Tag: ध्रुव गुप्त

देवासुर संग्राम
खुला दरवाजा

देवासुर संग्राम का अर्थ

 

जब भी किसी पौराणिक टी.वी सीरियल या सिनेमा में देवासुर संग्राम के नाम पर भव्य,सुंदर दिखने वाले देवताओं अथवा प्रतापी राजाओं को बड़ी-बड़ी दांतों, सींगों, लाल-लाल आंखों वाले कुरूप, कदाचारी असुरों या राक्षसों से लड़ते देखता हूं तो हमारी ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक समझ पर शर्म आती  है। इस अधकचरी, पक्षपाती समझ को बनाने में हमारे प्राचीन साहित्य और पुराणों ने बड़ी भूमिका निभाई हैं। ये सारे ग्रंथ आर्य पुरोहितों या दरबारी कवियों द्वारा अपने स्वामियों की प्रशस्ति में लिखे गए। असुरों ने अपना इतिहास नहीं लिखा। या शायद उनका लिखा हुआ कुछ भी अब उपलब्ध नहीं है। प्राचीन भारत में देवों और असुरों का संग्राम वस्तुतः सदाचार और दुराचार, अच्छे और बुरे, सत्य और असत्य के बीच की लड़ाई नहीं थी। यह उस काल की अलग सभ्यताओं और संस्कृतियों के बीच का टकराव था। देव या सुर कहे जाने वाले आर्यों और असुरों में फर्क उनकी दैहिक बनावट और चरित्र का नहीं, उनकी अलग आस्थाओं, पूजा पद्धतियों और जीवन मूल्यों का था। यह फर्क इतना प्रबल था कि ऋग्वेद की सैकड़ों ऋचाएं असुरों की निंदा और उन्हें दिए गए शापों से भरी हुई हैं। असुर राज हिरण्यकश्यप ने वैदिक धर्म से प्रभावित अपने ही पुत्र प्रह्लाद की हत्या का प्रयास किया था। बावजूद इस आस्थागत फर्क के देवों और असुरों के बीच मित्रता, प्रेम और विवाह के भी असंख्य उदाहरण पुराणों और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। 

देवों और असुरों के बीच आस्थागत विभेद ने हिंसक संघर्ष का रूप तब लिया था जब आजीविका के लिए पशुधन पर निर्भर आर्यों द्वारा खेती की खोज हुई। अथर्ववेद के अनुसार वैवस्वत मनु के वंश के राजा वेन के पुत्र पृथी ने कृषि का आरंभ कराया। ऋग्वेद में कृषि को यज्ञ कहा गया है। उसे इतना पवित्र माना गया कि राजा को स्वयं हल पकड़कर खेती का आरंभ करने का आदेश है। कृषि आर्यों के जीवन में आमूल परिवर्तन लेकर आई। घुमक्कड़ आर्यों के स्थायी घर बने और परिवार नाम की संस्था की शुरुआत हुई। कालांतर में खेती या यज्ञ के लिए भूमि कम पड़ी तो उसके विस्तार के लिए उन्होंने आसपास के वनों की कटाई शुरू की। आजीविका के लिए वन-उत्पादों पर निर्भर आर्येतर अर्थात असुर जनजातियों – नाग, दैत्य, राक्षस, दानव आदि ने वनों की कटाई के बहाने आर्यों की विस्तारवादी नीति का मुखर विरोध किया। अपना जंगल बचाने के लिए वे सीधी लड़ाई में भी उतरे और छिपकर कृषि अथवा यज्ञ को नुकसान भी पहुंचाया। असुरों द्वारा आर्यों के यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न करने और आर्य नायकों द्वारा यज्ञ-विरोधी असुरों के संहार के असंख्य किस्से प्राचीन साहित्य में बिखरे पड़े हैं। रामायण काल में राक्षसों के यज्ञ-विरोधी आक्रमणों का शमन करने के लिए ऋषि विश्वामित्र ने राजा दशरथ के पराक्रमी पुत्रों राम और लक्ष्मण की सहायता ली थी।

इस टकराव में देवों और असुरों के बीच असंख्य युद्ध हुए। हजारों साल चले इन युद्धों को देवासुर संग्राम कहा जाता है। इन युद्धों में विजय कभी देवों की हुई, कभी असुरों की। ऋग्वेद में देवराज इंद्र द्वारा वृत्रासुर की हत्या और असुरों के कई पुरों को ध्वस्त करने के उल्लेख मिलते हैं। युद्धों में ज्यादातर असुर ही देवों पर भारी पड़े थे। कई बार उन्होंने देवों को पराजित किया। कई असुर राजाओं ने देवराज इंद्र को उनके वैभवशाली राजधानी स्वर्ग से निष्कासित कर स्वयं उसपर आधिपत्य जमाया था। प्रतापी और दयालु असुरराज बलि का स्वर्ग विजय इसका एक उदाहरण है। उनसे अपना स्वर्ग छीनने में असफल देवों ने छल का सहारा लिया था। उन्होंने वामन ब्राह्मण के रूप में विष्णु को उनके पास भेजा जिन्होंने अपने घर के लिए तीन कदम भूमि की मांग के बहाने अपने तीन विराट कदमों से उनका पूरा साम्राज्य नाप लिया था।

पुराणों में देव बहुधा असुरों से पराजित होकर विष्णु, शिव, ब्रह्मा या दुर्गा से मदद की याचना करते दिखते हैं। एक शिव ही ऐसे थे जिनके प्रति देवों और असुरों में एक जैसा सम्मान था। वे सदा न्याय के पक्ष में खड़े दिखते हैं। उनके हस्तक्षेप से कई बार दोनों पक्षों के बीच सुलह हो सकी थी। दोनों पक्षों के संयुक्त प्रयास से समुद्र मंथन अर्थात समुद्र पार के देशों में लंबा व्यापारिक अभियान शिव की कोशिशों से ही संभव हुआ था। यह और बात है कि उस अभियान में संधि की शर्तों को तोड़कर देवों ने असुरों के साथ बड़ा छल किया था। मंथन में प्राप्त चौदह में से अधिकांश रत्नों को देवों ने आपस में बांट लिया था। असुरों के हिस्से में सिर्फ वारुणी आई थी। वे शिव थे जिन्होंने अभियान में प्राप्त विनाशकारी हलाहल पीकर विष के दुष्प्रभाव से संसार को बचाया और नीलकंठ कहलाए।

देवासुर संग्राम आज भी थमा नहीं है। आज कृषि के लिए तो नहीं, लेकिन उद्योगों और सड़कों के विस्तार के लिए अपने को सभ्य कहने वाले उद्योगपति और ठेकेदार आदिवासी जनजातियों की जीविका के एकमात्र साधन वनों की निर्मम कटाई में लगे हैं। इस लूट में देश की सरकार उनके साथ खड़ी है। अपने वन, अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए आदिवासी जनजातियां आज भी वनों की निर्मम कटाई का मुखर प्रतिरोध कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में माओवादी कही जाने वाली एक हिंसक राजनीतिक विचारधारा के समर्थकों के प्रवेश के बाद यह प्रतिरोध रक्तरंजित हुआ है। इस टकराव में पिछले पांच दशकों में हजारों लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है। 

ज़रूरत आज फिर किसी नीलकंठ शिव की है जो इन दोनों संस्कृतियों और जीवन-मूल्यों, परंपराओं और आधुनिकता, प्रकृति के संरक्षण और विकास के बीच कोई सार्थक, सम्मानजनक रास्ता निकालकर इस संघर्ष का अंत करा सके

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