कर्पूरी ठाकुर

सामजिक न्याय का सच्चा सिपाही

 

कर्पूरी ठाकुर (1924-1988) को अत्यंत पिछड़ी जाती के राजनेता के रूप में देखना उनके राजनीतिक संघर्ष और उनके जीवन को संकीर्ण दृष्टि से देखना है। उन्हें एक ऐसे जननायक के रूप में देखा जाना चाहिए जो गरीबों की लड़ाई लड़ते हुए किसान आंदोलन, समाजवादी आंदोलनों के विभिन्न चरणों में अपने जीवट और अपने कौशल के कारण ऐसी राजनीति करता रह सका जिसने लोकतंत्र को मजबूती दी। उन्होंने पिछड़े वर्ग की राजनीतिक लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपनी योग्यता से अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और अपने संघर्ष से यह सिद्ध किया कि राजनीति के क्षेत्र में समाज के दबे कुचले लोगों की लड़ाई लड़ी जा सकती है और यही रास्ता है जिसके द्वारा सचमुच के लोकतंत्र की स्थापना हो सकती है। 

कर्पूरी ठाकुर एक अत्यंत साधारण नाई परिवार में जन्मे थे। गरीब होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, हालांकि वे एक मेधावी छात्र थे। उनका राजनीति में प्रवेश कॉलेज छोड़कर राजनीति में “गांधी के आंदोलन में भाग लेने” के साथ हुआ। राजनीति में भ्रष्टाचार जिस राज्य में इतना अधिक माना जाता हो उस राज्य में दो बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी जीवन के अंत में जो अपना गाँव का घर भी न बनवा सके और जिसके पास जीवन भर की जमा पूंजी 33 हजार रुपये हो उसे अगर उनको विद्यार्थी जीवन से जानने वाले “अपनी तरह का अकेला और अंतिम आदमी जो बेदाग और प्रतिबद्ध” माने तो उस कथन को सत्य माना जाना चाहिए।

कर्पूरी ठाकुर के जीवन और उनके कृतित्व पर बात करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि उनके बारे में व्यवस्थित अध्ययन न के बराबर हुआ है। ले दे कर हवलदार त्रिपाठी सहृदय संपादित ‘कर्पूरी ठाकुर अभिनंदन ग्रंथ’ (1987) है और एक पुस्तक नरेंद्र पाठक द्वारा लिखित है।इसके अलावा कुछ श्रद्धांजलि स्वरूप लिखे लेख हैं और कुछ स्मृति के सहारे लिखे वृत्तान्त हैं। आज कर्पूरी एक विस्मृत व्यक्ति हैं। जिस कर्पूरी ठाकुर के कारण बिहार में पिछड़ी जातियों के नेतागण उभरे उन्होंने भी कर्पूरी की राजनीतिक दृष्टि को समझने और समझाने के लिए कुछ भी करना जरूरी नहीं समझा। 

इस लघु आलेख में उनके जीवन संघर्ष की एक संक्षिप्त चर्चा की गई है। 

जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है जो लोग कर्पूरी ठाकुर के नाई जाति के होने को ज्यादा हाइलाइट करके उन्हें जातीय राजनीति को बढ़ाने वाले एक नेता के रूप में ही देखते हैं वे गंभीरता से उनके बारे में विचार नहीं कर रहे होते हैं। कर्पूरी ठाकुर ने कभी भी जाति के आधार पर संघर्ष के लिए राजनीति नहीं की। अगर तथाकथित सवर्ण उनसे चिढ़ते रहे और उनको जाति विद्वेष बढ़ाने वाला मानते रहे तो यह उनकी भूल थी। अब कम से कम इस बात को स्वीकार करने की जरूरत है।

कर्पूरी ठाकुर कई अर्थों में बहुत बुद्धिमान राजनेता थे जो राजनीति के दांव पेंच को समझते थे। उनके राजनीति में ऊपर उठने में सवर्ण नेताओं का पूरा सहयोग रहा और उनके अपने जीवन में भी उनके उदार बने रहने के लिए थोड़ा क्रेडिट उनके गाँव के लोगों को भी दिया जाना चाहिए। उनके गाँव में बाबू साहबों (राजपूतों) का जोर था। लेकिन वे कर्पूरी ठाकुर के प्रति स्नेहिल थे और उनको पढ़ने लिखने के लिए उन्होंने प्रेरित भी किया। कर्पूरी ठाकुर के गाँव के लोगों की बातचीत के आधार पर एक बात और पता चलती है कि अपने छोटे से गाँव में जहां अधिकतर राजपूत थे, कुछ हरिजन और पिछड़ी जाति के लोग थे कर्पूरी जी ने हमेशा ध्यान रखा कि गाँव के राजपूत परिवार के लोग उनसे नाराज नहीं हों। 

गरीब नाई के युवा मन पर राजनीति से जुडने की प्रेरणा का आधार निश्चित रूप से गांधी के आंदोलन रहा होगा। गांधी ने यूं तो पूरे देश के ग्रामीण समाज को प्रभावित किया लेकिन विशेष रूप से पिछड़े ग्रामीणों ने उन्हें एक भगवान के रूप में ही देखा था इसमें संदेह नहीं। 

जब कर्पूरी 15 वर्ष के थे उनके गाँव के पास ओइनी (दरभंगा) में बिहार किसान सभा का अधिवेशन हुआ। कार्यानन्द शर्मा उसके सभापति थे। उस समय सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में समाजवादी लोग भी किसानों की लड़ाई में शामिल थे। वहीं नरेंद्र देव की पारखी आँखों ने युवा कर्पूरी में एक नेता होने की संभावना देख ली। कहते हैं कि युवा छात्र के रूप में उनके भाषण से नरेंद्र देव, राहुल सांकृत्यायन, बेनीपुरी और स्वयं सहजानंद प्रभावित हुए थे। उस समय से ही कर्पूरी ठाकुर समाजवादियों के साथ जुड़ गए। पहले उनको सिर्फ कर्पूरी के नाम से जाना जाता था लेकिन रामनन्दन मिश्र ने उनका एक भाषण सुनने के बाद प्रभावित होकर कहा कि ये कर्पूरी ठाकुर हैं और उसे इसी नाम से जानो! कर्पूरी ठाकुर की वक्तृता का प्रभाव सीधा पड़ता था इसकी गवाही सभी देंगे।

धीरे धीरे कर्पूरी ठाकुर कैसे समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में उभरे उसके बारे में अब तक किसी ने बहुत गहराई से शोध करके नहीं लिखा है। कुछ विवरणों से यह ज्ञात होता है कि 1940 के रामगढ़ कांग्रेस में एक स्वयं सेवक के रूप में थे। वहाँ वे गांधी के प्रभाव में अधिक थे, सुभाष से कम। 

अब तक के प्राप्त विवरणों के आधार पर यह कहना उचित होगा कि कर्पूरी ठाकुर को नेता बनाया 1942 के आंदोलन ने। सी एम कॉलेज दरभंगा में एक छात्रों की सभा में उनके जोशीले भाषण के बाद उसकी जो प्रतिक्रिया हुई उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अब प्रभावशाली होने लगे थे। सरकारी दमन के समय वे नेपाल चले गए और तीन महीने बाद लौटे। वे अब गाँव के एक स्कूल में अध्यापक बन गए ताकि उनको अंग्रेज सरकार को संदेह न हो। पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उन्होंने एक अनशन किया जिसे 29 वें दिन सफलता मिली। कर्पूरी ठाकुर भागलपुर कैम्प जेल में 13 महीने रहे। कुल मिलाकर वे पच्चीस महीने जेल में रहे और उन्हें नवंबर 1945 में छोड़ा गया। इसी दौरान जेल में वे समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। विधिवत सदस्यता उन्होंने 1946 में ली। उसके बाद सी एस पी के प्रथम मंत्री बन गए और राज्य भर में उनके दौरे होने लगे। उसके बाद जब आजाद हिन्द फौज के अफसरों पर लाल किले में मुकदमा चला उस समय कर्पूरी ठाकुर ने आंदोलन चलाया। उनके नेतृत्व में समस्तीपुर में आजाद हिन्द के अफसरों – कर्नल ढिल्लन और शहनवाज़ के समर्थन में युवाओं ने नारे लगाए। यह वह दौर था जब कांग्रेस के भीतर समाजवादियों ने किसान मजदूरों के हित में संघर्ष तेज किया था। वे गांधी के साथ थे, नेहरू के प्रति भी आशा की दृष्टि से देखते थे लेकिन कांग्रेस के भीतर के दक्षिणपंथी रुझान के प्रति बहुत संशय रखते थे। 1939 के बाद एक बार फिर से समाजवादी दल के लोगों ने 1946 में आंदोलन किए। इसी दौर में 1947 में इलियास नगर एवं विक्रम पट्टी के जमींदारों के विरुद्ध कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में हुए आंदोलन को सफलता मिली। गांधीवादी आदर्श और समाजवादी संगठन के साथ चलते हुए उस समय के समाजवादी नेता के रूप में कर्पूरी ठाकुर को देखा गया। उन्हें बिहार में अपने साथ उत्तर और मध्य बिहार के एक बड़े इलाके के कार्यकर्ताओं के साथ जुडने का मौका भी इसी समय मिला। 

कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं के लिए एक संकट तब खड़ा हुआ जब कांग्रेस में उनको एक अलग खेमे के रूप में रहने और कांग्रेस को छोड़कर अलग दल बनाने के बीच एक चुनाव का सीधा विकल्प सरदार पटेल ने दिया। अब कांग्रेस के भीतर समाजवादी के लिए स्थान नहीं था। अंततः मार्च 1948 के नासिक सम्मेलन में भारतीय समाजवादी दल की स्थापना हुई। कर्पूरी ठाकुर इस नए राजनीतिक परिवेश में जमीनी स्तर के प्रभावी नेता के रूप में उभरे। वे 1948 से लेकर 1952 के बीच के समय में समाजवादी दल के संगठन को मजबूत करने में लगे रहे। उनका प्रभाव बढ़ा और जिस 1952 के चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले में समाजवादी दल के बेनीपुरी कैसे प्रभावशाली नेता असफल हुए कर्पूरी ठाकुर ताजपुर (दरभंगा) से निर्वाचित हुए। इसके बाद वे कभी नहीं हारे। 

विधान सभा में कर्पूरी ठाकुर अल्प मत में थे लेकिन जैसे राज नारायण उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी नेतृत्व को चुनौती दे रहे थे वैसे ही कर्पूरी ठाकुर बिहार में कांग्रेसी नेतृत्व को चुनौती देते रहे। 

समाजवादी दल के नेता के रूप में उन्हें देश के बाहर जाने का मौका भी उन्हें मिला जिससे उन्हें मार्शल टीटो जैसे नेताओं से भी मिलने का मौका मिला। युगोस्लोवाकिया और इजराइल के उनके अनुभवों से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। 

1952 के चुनाव में कांग्रेस के हाथों मिली हार से समाजवादी खेमा स्तब्ध था और उसके दो टुकड़े हो गए। रामनन्दन मिश्र ने राजनीति छोड़ दी और अब कर्पूरी ठाकुर बिहार के समाजवादी दल में सबसे बड़े नेताओं में एक बन कर उभरे। ध्यान देने की बात यह है कि इस टूट के बाद कर्पूरी ठाकुर जयप्रकाश नारायण के साथ रहे लोहिया के साथ नहीं। यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है कि सहजानंद की किसान सभा के दौर में राजनीति में आए कर्पूरी ठाकुर ने 1940 में सुभाष की तुलना में गांधी को चुना और 1952 में लोहिया के मुकाबले जयप्रकाश नारायण को चुना। लेकिन जल्दी ही उनका मोहभंग हो गया। यह संदेह तब बढ़ा जब जे पी ने नेहरू से बात की। कांग्रेस के साथ इस तरह का सहयोगी रवैया कर्पूरी को बेमानी लगा और जे पी के प्रस्ताव को बैतूल में 1953 में गिराने के समय कर्पूरी जे पी के प्रस्ताव के विरोध में थे। कर्पूरी ठाकुर के लिए कुछ चीजें लगातार बनी रहीं। वे कांग्रेस की राजनीतिक नेतृत्व पर संदेह करते थे और पूरी कोशिश करते थे कि कांग्रेस के माया जाल में वे नहीं फँसें। कई समाजवादी इस मामले में उतने सावधान नहीं थे और वे राजनीति करते हुए कांग्रेस के साथ चले गए।

1957 में भी कर्पूरी ठाकुर चुनाव जीते। कर्पूरी ठाकुर का कद इतना बढ़ गया था कि पार्टी के भीतर से ही उनकी उम्मीदवारी को रद्द करने की कोशिश की गई, लेकिन वह षड्यन्त्र सफल नहीं हो सका। जो लोग कर्पूरी ठाकुर की बढ़ती राजनीतिक शक्ति को कम करने की कोशिश कर रहे थे उनमें दो नाम – सूरज नारायण सिंह और बसावन सिंह प्रमुख थे। दोनों दिग्गज नेता थे, लेकिन चुनावी राजनीति के मामले में वे कर्पूरी ठाकुर से बहुत पीछे थे। वे हार गए और कर्पूरी जीत गए!

जे पी भूदान और सर्वोदय आंदोलन के साथ गए और विनोबा के साथ हो गए इस बात का उल्लेख सब जगह किया जाता है लेकिन इस बात का उल्लेख कम होता है कि कर्पूरी ठाकुर भी इस आंदोलन से गहरे जुड़े हुए थे। विनोबा के करीबी होने के बावजूद वे राजनीति से अलग नहीं हुए। जनता से जुड़े रहने के कारण कर्पूरी ठाकुर महत्त्वपूर्ण बने रहे। धनिकलाल मण्डल ने उनके बारे में यह सुंदर बात कही है : “वे जन-भाषा, जन-भूषा, जन-भोजन, जन-भावना के पोषक थे। कर्पूरी ठाकुर यद्यपि अंग्रेजी जानते थे और ज्ञान के लिए पढ़ते भी थे लेकिन वे कभी भी अंगरेजी का सार्वजनिक व्यवहार नहीं करते थे।” गांधी की भाषा नीति के कर्पूरी हमेशा समर्थक रहे। वे हिन्दी उर्दू के पचड़े में कभी नहीं फंसे और उन्होंने हिन्दुस्तानी का समर्थन किया। एक समय उनको “मौलवी कर्पूरी” उनके उर्दू के पक्षधर होने के कारण कहा भी गया। वे जाड़े में कुर्ते पर कुर्ता पहनते थे और कहीं भी किसी के भी यहाँ समभाव से रहते और खाते पीते थे। वे सचमुच लोहिया के असली अनुयायी थे। 

1960 के बाद नेहरू के कांग्रेस के प्रति अविश्वास बढ़ा और गैर काँग्रेसवाद की लोहिया की नीति को अमली जामा पहनाने की राजनीतिक कोशिशें तेज हुईं। इस दौर में लोहिया के नजदीक होना कर्पूरी ठाकुर के लिए स्वाभाविक था। 1965 में सोशलिस्ट एक संयुक्त दल के रूप में 29 जनवरी को सारनाथ में एक साथ आ गए।इसके लिए लोहिया के साथ कर्पूरी की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण थी। उनकी भूमिका को इस बात से समझा जा सकता है कि लोहिया ने कहा कि “मुझे अगर प्रत्येक प्रांत में कर्पूरी ठाकुर जैसा एक कार्यकर्ता मिल जाए तो मैं पूरे देश में कांग्रेस का सफाया कर दूँ।” 

बिहार में 1967 के चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के दल को 67 सीटों पर विजय मिली। उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन कांग्रेस के विरुद्ध लामबंद होने के लिए उन्होंने महामाया प्रसाद सिंह को मुख्यमंत्री के रूप में समर्थन दिया और खुद उपमुख्यमंत्री बने। इस समय की सबसे बड़ी घटना यह थी कि उन्होंने अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम और अनिवार्यता को खत्म कर दिया। इस मुद्दे पर दो मत हैं। अधिकतर लोगों को लगता है कि इससे हरिजन और अत्यंत पिछड़ों को इससे लाभ हुआ। 

कर्पूरी ठाकुर कुछ अधिक कर नहीं सके और दो महीने में ही वह सरकार गिरा दी गई। दिलचस्प है कि मण्डल कमीशन के निर्माता बी पी मण्डल की भूमिका इसमें महत्त्वपूर्ण रही। 1969 के चुनाव हुए और वे विपक्ष में रामानंद तिवारी (शिवानंद तिवारी के पिता और अपने समय के बड़े नेता) के नेतृत्व में विपक्ष में रहे। लेकिन सिद्धांत को उन्होंने बहुत बड़ी दीवार नहीं बनने दी जब 1970 में मुख्य मंत्री के पद की बात चली। उलटफेर के उस दौर में कर्पूरी ठाकुर ने रामानंद तिवारी की तरह इस तरह का हठ नहीं रखा कि जनसंघ से मिलकर सरकार नहीं बनाएंगे। वे मुख्यमंत्री बने और अपने साथ रामानंद तिवारी को भी मंत्री मण्डल में ले आए!

उनकी सरकार को छह महीने से भी कम समय तक चलने दिया गया। 1972 के चुनाव में इंदिरा लहर के दौर में भी वे जीत गए। 

उस समय के प्रतिपक्ष के नेताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इंदिरा गांधी के प्रभाव का राजनीतिक मुकाबला करना। यह एक तरह से नए प्रकार की लामबंदी का समय था। ऐसे में कर्पूरी ठाकुर और राज नारायण दोनों ने प्रभावशाली किसान के नेता के रूप में चरण सिंह को आगे बढ़ाया। असली राजनीतिक संघर्ष कर्पूरी और राज नारायण जैसे नेताओं ने किया था लेकिन इसका लाभ जाट और यादव जाति के दबंग नेताओं को मिला। 

यह कांग्रेस विरोधी राजनीति में बहुत निर्णायक सिद्ध हुआ और एक तरह से कर्पूरी ठाकुर के लिए नुकसानदेह भी। नरेंद्र पाठक ने सच्चिदानंद, लाडली मोहन निगम और कपिलदेव सिंह के हवाले से यह कहने की कोशिश की है कि “कर्पूरी ठाकुर की पार्टी अब अभिजात्य किसानों के हमदर्द के रूप में भारतीय लोक दल में परिवर्तित हो गई।”

1974 में राजनीतिक आंदोलनों का एक नया दौर शुरू हुआ। इस समय के नायक जे पी थे। राष्ट्रीय स्तर पर वे इस नए समय के गांधी थे। जे पी को कर्पूरी से बड़ी मदद मिली। जे पी के आह्वान पर सबसे पहले उन्होंने ही विधान सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दिया। 

अब परिस्थितियाँ ऐसी बन गई थी कि एक बार फिर कर्पूरी ठाकुर 1942 के दौर की तरह छिपने के लिए नेपाल गए। लेकिन अधिक दिनों तक यह सिलसिला नहीं चल सका। भेष बदल कर वे 20 सितंबर, 1975 को भारत लौटे और देश भर के गैर वामपंथी नेताओं (हालांकि ज्योति बसु से उन्होंने संपर्क किया था) के संपर्क करते रहे। लगातार 19 महीने तक प्रदेश का पूर्व मुख्यमंत्री भूमिगत संघर्ष करने में लगा रहा! 

18 जनवरी 1977 को जनता पार्टी बनी। मोरारजी देसाई के आवास पर हुई सभा में यह हुआ। कर्पूरी वहीं थे। 30 जनवरी को पटना की जे पी की सभा में नाटकीय ढंग से कर्पूरी ठाकुर ने गिरफ़्तारी दी। 13 दिनों तक जेल में रहे। उसके बाद क्या हुआ यह सबको ज्ञात है। इंदिरा गांधी की हार हुई और जनता पार्टी जीत गई। 1977 के चुनावी संग्राम में वे जी जान से लड़े और अपनी ओर से उन्होंने हर अच्छे नेता को इससे जोड़ने की कोशिश की। जॉर्ज फर्नांडीस के जीवनी लेखक राहुल रामगुंडम ने एक चिट्ठी को अपनी पुस्तक में रखा है। उसमें कर्पूरी ने जॉर्ज को लिखा है कि वह मुजफ्फरपुर से चुनाव निश्चिंत होकर लड़ें, कोई चिंता न करें। अगर उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा तो उनके साथ वे संबंध खत्म समझें।

चुनाव जीतने के बाद कर्पूरी ठाकुर चाहते थे कि जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनें। ऐसा नहीं हो सका। बाद में वे सत्येन्द्र नारायण सिंह को पराजित कर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह 24 जून 1977 का दिन था। वे इस बार 22 महीने तक टिक सके। उस दौरान उनके किए गए प्रयासों में एक किस्म की विविधता है जिसके बारे में कोई एक तरह की राय देना मुश्किल है। वे कितने स्तरों पर प्रयास कर रहे थे उसका कोई भी विधिवत विश्लेषण आज तक नहीं हुआ है। वे सीधे कार्य करने के पक्ष में थे। ब्यूरोक्रेसी का वैसा समर्थन उन्हें नहीं मिला। वे सीधे जनता के साथ जुडने के कई अभिनव प्रयोगों की तरफ बढ़े। सीधी जनता के साथ जुडने की उनकी नीति के बारे में कुछ लोगों ने विचार करके एक सैद्धांतिकी के निर्माण की कोशिश की है जिससे कि सीधे जनता के हाथ में देने की प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। मुख्यमंत्री के रूप में खुद अपने हाथों से इंजीनियरों को नियुक्ति पत्र गांधी मैदान में देने जैसा काम उन्होंने किया। एक मुख्यमंत्री की छटपटाहट को उनके विभिन्न प्रयासों में देखा जा सकता है। 

कर्पूरी ठाकुर के 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ कामों को लेकर ध्यान से चर्चा नहीं हुई। एक तरह से उनके ऊपर चौतरफा हमला हुआ। वे किस हद तक अपने लिए समर्थन ढूंढ रहे थे उसके बारे में उस समय उनके द्वारा किए गए कामों की बड़ी सूची देखी जा सकती है। एक बार वे चीन के क्रांति के नायक माओ की प्रतिमा पर फूल चढ़ाने गए और उनके आदर्शों पर चल कर संघर्षशील गरीबों के जीवन में सुधार लाने का आह्वान किया। कर्पूरी ने मुंगेरी लाल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा 1978 में करके बहुत सारे लोगों को रुष्ट कर दिया था। बाद में उन्होंने लचीलापन दिखते हुए 26 को बीस प्रतिशत किया और बाकी के 6 में से 3 प्रतिशत उच्च जाति के आर्थिक रूप से पिछड़ों और तीन प्रतिशत को स्त्रियों के लिए आरक्षित करने की घोषणा की थी। यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि नीतीश कुमार ने बाद में इस मामले में कर्पूरी ठाकुर का अनुसरण करने की कोशिश ही की है जिसका बहुत लाभ उनको मिला। भूमि सुधार के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ी कोशिश की लेकिन दुर्भाग्य से अब तक उसकी चर्चा नहीं हो सकी है। इतने कम समय में इतनी कोशिशों के बीच उनपर हर ओर हमला होता रहा। यह एक ऐसा दौर था जब आरक्षण के प्रश्न पर जॉर्ज फर्नांडीस के ऊपर इतना थूका गया कि उनका खादी का कुर्ता गीला हो गया।

सत्ता से हटने के बाद उन्होंने नए सिरे से काम करना शुरू किया। इस नई परिस्थिति में उनको लोकदल छोड़ना पड़ा। 1982 में उन्होंने देवी लाल, जॉर्ज फर्नांडीस और मधु दंडवते आदि के साथ मिलकर एक नई पार्टी लोकदल (कर्पूरी) बनाई। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की विशेष परिस्थिति में कर्पूरी ठाकुर जीवन में पहली बार किसी चुनाव में हारे। वे समस्तीपुर लोकसभा केंद्र से पराजित हुए। मार्च 1985 में सोनबरसा विधानसभा से जीतकर ये और प्रतिपक्ष के नेता बने। उनकी भिड़ंत अध्यक्ष से हुई और उन्हें प्रतिपक्ष के नेता पद से हटा दिया गया। उनके विपक्ष के नेता पद से हटाए जाने के पीची शिव चंद्र झा की बड़ी भूमिका थी। 

इन सब दांव पेंच के बावजूद कर्पूरी ठाकुर प्रभावशाली बने रहे। यह आज किसी को शायद याद न हो कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के कांग्रेस से निकल कर आने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नेता के रूप में उभरने के अभियान को तब तक सफलता नहीं मिली जब तक कर्पूरी ठाकुर ने समर्थन नहीं दिया। 1988 में अगर उनकी अचानक मृत्यु नहीं होती तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे उस समय मुख्यमंत्री बनते जिस समय श्री लालू प्रसाद यादव बने। 

इस महान जननेता के लगभग पाँच दशक के संघर्ष का इतिहास जब भी ठीक से लिखा जाएगा लोग पाएंगे कि स्वाधीनता के उपरांत के चार दशकों के बिहार के वे सबसे बड़े नेता थे। श्री कृष्ण सिन्हा ने मुख्य मंत्री के रूप में बहुत सम्मानपूर्वक कार्य किया। लेकिन जिस परिवेश से उठकर कर्पूरी ठाकुर ने बिहार के गरीबों की राजनीतिक लड़ाई का नेतृत्व दशकों तक किया उसके हिसाब से उनका महत्त्व श्री कृष्ण सिन्हा से कम नहीं। उस महान नेता के संघर्ष को याद करके हमारा सिर उनके सम्मान में झुक जाना चाहिए। कम से कम इस बात को तो लोग स्वीकार करेंगे ही कि सामाजिक न्याय का जो संघर्ष बिहार में हुआ उसके असली कर्णधार वहीं थे। सत्ता में उनकी राजनीति के अनुयायी – श्री लालू प्रसाद यादव और श्री नीतीश कुमार आए लेकिन असली संघर्ष तो कर्पूरी ठाकुर का ही था। यह एक चिंता का विषय है कि इस नेता पर अध्ययन न के बराबर है, इस बात पर इन दोनों में किसी का ध्यान नहीं गया। कर्पूरी ठाकुर ने विधिवत पुस्तक लिखा नहीं लेकिन उनके जो भाषण हैं उनको संग्रहित करने का काम भी नहीं हो पाया है। 

यह प्रश्न भी कोई अगर पूछे कि सामाजिक न्याय की लड़ाई का चेहरा कैसा होता यदि वे दस साल और जीते और बिहार के मुख्य मंत्री के रूप में उन्हें सिर्फ अठारह महीने नहीं मिले होते, कम से कम पाँच बरस मिले होते तो इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है की राज्य की राजनीति कुछ और ही होती। उनके घोर विरोधी श्री जगन्नाथ मिश्र ने उनकी मृत्यु के बाद जो उनको श्रद्धांजलि दी है उसे पढ़कर जाना जा सकता है कि उनके विरोधी भी उनका कितना सम्मान करते थे। “बिहार का कीमती मोती” कहकर श्री मिश्र ने अतिरिक्त उदारता का परिचय नहीं दिया था। वे जन-गण-मन नायक थे। और ऐसे लोग अधिनायक कहाँ बन पाते हैं!

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हितेन्द्र पटेल

लेखक इतिहास के प्राध्यापक और उपन्यासकार हैं। सम्पर्क +919230511567, hittisaba@gmail.com
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