देश

अस्थिरता और थरथराहट के दौर में न्याय

प्रफुल्ल कोलख्यान

पूरी दुनिया में हाहाकार बढ़ने का एक बड़ा कारण अन्याय का निरन्तर फैलता दायरा है। विडम्बना यह है कि न्याय असंगठित होता गया है और अन्याय संगठित। राज्य संरचना पर आपराधिक संरचना तेजी से हावी होती जा रही है। आपराधिक मनोवृत्ति वाले लोग सत्ता के प्रमुख केन्द्रों पर कब्जा जमाने में सफल हुए हैं और लोकतान्त्रिक संस्थाओं का उपयोग भी अपने हित में करने लगे हैं।

सोवियत संघ के विघटन और उदारवादी विश्व-व्यवस्था के विस्तार के साथ संगठित अन्याय का दायरा भी बढ़ा। कम्युनिस्ट राजनीति से असहमति रखने वालों को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि दुनिया भर की सरकारों में बढ़ती आपराधिक मनोवृत्तियों के कारण क्या हैं। लोकतन्त्र में सत्ता का अति-केन्द्रीकरण हो या सामाजिक वितरण के नाम पर उसका अव्यवस्थित विकेन्द्रीकरण—दोनों ही परिस्थितियाँ संविधान की भावना के विरुद्ध जाकर अपराध के लिए रास्ता खोलती हैं। आज वैश्विक और घरेलू सत्ता-संरचनाएँ गहरे संकट में हैं। ऐसे अनिश्चित और थरथराते समय में न्याय की बात करना आसान नहीं, फिर भी करना आवश्यक है। दुनिया के अनेक हिस्सों में अन्याय जिस तरह संस्थागत हुआ है, वैसा शायद पहले कभी नहीं था।

गाजा का मानवीय संकट, यूक्रेन पर रूस का आक्रमण और सम्प्रभुता का हनन—ये केवल युद्ध नहीं, न्याय की विफलताओं के उदाहरण हैं। इसी क्रम में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या को भी कुछ शक्तियों ने न्याय की कार्रवाई बताया। किसी राज्य का सिर काट देने को न्याय कहना स्वयं न्याय की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न है।

शहादत केवल शोक का विषय नहीं, प्रतिरोध का भी प्रतीक होती है। लेकिन आज सत्ता का चरित्र ऐसा है कि वह एक ही घटना पर क्षण-क्षण में बयान बदलती है—न थूकते देर, न चाटते देर। वैश्विक राजनीति में नैतिकता की जगह शक्ति ने ले ली है। जो यह तय करने का दावा करते हैं कि क्या होना चाहिए, उनकी एक आँख नम दिखाई देती है तो दूसरी में सत्ता की आग जलती रहती है।  भारत में भी छोटे-छोटे अन्याय लगातार घटते रहते हैं। अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों पर अत्याचार होते हैं, पर समाज ऊपर से शान्त दिखाई देता है; जैसे तालाब में बुलबुले फूटते रहें और पानी स्थिर दिखे।

मणिपुर की जातीय हिंसा पर सत्ता का रवैया हाल के भारतीय इतिहास के सबसे पीड़ादायक प्रसंगों में है। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर लाखों नाम हटाए जाने की घटनाएँ भी लोकतान्त्रिक अधिकारों पर प्रश्न खड़े करती हैं। जब नागरिक के मताधिकार पर संकट हो और उसे केवल ‘अगली बार’ का भरोसा मिले, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि न्याय आखिर किसके लिए है। सब कुछ उलटा-पुलटा दिखाई देता है—सर के ऊपर धरती, पैर के नीचे आसमान। इतिहास की लूट की आड़ में वर्तमान की लूट छिपाई जा रही है। पूजा पर पूँजी भारी पड़ रही है।

पश्चिम बंगाल सहित अनेक राज्यों में सत्ता-प्रेरित सामाजिक तनाव इस बात का संकेत हैं कि सत्ता के चित्त में अन्याय का भय नहीं, जबकि जनता भय से भरी हुई है। प्लेटो ने न्याय को आत्मा का गुण कहा था। प्रश्न यह है कि किसकी आत्मा का? विश्व-व्यवस्था की, राष्ट्र की, राजनीतिक दलों की, न्यायपालिका की या उन नेताओं की जो दिन-रात घृणा फैलाते हैं? जब आँख का पानी सूख जाता है तो तर्क की धारा भी सूख जाती है और विवेक की वाणी रुद्ध हो जाती है। विकलांग विवेक के हाथों में न्याय की हैसियत थाली के बैंगन से अधिक नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में न चित्त भय शून्य हो सकता है, न माथा ऊँचा। लोकतन्त्र केवल चुनावों से नहीं, न्याय की जीवित चेतना से बचता है; और जब वही चेतना क्षीण पड़ने लगे, तब लोकतन्त्र भी केवल लगभग लोकतन्त्र रह जाता है, न्याय भी केवल लगभग न्याय।

न्याय के अनेक प्रसंग हैं और उनमें से कुछ पर बात करना जरूरी है। आज की दुनिया का मुख्य सन्दर्भ अब तक लोकतन्त्र की आकांक्षाओं से तय होता आया है। ‘अब तक’ तो ठीक, लेकिन लाख टके का सवाल है—’कब तक’? कब तक न्याय की चर्चा का आधार लोकतन्त्र बना रहेगा? भारत की राजनीतिक स्थिति को देखकर लगता है कि लोकतन्त्र को अब अपने ही घर में मेहमान बना दिया गया है। राजनीति के घर में उसकी विदाई की धुन बजाई जा रही है। लोकतन्त्र एक राजनीतिक उत्पाद है; उसकी गुणवत्ता राजनीति से तय होती है और न्याय की गुणवत्ता लोकतन्त्र की गुणवत्ता से। लेकिन आज राजनीतिक संगठन की आँख नहीं खुली, न्याय की आँख पर पट्टी बँधी है और संसद के कान जैसे सुनने से इनकार कर चुके हैं। कौन है यहाँ जो सचमुच खुली आँख से देख रहा है? लोकतन्त्र की गुणवत्ता ऐसी होगी तो न्याय की गुणवत्ता कैसी होगी?

भारत में लोकतन्त्र का आधार संविधान है। मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व इस बात के प्रमाण हैं कि संविधान न्याय को केवल आदर्श नहीं, व्यवहार का आधार मानता है। वितरणात्मक और सुधारात्मक न्याय—दोनों के लिए उसमें पर्याप्त स्थान है। इसलिए न्याय का प्रश्न केवल अदालतों का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक जीवन का प्रश्न है। संविधान एक जीवित जीवन-दर्शन है।

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को संविधान से शिकायत रही है। पहली शिकायत संविधान से कम, उसे लागू करने के तौर-तरीकों से है। संविधान के आदर्श जमीन पर उतरने में देर हुई, कई जगह रुकावटें पैदा की गयीं। समानता की संवैधानिक प्रतिबद्धता के बावजूद विषमता की खाई लगातार चौड़ी और गहरी होती गयी। यह न्याय की विफलता है, संविधान की नहीं। बाबासाहेब अम्बेडकर ने पहले ही सावधान किया था कि संविधान की सफलता उसे लागू करने वालों के इरादों पर निर्भर करेगी।

व्यवहार में जब सरकार स्वयं संविधान का पर्याय बनने लगे तो शिकायतों की सीमा भी सरकार तय करने लगती है। जो शिकायत सरकार को पसन्द नहीं आती, वह राजद्रोह, राष्ट्रविरोध या कानून-व्यवस्था का प्रश्न बना दी जाती है। सवाल यह है कि संविधान इतना ही अधिकार देता है जितना सरकार देना चाहे, या उससे कहीं अधिक? इस प्रश्न का उत्तर अदालतों में बार-बार सुनाई देता है।

संविधान यदि केवल पूजा की वस्तु बनकर रह जाए और जीवन में न उतरे तो उसकी पवित्रता का क्या अर्थ? संविधान को लागू करने के तरीके पर सवाल उठाना संविधान-विरोध नहीं है। सरकार के राजनीतिक रुख का विरोध लोकतन्त्र का स्वाभाविक अधिकार है। लेकिन आज सरकारी तन्त्र और उसके समर्थक विरोध को ही संविधान-विरोध मान बैठते हैं। उनकी समझ में सरकार की अनुमति ही संवैधानिक स्वतन्त्रता की सीमा है। वे जो मानते हैं, वही सच घोषित कर देते हैं। पर सच इतना छोटा नहीं होता।

संविधान से असहमति का इतिहास नया नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े राजनीतिक प्रवाहों ने भी समय-समय पर संविधान के जीवन्त लोकतान्त्रिक दर्शन पर आपत्ति की। सत्ता की राजनीति ने उनके रुख में रणनीतिक परिवर्तन अवश्य किया, पर नीति और रणनीति के बीच का तनाव आज भी दिखाई देता है। संविधान से मिली सत्ता का लाभ भी चाहिए और संविधान की आत्मा से असुविधा भी बनी रहे—यह विरोधाभास लगातार सामने आता है।

उधर शासनकाल में चारों ओर लूट और अव्यवस्था की शिकायतें बढ़ती हैं। श्रद्धालु तक कहने लगे हैं कि यदि भगवान भी सुरक्षित नहीं, तो साधारण नागरिक की सुरक्षा का भरोसा कैसा? विडम्बना यह है कि यदि लूटने वाले पकड़े भी जाएँगे तो उसी संविधान के कानून के तहत, जिसे कभी नापसन्द किया जाता था। इस देश में प्रार्थना ने बहुत कुछ किया है, लेकिन संविधान की प्रेरणा से अभी बहुत कुछ होना बाकी है। दिनकर की पंक्ति आज भी याद आती है—”समर शेष है।”

मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति माधव जे. जामदार का एक निर्णय इस समय विशेष महत्त्व रखता है। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इण्डिया के नेता सईद अहमद को केवल सरकार और गृहमन्त्री के विरुद्ध नारे लगाने के आरोप में एक वर्ष के लिए जिला बदर कर दिया गया था। न्यायालय ने उस आदेश को पूरी तरह रद्द करते हुए स्पष्ट कहा कि नागरिक सरकार के गुलाम नहीं हैं और पुलिस मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री की निजी नौकर नहीं है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था सरकार से असहमति और उसके विरोध का अधिकार देती है। लेकिन आज का माहौल ऐसा बना दिया गया है कि सरकार की आलोचना भी राष्ट्रद्रोह जैसी प्रतीत होने लगती है। सत्ता से असहमति को अपराध बना देने की यह प्रवृत्ति लोकतन्त्र की नहीं, भय की पहचान है। लगुआ-भगुआ के लोकतन्त्र में नागरिकों को लगभग न्याय ही मिलता है। लगभग न्याय और लगभग अन्याय के बीच का अन्तर बहुत बड़ा नहीं होता। न्याय के अनेक सिद्धान्त और अवधारणाएँ हैं, लेकिन आज वे सब सत्ता, अपराध और अन्याय के जाल में उलझती दिखाई देती हैं। अदालती न्याय अभी भी आशा का स्रोत है, पर उसके समानान्तर एक नया शब्द चल पड़ा है—बुलडोजर न्याय। जब प्रक्रिया की जगह प्रदर्शन ले ले और कानून की जगह शक्ति खड़ी हो जाए, तब न्याय की अवधारणा ही घायल हो जाती है। मनुष्य अभाव से जितना पीड़ित है, उससे कम अन्याय से नहीं। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जिनसे राहत की उम्मीद होती है, उन्हीं के दंश सबसे अधिक बेरहम निकलते हैं। यही हमारे समय का सबसे कठिन न्याय-संकट है—राष्ट्र की आँख खुली होने का दावा बहुत है, पर न्याय की आँख अब भी पूरी तरह खुली नहीं है।

 

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सबलोग : सच के साथ, सब के साथ * ISSN: 2277-5897
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