झारखंडदेश

विकास,न्याय और लोकतन्त्र की कसौटी

कुमार कृष्णन

झारखण्ड के गोड्डा जिले का मोतिया गाँव आज केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल से जुड़े उन जटिल प्रश्नों का प्रतीक बन गया है, जहाँ विकास, लोकतन्त्र, भूमि अधिकार, पर्यावरण और न्याय एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। हाल के दिनों में यह गाँव फिर चर्चा में है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि अडानी पावर परियोजना के लिए उनकी भूमि पर बिजली के टावर और पोल लगाए जा रहे हैं, जबकि अनेक प्रभावित रैयतों को अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला। दूसरी ओर परियोजना से जुड़े अधिकारी दावा करते हैं कि समस्त कार्य निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हो रहा है। इन्हीं परस्पर विरोधी दावों ने इस विवाद को फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।

दरअसल, यह विवाद नया नहीं है। गोड्डा ताप विद्युत परियोजना की घोषणा के समय इसे झारखण्ड के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा निवेश बताया गया था। सरकार ने रोजगार, आधारभूत संरचना के विकास और क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का भरोसा दिया। बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति की योजना के कारण इसे अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की परियोजना भी कहा गया। लेकिन भूमि अधिग्रहण शुरू होते ही स्थानीय किसानों, सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों ने विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि परियोजना के लिए चुनी गयी भूमि बहुफसली और उपजाऊ कृषि भूमि है, जो केवल सम्पत्ति नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, सामाजिक पहचान और भविष्य का आधार है।

विवाद अन्ततः झारखण्ड उच्च न्यायालय तक पहुँचा। लगभग 1363 एकड़ भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई स्वीकार की गयी। याचिकाकर्ताओं ने प्रश्न उठाया कि यदि परियोजना से उत्पादित अधिकांश बिजली निर्यात के लिए है, तो भूमि अधिग्रहण को “सार्वजनिक उद्देश्य” की कसौटी पर कैसे परखा जाए। सामाजिक प्रभाव आकलन, प्रभावित परिवारों की भागीदारी और सन्ताल परगना टेनेंसी कानून के पालन को लेकर भी गम्भीर आपत्तियाँ दर्ज की गयी हैं। इन सभी मुद्दों पर अन्तिम निर्णय न्यायालय को करना है, इसलिए किसी भी पक्ष के दावों को अभी अन्तिम सत्य नहीं माना जा सकता।

मोतिया विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यहाँ प्रश्न केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि विकास की अवधारणा का है। ग्रामीण वर्षों से पूछ रहे हैं कि औद्योगिक परियोजना के लिए सबसे उपजाऊ कृषि भूमि ही क्यों चुनी गयी? यदि वैकल्पिक भूमि उपलब्ध थी, तो उसका परीक्षण किस स्तर पर हुआ? क्या इस विषय पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श हुआ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल प्रभावित किसान ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जानना चाहता है।

इसी पुराने विवाद के बीच अब बिजली के टावर और पोल लगाने को लेकर नया तनाव पैदा हुआ है। मोतिया और समरूआ क्षेत्र के कुछ रैयतों का आरोप है कि पूर्ण मुआवजा दिए बिना निर्माण कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त सूचना नहीं मिली और उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई भी नहीं हुई। कई ग्रामीणों का दावा है कि पहले आश्वासन दिया गया था कि भुगतान के बाद ही निर्माण होगा, लेकिन बाद में पिलर, टावर और बिजली लाइन का कार्य शुरू कर दिया गया। दूसरी ओर परियोजना प्रबन्धन का कहना है कि सभी कार्य नियमानुसार किए जा रहे हैं।

यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं, तो सत्य क्या है? इसका उत्तर न राजनीतिक बयानबाजी दे सकती है, न सोशल मीडिया। यह केवल पारदर्शी प्रशासनिक जाँच, उपलब्ध अभिलेखों और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आ सकता है।

भारत जैसे विकासशील देश में बड़े उद्योगों, ऊर्जा परियोजनाओं और निवेश की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक प्रगति के लिए आधारभूत संरचना का विस्तार आवश्यक है। लेकिन लोकतान्त्रिक व्यवस्था यह भी सुनिश्चित करती है कि विकास नागरिकों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की कीमत पर न हो। यदि प्रभावित लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी सहमति, मुआवजा और शिकायतों की अनदेखी की जा रही है, तो विकास का पूरा विमर्श अविश्वास में बदल जाता है।

ऐसी स्थिति में राज्य की भूमिका केवल परियोजना को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। उसकी जिम्मेदारी यह भी है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार को न्यायपूर्ण मुआवजा मिले, सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पारदर्शी पालन हो, शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई हो और प्रशासन दोनों पक्षों के बीच विश्वास कायम करे। यही सुशासन की कसौटी भी है।

मोतिया का विवाद अन्ततः किसी एक परियोजना या एक कम्पनी का प्रश्न नहीं है। यह भारत के विकास मॉडल की विश्वसनीयता की परीक्षा है। यदि विकास और न्याय साथ-साथ चलेंगे, तभी लोकतन्त्र मजबूत होगा; अन्यथा विकास की चमक के पीछे असन्तोष और अविश्वास की गहरी परछाइयाँ बनी रहेंगी। इसलिए मोतिया की धरती पर उठे सवाल केवल स्थानीय नहीं हैं, वे पूरे देश से पूछते हैं—क्या विकास का अर्थ केवल निवेश है, या उसमें न्याय, पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की समान भागीदारी भी अनिवार्य है? यही प्रश्न इस पूरे विवाद का वास्तविक केन्द्र है।

यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं, तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया की गम्भीर समीक्षा का विषय है। और यदि आरोप निराधार हैं, तो प्रशासन का दायित्व है कि वह सम्बन्धित अभिलेख सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करे। पारदर्शिता ही अविश्वास को कम कर सकती है। यही वह बिन्दु है जहाँ मोतिया का मामला केवल कम्पनी और किसानों के बीच का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा बन जाता है।

झारखण्ड की राजनीति भूमि अधिकारों के संघर्ष से निर्मित हुई है। आदिवासी आन्दोलनों से लेकर राज्य निर्माण तक ‘जल, जंगल और जमीन’ केवल नारा नहीं, बल्कि राजनीतिक दर्शन रहा है। मुख्यमन्त्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक पहचान भी इसी विचारधारा से जुड़ी रही है। ऐसे में यदि प्रभावित लोग यह महसूस करते हैं कि उनकी शिकायतों का समुचित समाधान नहीं हुआ, तो यह सरकार के लिए गम्भीर चुनौती है। प्रश्न किसी दल की आलोचना का नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही का है। यदि सरकार स्थानीय अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे विवादित मामलों की निष्पक्ष जाँच, लम्बित मुआवजों की समीक्षा और शिकायतों के त्वरित निस्तारण की दिशा में स्पष्ट पहल करनी होगी।

इसी प्रकार गोड्डा के सांसद निशिकांत दूबे लगातार इस परियोजना को क्षेत्रीय विकास का प्रतीक बताते रहे हैं। बड़े निवेश से रोजगार और आधारभूत संरचना के विस्तार की उनकी दलील अपनी जगह महत्त्वपूर्ण है। लेकिन लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल निवेश का समर्थन करना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के नागरिकों की आशंकाओं और शिकायतों को भी गम्भीरता से सुनना है। यदि लोग भूमि, मुआवजे और अधिकारों को लेकर प्रश्न उठा रहे हैं, तो उनसे संवाद स्थापित करना और तथ्यों को सामने लाना भी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है।

मोतिया के संघर्ष का सबसे मानवीय पक्ष वे परिवार हैं, जिनके लिए भूमि केवल आर्थिक सम्पत्ति नहीं, बल्कि जीवन, पहचान और भविष्य का आधार है। कई ग्रामीणों और महिलाओं ने आशंका व्यक्त की है कि यदि समुचित पुनर्वास और आजीविका के विकल्प उपलब्ध नहीं कराए गये, तो उनके सामने आजीविका और आवास दोनों का संकट उत्पन्न हो सकता है। इसलिए विकास की चर्चा केवल निवेश और उत्पादन के आँकड़ों तक सीमित नहीं रह सकती; उसमें पुनर्वास, सामाजिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा को भी समान महत्त्व देना होगा।

विवाद अब तीन स्तरों पर खड़ा है—उच्च न्यायालय में लम्बित कानूनी प्रश्न, ग्रामीणों के ताजा आरोप और प्रशासन तथा राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही। यदि इन तीनों स्तरों पर पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई, तो अविश्वास और गहरा सकता है। इसके विपरीत यदि सभी दस्तावेज सार्वजनिक हों, लम्बित दावों की निष्पक्ष समीक्षा हो और सभी पक्षों के बीच संवाद स्थापित किया जाए, तो समाधान की दिशा भी निकल सकती है।

झारखण्ड उच्च न्यायालय में लम्बित याचिका में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया, सामाजिक प्रभाव आकलन, प्रभावित लोगों की भागीदारी और सन्ताल परगना क्षेत्र से जुड़े विशेष कानूनी प्रावधानों के पालन पर प्रश्न उठाए गये हैं। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि जब परियोजना से उत्पादित बिजली का बड़ा हिस्सा बांग्लादेश को आपूर्ति के लिए है, तब अधिग्रहण के ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ की कानूनी व्याख्या पर पुनर्विचार आवश्यक है। इन सभी प्रश्नों का अन्तिम निर्णय न्यायालय को करना है।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की मूल भावना केवल भूमि अर्जित करना नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। यदि किसी परियोजना में इन सिद्धान्तों के पालन को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो उसका समाधान केवल प्रशासनिक दावों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, स्वतन्त्र जाँच और न्यायिक परीक्षण से होना चाहिए।

स्थानीय लोगों की एक बड़ी चिन्ता पर्यावरण को लेकर भी है। उनका कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों का असर खेती, जलस्रोतों और आसपास के पर्यावरण पर पड़ सकता है। इन आशंकाओं का समाधान भावनात्मक बहस से नहीं, बल्कि नियमित पर्यावरणीय निगरानी, सार्वजनिक रिपोर्टों और वैज्ञानिक अध्ययनों से होना चाहिए। यदि परियोजना सभी मानकों का पालन कर रही है, तो उसके प्रमाण भी सार्वजनिक होने चाहिए।

मोतिया आज केवल एक गाँव नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल के सामने खड़ा एक मूलभूत प्रश्न है—क्या विकास का अर्थ केवल निवेश और उद्योग है, या उसमें नागरिकों की सहमति, न्याय, पर्यावरण और संवैधानिक अधिकार भी समान रूप से शामिल हैं? यदि सभी प्रक्रियाएँ कानून के अनुरूप हुई हैं, तो यह तथ्य पारदर्शिता के साथ सामने आना चाहिए। और यदि कहीं प्रक्रियागत त्रुटि, लम्बित मुआवजा या अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो उसका समयबद्ध और न्यायपूर्ण समाधान होना चाहिए। क्योंकि इतिहास किसी परियोजना की उत्पादन क्षमता से अधिक इस बात को याद रखता है कि विकास की प्रक्रिया में सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार किया गया।

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कुमार कृष्णन

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं एवं 'सबलोग' के बिहार ब्यूरोचीफ़ हैं। सम्पर्क +919304706646 kkrishnanang@gmail.com
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