Uncategorized

सभी का खून शामिल है यहाँ की मिट्टी में

जब देश आजाद हुआ तो वह केवल अँग्रेजी शासन से ही नहीं, राजे-रजवाड़ों और राजशाही से भी मुक्त हुआ। आजादी अपने साथ समाज के पुनर्गठन का एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आयी। उसने सपने दिये, आकाँक्षाएँ दीं और लड़ने से गढ़ने की ताकत भी दी। सदियों से जाति, धर्म, लिंग, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भीतर-ही-भीतर बँटा समाज, ऊपर से विभाजन की त्रासदी से भी गुजरा। पाकिस्तान एक नये राष्ट्र के रूप में बना और सदियों की गुलामी झेल चुका भारत एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में पुनर्जन्मा। पाकिस्तान के हिस्से में पाने की खुशी थी, भारत के हिस्से में बँटने का दुःख।

जो लोग पाकिस्तान चले गये, वे चले गये; लेकिन जिन्होंने भारत को चुना, उनके सामने नयी चुनौतियाँ थीं। उन्हें बहुसंख्यक हिन्दू समाज में अल्पसंख्यक बनकर रहना था। वे केवल बराबरी के साथ रहने वाले समुदाय का हिस्सा नहीं थे, बल्कि सदियों तक इस देश के शासन और समाज का भी हिस्सा रहे थे। फिर भी उन्होंने भारत में रहने का निर्णय लिया। यह निर्णय इस भरोसे पर आधारित था कि धर्मनिरपेक्ष भारत में उन्हें सम्मान, समानता और नागरिक अधिकार मिलेंगे।

इसी समय दो समानान्तर कल्पनाएँ भी आकार ले रही थीं—एक ओर घोषित इस्लामी पाकिस्तान, दूसरी ओर हिन्दू राष्ट्र का विचार। यह सच है कि द्विराष्ट्र सिद्धान्त की वैचारिक भूमि विनायक दामोदर सावरकर ने तैयार की थी। पाकिस्तान के इस्लामी स्वरूप ने हिन्दू राष्ट्र की राजनीति को और उग्र बनाया। परिणाम यह हुआ कि देश की राजनीति और समाज बार-बार हिन्दू-मुसलमान के प्रश्न में उलझता गया।

ऐसे कठिन समय में, जब देश गरीबी, अशिक्षा, जाति-भेद, छुआछूत और आर्थिक विषमता से जूझ रहा था, तब भी हमारे पुरखों ने लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता का रास्ता चुना। उस समय भारत खाद्यान्न के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर था, लोकतन्त्र का कोई अनुभव नहीं था, फिर भी संविधान निर्माताओं ने यह साहसिक संकल्प लिया कि राज्य धर्मनिरपेक्ष होगा और समाज सर्वधर्म समभाव की दिशा में आगे बढ़ेगा। बारूद के ढेर पर बैठकर लिया गया यह संकल्प भारतीय गणराज्य की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति था।

आजादी की लड़ाई भी हमने साथ-साथ लड़ी थी। 1857 से 1947 तक स्वतन्त्रता संग्राम की लगभग हर धारा में मुसलमानों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर प्रतीकात्मक नेतृत्व के केन्द्र बने। बेगम हजरत महल ने लखनऊ में अँग्रेजों का डटकर सामना किया और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व किया।

भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के आरम्भिक दौर में भी मुस्लिम नेतृत्व महत्त्वपूर्ण रहा। बदरुद्दीन तैयबजी 1887 में कॉंग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने। मौलाना अबुल कलाम आजाद पत्रकार, चिन्तक और विलक्षण विद्वान थे। आगे चलकर वे कॉंग्रेस के अध्यक्ष बने और स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षा मन्त्री भी। खान अब्दुल गफ्फार खान ने उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रान्त में अहिंसा का आन्दोलन खड़ा किया और ‘खुदाई खिदमतगार’ संगठन के माध्यम से हजारों पठानों को आजादी की लड़ाई से जोड़ा। रफी अहमद किदवई, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और सैफुद्दीन किचलू जैसे अनेक नेता कॉंग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख स्तम्भ रहे।

1919 से 1922 के खिलाफत आन्दोलन को महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन से जोड़कर राष्ट्रीय स्वरूप दिया। मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में लाखों मुसलमान स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुड़े। बड़ी संख्या में लोगों ने सरकारी नौकरियाँ, विद्यालय और महाविद्यालय छोड़ दिये।

अहिंसक आन्दोलन के साथ-साथ क्रान्तिकारी धारा में भी मुसलमानों की सक्रिय भागीदारी रही। हसरत मोहानी ने ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का नारा दिया, जो आगे चलकर भगत सिंह और उनके साथियों की पहचान बना। आज भी यह नारा परिवर्तन और प्रतिरोध का प्रतीक है। सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक और अधिकारी थे। जनरल शाहनवाज खान और उनके अनेक साथियों ने इस संघर्ष में उल्लेखनीय भूमिका निभायी।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के समानान्तर मुस्लिम समाज के भीतर भी सुधार की एक मजबूत धारा बह रही थी। सर सैयद अहमद खान ने आधुनिक शिक्षा का अभियान चलाया और अलीगढ़ आन्दोलन की शुरुआत की। उनका विश्वास था कि शिक्षा, विज्ञान और तर्कशीलता के बिना कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने पर्दा-प्रथा, बहुविवाह और रूढ़िवाद की आलोचना की तथा कहा—‘पहले शिक्षा, फिर राजनीति।’

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी साम्प्रदायिकता, कट्टरता और महिलाओं की अशिक्षा का लगातार विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि इस्लाम और भारतीय राष्ट्रीयता में कोई विरोध नहीं है। स्वतन्त्र भारत में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की ऐसी बुनियाद रखी, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभायी।

मुस्लिम समाज के भीतर सुधार की यह धारा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी। बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने पर्दा-प्रथा, स्त्री-अशिक्षा और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘सुल्ताना का सपना’ उस समय की सबसे साहसी कल्पनाओं में थी, जिसमें स्त्रियाँ शिक्षित, स्वतन्त्र और समाज का नेतृत्व करती दिखाई देती हैं। 1909 में उन्होंने कोलकाता में लड़कियों के लिए सखावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल की स्थापना की और स्पष्ट कहा कि स्त्रियों को चारदीवारी में कैद रखना न धर्म है, न न्याय।

शिबली नोमानी, अल्ताफ हुसैन हाली, मुमताज अली और उनके समकालीन सुधारकों ने भी मुस्लिम समाज में शिक्षा, तर्कशीलता और आत्मालोचना की परम्परा को मजबूत किया। हाली ने ‘मुसद्दस’ के माध्यम से समाज की गिरावट पर चोट की, शिबली ने इतिहास, साहित्य और आधुनिक ज्ञान के अध्ययन पर बल दिया, जबकि मुमताज अली ने स्त्रियों के अधिकार, शिक्षा, विधवा-विवाह और पैतृक संपत्ति में उनके हिस्से का समर्थन किया। इन सबका साझा आग्रह था कि धर्म का अर्थ जड़ता नहीं, बल्कि ज्ञान, न्याय और मानवीय गरिमा है।

स्वतन्त्रता संग्राम में मुसलमानों का योगदान केवल नेतृत्व या समाज-सुधार तक सीमित नहीं था; उन्होंने अपने प्राण भी न्योछावर किए। काकोरी काण्ड के अमर शहीद अशफाकउल्ला ख़ाँ अपने साथियों रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह के साथ फाँसी पर चढ़े। उनके अन्तिम शब्द थे—“वन्दे मातरम्।” ग़दर आन्दोलन के नेता बरकतुल्ला ख़ाँ ने विदेशों में रहकर भारत की स्वतन्त्रता का अभियान चलाया। मौलवी अहमदुल्लाह शाह 1857 के महान योद्धाओं में थे, जिन्हें अँग्रेज भी असाधारण साहस के कारण सम्मान से याद करते थे। हसरत मोहानी बार-बार जेल गये, लेकिन स्वतन्त्रता और सामाजिक न्याय के अपने विचारों से कभी पीछे नहीं हटे।

आजाद हिन्द फौज में भी मुसलमानों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। जनरल शाहनवाज ख़ाँ सहित अनेक अधिकारियों और सैनिकों ने रंगून, इम्फाल और पूर्वोत्तर के मोर्चों पर संघर्ष किया। यह इतिहास बताता है कि भारत की स्वतन्त्रता किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की नहीं, बल्कि साझा बलिदानों की देन है।

स्वतन्त्रता के बाद भी यह परम्परा समाप्त नहीं हुई। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए असंख्य मुस्लिम सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। 1965 के युद्ध में क्म्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने अपने अद्वितीय साहस से दुश्मन के पैटन टैंकों को ध्वस्त किया और परमवीर चक्र से सम्मानित हुए। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने 1947–48 के कश्मीर युद्ध में शहादत दी और ‘नौशेरा का शेर’ कहलाये। 1971 के युद्ध से लेकर कारगिल तक सेना, सीमा सुरक्षा बल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल और अन्य सुरक्षा बलों में अनगिनत मुस्लिम जवानों ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। उनकी शहादत इस बात की गवाही है कि राष्ट्रभक्ति किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।

संविधान सभा में मुस्लिम सदस्यों की संख्या भले कम थी, लेकिन उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने नागरिक अधिकारों, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता पर लगातार बल दिया। डॉ. सैयद महमूद ने विधिक और संवैधानिक विमर्श में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। बेगम ऐजाज रसूल संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों और लोकतान्त्रिक मूल्यों की सशक्त पैरवी की। हिफ्जुर रहमान ने स्पष्ट कहा कि इस्लाम और लोकतन्त्र परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि साथ-साथ चल सकते हैं।

इतिहास के ये तथ्य इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि वे हमें याद दिलाते हैं—भारत की स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र और संविधान किसी एक समुदाय की देन नहीं हैं। इस देश की मिट्टी में सबका पसीना है, सबका श्रम है और सबका खून मिला हुआ है।

फिर आज ऐसा क्यों है कि इसी देश के मुसलमानों की नागरिकता, देशभक्ति और निष्ठा पर बार-बार प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं? क्यों उनके मताधिकार, शिक्षा, रोजगार, इबादतगाहों और आजीविका को लेकर असुरक्षा का वातावरण बनता है? क्यों भीड़ की हिंसा, बुलडोजर और सन्देह की राजनीति उन्हें बार-बार यह महसूस कराती है कि वे अपने ही देश में पराए हैं?

ये प्रश्न केवल मुसलमानों के नहीं, भारतीय लोकतन्त्र और संविधान के भी हैं। जिस देश को साझा संघर्षों, साझी शहादतों और साझे सपनों ने बनाया हो, वहाँ किसी नागरिक की देशभक्ति का प्रमाण उसके नाम या मजहब से नहीं, उसके समान नागरिक अधिकारों से तय होना चाहिए। इतिहास को भूलना केवल अतीत से विश्वासघात नहीं, भविष्य को भी संकट में डालना है। अगर हमें भारत को सचमुच मजबूत बनाना है तो यह स्वीकार करना होगा कि इस देश की मिट्टी में सबका खून शामिल है, इसलिए इस देश में सबका बराबर का अधिकार भी है।

 

Show More

मणिमाला

लेखिका गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पूर्व निदेशक तथा ‘अन्तिम जन’ पत्रिका की संस्थापक प्रधान सम्पादक रही हैं। iammanimala@gmail.com +9810841159
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x