चर्चा में

आखिर क्यों दिवालिया हो रहे है डिस्काम..?

 

देश भर में पिछले 17 वर्षों से  बिजली घोटाला हो रहा है। करीब 10 लाख करोड़ का सरकारी घाटा औऱ इतनी राशि की बंदरबांट मौजूदा विधुत अधिनियम 2003 के क्रियान्वयन से कारित की जा चुकी है। देश की सियासत में टेलीकॉम घोटाले की खूब चर्चा होती है लेकिन इसी तर्ज पर हुए इससे चार गुना बड़े बिजली घोटाले की कहीं चर्चा नही हो रही है। बिडम्बना यह है कि मौजूदा विधुत कानून को एक बार फिर बदला जा रहा है और सियासी दल इस पर चुप है। क्योंकि सभी राज्यों में हुए इस घोटाले में किसी का दामन धवल नही है। कमाल की बात यह है कि मुफ्त बिजली से सरकारें तो बनाईं जा रही है लेकिन मुल्क के संसाधन किस तरह कारपोरेट की लूट के लिए खोल दिये गए है इस पर कोई चर्चा नही करना चाहता है। उत्तरप्रदेश विधुत निगम बर्ष 2000 में 77 करोड़ के घाटे में था आज यह आंकड़ा 83 हजार करोड़ पहुँच गया है। बिहार में 47 हजार करोड़ है. मध्यप्रदेश में  सरकार को अक्सर उधार देने वाला बोर्ड 52 हजार करोड़ के घाटे में है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्णाटक हर राज्य में हजारों करोड़ से नीचे नही है यह आंकड़ा।

देश भर के सभी डिस्कॉम  घाटे को जोड़ दें तो यह करीब 10 लाख करोड़ के आसपास है। विधुत अधिनियम 2003 में संशोधन के मौजूदा प्रस्ताव का देश भर में विरोध हो रहा है। सभी राज्यों के बिजली इंजीनियर्स ने एक जुट होकर सरकार से न केवल इन संशोधन को वापिस लेने बल्कि  सभी विधुत कम्पनियों को भंग कर पुरानी निगम/बोर्ड व्यवस्था बहाल करने की मांग भी दोहराई है। इस प्रस्ताव के देश व्यापी विरोध का बुनियादी आधार 2003 के अधिनियम की व्यवहारिक विफलता ही है। जिसके अनुपालन में  तत्कालीन बिजली बोर्डों को विघटित करके कम्पनियों में बदला गया। ताकि उत्पादन, पारेषण,और वितरण को व्यावसायिक और उपभोक्ता अधिकारों के मानकों पर व्यवस्थित किया जाए।

लेकिन आज ये कम्पनीकरण प्रयोग पूरी तरह से असफल हो गया है। इसके मूल में अफ़सरशाही को देखा जाता है जिसने कम्पनीकरण के नाम पर स्थापना और प्रशासनिक खर्चे तो बेतहाशा बढ़ा लिए लेकिन जिस टेक्नोक्रेटिक, और प्रोफेशनल एप्रोच की आवश्यकता थी उसे अमल में नही लाया। पहले राज्यों में रेलवे की तर्ज पर एक स्वायत्तशासी  निगम/बोर्ड होता था। अब वितरण, पारेषण ,उत्पादन,मैनेजमेंट, ट्रेडिंग होल्डिंग कम्पनियां बनाकर सभी की कमान  आईएएस अफसरों को दे दी। जिन्होंने सरकारी महकमों की तरह ही इन कम्पनियों को चलाया है। कम्पनीकरण के पीछे  का सोच बिजली वितरण को विशुद्ध व्यावसायिक औऱ प्रतिस्पर्धी धरातल देना था ताकि उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प और सस्ती सुविधाएं सुनिश्चित हो।अनुभव इसके उलट कहानी कहते है एक तो देश के सभी सरकारी डिस्कॉम दिवाले की कगार पर है और दूसरी तरफ निजी बिजली कम्पनियां  करोडों का मुनाफा कमा रही है।Image result for discom

बिजली के खेल को समझने के लिए हमें विधुत अधिनियम 2003 की उस भावना को समझने की जरूरत है जो बुनियादी तौर पर निजीकरण की वकालत करती है।भारतीय विधुत अधिनियम1910 औऱ इंडियन इलेक्ट्रिक एक्ट 1948  बिजली क्षेत्र में किसी भी निजी भागीदारी को निषिद्ध करता था। एक लंबे कारपोरेट दबाब के बाद देश मे 2003 का एक्ट पारित कर  निजीकरण की नींव रखी गयी।  इसके लिए नीतिगत निर्णय हुआ कि बिजली क्षेत्र को निजी कम्पनियां के हवाले किया जाएगा। नया फ़्रेंचाइजी मॉडल ईजाद किया गया।शर्त रखी गयी कि बड़े बड़े बिजली बोर्डों के टुकड़े किये जायें और पूरी व्यवस्था को सरकारी धन से दुरुस्त किया जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे कोई जर्जर मकान है उसे बेचने के लिए उसकी मरम्मत कराई जाती है। बोर्डो के टुकड़े कम्पनियों मे इसलिये किये गए ताकि बेहतर कमाई वाले इलाके चिन्हित हो सके।

उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश में सम्पन्न क्षेत्र मालवा की कम्पनी पश्चिम क्षेत्र बनाई गयी उसका मुख्यालय इंदौर कर दिया गया। यूपी को सात वितरण कम्पनियों में बांट दिया गया। पहले केंद्रीय मदद, विश्वबैंक, जापान बैंक, एडीबी जैसे वितीय संस्थानों से ऋण लेकर बुनियादी ढांचा सुदृढ़ीकरण पर हजारों करोड़ खर्च किये गए। एपीडीआरपी, आरईसी, सिस्टम स्ट्रेंथनिंग, जेबीआईसी, उदय, राजीव गांधी विधुतीकरण, दीनदयाल  ग्राम ज्योति, एडीबी, आरएपीडीआरपी, फीडर सेपरेशन, उजाला जैसी भारी भरकम बजट वाली योजनाओं के जरिये करीब 8 लाख करोड़ रुपये पिछले 15 साल में इंफ्रस्ट्रक्चर पर खर्च किये जा चुके है। यह राशि राज्य और केंद्र ने अलग अलग एजेंसियों के जरिये व्यय की। दावा किया गया कि  ढांचागत सुधार के बगैर बिजली क्षेत्र में कम्पनीमूलक प्रतिस्पर्धा नही हो पाएगी। इस काम के लिए भी निजी कम्पनियों को चुना गया।

2003 के कानून से पहले सभी बिजली निर्माण कार्य बोर्डों द्वारा सीमित ठेकेदारी के जरिये खुद किये जाते थे इसके लिए एसटीसी विंग हुआ करती थी। लेकिन 50 साल के सरकारी सिस्टम को हटाकर  निजी कम्पनियों को हजारों करोड़ के टेंडर जारी किये।जो नेटवर्क सरकारी निगमों ने 50 साल में खड़ा किया। उससे दोगुनी 33 केवी, 11 केवी, एचटी, लाइनें, पावर और वितरण ट्रांसफारमर गांव, कस्बों में खड़े कर दिए गए। शहरी इलाकों में हजारों करोड़ के टेंडर पर रिनोवेशन, अपग्रेडेशन क्षमता बृद्धि के काम कराये गए। ये सभी टेंडर ग्लोबल और सेंट्रलाइज्ड प्रक्रिया अपनाकर बुलाये गए जिनके सर्वाधिकार आईएएस सीएमडीयों ने अपने पास रखे। विसंगति यह रही की इतना बड़ा नेटवर्क एक साथ खड़ा किया जाता रहा और इसके मेंटेनेंस के लिए कोई मानव संसाधन भर्ती नही किया गया। हजारों करोड़ की धनराशि के टेंडर बड़ी बड़ी कम्पनियों को उनकी सुविधा के अनुरूप बनाएं गए बिड और टेक्निकल अहर्ताओं को प्रयोजित कर अवार्ड किये गए। ठीक वैसे ही जैसे टेलीकॉम के लाइसेंस बगैर पूर्व अनुभव के बांटे गए ।

मसलन गोदरेज और ऐसी ही तमाम कम्पनियों ने मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात में हजारों करोड़ के ग्रामीण विधुतीकरण और शहरी सुधार के टेंडर हासिल किए गए। जमीनी हकीकत यह रही कि टेक्निकल सुपरविजन का काम भी निजी कन्सल्टिंग फर्मों के हवाले रहा नतीजतन देश भर में किसी भी टेंडर के अनुरूप मानक काम नही हो सके। कम्पनियां फायदे के काम कर भाग गईं। खासबात यह है कि कम्पनियों को ये टेंडर पांच साल में लाइन लॉस यानी विधुत चोरी को 15 फीसदी पर लाने की शर्त पर मिले थे लेकिन एक भी कम्पनी इस पर खरी नही उतरी। किसी डिस्कॉम का लाइन लॉस आज 45 फीसदी से कम नही है। जाहिर है करोडों के यह ढांचागत काम आईएएस अफसरों एवं बड़ी कम्पनियों के गठजोड़ को भेंट चढ़ डिस्कॉम के दिवाले निकाल गए।Image result for discom

दूसरा पक्ष कम्पनियों के प्रशासनिक खर्चे बढ़ने का भी है। निगमों में कार्मिक, वाणिज्य, सदस्य पूरे राज्य के काम देखते थे लेकिन कम्पनी कल्चर के नाम पर हर अधीक्षण यंत्री कार्यालय में एच आर, आई टी मैनेजर, सीए, अकाउंट ऑफिसर के अलावा बड़ी संख्या में नॉन टेक्नीकल लोगों की भर्तियां कर ली गयी। इंजीनियर के पद नाम बदलकर प्रबंधक, महाप्रबंधक कर दिए और हर वितरण केंद्र पर लग्जरी गाड़ियां किराए पर उठा लीं गयी। बिलिंग सॉफ्टवेयर के नाम पर करोड़ों के घोटाले हुए। कॉलसेंटर,कलेक्शन सेंटर, फ्यूज कॉल रिस्पॉन्स जैसे कामों पर भी बेतहाशा धन खर्च हुआ। ये सब कर्ज के बोझ में ही हुआ ताकि निजी कम्पनियों के लिये वितरण व्यवस्था बढ़िया बनाकर दी जा सके। महंगी बिजली खरीदी के अनुबंध भी निजी कम्पनियों से ऐसी शर्तों पर हुए है कि डिस्कॉम को दिवालिया होने से कोई भी नही बचा पाया। उधर सरकारों ने चुनावी खैरात के लिये भी बिजली को ही चुना।

अब सरकार एक बार फिर विधुत अधिनियम 2003 में संशोधन करने जा रही है जो मूलतःनिजी कम्पनियों के हितों की ओर झुका है। बिजली मंत्री आरके सिंह ने लोकसभा मे इसे उपभोक्ताओं के हितों के अनुकूल बताया है लेकिन बुनियादी रूप से यह गांव, गरीब और किसानों के विरुद्ध इसलिये है क्योंकि इसके तहत निजी कम्पनियां मुनाफे वाले बड़े उपभोक्ताओं को बिजली देकर टोरंट पावर आगरा की तरह पैसा बनायेंगी और सरकारी कम्पनी ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों, गरीबों और आम उपभोक्ताओं को बिजली देगी जिससे वह केवल घाटे में ही चलेगी। क्रॉस सब्सिडी खत्म होने से उपभोक्ताओं को महंगी बिजली लेनी पड़ेगी। नोयडा, आगरा, दिल्ली की कम्पनियों के मुनाफे इस आशंका को प्रमाणित करते है।

Image result for discom

बेहतर होगा सरकार बिजली एक्ट में प्रतिगामी संशोधन वापिस ले और देश भर में बिजली बोर्डों की व्यवस्था को बहाल करें। सरकारी बिजली ग्रहों की क्षमता बृद्धि के लिए एक बेल आउट पैकेज जारी किया जाए। बिजली को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। प्रबंधन से अफ़सरशाही का दखल भी खत्म किया जाए। वस्तुतः बिजली क्षेत्र में निजी कम्पनियों का दावा कानूनी तौर पर खारिज हो चुका है।सबसे पहले यह प्रयोग उड़ीसा में हुआ था जहाँ रिलायंस को पूरा सिस्टम ठेके पर उठाया गया था। कम्पनी वहाँ काम नही कर पाई।सरकार ने जुर्माना लगाया तो मामला कोर्ट में गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी रिलायंस हार गयी। इसके बाबजूद मौजूदा संसद में निजीकरण को बढ़ाने वाले संशोधन लंबित है।

.
कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक मध्यप्रदेश के विभिन्न अखबारों में कार्यरत रहे हैं। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर औऱ राजनीति विज्ञान में पीएचडी है एवं लोकनीति के विश्लेषक हैं। सम्पर्क +919407135000, ajaikhemariya@gmail.com

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x