मुद्दा

दोयम रवैये का अंत आख़िर कब

 

धर्म कोई भी हो। सभी धर्म में महिलाओं के इज्जत और मान सम्मान की बात कही गयी है। हमें हमारा समाज हमेशा यही बताता आया है कि महिलाओं की इज्जत करनी चाहिए। खासकर हिन्दू धर्म में तो महिलाओं को देवताओं के समान माना गया है। लेकिन अगर इसी समाज में कोई अपनी बहन बेटी की ही इज्जत ना कर पाए तो वह कहीं न कहीं दुर्भाग्य की बात है। आए दिनों महिलाओं पर होते अत्याचार मीडिया जगत की सुर्खियां बनते है। बावजूद इसके हमारे हुक्मरानों के कानों पर न कोई जूं रेंगती और न ही हमारे सभ्य समाज पर इन बातों का कोई असर होता है। हमारे पुरुष प्रधान समाज ने तो मानो महिलाओं पर अत्याचार को ही अपनी नियति मान लिया हो। तभी तो समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार का कोई असर नहीं दिखता। उसके खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए कोई तैयार नहीं होता।

समाज कोई भी हो। चाहें वह सभ्य समाज हो या फिर पिछड़ा या अमीर। अत्याचार की शिकार महिलाएं हर जगह होती है। बस तरीक़े में बदलाव हो सकता है। वहीं गरीब और पिछड़ी महिलाओं पर होते जुल्मों की कोई कमी नही है। हमारे संविधान की धारा 14 हम सभी को समान अधिकार प्रदान करती है। लेकिन आज भी समाज के एक बड़े तबक़े की बात आती है तो रिश्तों के मायने बदल जाते है। जी हाँ पिछले दिनों ऐसी दो घटनाएं घटी जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? इतना ही नहीं क्या जीवन जीने की स्वतंत्रता भी अब ग़रीबी-अमीरी देखकर तय की जाएगी? बता दें कि पहली घटना अमीर खान और किरण राव की है। जो अपनी मर्जी से तलाक ले रहे है। जिसे हमारा सभ्य समाज खुशी खुशी स्वीकार कर रहा है।

तो वही दूसरी ओर अलीराजपुर में घटी एक घटना है। जहाँ एक लड़की को उसके भाई और परिवार के लोग सिर्फ इसलिए सरेआम पीटते है कि वह अपनी ससुराल से अपने मामा के घर आ जाती है। जिसकी सजा उसे पेड़ से लटकाकर डंडे मार कर दी जाती है। ये खबर भले ही हमारे अखबारों की सुर्खियां बनी हो। लेकिन इन सब बातों का किसी पर खास असर नही हुआ, क्योंकि अलीराजपुर की घटना एक साधारण सी महिला की है। अब ऐसे में बड़ा सवाल यहीं कि क्या अमीर परिवार के जीने का अलग तरीका होगा और गरीब का अलग? एक को जीवन में कब किसके साथ रहना है। कब नहीं रहना। हर बात की स्वतंत्रता है तो दूसरे को बिल्कुल नहीं? आख़िर ऐसा क्यों! क्या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वह छोटे से समाज से आती? ऐसे क़ायदे-क़ानून किस काम के जो अपने जीवन की डोर किसी दूसरे को थामने की इजाज़त दे? 

किसके साथ रहना है। नहीं रहना है। यह अधिकार सिर्फ़ नामी-गिरामी लोगों को ही तय करने का हक थोड़े न? यह तय करने का अधिकार सभी को है। फिर ऐसे में अलीराजपुर की घटना को क्या कहा जाए? वैसे भी हमारे समाज मे दर्द तकलीफ के मायने भी हैसियत के अनुसार बांट दिए जाते है। यह भी एक सच्चाई है। जहाँ एक ओर किसी रहीस के घर जानवर को भी दर्द हो तो बहुत बड़ी खबर बन जाती है। वही दूसरी और कही कोई गरीब इंसान पर जुल्म की बेइंतहा हो तो भी उसकी पुकार कोई नही सुनता है। वही सबसे ग़लत यह हुआ है कि हमने समाज के इस दोहरे रवैये को सहज ही स्वीकार कर लिया है। आज समाज की व्यवस्थाओं के खिलाफ बोलने पर हमारे अपने ही घर में हमारी आवाज को दबाने का प्रयास शुरु हो जाता है और गर हम साहस जुटा भी ले तो समाज मे हमारी बगावत को हमारी मर्यादा से जोड़कर देखा जाने लगता है।

  मालूम हो कि यहाँ पिता की जायजाद भले ही बेटे के नाम करने की प्रथा हो। लेकिन जब समाज के रीति रिवाजों की बात आती है तो उनका पालन सिर्फ़ महिलाओं को ही करना पड़ता है। कही न कही समाज मे महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार की प्रमुख वजह भी यही है। समाज कोई भी हो लेकिन परम्पराओं की बलि महिलाओं को ही चढ़ाया जाता है। ऐसे न जाने कितने रिवाज है जो सिर्फ महिलाओं के हिस्से ही लिखे जाते है। बात चाहे मुस्लिम समाज मे तीन तलाक की हो या फिर हिन्दू समाज मे बाल विवाह, कन्या दान या सती प्रथा की हो। हर रस्मों रिवाज का केंद्र महिलाएं ही होती है। वैसे कितनी अजीब बात है जब महिलाओं को समान शिक्षा या समान अधिकार की बात हो तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। 

इतना ही नहीं महिलाओं के साथ भेदभाव जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। उनके अपने ही घर से उन्हें यह शिक्षा दी जाती है कि उन्हें क्या करना और कैसे रहना है? और ग़लती से उसमें कुछ मिस्टेक हो गयी या फ़िर महिलाएं अपने हिसाब से चलने की कोशिश करती है। तो समाज मान-मर्यादा का हवाला देकर अलीराजपुर जैसी घटना को अंजाम देता है। जो कहीं न कहीं न मानवता के लिहाज से सही और न संविधान सम्मत, लेकिन क्या करें कोई बोलने वाला नहीं तो जो चल रहा जैसा चल रहा। सब उचित ही लगता है। सोचिए कैसा अजीबोगरीब हमारा समाज है कि बच्चे को नाम पिता का देना होता है लेकिन जब बात उसकी परवरिश या देखभाल करने की हो तो उसकी जिम्मेदारी मां को ही उठानी पड़ती है। महिलाएं चाहे घर के काम करे या फिर बाहर जाकर। फिर भी घर आकर घर का चूल्हा चौका उन्हें ही करना। जैसे यह विधि का विधान बन गया हो। 

देखा जाए तो हमारी सामाजिक व्यवस्था में पुरुषवादी सोच की जडें इस कदर मजबूत है कि कोई महिलाएं चाहे भी तो इस व्यवस्था से बाहर नही निकल सकती है। और अगर महिलाएं इस व्यवस्था से बाहर निकलने की कोशिश कर ले तो उस पर हमारा अपना ही समाज ऊँगली उठाना शुरू कर देता है। समाज ही नहीं परिवार। परिवार ही नहीं लड़की के भाई और बाप ही। जो कहीं न कहीं अलीराजपुर में भी देखने को मिला और ये कोई हमारे समाज की अकेली घटना नहीं। ऐसे में अब समय आ गया है। जब एक महिला को खुद से सवाल करना होगा कि वह जिस समाज मे जी रही है। क्या वह समाज उसके मुफीद है या नहीं, क्योंकि एक ही संविधान तले किरण राव और अलीराजपुर की बेटी दोनो के लिए अलग- अलग से नियम क्यों? किरण राव और आमिर खान अगर मर्ज़ी से अलग-अलग हो सकते। तो क्या एक सामान्य लड़की को अपने तरीक़े से जीवन जीने का भी अधिकार नहीं?

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लेखिका सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर स्वतन्त्र लेखन करती हैं। सम्पर्क sonaavilaad@gmail.com

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जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
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