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आम चुनाव 2024 – अरुण कुमार पासवान

 

  • अरुण कुमार पासवान

 

आप को अटपटा तो नहीं लग रहा? शायद नहीं लग रहा होगा। आप हमसे कम समझदार थोड़े ही हैं? पर यदि आप को कोई हैरानी हो रही है तो हम आप को पप्पू कह सकते हैं। बुरा मत मानियेगा। एक आदमी को आप भी तो कई वर्षों से पप्पू कह रहे हैं। ये 2014 और 2019 के लिए आप की चुनाव-तैयारी थी। तो क्या मैं 2024 के चुनाव की बात नहीं कर सकता? अब यह बात अलग है कि 2024 में चुनाव होंगे या नहीं। नहीं भी हो सकते हैं। पिछले चुनाव की जीत के बाद श्री नरेन्द्र मोदी जी ने संसद की दहलीज़ पर मत्था टेका था। पाँच वर्ष उन्होंने संसद के सहारे विधान बनाये। इस बार उन्होंने संविधान को मत्था टेका है, संविधान पर उनका पूरा ध्यान रहेगा। आख़िर बीजेपी को 303 और एनडीए को 353 सीटें मिली हैं, 2019 के आम चुनाव में। और इस विशाल फलदार वृक्ष के नीचे अभी कई मुसाफिर आएँगे, जो धूप बर्दाश्त नहीं कर सकते। फिर बीजेपी आरएसएस के समर्पित कार्यकर्ता मिशन 2021, मिशन 2022 लेकर प्रान्तों में सक्रिय हो ही चुके हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 2 विधायकों सहित 50 पार्षदों को बीजेपी में शामिल करने के साथ इसका शुभारम्भ हो ही चुका है। कर्नाटक में पार्टी ने मध्यावधि चुनाव के औचित्य पर बल दे ही दिया है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी शीघ्र ही यह प्रस्ताव ज़ोर पकड़ेगा। और काँग्रेस तो चुनाव तिथि की घोषणा के बाद ही जनसम्पर्क के लिए निकलना उचित समझती है।

आप ने मोदी जी का नवनिर्वाचित अपने सांसदों को सम्बोधन अवश्य सुना होगा। आइये उनके भाषण के क़ुछ मुद्दों पर चर्चा कर लें। क्योंकि आप ने पहली बार मोदी जी का इतना सन्तुलित भाषण सुना होगा। कम से कम मैं ने तो पहले कभी नहीं सुना था। अपने, जीत बाद, पहले भाषण में मोदी जी ने यह समझाने की भरपूर कोशिश की कि लोगों ने पार्टी, गठबंधन या उम्मीदवार को नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ उनको मत दिया है। यह बात सच है भी। क्योंकि इस देश की जनता को इतना ठगा गया है, इतनी निराशा मिली है कि उसे जहाँ कोई आशा की किरण दिख जाती है वहीं वो अपनी खुशियों की सुबह के लिये आश्वस्त हो जाती है। पाँच वर्षों में कुछ ख़ास नहीं मिलने के बाद भी, उन्हें चुनाव प्रचार में मोदी जी के आखिरी वादे पर पूरा भरोसा है कि पाँच वर्ष उन्हें बिगड़ी हुई स्थिति को काम करने लायक बनाने में लगे, अगले पाँच वर्ष काम करने में लगाएँगे। आप मानें या न मानें मोदी जी इस बात को अच्छी तरह जानते और मानते भी हैं, तभी उन्होंने कहा कि विशाल जन समर्थन के बाद जिम्मेदारियां भी काफ़ी बढ़ गयी हैं।

मोदी जी ने संवेदना प्रकट की कि ग़रीबों और अल्पसंख्यकों को ठगा गया है, खासकर उन लोगों के द्वारा, जो उन्हें वोटबैंक समझते हैं और उसी रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं। इसीलिए उन्हें शिक्षा तथा अन्य विकास से वंचित रखा गया है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस स्थिति में सुधार लाया जा सकता था। एनडीए सांसदों से उन्होंने इस कार्य को पूरा करने को कहा। प्रधानमन्त्री ने बीजेपी और एनडीए की जीत को विश्वास का प्रतिफल बताया जनता का सरकार में विश्वास, लोगों का परस्पर एक दूसरे पर विश्वास। प्रधानमन्त्री का यह विश्वास, विश्वास से अधिक अपेक्षा है, जिसे न केवल एनडीए, बल्कि सभी दल को, सभी लोगों को ध्यान में रखना चाहिए। और प्रधानमन्त्री को भी इस बात के लिये चौकन्ना रहना चाहिए कि लोगों के बीच, गरीबों और अल्पसंख्यकों में व्याप्त भय वास्तव में किससे है।

प्रधानमन्त्री जी ने सेवा भाव की बात की है। हालाँकि उन्होंने 2014 की जीत के बाद ही घोषत किया था कि वे प्रधानमन्त्री नहीं, प्रधान सेवक हैं। 2019 तक में उन्होंने अपने को चौकीदार के रूप में प्रस्तुत किया है। चौकीदार का दायित्व और भी कठिन हो जाता है, कि सब अपने घरों में रात्रिविश्राम करते हैं और चौकीदार गलियों के सुनसान अंधेरे में “जागते रहो” की आवाज़ लगते हुए “सब ठीक है” की आश्वस्ति भी देता है कि चौकीदार तैनात है, वे निश्चिंत रहें। क्योंकि चौकीदार को  पता है कि गलियों में सब कुछ ठीक नहीं। विभिन्न सेवाओं में तैनात सेवादार भी भय का माहौल पैदा करते हैं। 2024 की चुनाव तैयारी में सेवादारों की व्यस्तता और दृढ़ संकल्प कहीं कमज़ोर लोगों के भय का बड़ा कारण न बन जाय।

प्रधानमन्त्री के भाषण का एक महत्वपूर्ण बिंदु था कि भारतीयों ने कभी सत्ता के लिए लालच नहीं की। उनका संकेत था कि सरकार सत्ता के लिये नहीं, जनसेवा, जनकल्याण के लिए होती है। पर अफ़सोस, यही सच होता और आज के परिदृश्य में लोगों को भी यह बात हज़म होती; जबकि सत्ता स्वीकारने का नहीं, हथियाने का दौर है।

आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण बात की चर्चा किये बिना बात खत्म कर दूँ तो अपनी नज़र में ही अपराधी बना रहूँगा। मोदी जी ने मिडिया से सावधान रहने और मीडिया पर विश्वास नहीं करने की कीमती सलाह दी अपने सांसदों को। हालाँकि मीडिया, खासकर टीवी चैनलों ने, एकाध को छोड़कर, चुनाव के दौरान उनके और उनकी पार्टी के प्रशस्तिगान में इतना गला फाड़ा कि इतने में तो…। पर,सच तो सच है। प्रधानमन्त्री की, इस बेबाक़ टिप्पणी के लिए, जितनी प्रशंसा की जाय, कम है। मीडिया आज हर चर्चा में इतनी एकपक्षीय प्रस्तुति देती है कि समझना कठिन हो जाता है कि मीडिया का प्रतिनिधि कौन है और प्रतिभागी कौन। कुछ एंकर तो इतने व्यक्तिगत हो जाते हैं कि मीडियापर्सन की पहचान ही खो देते हैं, भाड़े के टट्टू लगते हैं। और यदि भद्दी भाषा और गालियाँ सीखनी हो तो कुछ अल्पज्ञ राजनीतिक नेताओं के भी ये गुरु सबित हो सकते हैं ये महान एंकर|

बहरहाल, सभी का ध्यान 2024 के आम चुनाव की ओर होना चाहिए। मन्त्रिपरिषद के गठन और विभागों के बंटवारे भी बहुत कुछ कह रहे हैं। मीडिया वालों को बताने की ज़रूरत ही नहीं, सजग नेता हमेशा तैयार ही रहते हैं, समझना उन किसानों को है जो पगड़ी बाँधने में तड़क गंवा बैठते हैं, और उनके खेत में फसल नहीं घास उगती है। जनता का विश्वास न एक दिन में जीता जा सकता है, न प्रतिपक्षी के जनविश्वास खोने की प्रतीक्षा कर के, बल्कि जनता के ज़ख्मों पर महरम लगा कर, उनका बन कर।

 

लेखक प्रसिद्ध मीडियाकर्मी हैं|
सम्पर्क- +919810360675
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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