
राष्ट्रीय संकट और लोकतान्त्रिकरण की नयी लहर
भारत के राजनेताओं का दावा है कि स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पूरे कर देश ‘अमृत काल’ में प्रवेश कर चुका है और भारतीय लोकतन्त्र का देशज आधार पहले से अधिक मजबूत हुआ है। नियमित चुनाव, इतिहास और शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन, प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, किसान और मजदूर संगठनों के आन्दोलन, अनेक राज्यों में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (राजग) से इतर दलों की सरकारें, संसद में सरकार की आलोचना तथा अनेक अवसरों पर सरकारी प्रस्तावों का विरोध—इन सबको इस दावे के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल और अनेक स्वतन्त्र विश्लेषक इस दावे को अतिरंजित मानते हैं। उनके अनुसार भारतीय लोकतन्त्र आज लँगोटिया पूँजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) और साम्प्रदायिक राजनीति के गठजोड़ के दबाव में है। उद्योगपति घरानों के प्रति सरकारी झुकाव, चुनावी बॉन्ड योजना, प्रधानमन्त्री कार्यालय में सत्ता का बढ़ता केन्द्रीकरण, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं के कथित राजनीतिक दुरुपयोग, चुनावों में धनबल और बाहुबल की बढ़ती भूमिका, मीडिया के बड़े हिस्से का सरकार समर्थक रुख तथा सरकार के आलोचकों की लम्बी न्यायिक प्रक्रिया के बिना गिरफ्तारी जैसे प्रश्न लगातार उठाए जाते रहे हैं। भीमा-कोरेगाँव प्रकरण, आम आदमी पार्टी के नेताओं की गिरफ्तारियाँ, ‘न्यूजक्लिक’ के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ तथा छात्र नेताओं उमर खालिद और शरजील इमाम से जुड़े मामले भी इसी सन्दर्भ में उद्धृत किए जाते हैं।
हमारा विदेशी कर्ज 2014 में 440 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 762 अरब डॉलर हो गया है। हमारे बाजार में चीन निर्मित वस्तुओं की प्रधानता बनी हुई है। लोकतन्त्र की गुणवत्ता की दृष्टि से 179 देशों में भारत का 100वाँ स्थान चिन्ता का विषय है। भारत को ‘चुनावी निरंकुशता’ की ओर बढ़ते देश के रूप में भी देखा जाने लगा है। लोकतन्त्र की गुणवत्ता, मानव विकास, सामाजिक सुरक्षा, प्रेस की स्वतन्त्रता और भ्रष्टाचार जैसे अनेक अन्तरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत की स्थिति अपेक्षित नहीं मानी जाती। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया जैसी लोकतान्त्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सार्वजनिक बहस तेज हुई है। दूसरी ओर, व्यापक आर्थिक विषमता बनी हुई है। करोड़ों नागरिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं, जबकि संसद में करोड़पति सांसदों का अनुपात लगातार बढ़ा है। यह बढ़ती आर्थिक दूरी लोकतन्त्र की सामाजिक विश्वसनीयता पर गम्भीर प्रश्नचिह्न लगाती है। इन परिस्थितियों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के परस्पर आरोपों से आगे बढ़कर यह पूछना आवश्यक है कि भारतीय लोकतन्त्र के सामने वे कौन-से बुनियादी प्रश्न हैं, जो उसके जन्मकाल से आज तक बने हुए हैं और जिनकी उपेक्षा अब सम्भव नहीं रह गयी है।
भारतीय लोकतन्त्र के ‘यक्ष प्रश्न’
भारतीय लोकतन्त्र अपने जन्मकाल से ही कुछ बुनियादी समस्याओं से जूझता रहा है। इनमें न्याय की अधूरी स्थापना, राष्ट्रीयता की कमजोर सामाजिक नींव, नागरिकता को चुनौती देने वाली साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रीय अस्मिताएँ, नागरिक अधिकारों की उपेक्षा, बहुसंख्यक समुदायों तथा प्रभुत्वशाली जातियों द्वारा लोकतान्त्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण और विविधता में एकता की भावना का क्रमशः क्षीण होना प्रमुख हैं। इन प्रश्नों की अनदेखी अब सम्भव नहीं रह गयी है।
यदि प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लोकतन्त्र में निहित न्याय का मूलाधार माना जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम स्त्री-पुरुष, गाँव-शहर, सम्पन्न-निर्धन तथा बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के बीच सन्तुलित भागीदारी सुनिश्चित कर पाये हैं? आरक्षण व्यवस्था ने वंचित समुदायों में नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया को गति अवश्य दी है, किन्तु इसके साथ ही लाभान्वित और वंचित समूहों के बीच नयी खाइयाँ भी उभरी हैं। ‘पिछड़ा’, ‘अति पिछड़ा’, ‘दलित’ और ‘महादलित’ जैसी श्रेणियों का निर्माण इसी सामाजिक यथार्थ का परिणाम है। माला-मादिगा, चमार-जाटव, पासवान-भर-मुसहर, महार-मांग तथा मीणा-गुर्जर जैसे अनेक समुदायों के बीच आरक्षण और वर्गीकरण को लेकर न्यायालयों में विवाद चल रहे हैं। अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियों का राजनीतिकरण भी एक सार्वजनिक प्रश्न बन चुका है। परिणामस्वरूप ‘आरक्षण में आरक्षण’ तथा संविधान की नौवीं अनुसूची के उपयोग जैसे सुझाव भी चर्चा में आये हैं। दूसरी ओर, सामान्य वर्ग की अनेक जातियाँ भी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लगातार विस्तार को अपने प्रति अन्याय के रूप में देखती हैं।
लोकतन्त्र की जड़ों को कमजोर करने वाला दूसरा बड़ा संकट चुनाव प्रक्रिया का प्रदूषण है। अधिकांश राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र परिवारवाद के दबाव में सिमट गया है। धनबल, मीडिया की बढ़ती शक्ति और बाहुबल के प्रभाव ने स्वस्थ प्रतिनिधि-चयन की प्रक्रिया को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है। वैश्वीकरण के बाद के दशकों में अनेक चुनावों में साम्प्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। मतदाताओं को प्रत्यक्ष या परोक्ष आर्थिक प्रलोभन दिए जाने की शिकायतें भी आम हो चुकी हैं। ऐसी परिस्थितियों में केवल मतदान की प्रक्रिया सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं रह जाती।
भारतीय राष्ट्रीयता का विकास भी यूरोप से भिन्न ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ। यहाँ राष्ट्रीय चेतना का प्रारंभ आर्थिक शोषण की पहचान से हुआ। दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ के माध्यम से ‘आर्थिक दोहन के सिद्धान्त’ को प्रतिपादित किया। इसके बाद महर्षि अरविंद और लोकमान्य तिलक ने सांस्कृतिक राष्ट्रीयता को वैचारिक आधार प्रदान किया। इन्हीं आर्थिक और सांस्कृतिक आधारों पर आगे चलकर गांधी के ‘हिन्द स्वराज’, नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ और सुभाषचंद्र बोस की ‘द इंडियन स्ट्रगल’ जैसी कृतियों ने भारतीय राजनीतिक राष्ट्रवाद को दिशा दी।
स्वतन्त्रता आन्दोलन की स्मृतियाँ धुँधली पड़ने के साथ भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा भी नये विवादों के घेरे में आ गयी है। ‘भारतीय राष्ट्रीयता’ और ‘हिन्दू राष्ट्र’ के बीच चल रही बहस केवल वैचारिक विवाद नहीं, बल्कि लोकतन्त्र की प्रकृति से जुड़ा प्रश्न है। अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के बाद यह विमर्श और तीव्र हुआ है। किन्तु यह भी स्मरणीय है कि संविधान-निर्माताओं ने भारत को उसकी बहुभाषी, बहुधर्मी, बहुजातीय और बहुवर्गीय संरचना के अनुरूप एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र के रूप में विकसित करने का मार्ग चुना था। आज भी यही चुनौती हमारे सामने है कि इतिहास-सम्मत इस बहुलतावादी राष्ट्रीयता को सर्वधर्म समभाव, समान नागरिकता और लोकतान्त्रिक बन्धुत्व के आधार पर और अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।
भारतीय लोकतन्त्र के इन ‘यक्ष प्रश्नों’ का उत्तर हमारे संविधान की प्रस्तावना में निहित है। उसमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता; राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय; प्रतिष्ठा और अवसर की समता; व्यक्ति की गरिमा; राष्ट्र की एकता और अखण्डता तथा बन्धुत्व को भारतीय गणराज्य की आधारशिला के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इन्हीं मूल्यों के आधार पर भारत ने स्वयं को सम्प्रभु, समाजवादी, पन्थनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में संगठित किया। इसलिए लोकतन्त्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं, बल्कि इन संवैधानिक आदर्शों को सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित करने से सुनिश्चित होगी।
भारत की सामाजिक संरचना इस चुनौती को और जटिल बनाती है। देश की लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी हिन्दू है, जबकि मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन तथा अन्य धार्मिक समुदाय भी भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सीमावर्ती राज्यों में अनेक अल्पसंख्यक समुदाय देश की सीमाओं की रक्षा और राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरी ओर, लगभग एक चौथाई आबादी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की है, जिनका इतिहास सामाजिक बहिष्कार और वंचना से जुड़ा रहा है। इसके अतिरिक्त लगभग प्रत्येक धर्म और भाषाई समुदाय के भीतर जाति तथा लैंगिक असमानताएँ भी मौजूद हैं। ऐसे बहुलतापूर्ण समाज को स्वतन्त्रता, न्याय, समता, गरिमा, एकता और बन्धुत्व से युक्त लोकतान्त्रिक राष्ट्र में रुपान्तरित करना केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं, बल्कि अपनत्व और साझी नागरिकता की भावना से ही सम्भव है। किसी एक धर्म, भाषा या सांस्कृतिक पहचान के प्रभुत्व पर आधारित राष्ट्र-निर्माण का प्रयास अन्ततः भारतीय समाज की बहुलतावादी संरचना को कमजोर करेगा।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में 26 नवम्बर 1949 को अपने ऐतिहासिक भाषण में चेतावनी दी थी कि भारत में राजनीतिक लोकतन्त्र का पौधा सामाजिक विषमता और आर्थिक असमानता की भूमि में रोपा जा रहा है। यदि सामाजिक और आर्थिक अन्याय दूर नहीं किए गये, तो राजनीतिक लोकतन्त्र भी स्थायी नहीं रह सकेगा। स्वतन्त्रता के बाद सात दशक से अधिक समय बीत जाने पर भी यह चेतावनी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोती। सामाजिक समता की तुलना में उपभोगवादी सम्पन्नता का आकर्षण बढ़ा है और सामुदायिक समाजवाद की जगह बाजारवादी संस्कृति ने व्यापक प्रभाव स्थापित किया है।
संविधान लागू होने के लगभग पच्चीस वर्ष बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी लोकतन्त्र के इसी संकट की ओर संकेत करते हुए कहा था कि भारत में लोकतान्त्रिक क्रान्ति के बावजूद ‘तन्त्र’ का वर्चस्व ‘जन’ पर बना हुआ है। उन्होंने निर्दलीय लोकशक्ति, लोक समितियों और छात्र-युवा संघर्ष समितियों के माध्यम से शान्तिपूर्ण ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का आह्वान किया। जनता पार्टी की सरकार बनने के बावजूद उस वैकल्पिक लोकतान्त्रिक कार्यक्रम को लागू नहीं किया जा सका। इसके बाद भारतीय राजनीति का बड़ा हिस्सा राज्यसत्ता, आर्थिक उदारीकरण, सामाजिक न्याय, पहचान की राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच नये सन्तुलन खोजने में व्यतीत हुआ।
इसी पृष्ठभूमि में 1984 से 2014 और उसके बाद के दशकों को देखना चाहिए। मण्डल और कमण्डल की राजनीति, वैश्वीकरण, क्षेत्रीय दलों का उदय तथा 2014 के बाद की नयी राजनीतिक परिस्थितियों ने लोकतन्त्र के स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है। आज प्रश्न केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि लोकतान्त्रिकरण की नयी लहर का है। यदि भारत को अपनी राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक बन्धुत्व और बहुलतावादी विरासत को सुरक्षित रखना है, तो सहभागी लोकतन्त्र, सामाजिक न्याय और समान नागरिकता को नये सिरे से मजबूत करना होगा। अन्यथा धार्मिक, जातीय और भाषाई वर्चस्व की राजनीति स्वतन्त्रता आन्दोलन से निर्मित भारतीय राष्ट्रीयता की नींव को कमजोर कर सकती है। भारतीय लोकतन्त्र का भविष्य इसी ऐतिहासिक विकल्प पर निर्भर करता है।










