कर्पूरी ठाकुर

मितव्ययी और विशाल हृदय वाले नेता कर्पूरी ठाकुर

 

जरा सोचिये, आपके पिता को कुछ लोग परेशान करे या गाली-गलौच करते हुए हाथापाई करे तो आपको कैसे लगेगा? आपका रिएक्शन क्या होगा? अवश्य, आप अपने पिता के साथ ऐसी बदसलूकी करने वाले से बदला लेंगे। अवश्य ही आप पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज करवाएंगे और चाहेंगे कि उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले। हो सकता है, आप कुछ लोगों को साथ लेकर उसे सबक सिखाने के लिए पीट-पाट दें। अगर आप की जगह कोई आई.ए.एस. या आई.पी.एस. अधिकारी के पिता जी के साथ ऐसा सलुक करदे तब तो पुलिस वाले ही पीट-पीटकर खाया-पिया निकाल दे और आज के दौर में ऐसी घटना किसी विधायक या मंत्री के पिता के साथ हो जाए तो उसका तो बचना ही मुश्किल हो जाएगा। गिरफ्तार करके, आपको जेल में डाल देंगे, जिसकी जमानत भी नहीं होने देंगे, कई साल तक और ऐसी घटना यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के पिता के साथ हो जाय तो वे तो उसे एनकाउन्टर कर देंगे और उसके मकान, दुकान सभी को बुलडोज भी कर देंगे। लेकिन आपको आश्चर्य होगा एक ऐसे मुख्यमंत्री के पिता को पीट दिया तो मुख्यमंत्री ने कहा यह तो सामान्य घटना है हमारे देश में ऐसा तो गरीब वंचित लोगों के साथ होता रहता है इसलिए इन्हें छोड़ दीजिए।

उन्होंने कहा कि जब ऐसी सभी घटनाओं का संज्ञान लेकर कार्यवाही होने लगे। तब इन पर भी कार्यवाही करना पुलिस का दायित्व है कि वे ऐसी घटना ना होने दे और होने पर तत्काल कार्यवाही करे, पर केवल मेरे पिता के आरोपियों पर कार्यवाही से कुछ नहीं होगा, सभी पिताओं पर ऐसी विभिन्न घटना होने पर कार्यवाही हो। जी हां, यह बिहार के पहले वंचित वर्ग के मुख्यमंत्री थे और नाम था कर्पूरी ठाकुर। आज अगर बिहार में राजनेताओं के तौर पर किसी को याद किया जाता है तो वह जननायक कर्पूरी ठाकुर ही हैं। इसकी बड़ी वजह है इन्हें याद करने की तो उनके पद पर रहते हुए बिहार के लिए किये काम हैं। ये दो बार मुख्यमंत्री रहे। 10 बार विधायक रहे। एक बार नेता प्रतिपक्ष रहे और एक बार उपमुख्यमंत्री रहे।

लेकिन दोनों बार अपना मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये। क्योंकि उनके कार्यो से गरीब और वंचित तो खुश थे लेकिन संवर्ण और धनी लोग नाराज थे। कर्पूरी जी राजनीति में एक ऐसा उदाहरण है जो आज ही नहीं भविष्य में भी लोगों को प्रेरणा देते रहेंगे।

जननायक कर्पूरी जी आत्मकथा

कर्पूरी ठाकुर कांग्रेस समाजवादी पार्टी के सदस्य बने। महात्मा गांधी के त्याग और सेवा से तो सभी प्रभावित थे लेकिन कर्पूरी जी पर डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोक नायक जय प्रकाश जी और आचार्य नरेन्द्रदेव के कर्मो और विचारों का भी बहुत असर पड़ा, जिसे उन्हें अवसर मिलने पर पूरा करके दिखाया।

‘‘कमाने वाला खायेगा और लूटने वाला जाएगा’’ के नारे के साथ कर्पूरी जी ने अपनी राजनीति का प्रारम्भ किया। अपनी उच्च शिक्षा को छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाले कर्पूरी जी को अंग्रेजों के राज में दो बार जेल जाना पड़ा, लेकिन आजाद भारत के कांग्रेस सरकार ने कर्पूरी जी को 18 बार गिरफ्तार किया और जेल भेजा। 1952 में पहला विधायक का चुनाव लड़ा और जीता, बाद में लगातार सभी चुनाव जीतते रहे। इतना ही नहीं, कर्पूरी जी को हराने के लिए कांग्रेस पार्टी ने एडी से चोटी का जोर लगाया, यहां तक कि तात्कालिक प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी भी उनके खिलाफ प्रचार करने आई, लेकिन वे भी हरा नहीं पाई। डॉ. लोहिया ने विशेष अवसर का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था, जिससे वंचित लोगों को आरक्षण का लाभ मिले और वे भी मुख्य धारा में आ जाए, उसके लिए उन्होंने एक नारा दिया था ‘‘संसोपा ने बांधी गांठ सौ में पांवे पिछड़े साठ’’।

जब वे मुख्यमंत्री थे, तब उनके द्वारा दिया गया यह नारा याद था, उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए मुंगेरीलाल कमीशन बनाया और उनकी रिपोर्ट के आधार पर मण्डल कमीशन के भी 11 साल पहले पिछड़ों को 26 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की। इतना ही नहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग की केटेगरी बनाई। उन्होंने अति पिछड़ों को 12 फीसदी आरक्षण दिया तो पिछड़ों को 8 फीसदी आरक्षण दिया 3 फीसदी महिला के लिए व 3 फीसदी आरक्षण साधारण लोगों के लिए भी रखा। कर्पूरी जी के दबाव में ही मण्डल कमीशन का गठन किया गया। लेकिन उन सिफारिशों को कांग्रेस सरकार ने लागू नहीं किया और वी.पी. सिंह ने उसे लागू किया। 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ा वर्ग के लिए वी.पी. सिंह जी ने सुनिश्चित किया। कर्पूरी जी दो बाद मुख्यमंत्री रहने वे बावजूद वे रिक्शा व बस से यात्रा करते थे। वे ऐसे ईमानदार और गरीब वर्ग के हमदर्द थे। कर्पूरी जी ने कई भूमिहीन लोगों को 5 बीघा जमीन आवंटित की, लेकिन अपने लिए घर तक नहीं बनाया। एक ऐसा मुख्यमंत्री था, जिसके पास रहने को अपना कोई आवास नहीं था। अपनी विरासत में कोई सम्पति नहीं थी। वो ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने कभी अपने परिवार को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया।

 

डॉ. लोहिया उन दिनों ‘‘अंग्रेजी हटाओ’’ आन्दोलन चला रहे थे। कर्पूरी ठाकुर, राजनारायण, मधुलिमये, जार्ज फर्नाडिस जैसे नेता उस आन्दोलन में डॉ. लोहिया के साथ अग्रिम नेताओं में थे। कर्पूरी ठाकुर को जब उप मुख्यमंत्री बनाकर शिक्षामंत्री का प्रभार दिया गया तो जो पहला काम उन्होंने किया, वो था दसवीं बोर्ड की परीक्षा में कोई बच्चा अंग्रेजी विषय में फेल होने से फेल नहीं माना जाएगा। माने अंग्रेजी विषय में पास होना जरूरी नहीं है। डॉ. लोहिया के ‘‘अंग्रेजी हटाओ’’ आन्दोलन की प्रेरणा से यह आदेश निकाला गया। दूसरा, उनका काम इससे भी विलक्षण था और वो था स्कूली शिक्षा में आठवीं तक फीस माफ। आठवीं तक के बच्चों की कोई फीस नहीं लगेगी। इन दोनों कामों से स्कूल शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन हुआ, बच्चों का ड्रॉप आउट कम हो गया और इससे शिक्षा का प्रसार हुआ। उन्होंने बिहार में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा दिया।

1985 में कर्पूरी ठाकुर चरण सिंह चैधरी के साथ लोकदल में थे, उस समय बिहार में चुनाव होने वाले थे और राजनारायण उम्मीदवारों से बात करने और टिकट फाइनल करने पटना आये हुए थे। उस लिस्ट में एक नाम कर्पूरी जी के बेटे रामनाथ ठाकुर का भी था। पहले तो राजनारायण जी ने यह बात नहीं बताई, पर जब कर्पूरी जो को यह पता चला कि उनके बेटे रामनाथ को भी टिकट दिया जा रहा है। वो अड़ गये और बोले, मेरे बेटे का नाम इस लिस्ट से निकालो।

उन्होंने साफ कहा कि मैं और मेरा बेटा रामनाथ में से एक ही चुनाव ही लड़ेंगे और जब बेटा इतना होशियार हो गया है और विधायक का चुनाव लड़ सकता है तो मैं क्यों लड़ू? पार्टी ने देखा कि कर्पूरी चुनाव नहीं लड़ेंगे तो क्या चुनाव होगा? और कैसे जीत पाएंगे इसलिए बेटे का नाम काट दिया। कर्पूरी जी कितने पक्के सिद्धान्तवादी थे, यह इस बात से मालूम होता है। आज तो बाप, बेटे, बहू सब को टिकट चाहिये। परिवारवाद का विरोध करने वाली पार्टी के कई नेता और उनके बेटे और पोते तक साथ चुनाव लड़ रहे है। स्व. कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह इसके साफ उदाहरण है।

कर्पूरी जी के ऐसे सिद्धान्तिक निष्ठा के कई किस्से है अगर लिखे जाय तो एक लेख नहीं, कई पुस्तकें लिखनी पड़ेगी और लिखी भी गई हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ, कर्म और वाणी में एक रूपता रखने वाले राजनेता के पद-चिन्हों पर या उनके दिखाये रास्ते पर चल कौन रहा है? कर्पूरी ठाकुर ने खूब सारी गालियां सुनकर भी पिछड़े वर्ग को सम्बल देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की। आज के नेता तो शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योगों का निजीकरण करके आरक्षण को समाप्त करने का काम कर रहे हैं। आज सरकारी कम्पनियां बेची जा रही है और सरकार में भी ठेकेदारी प्रथा पर काम कराया जा रहा है। यह सब तो आरक्षण समाप्त करने के उपक्रम है। लाखों ही नहीं, करोड़ों में आज भ्रष्टाचार हो रहा है, उसमें कर्पूरी जी जैसे नेता, जो अपनी बेटी के लिए लड़का देखने के लिए भी एक टैक्सी, जीप में बैठ कर गये थे जबकि मुख्यमंत्री आवास में सरकारी कारों की कोई कमी नहीं थी। ऐसे अनुकरणीय कर्पूरी जी को सादर नमन एवं श्रद्धांजलि

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हिम्मत सेठ

लेखक महावीर समता सन्देश के संपादक हैं। +919460693560, himmatseth@gmail.com
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