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मैं कहता आँखन देखी

नहीं कारगर साबित हुआ भाजपा का ‘पुलवामा-बालाकोट’ फार्मूला

 

  • नवल किशोर कुमार

 

हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव व कई अन्य राज्यों में हुए उपचुनाव के परिणाम आ चु के हैं। हालांकि महराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की सरकार का बनना तय हो गया है। वहीं हरियाणा में बहुमत से 6 सीटें कम जीतने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने की दिशा में अग्रसर है। इसके लिए उसने गोपाल कांडा जैसे विधायक का साथ लिया है जो एयर होस्टेस गीतिका शर्मा के साथ बलात्कार और उसकी खुदकुशी के मामले में आरोपित रहा है। अन्य राज्यों में भी भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। यह हालत तब है जब भाजपा के कोर एजेंडे में मूल मुद्दों यथा बेरोजगारी, महंगाई और बदहाल होती अर्थव्यवस्था के बजाय पाकिस्तान के साथ सीमा पर ‘रगड़ा’ रहा और सरकार ने सत्ता की राजनीति के लिए सेना का इस्तेमाल किया।

ध्यातव्य है कि बीते 20 अक्टूबर को यानी मतदान के ठीक एक दिन पहले भारतीय सेना द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में कथित तौर पर आतंकी कैंपों पर हमला कर नष्ट किये गये। इससे संबंधित खबरों को पूरे देश में प्रमुखता से अखबारों में छापा/छपवाया गया। हरियाणा में तो एक प्रमुख दक्षिणपंथी दैनिक हिंदी ने इस खबर के साथ भाजपा का विज्ञापन भी प्रकाशित किया।

सनद रहे कि इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव के ठीक पहले 14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमला हुआ और इस घटना में 40 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना को लेकर कई तरह की खबरें तब सामने आयी थीं। बाद में सीआरपीएफ की आंतरिक रिपोर्ट ने इसे खुफिया चूक का परिणाम कहा था। इस घटना ने देश की जनता का ध्यान उन मुद्दों से अलग कर दिया जो महंगाई, रोजगार आदि से जुड़े थे। तब पूरे देश में भाजपा के खिलाफ माहौल भी बन चुका था। इसी क्रम में 26 फरवरी को इंडियन एयर फोर्स ने पाकिस्तान के बालाकोट इलाके में एयर स्ट्राइक किया और यह दावा किया कि उसने 200-300 आतंकी मार गिराए हैं। हालांकि वायु सेना ने इस आपाधापी में अपने ही एक हेलीकॉप्टर को मार गिराया। यह स्वीकारोक्ति वायु सेना के नये प्रमुख आर. के. भदौरिया ने पद संभालने के बाद की।

खैर, राजनीति में सेना का इस्तेमाल और लोगों को राष्ट्र के नाम फुसलाने की भाजपा की यह कोशिश उस तरह कामयाब नहीं हो सकी, जिसकी उसे अपेक्षा थी। मसलन बिहार में समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए उपचुनाव में उसे सफलता जरूर मिली परंतु पांच विधानसभा क्षेत्रों में से केवल एक नाथनगर विधानसभा क्षेत्र में जदयू के उम्मीदवार को जीत मिली है। यूपी में वह क्लीन स्वीप के खेल को नहीं दोहरा सकी। प्रदेश के 11 विधानसभा क्षेत्रों में से सात पर भाजपा, सपा को दो और अपना दल को एक सीट मिली है। वहां बसपा को बड़ा नुकसान हुआ है। सपा से गठबंधन तोड़ने के बाद उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली।

पूर्वोत्त्तर के राज्य असम में भाजपा का अपराजेय साबित हुई है। वहां चार विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में उसे तीन पर जीत मिली है। जबकि एक सीट पर एआईयूडीएफ ने बाजी मारी है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में इस बार कांग्रेस के लिए अच्छी खबर है। छह सीटों पर हुए उपचुनव में परिणाम 3-3 रहा। यानी भाजपा को भी तीन सीटें मिलीं और कांग्रेस को भी। राजस्थान में दो विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए। वहां भाजपा को कोई सीट नहीं मिली। कांग्रेस और आरएलपी को एक-एक सीट मिली।

वहीं दक्षिण के राज्यों की जनता ने भाजपा को बुरी तरह खारिज किया। तामिलनाडु में दो सीटों पर उपचुनाव हुए और दोनों पर अन्नाद्रमुक को जीत मिली। इसी प्रकार केरल में 5 सीटों पर हुए उपचुनाव में कांगेस और माकपा के हिस्से में दो-दो और एक सीट आईयूएमएल को मिली।

बहरहाल, यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी कोशिशों के बाद भी देश की जनता में इनके प्रति विश्वास कम हो रहा है। विश्वास कम होने की गति और तेज होती यदि विपक्ष कोई नैरेटिव लोगों के सामने रख पाता। यह तो माना ही जाना चाहिए कि इस पूरे चुनाव में विपक्ष सामने आया ही नहीं। विपक्ष के पास न तो जीतने की कोई अभिलाषा थी और न रणनीति। इसके बावजूद भी यदि देश की जनता ने मौजूदा भाजपा सरकार को आंख दिखाया है तो इसके खास मायने हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इन मायनों को कब समझता है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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