझे बदचलन, संस्कृतिविहीन … पता नहीं कौन-कौन सी मेडलों से अलंकृत कर दिया जाएगा।
बहुत हुआ, अब मुझे नहीं चाहिए किसी का संरक्षण, मुझे मेरी स्वतंत्र पहचान चाहिए। मैं क्या पहनूं, क्या खाऊँ, किससे शादी करूँ, किसे दोस्त बनाऊँ, किसको हाँ करूँ, किसको ना करूँ, कब, कहां, और किसके साथ घूमूँ, ये तय करने का मुझे अधिकार चाहिए। यदि मुझे नहीं समझ सकते, मेरी स्वतंत्र पहचान का सम्मान नहीं कर सकते, मुझे बराबर का इंसान नहीं समझ सकते तो बंद करो ये ढकोसला, बंद करो 8 मार्च को लम्बी-लम्बी फेंकना।
#WOMEN’SDAY

लेखक बिहार रिसर्च ग्रुप के संयोजक हैं|

सम्पर्क- +919899339892, rrakeshcps@gmail.com

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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