साहित्य

प्रेमचंद: विरोध के कथा सम्राट

 

साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब मात्र नहीं, अपितु उसकी भविष्य-दृष्टि का भी संवाहक है। वह काल के प्रवाह में घटित घटनाक्रमों का दस्तावेज मात्र प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि समय की वस्तुस्थिति को पहचान कर समाज के अंतःकरण में सुप्त चेतना को जागृत करने का भी काम करता है। जब-जब अन्याय, विषमता, शोषण एवं नैतिक अवमूल्यन की छाया समाज पर गहन होती है, तब-तब साहित्य लोकमंगल की ज्योति बनकर जनमानस का मार्ग आलोकित करता है। इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहना पर्याप्त नहीं; वह उसके आत्मबोध, विवेक तथा सांस्कृतिक अस्मिता की आत्मा भी है।

उनका संपूर्ण साहित्य अन्याय, शोषण, असमानता, रूढ़ियों तथा औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध का स्वर है। उन्होंने समाज के उपेक्षित, शोषित एवं वंचित वर्गों की पीड़ा को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए मानवता, न्याय तथा समानता के आदर्शों का समर्थन किया। इस दृष्टि से प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज की जनचेतना एवं प्रतिरोध की संस्कृति का अमूल्य दस्तावेज़ है। प्रेमचंद के साहित्य में विरोध का स्वर सर्वप्रथम सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध दिखाई देता है। जाति-व्यवस्था, छुआछूत, स्त्री-असमानता तथा सामंती मानसिकता पर उन्होंने करारा प्रहार किया। ठाकुर का कुआँ, सद्गति, मंदिर तथा कफन जैसी कहानियाँ सामाजिक अन्याय और अमानवीय व्यवस्था का यथार्थ उद्घाटन करती हैं। इन रचनाओं में लेखक केवल समस्याओं का ही चित्रण नहीं करता, अपितु पाठक के अन्तःकरण में व्यवस्था के प्रति प्रश्नाकुलता और परिवर्तन की चेतना भी उत्पन्न करता है। उन्होंने कृषकों, श्रमिकों एवं निर्धनों के जीवन-संघर्ष को अत्यन्त मार्मिकता के साथ चित्रित किया। गोदान में होरी का जीवन भारतीय कृषक की शोषणग्रस्त स्थिति का प्रतीक बन जाता है, जबकि पूस की रात में किसान की विवशता और निर्धनता का अत्यन्त करुण चित्र उपस्थित किया गया है।

इन रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद सामंती एवं महाजनी व्यवस्था के अन्यायपूर्ण स्वरूप का विरोध करते हैं। प्रेमचंद का विरोध केवल सामाजिक एवं आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं है, अपितु वह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना के भी समर्थक रहे हैं। कर्मभूमि तथा रंगभूमि जैसे उपन्यासों में सत्य, अहिंसा, जनसंघर्ष तथा स्वाधीनता की भावना का सशक्त चित्रण मिलता है। कर्मभूमि का अमरकान्त और रंगभूमि का सूरदास अन्याय के समक्ष झुकने के स्थान पर नैतिक प्रतिरोध का मार्ग अपनाते हैं। इनके माध्यम से प्रेमचंद यह बताने की कोशिश करते हैं कि अन्याय का विरोध ही समाज को उन्नति के पथ पर अग्रसर करता है। यह उपन्यास मात्र औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध की कहानी नहीं है, अपितु जनजागरण, नैतिक उत्तरदायित्व, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक अधिकार-बोध तथा मानवीय गरिमा का वैचारिक घोषणापत्र भी है। इसमें प्रतिपादित संघर्ष किसी व्यक्ति-विशेष अथवा सत्ता-विशेष के विरूद्ध नहीं, बल्कि अन्याय, असमानता एवं सामाजिक जड़ता के खिलाफ है। कर्मभूमि का प्रधान नायक अमरकान्त एक संपन्न परिवार का युवक है। उसके पिता लाला समरकान्त धन एवं व्यापार को जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं, जबकि अमरकान्त सत्य, न्याय, मानवता तथा लोकमंगल के आदर्शों का अनुगामी है।

वैचारिक मतभेद के कारण वह गृह-त्याग कर ग्राम्य-जीवन में किसानों, दलितों तथा वंचित वर्गों की सेवा में प्रवृत्त हो जाता है। अमरकान्त की पत्नी सुखदा प्रारंभ में विलासपूर्ण जीवन की पक्षधर होती है। किंतु, कालांतर में उसका दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है और वह जनांदोलन की सशक्त नेत्री के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। कृषकों पर अत्याचार, सामाजिक विषमता तथा औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध अमरकान्त एवं उसके सहयोगी सत्याग्रह और अहिंसा का मार्ग अपनाते हैं। अनेक संघर्षों एवं कारावास के उपरान्त अन्ततः अमरकान्त और सुखदा के मध्य वैचारिक सामंजस्य स्थापित हो जाता है, जिनका  उद्देश्य व्यक्तिगत सुख नहीं, अपितु समाज एवं राष्ट्र की निःस्वार्थ सेवा है। कर्मभूमि में चित्रित कृषक-आंदोलन वस्तुतः केवल लगान-विरोध का प्रसंग मात्र नहीं, बल्कि मानवीय अस्मिता, सामाजिक न्याय तथा अधिकार-संरक्षण का उद्घोष है। प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि जब पीड़ित समाज आत्मबोध से प्रेरित होकर संगठित होता है, तब कोई भी सत्ता उसकी जनशक्ति की उपेक्षा नहीं कर सकती। उनके लिए आंदोलन विध्वंस का उपकरण नहीं, अपितु न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का सृजनात्मक उपक्रम है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में कर्मभूमि जैसी कहानियों अथवा उपन्यासों की प्रासंगिकता और भी अधिक सुदृढ़ होकर उभरती है। शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता, सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक अधिकारों से संबद्ध वर्तमान जनांदोलन इस तथ्य की पुनर्पुष्टि करते हैं कि लोकतन्त्र की वास्तविक शक्ति शासन-संरचनाओं में नहीं, अपितु जागरूक नागरिक-चेतना में निहित होती है। प्रेमचंद का साहित्य आज भी हमें स्मरण कराता है कि कोई भी जनांदोलन तभी स्थायी एवं लोकहितकारी सिद्ध होता है, जब उसका उद्देश्य सत्य, न्याय, नैतिकता तथा संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो। इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि कोई भी जनांदोलन आकस्मिक रूप से उत्पन्न नहीं होता। वह दीर्घकाल से संचित पीड़ा, उपेक्षा, अन्याय तथा अधिकार-हनन की गर्भभूमि में अंकुरित होता है। जब लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लघंन होने लगे, सामाजिक न्याय की अवधारणा क्षीण पड़ने लगे, शिक्षा व्यापार का पर्याय बन जाए, युवाओं की आकांक्षाएँ बेरोज़गारी के साये में खो जाये तथा किसान अपनी मेहनत के फल से वंचित होने को विवश हो जाए, तब जनमानस के अंतःकरण में प्रतिरोध का बीज अंकुरित होता है। यही बीज कालांतर में जनशक्ति के विराट वटवृक्ष के रूप में विकसित होकर परिवर्तन का उद्घोष करता है। युग-परिवर्तन के साथ अभिव्यक्ति के माध्यमों में भी व्यापक रूपांतरण हुआ है।

प्रेमचन्द का साहित्य भारतीय समाज के यथार्थ का केवल चित्रण नहीं करता, अपितु उसके नैतिक पुनर्जागरण का भी उद्घोष करता है। यही वजह है कि वे हर काल में प्रासंगिक बने हुए कालजयी रचनाकार हैं। कर्मभूमि  भी उनकी सर्वाधिक प्रासंगिक कृतियों में से एक है जो समाज का यथार्थ चित्रण करता है। इस प्रकार कर्मभूमि  केवल अपने समय की कृति नहीं, प्रत्युत प्रत्येक युग की लोकतान्त्रिक चेतना का अमर दस्तावेज़ है। जब-जब समाज अन्याय के अंधकार से आच्छादित होगा, तब-तब प्रेमचंद की यह कृति लोकचेतना के स्तंभ के रूप में पथ-प्रदर्शन करती रहेगी। ये कहानियां समाज में जनता की ताकत की ओर ध्यान आकर्षित करती है और यह एहसास कराती है कि समाज में जब-जब अन्याय, अत्याचार बढ़ता है, सत्तासीन धृतराष्ट्र की भूमिका में आ जाते हैं तो जनता को सड़कों पर उतरकर सत्ता में बैठे लोगों को यह एहसास कराना पड़ता है कि सत्ता की ताकत जनता में ही निहित होती है। जनता चाहे तो किसी को शीर्ष पर बैठा सकती है और चाहे तो उसे फर्श पर गिरा भी सकती है। कुछ ऐसी ही घटना हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए आंदोलन में भी घटी।

युवाओं ने देश में बढ़ती बेरोजगारी, पेपर लीक जैसे मुद्दे पर सरकार का ऐसे घेरा की देश के शिक्षामंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। ऐसा आंदोलन पहली बार नहीं हुआ है। जब-जब देश में तानाशाही बढ़ी किसान, युवा, महिलाएं सड़कों पर उतरी और जिनके हाथों में देश, समाज की बागडोर थी, उन्हें उनके गलत होने का एहसास कराया। प्रेमचंद ने उस समय-काल-परिस्थिति में जो कुछ भी लिखा वह आज भी बिल्कुल प्रासंगिक नजर आती है। इससे एक बात और भी स्पष्ट होती है कि शोषण हर काल में चरम पर रहा है, बस समय के अनुसार शोषण का स्वरूप बदलता रहा है तथा विरोध का तरीका भी बदलता गया। पूर्वकाल में ज्ञान-विनिमय का प्रमुख आधार मुद्रित ग्रंथ, पत्र-पत्रिकाएँ तथा सार्वजनिक विमर्श हुआ करते थे। किंतु, वर्तमान डिजिटल युग में गूगल, सोशल मीडिया, ई-पुस्तकें तथा एआई मंच ज्ञान-संप्रेषण के प्रमुख साधन बन चुके हैं। समकालीन युवा-वर्ग किसी भी विषय की प्रारंभिक जिज्ञासा की तृप्ति हेतु सर्वप्रथम इन्हीं माध्यमों का सहारा लेते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सामाजिक माध्यमों ने जनसामान्य को ऐसा सार्वजनिक संवाद-मंच प्रदान किया है, जहाँ व्यक्तिगत वेदना सामूहिक चेतना में रूपान्तरित होकर व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर सकती है। यही कारण है कि अनेक सामाजिक, शैक्षिक एवं लोकतांत्रिक प्रश्न क्षणमात्र में जनविमर्श का विषय बनकर जनांदोलन का स्वरूप धारण कर लेते हैं।

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संतोष बघेल

लेखक शिक्षाविद् एवं स्‍वतन्त्र लेखक हैं| सम्पर्क- +919479273685, santosh.baghel@gmail.com
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