
नासिरा शर्मा समकालीन हिन्दी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण स्वर हैं, जिनका लेखन युद्ध, विस्थापन और स्त्री-अनुभव के जटिल अन्तर्सम्बन्धों को केन्द्र में लाता है। ईरान, इराक, अफगानिस्तान और फिलिस्तीन जैसे देशों के उनके प्रत्यक्ष अनुभव उनके लेखन को विशिष्ट प्रामाणिकता प्रदान करते हैं। रक्षा गीता, जो कालिंदी महाविद्यालय, दिल्ली में अध्यापनरत हैं, एक प्रतिष्ठित फिल्म समीक्षक के रूप में जानी जाती हैं और ‘सबलोग’ के पाठकों के लिए परिचित नाम हैं। इस साक्षात्कार में ‘युद्ध के भीतर युद्धरत स्त्री’ की अवधारणा गहराई से उभरती है, जहाँ स्त्री केवल पीड़िता नहीं, बल्कि सतत संघर्षशील चेतना के रूप में सामने आती है।
आपके लेखन को पढ़ते हुए लगता है कि युद्ध केवल बाहरी नहीं, बल्कि स्त्री के भीतर भी चलता है। आप युद्ध के भीतर युद्धरत स्त्री को कैसे परिभाषित करेंगी?
इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर बहुत कम बात हुई है, या कहें कि लगभग नहीं के बराबर। हमने अपने देश में अपेक्षाकृत कम युद्ध झेले हैं, मगर दूर से उनकी आहटें हमें लगातार विचलित करती रही हैं। ऐसे में हमारे सामने उन देशों की स्त्रियों का प्रश्न खड़ा हो जाता है, जिन्होंने लम्बे समय तक युद्ध की विभीषिकाएँ झेली हैं; जैसे फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, वियतनाम, अफ्रीका के कई देश, ईरान, इराक, यूक्रेन, और अब लेबनान तथा इजरायल के साथ ईरान और अमेरिका का तनाव।
युद्ध में लाशें दोनों तरफ बिछती हैं और बर्बादी भी दोनों ओर होती है। फिर भी फर्क है। आक्रमणकारी की मनःस्थिति और लक्ष्य अलग होते हैं, और जिस पर हमला होता है उसकी परिस्थितियाँ अलग। लेकिन दोनों ही स्थितियों में सबसे अधिक जो झेलती है, वह माँ होती है।
यदि पी.एल.ओ. की वरिष्ठ सदस्या नाजिया हसन का इण्टरव्यू पढ़ें, जो मेरी पुस्तक ‘औरत की आवाज’ में शामिल है, तो वे कहती हैं कि फिलिस्तीनी योद्धाओं से कहीं अधिक अहम भूमिका माँ की होती है। वे यह भी बताती हैं कि हमारी युवा पीढ़ी की लड़कियों ने जीवन की लय को टूटने नहीं दिया है। वे प्रेम करती हैं, शादी करती हैं, बच्चे पैदा करती हैं और काम भी करती हैं।
उनकी बात मैंने अपनी आँखों से ईरान-इराक और अफगानिस्तान में सच होते देखी है, ठीक युद्ध के बीच का सच। लाशें, मोर्चे, कब्रिस्तान, जवान विधवाएँ और लावारिस बच्चे सब एक साथ मौजूद होते हैं।
लेकिन नाजिया के ब्योरों से आगे बढ़ते हुए मैं उन औरतों की बात भी सामने लाना चाहती हूँ, जो न युद्ध चाहती हैं और न अपने मर्दों को खोना। वे अवसाद का शिकार हो जाती हैं और सामाजिक शोषण का मोहरा बनती हैं। उनके सामने एक वीरान जिन्दगी होती है। इस संघर्ष की लड़ाई उन्हें अकेले लड़नी पड़ती है, और यह युद्ध उनके लिए पूरी जिन्दगी समाप्त नहीं होता।
एक सहज जीवन उन्हें अचानक ऐसे मैदान में पटक देता है, जहाँ उन्हें चारों ओर से लड़ाई लड़नी पड़ती है।
बगदाद में मैंने सियाह लिबास में सैकड़ों औरतों को बल्ब बनाने की फैक्टरी में काम करते देखा है। उनके चेहरों पर न खुशी के भाव थे, न जवानी की चमक। सियासत लड़ रही थी और संवेदनाएँ अपने को हारी और थकी हुई महसूस कर रही थीं। यही अनुभव मेरे उपन्यासों और कहानियों के किरदारों के जरिए उभरकर आये हैं।
युद्धरत औरत का एक दूसरा सच भी है। हमारे यहाँ पति के शहीद होने के बाद औरत को धन तो मिलता है, लेकिन उस पर उसका अधिकार नहीं होता। ससुराल और मायके वाले, और कभी-कभी प्रेमी के रूप में धोखेबाज लोग भी, उसे हड़पने की होड़ में लगे रहते हैं। इसलिए मैं कह सकती हूँ कि यह “दोहरी युद्ध की मार के बीच खड़ी औरत” है।
आपने बताया कि आपके द्वारा लिए गये साक्षात्कार में नाजिया हसन फिलिस्तीनी संघर्ष में माँ की भूमिका को योद्धाओं से भी अधिक महत्त्वपूर्ण मानती हैं, जहाँ वह अपने बच्चे को केवल आशा के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान के लिए तैयार करती है। क्या यह दृष्टिकोण स्त्री की शक्ति और धैर्य का महिमामण्डन है, या फिर युद्ध और राष्ट्रवाद द्वारा स्त्री की भावनाओं और मातृत्व के एक प्रकार के ‘राजनीतिक उपयोग’ को दर्शाता है? क्या यह भी कहा जा सकता है कि लगातार संघर्ष की परिस्थितियाँ स्त्री की संवेदनाओं को ‘सामान्यीकृत पीड़ा’ में बदल देती हैं?
बिल्कुल। कहा भी जाता है कि क्रान्तियाँ अपने ही बच्चों को खा जाती हैं। कभी यह गुमान नहीं था कि ईरान में इतनी जल्दी तख्ता पलट जाएगा। एक और बात कहना चाहूँगी। हर देश में परिवार नियोजन की जरूरत एक जैसी नहीं होती। यह देश के संसाधनों और आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। कई बार ऐसा भी होता है कि आप बहुत चाहते हैं, लेकिन तीसरी सन्तान नहीं हो पाती, कारण भी स्पष्ट नहीं होता।
स्त्री-विमर्श कई बार औरतों के प्रश्नों में इतना गहरे उतर जाता है कि वह दूसरे पक्ष के साथ अनजाने में अन्याय करने लगता है। सबसे बड़ी बात यह है कि माएँ अपने बच्चों को बेहतर से बेहतरीन अवसर देने की कोशिश करती हैं। वे उन्हें बेहतर इंसान बना सकती हैं।
अगर हमारे समाज को इंजीनियर, डॉक्टर और अध्यापक चाहिए, तो क्या हम उसी दिशा में सोचेंगे? और क्या एक ऐसी औरत, जो पिछले सत्तर साल से युद्ध की स्थिति में जी रही है, अपने बच्चों को देश के लिए तैयार नहीं कर सकती? यह पूरी तरह परिवेश पर निर्भर करता है कि आपकी औलाद का उद्देश्य क्या बनता है। यह हमेशा एक जैसा नहीं होता।
उदाहरण के तौर पर, सद्दाम हुसैन ने कहा था कि लोग अधिक बच्चे पैदा करें और तीसरे बच्चे का खर्च सरकार उठाएगी। वहाँ आबादी कम थी, जबकि संसाधन और अवसर अपेक्षाकृत अधिक थे। इसके उलट भारत की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और चीन को चुनौती दे रही है। ऐसे में इस तरह के आह्वान कितने उचित हैं, यह हमें खुद समझना होगा।
हर देश, हर धर्म और हर समय की अपनी माँग, समस्याएँ और चुनौतियाँ होती हैं।
इन मूलभूत प्रश्नों पर स्त्री-विमर्श को भी गम्भीरता से जाना होगा। उसे एक नया आकाश खोजना होगा, क्योंकि कई बार वह बिना वजह खुद को दोहराने लगता है। मैंने शाह के दौर में 1976-77 में जो देखा, वह 1980-81 में बदल चुका था। वह बदलाव अजीब और अप्रत्याशित था।
किसी को अन्देशा नहीं था कि औरतें ऐसी स्थिति में पहुँच जाएँगी, जहाँ उन पर पर्दा अनिवार्य कर दिया जाएगा। लेकिन इसके मूल में केवल धर्म नहीं था। उस पर राजनीतिक दबाव भी था। उन्हें यह दिखाना था कि वे अपने दुश्मन से अलग हैं, और उनकी पोशाक उनकी अपनी जमीन से उपजी है।
जहाँ तक मौलवियों का सवाल है, वे पर्दे की बात करेंगे ही। जबकि इस्लाम में पर्दे का अर्थ केवल मुँह छिपाना नहीं है। लेकिन वहाँ यह बात अति तक चली गयी, जिससे समस्याएँ पैदा हुईं।
ईरान-इराक़ युद्ध जैसे लम्बे युद्धों ने स्त्री के जीवन, उसकी पहचान और उसके सम्बन्धों को किस तरह बदला है?
तुम्हारे सवाल का जवाब मेरे दो उपन्यासों में दर्ज है। पहला, इराक पर लिखा ‘अजनबी जजीरा’। इसमें 2003 के अमेरिकी हमले और मल्टीनेशनल फौज की मौजूदगी के बीच आम लोगों पर लगे झूठे आरोप, हिंसात्मक व्यवहार और प्रचार का चित्रण है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि लोग किस तरह साँस लेते हुए भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं।
इस उपन्यास में अँग्रेजी टीचर समीरा का चरित्र है, जो अपनी पाँच जवान होती बेटियों को न केवल फौजियों से, बल्कि असामाजिक तत्त्वों से भी बचाकर घर में बन्द रखने को मजबूर है। वह खुद भी चादर लपेटकर ही घर से निकलती है। दवाइयों के अभाव में उसका पति मर जाता है।
खर्च, इच्छाएँ, भूख और भविष्य—सब कुछ वह अकेले झेलती है। घर का सामान बेचकर वह केवल फल और रोटी जुटा पाती है। एक प्याली चाय के लिए तरसती हुई वह अपने पति की लाश को घर के अहाते में दफनाने की हिम्मत करती है।
इसी तरह ईरान पर लिखा मेरा दूसरा उपन्यास ‘कुछ रंग थे ख्वाबों के’ है। इसमें वह ईरान उभरता है, जो इंकलाब और युद्ध के भयावह अनुभवों से गुजरने के बाद बदले हुए समाज और व्यवस्था में जीने की आदत डालने की कोशिश करता है। वहाँ लूले-लंगड़े सिपाही हैं, जवान पीढ़ी है, लावारिस बच्चे और विधवाएँ हैं।
मुझे याद है, जब इराक ने ईरान पर हमला किया था, तो बारूद के प्रभाव से कई औरतों की आवाज तक बदल गयी थी। दोनों देशों में आर्थिक नाकेबन्दी ने कई पीढ़ियों को कष्टमय जीवन जीने पर मजबूर किया।
डेमोक्रेसी लाने और दुनिया को बचाने के नाम पर इराक में विभिन्न धर्मों के आपसी रिश्तों को बर्बाद किया गया। आज भी वह ईरान पहले जैसा नहीं है, जहाँ लोग अपनी शिकायतों के बावजूद अपनी तरह जी रहे थे।
वर्तमान समय में भी हालात जटिल हैं। रिहायशी इलाकों, ऐतिहासिक इमारतों, स्कूलों और अस्पतालों पर हमले हो रहे हैं। दुनिया इस दादागीरी से या तो डरी हुई है या खामोशी से उसके साथ खड़ी है।
आपके उपन्यास ‘सात नदियाँ एक समन्दर (बहिश्ते जहरा)’ में तय्यबा जैसी शिक्षित और स्वतन्त्रता का स्वप्न देखने वाली स्त्री का अन्त जेल, दमन और मृत्यु में होता है। क्या यह आपकी पूर्वानुमानित दृष्टि थी कि यह क्रान्ति स्त्रियों के लिए मुक्ति नहीं, बल्कि नये दमन का माध्यम बन सकती है? क्या तैय्यबा का चरित्र इस ऐतिहासिक विडम्बना को उजागर करता है कि क्रान्ति का लाभ सत्ता को मिलता है, जबकि उसकी कीमत स्त्रियाँ चुकाती हैं?
ईरान में मूलतः विचारों की टकराहट रही है, मर्द और औरत की नहीं। जब तक साम्राज्य के विरोध में ईरानी एकजुट थे, तब तक विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद उनमें एकता बनी रही। उस दौर की सियासी लड़ाई में औरतों का योगदान भी बड़ी संख्या में था।
लेकिन शाह के जाने के बाद वैचारिक टकराहटें बहुत तीव्र हो गयीं। हिज्बुल्लाही, मुजाहिदीन और साम्यवादी पार्टियों तथा अन्य समुदायों के बीच खूनी झड़पें हुईं। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियाँ मारे गये।
मौलवियों की अवाम में गहरी पैठ थी, जबकि मुजाहिदीनों की पकड़ अपेक्षाकृत कम थी। वे इस्लामी विचारधारा से जुड़े थे, लेकिन कुछ मुद्दों पर मार्क्सवादी सिद्धान्तों को भी अपनाते थे। साम्यवादी पार्टी पुरानी थी, लेकिन अन्य कई समूह अंडरग्राउंड रहकर संघर्ष कर रहे थे। उनका आम जनता से सीधा रिश्ता कम था, भले ही वे सर्वहारा के हित की बात करते थे।
तूदेह पार्टी ईश्वर में विश्वास नहीं रखती थी और सोवियत संघ के प्रति उसका झुकाव था, इसलिए उसे जनता का व्यापक समर्थन नहीं मिला। इमाम खुमैनी के नेतृत्व और बाजार के समर्थन के साथ इस्लामिक सरकार सत्ता में आयी। इसके बाद मुजाहिदीन-ए-खल्क, साम्यवादी पार्टियों और अन्य समूहों के लिए जगह लगभग समाप्त हो गयी—सिवाय मौत और निर्वासन के।
खुमैनी ने यह भी घोषणा की थी “न पूर्व, न पश्चिम।” उन्होंने केवल हिन्दुस्तान को मित्र के रूप में स्वीकार किया।
ईरानी संसद और अन्य संस्थाओं में औरतों को स्थान मिला, लेकिन सख्त ड्रेस कोड के साथ, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों पर लागू था। मेरे उपन्यासों और कहानियों में इन टकराहटों का चित्रण है। पहली नजर में यह सब घोर अत्याचार लगता है, लेकिन यह भी सच है कि सुपर पावर के हस्तक्षेप और शोषण से ईरानी समाज इस कदर आहत था कि उसने पश्चिमी प्रभावों का व्यापक बहिष्कार शुरू कर दिया।
शाही दौर में जहाँ लड़कियाँ मिनी स्कर्ट और स्विमिंग सूट पहनती थीं, वहीं इंकलाब के बाद परिदृश्य बिल्कुल बदल गया। शुरुआती चार-पाँच वर्षों तक स्थिति बेहद हिंसक और उथल-पुथल भरी रही।
आज, लगभग सैंतालीस वर्षों के अन्तराल में, हम देखते हैं कि ईरान की औरतों ने हिजाब के साथ जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करायी है। उनकी साक्षरता बढ़ी है और वे हर क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। फिर भी, वे पूरी तरह समझौता नहीं करतीं, न ड्रेस कोड के प्रश्न पर, न अपने विचारों को व्यक्त करने के अधिकार पर।
ईरान की इस्लामिक सरकार स्वयं को साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक बड़े संघर्ष के रूप में देखती है। इस संघर्ष में औरतें और लड़कियाँ भी सक्रिय रूप से शामिल हैं।
मेरे उपन्यास की सात लड़कियाँ, जो पीड़ित और शोषित दिखाई देती हैं, वे अपने विचारों या अपने पतियों के विचारों के कारण उस स्थिति में हैं। तय्यबा जैसी स्त्री जो देशभक्त है, लेकिन अलग विचारधारा रखती है उसके लिए भी जगह नहीं बनती। यहाँ केवल औरतें ही नहीं, बल्कि कई मर्द भी इसी तरह हाशिए पर हैं, क्योंकि सत्ता का प्रश्न सब पर भारी है।
उदाहरण के तौर पर, शाह का बेटा जावेद पहलवी, जो अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले की बात करता है, यह दिखाता है कि सत्ता की आकाँक्षा किस तरह काम करती है।
जहाँ तक इस उपन्यास के पीछे मेरी पूर्वानुमानित दृष्टि का सवाल है-कि यह क्रान्ति स्त्रियों को दबाएगी-तो यह मेरा कोई पूर्वनिश्चित विचार नहीं था। यह मेरे अनुभवों और अवलोकनों से उपजा है। स्वयं इमाम खुमैनी ने भी कहा था कि यदि इस क्रान्ति में औरतें शामिल न होतीं, तो यह कभी सफल नहीं होती।
आपकी पुस्तक ‘फिलिस्तीन: एक नयी कर्बला’ में ‘कर्बला’ का रूपक बहुत अर्थपूर्ण ढंग से आता है। क्या आज का पश्चिम एशियाई संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक नैतिक और मानवीय प्रतिरोध का प्रश्न भी बन चुका है?
यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि नैतिक और मानवीय—तीनों स्तरों पर मौजूद है। इजरायल का एक सुनियोजित राजनीतिक कब्जे का कार्यक्रम था, जो 1948 से पहले ही आकार ले रहा था।
मध्य-पूर्व और ईरान के देशों में सदियों से विभिन्न धर्मों और नस्लों के लोग साथ रहते आये हैं। इजरायल उन देशों से सीधे बदला नहीं ले पा रहा, जहाँ से उसे कभी अस्वीकार किया गया और जहाँ उसने अत्याचार झेले।
यह भी कहा जाता है कि यहूदी समुदाय व्यापारिक दृष्टि से बहुत सक्षम होता है। आज उसकी आकाँक्षा ‘ग्रेटर इजरायल’ की है, ताकि वह अरब देशों के खनिज, पानी और सांस्कृतिक संसाधनों का उपयोग कर सके।
फिलिस्तीनियों की शिकायत है कि उनकी कला और भोजन तक को इजरायली अपने नाम से बाजार में प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे वे न केवल अपनी जमीन और घर से, बल्कि अपने इतिहास और संस्कृति से भी वंचित होते जा रहे हैं।
ऐसी स्थिति में फिलिस्तीनी लोग अपने मानवीय और नैतिक अधिकारों के लिए लम्बे समय से संघर्षरत हैं। यह जंग केवल भू-राजनीति की नहीं, बल्कि अधिकार और मानवता की भी है।
‘कर्बला’ का रूपक मैंने इसी सन्दर्भ में लिया था। जब फिलिस्तीनियों को पानी से वंचित किया गया, यहाँ तक कि सहायता में आई पानी की बोतलों को भी नष्ट कर दिया गया, तब मुझे हजरत हुसैन और यजीद की घटना याद आयी। कर्बला में भी पानी पर पहरा था, और हुसैन के परिवार को प्यासा रखा गया था।
जब हुसैन अपने छह महीने के बच्चे के लिए पानी माँगने गये, तो बच्चे के गले में तीर मारा गया। उसी पीड़ा और अन्याय की स्मृति इस रूपक में निहित है।
आज ईरान भी अपने ऊपर हुए आक्रमणों का जवाब देने की तैयारी में है और अपने साथ अन्य देशों के अधिकारों की बात भी जोड़ता है। उसकी दृष्टि में यह संघर्ष साम्राज्यवाद के विरुद्ध है, और वह चाहता है कि यह शोषण समाप्त हो तथा बड़ी शक्तियों का वर्चस्व कम हो।
यदि भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सन्दर्भ में बात करें, तो स्त्रियों की भूमिका के बिना स्वतन्त्रता सम्भव न होती। लेकिन उनके योगदान को उसी तरह स्मरण नहीं किया जाता, जैसे पुरुष सेनानियों को किया जाता है। आपके विचार?
इसके दो मुख्य कारण मुझे दिखाई देते हैं। पहला, यह माना जाता रहा कि स्त्रियों की संख्या मुख्य भूमिका में उतनी नहीं थी। जैसे सरोजिनी नायडू और अरुणा आसफ अली के नाम तो लिये जाते हैं, झाँसी की रानी की बहुत चर्चा होती है, लेकिन उसके मुकाबले बेगम हजरत महल का नाम कम सामने आता है। इन कुछ नामों के अलावा एक तरह का सन्नाटा है।
इस पर गम्भीर काम होना चाहिए। जो औरतें बड़े पैमाने पर दूसरे या तीसरे स्तर पर अपनी भूमिका निभा रही थीं, उन गुमनाम स्त्रियों के लिए न तो कोई सामूहिक स्मारक बना और न ही उन्हें समुचित श्रद्धांजलि दी गयी।
एक तीसरी श्रेणी की महिलाएँ भी थीं, जो साहित्य से जुड़ी थीं। जैसे कवि हसरत मोहानी की पत्नी निशात उन निशा, सुभद्रा कुमारी चौहान और मन्नू भंडारी। इनके जीवन-वृत्त में इनका उल्लेख भर मिलता है, लेकिन विस्तार से चर्चा नहीं होती।
यह केवल औरतों के साथ ही नहीं हुआ, बल्कि कई बार धर्म या अन्य आधारों पर पुरुषों के साथ भी ऐसा हुआ है। असल में गलती हमारी है। हम अपने लोगों को जानने की कोशिश भी नहीं करते, उनकी परवाह करना तो दूर की बात है।
हमने सेनानियों के बलिदान को तो याद किया, लेकिन उनके परिवारों के माँ, पत्नी, बहन और बेटी पर क्या गुजरी, उन्होंने संकट के समय किस तरह जीवन बिताया और कैसी कुर्बानियाँ दीं, इस पर न नेताओं ने ध्यान दिया, न शोधकर्ताओं ने, न इतिहासकारों ने और न ही लेखकों ने।
जब युद्धग्रस्त देशों में स्त्रियों की पीड़ा खबरों से गायब कर दी जाती है, जैसा कि आपने अपने लेख ‘खबरों से दूर आधी आबादी’ (औरत की आवाज) में प्रश्न उठाया है, तो क्या भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में भी स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली हिंसा, दमन और हाशियाकरण कहीं न कहीं मीडिया की चयनात्मक दृष्टि या सत्ता-संरचना के दबाव में ‘अदृश्य’ नहीं बना दिए जाते? या फिर यह हमारी सामाजिक संवेदनहीनता का परिणाम है, जहाँ हम देखने के बावजूद ‘न देखने’ का विकल्प चुन लेते हैं?
जिस तरह का समाज हमने बचपन से लेकर अब तक देखा है, उससे मुझे यही समझ आया है कि औरतों की मेहनत और उनके समर्पण को सहज ही उनकी प्रकृति का हिस्सा मान लिया जाता है। उसे अलग से रेखांकित करना जरूरी नहीं समझा जाता। मान लिया जाता है कि यह तो उनका स्वभाव है।
मेरी पुस्तक ‘औरत की आवाज’ में लैला अख्तार का एक उल्लेख है। वह कहती हैं कि जब सबलोग रात में सो जाते हैं, तब मैं पेंटिंग करती हूँ। आगे वह यह भी कहती हैं कि अगर मेरा शौहर पेंटिंग करता, तो मैं उसे पूरा सहयोग, प्रशंसा और मदद देती, यानी जो मुझे नहीं मिला।
औरतों को अक्सर अपने आप को दो हिस्सों में बाँटना पड़ता है। उनकी संरचना ही ऐसी है कि वे आधी आबादी को जन्म देती हैं और उसका निर्माण करती हैं।
बारिश के बाद जैसे सूखी जमीन पर अचानक घास और पत्ते उग आते हैं, वैसे ही औरतें भी होती हैं। जीवन में जैसी परिस्थितियाँ, घटनाएँ और दुर्घटनाएँ आती हैं, वे उनके अनुसार खुद को ढाल लेती हैं और उनका सामना करती हैं। समाज इसे बहुत सहज ढंग से, लगभग ‘कैजुअली’ लेता है।
लेकिन सवाल यह है कि औरत को इसके बदले क्या मिलता है? हम सृष्टि से बहुत कुछ लेते हैं, लेकिन पलटकर लौटाते क्या हैं?
यह भी देखना होगा कि उसकी अपनी जरूरतें क्या हैं, उसकी सीमाएँ क्या हैं, और वह किस तरह खुश रहती है। मुझे याद है, मैं एक परिवार से जुड़ी थी। वहाँ पति को मुझसे मिलने के बाद यह एहसास हुआ कि उनकी पत्नी घर पर ही रहती है, जबकि पहले वह नौकरी करती थी। इस बात को लेकर दोनों के बीच बहस छिड़ गयी।
वह औरत बेहद पढ़ी-लिखी, जागरूक और खुशहाल थी। अँग्रेजी किताबें पढ़ती थी। उसका साफ कहना था कि मैं इस स्थिति में खुश हूँ, तो मुझे नौकरी करने की जरूरत क्यों है?
पिछले लगभग तीस वर्षों में मैंने यह भी देखा है कि कई लड़कियाँ खुद यह कहने लगी हैं कि वे ‘होम बर्ड’ बनना चाहती हैं, बाहर काम करने नहीं जाना चाहतीं। सच तो यह है कि एक ही जमीन पर हर तरह की खेती सम्भव नहीं होती।
दूसरी ओर, आज एक बड़ा बदलाव भी दिखाई देता है। औरतें अपनी माँ को संघर्ष की साक्षी के रूप में देखने लगी हैं। आज की लड़कियाँ अपनी माँ पर लिख रही हैं, उन्हें केन्द्र में ला रही हैं।
पहले जहाँ पिता पर गर्व का भाव अधिक दिखाई देता था, अब माँ की भूमिका को लेकर एक नयी तरह की गौरव-भावना उभर रही है। उन्हें लिखकर, उन्हें सम्मान देकर उनकी अहमियत को रेखांकित किया जा रहा है।
यह बदलाव आने वाले पचास वर्षों में और स्पष्ट रूप से समझ में आएगा। आज अनगिनत विस्मृत लेखिकाओं के योगदान को नये सिरे से देखने और समझने का सिलसिला शुरू हो रहा है। इसी तरह औरत और पर्यावरण के सम्बन्ध में भी जागरूकता लगातार बढ़ रही है।










