भारतीय राजनीति का प्रस्थान बिन्दु
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भारतीय राजनीति का प्रस्थान बिन्दु

 

भारत की वृहत राजनीति में 1980 के दशक के अन्त में मूर्त बदलाव देखने को मिलते हैं। ये बदलाव मंडल, मंदिर और मार्केट, इन तीन धुरों के इर्द-गिर्द अवतरित हुए और ठोस रूप लिया। आज़ादी के उपरान्त हिन्दी पट्टी की राजनीति में तीन प्रमुख घटनाओं का उल्लेख आवश्यक है- भूमि सुधार और हरित क्रांति, दलित चेतना का उभार और अयोध्या मसला। समाज के एक बड़े वर्ग ने, जो लम्बे समय से या तो राजनीतिक प्रक्रियाओं (विशेष करके चुनावी) के प्रति उदासीन रहता था या फिर अपनी सामाजिक अवस्था के कारणों से इन प्रक्रियाओं के हासिये पर रहता था वह 1990 के दसक से सक्रीय नज़र आने लगा। राजनीतिक विश्लेषकों ने पूरे भारत और विशेष कर के उत्तर भारत में हाशिये के लोगों की राजनीति में बढ़ती भागीदारी और सक्रियता को ‘दूसरे जनतांत्रिक उछाल’ की अवधारणा के रूप में प्रतिपादित किया।

भारतीय राजनीति में शक्ति समीकरणों के संदर्भो में इसे विवर्तनिक परिवर्तन कहा जा सकता है। इसके पहले तक भारत की वृहत राजनीतिक वितान पर उच्च जातियों का जो दबदबा था, वह अब तेजी से समाज में चिरकाल से हासिये पर रहे लोगो के गिरफ्त में जा पहुंचा। इसी प्रकार धर्म, जो लम्बे समय से भारतीय राजनीतिक समीकरणों के कई ज्ञात अवयवों में से एक था, 1990 के दशक में भारतीय राजनीति के मुख्य धुरी का रूप लेने लगा। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद आन्दोलन की पृष्ठिभूमि में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उदय होना भी इन्ही संदर्भो में देखा जाना चाहिए। आर्थिक जगत में उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण ने आर्थिक-राजनीतिक दृष्टिकोण से भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण घटक को जन्म दिया। मध्य वर्ग की सक्रिय राजनीतिक भागीदारी और उसकी नई आशंकाएं और आकांक्षाएँ भारतीय राजनीति को एक नया मोड़ देने वाली सिद्ध हुईं। 1980 के दशक के अन्त तक आते आते भारत के सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जीवन में नेहरु के नेतृत्व में जन्मे ‘आमसहमति’ का कहीं मूक तो कहीं मुखर पटाक्षेप भी दृष्टिगोचार होता है।

भारतीय राजनीति में हुए इस अभूतपूर्व परिवर्तन को वैश्विक स्तर पर चल रहे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मंथन की परिणति के रूप में भी देखने और समझने का प्रयत्न हुआ। बीसवीं सदी के उत्त्राध में आधुनिक जीवनकाल के सबसे बड़े मिथक ‘सेकुलारिज़ेसन’ के विखंडित होने की प्रक्रिया को भारतीय राजनीति में तेजी से हो रहे परिवर्तनों से जोड़ कर देखा गया। ईरान में क्रांति से लेकर वैश्विक आतंकवाद तक की घटनाओं को ‘धर्म के पुनरुत्थान’ के रूप में जांचा परखा गया और विश्वास पूर्वक कहा जाने लगा गया कि ये पुनरुत्थान सिर्फ सामाजिक अस्मिताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका राजनैतिक आयाम भी है। पाश्चात्य राजनीतिक चिंतकों के लिए विशेष समस्या थी कि धर्म से प्रभावित ये बदलाव ‘प्रोग्रेसिव’ नहीं थे। इनमें से कुछ का मानना था कि धर्म ने उदण्ड राष्ट्रवाद या फिर रूढ़िवादिता को जन्म दिया है। 1980 और नब्बे के दशक का ही वो दौर था जिसमें फ्रांस, पूर्व के यूगोस्लाविया, अल्जीरिया, तुर्की, जर्मनी, अमेरिका, श्रीलंका, रूस, रवांडा और इथोपिया जैसे देशों में भी अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के दमन का शिकार होना पड़ा। उनकी स्थिति में लगातार गिरावट आई।

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में वैश्विक स्तर पर हो रहे इन बदलाओं की प्रतिश्रुति भारत में भी हो रहे परिवर्तनों में परिलक्षित हो रही थी। 1980 के दशक के अन्त और 1990 के दशक के शुरू में भाजपा का एक राजनीतिक दल के रूप में मजबूती प्राप्त करना शायद इसका सबसे उपयुक्त उदहारण है। टेलीविज़न के बढ़ते प्रभाव, रामायण और महाभारत के राष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रसारित किये जाने और सीएनएन पर खाड़ी युद्ध के सीधा प्रसारण ने धर्म और राष्ट्र की एक विशेष समझ और उससे उपजने वाले मनोवैज्ञानिक ‘गूबारों’ को एक नई उंचाई पर पहुँचाने का काम किया। धर्म की आयातित समझ का रचनात्मक प्रयोग नए विचारों, मीडिया, संस्थाओं और दैनिक जीवन के प्रयोगों में किया जाने लगा। यह अनायास ही नहीं था की रामलला राष्ट्रीय दूरदर्शन पर वनवास पूरा कर के लौट रहे थे और इधर देश में पूरा जनमानस ‘रामलला हम आयेंगे मंदिर वहीं बनाएंगे’ के संकल्प से लबरेज था। महाभारत के प्रसारण और ‘अयोध्या तो बस झांकी है मथुरा काशी अभी बाकी है’ में भी एक सामानांतर सम्बन्ध देखने को मिलता है। यह सब कुछ एक नए सामूहिक बोध के बनने की लम्बी प्रक्रिया के शुरूआती चरण थे। अमेरिका के ‘नैतिक बहुलवाद’ के मापदण्डों पर खरा उतरते हुए भारत में भी धर्म और राजनीति के सम्बन्धों को एक नए नैतिक अमलीजामा पहनाया जाने लगा गया।

भारतीय राजनीति की अभी तक की प्रचलित समझ थी की उसका रुझान न ही धूर वामपन्थी या धूर दक्षिण पन्थी ही है। यह दोनों के मध्य में है और इसका सांकेतिक झुकाव वामपन्थ की तरफ़ है। भाजपा के राजनीतिक वितानपर उभरनें के बाद यहाँ की वृहत राजनीति की एक नई समझ उभरी। 1890 के दशक से लेकर आज़ादी के प्राप्त होने तक देश में दक्षिण पन्थी राजनीति की एक प्रमुख धारा, जिसमें हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग मुख्यतः भागीदार थे, का अपना इतिहास और दर्शन शास्त्र रहा था। धर्म को राष्ट्र के ‘गौरव’ और अस्मिता से जोड़े जाने की इस परम्परा को 1980 के दशक में पुनर्जीवन मिला। इसके सामानांतर, अकादमिक जगत में ध्रुवीकरण की राजनीति की समझ को प्रसार मिला। काल्पनिक और कृतिम राष्ट्रवाद को धर्म आधारित राजनीति को समझने के लिए प्रयोग में लाया गया। वैश्विक राजनीति और विशेष तौर पर अमेरिका में ‘इस्लाम से खतरा’ धर्म और राजनीति के अन्तर्संबंधों को समझने का एक अनिवार्य प्रस्थान बिन्दु सा ही बन गया। ऐसे में न सिर्फ अंग्रेजी भाषी बहुत से पत्रकार बल्कि धर्म और राजनीति के बड़े विद्वानों ने भी उपरोक्त बिन्दु से ही शुरुवात की।

यह बदलाव ‘सूक्ष्म राजनीति’ की समझ के सन्दर्भ में भी देखने को मिलता है। यहाँ हम उस बदलाव के प्रकृति की पड़ताल करने का प्रयत्न करेंगे। 1990 के दशक में भारत और विदेश में प्रकाशित अधिकाँश अध्ययन धर्म और राजनीति के अन्तर सम्बन्धों की पड़ताल ‘सेक्युलर-कम्युनल’ के सीमित विमर्शों में रख कर करते हैं। हालाँकि इसके बाद इकिस्वीं सदी के पहले दशक में धर्म और राजनीति के अन्तर सम्बन्धों के अध्यन को एक नई दिशा मिली। धर्म में राजनीति और इसके उलट, दोनों ही अवस्थाओं में विविध समझ देखने को मिले हैं। राजनीति-धर्म के युग्म ने दैनिक जीवन में अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित किया है। 1990 के दशक तक धर्म की वृहत राजनीति में भूमिका को संस्थागत स्तर पर ही सीमित कर के देखा जाता रहा। परन्तु बाद के दशक में यह सूक्ष्म राजनीति के सन्दर्भों में विश्लेषित किया जाने लगा। इसे हम सामाजिक विज्ञान में ‘वृहत’ से मोह भंग और ‘सूक्ष्म’ के प्रति बढ़ते लगाव के रूप में भी देख सकते हैं। कुछ विद्वान सामाजिक विज्ञान में ‘सूक्ष्म’ के प्रति बढ़ते अनुराग को उत्तर आधुनिकता के दृष्टीकोण से परखने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, धर्म और राजनीति का सामाजिक शास्त्रीय अध्ययन एक नए मोड़ पर पहुंचा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि नब्बे के दशक में ‘राजनीति’ और ‘धर्म’ के एक विशेष समझ, जो पश्चिमी विमर्श पर आधारित थी, ने मूर्त रूप लिया।

राजनीति के पटल पर स्थानीय धार्मिक और पंथिक परम्पराओं को आसानी से राजनीति और धर्म के अन्त क्रिया में शामिल कर के वृहत राजनीति के परिधि में लाया गया। ‘आईडियाऑफ़ इंडिया’ को परिभाषित करने का प्रयास लम्बे समय से चल रहा था। 1960 और 1970 के दशक में, पहले जनतांत्रिक उछाल से कमजोर हुई कांग्रेस ने ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ की एक नई संभावना को खोला। समाजवादी और लाल क्रांति के मध्य नेहरु के ‘विज़न’ को गहरा धक्का लगा था। इंदिरा गाँधी ने, लोहिया और जे पी के सपनों के भारत, जिसमें किसान और मजदूर अपनी अस्मिता की बाट जोहता हुआ संघर्षशील था, को ‘गरीबी हटाओ’ के एक नए परिकल्पना से लांघने की कोशिश की। एक नए ‘इमेजइंडरियलिटी’ को मूर्त रूप देने का समय था। कहीं न कहीं इसमें कांग्रेस चूक गई। फलस्वरूप देश को आपातकाल की त्रासदी भोगना पड़ा। 1980 के दशक और उसके बाद तो जैसे भारतीय समाज के सभी ही ‘फाल्टलाइन्स’ गहरे ही होते गए। धार्मिक उन्माद, भ्रस्टाचार, नक्सलवाद, जातीय हिंसा बाज़ार का विकृत स्वरुप- सब जगजाहिर था। जहाँ कांग्रेस और वाम दल अपने अस्तित्व को लेकर संशकित थे वहीं भारतीय जनता पार्टी अपने विस्तार में संलग्न थी। संघ इस एजेंडे पर लम्बे समय से काम कर ही रहा था। उसका एक समय में एक ही लक्ष्य की विधा पर लम्बे समय तक चलता रहा। उसकी अंतिम परिणति पिछले दसक में भारतीय राजनीति का दक्षिण पन्थी राजनीति की तरफ एक तरह का स्थाई करवट लेना हुआ। फिलहाल इसमें किसी बड़े उलट पलट की संभावना क्षीण ही है

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लेखक ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के रिसर्च एफिलिएट हैं। सम्पर्क +919971729178, jnushashank@gmail.com

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