स्टापू
स्त्रीकाल

प्रेम कहानी के केन्द्र में ‘बहनापे’ को प्रस्तुत करती ‘स्टापू’

 

स्टापू एक खेल है जिसे बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में छूकिता या कित-कित कहा जाता है। ईंट या खपरैल की बनी चौकोर गोटी होती है जिसे एक पैर से एक खाने से दूसरे खाने तक कित-कित करते हुए ले जाना होता है। जब सभी खाने पार कर लेते हैं तब उस बाहर जा चुके गोटी पर कूदना होता है। यदि पैर गोटी को स्पर्श नहीं कर पाए तो आप खेल में हार जाते हैं। इस खेल के खेलने के अन्य संस्करण भी हैं। बचपन में यह हम बच्चों का प्रिय खेल था जिसमें लड़का-लड़की का कोई भेद नहीं था। जीवन भी स्टापू की तरह है जिसमें सामाजिक और पारिवारिक नैतिकता कई तरह के बॉक्स या कंपार्टमेंट बनाता है। हमें इनसे बाहर निकलने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति और आर्थिक आत्मनिर्भरता की जरूरत पड़ती है। स्त्रियों के लिए यह और भी अनिवार्य हो जाता है। कहानी का शीर्षक ‘स्टापू’ जीवन के इसी पहलू को ध्यान में रखकर रखा गया है।

      कहानी निर्मल, कनु और वैष्णवी के प्रेम त्रिकोण की है। इन तीनों के बीच की मजबूत कड़ी आकृति है। वह पापा (निर्मल) की लाडली है। उसे वैष्णवी आंटी की तरह बनना है क्योंकि वो बुलेट चलाती हैं, खुलकर हँसती है और उसे प्यार करती हैं। उसे अपनी माँ कनु नहीं पसन्द है क्योंकि वो बस पापा की आज्ञा का पालन करती हैं और बिल्कुल भी फैशनेबुल नहीं हैं। वह हमेशा चाहती है कि वह वैष्णवी की बेटी होती। यह कहानी बालिका मनोविज्ञान (बालिका मनोविज्ञान शब्द चाइल्ड साइकोलॉजी के हिन्दी अनुवाद में कहीं देखने को नहीं मिलता जो लैंगिक दृष्टि से भाषिक समस्या है) की पृष्ठभूमि से होते हुए बहनापे की थ्योरी से जुड़ती है। लेखिका ने इसलिए बहुत सोचकर कहानी के सूत्रधार के रूप में बच्ची को चुना है।

   कहानी का विषय एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर है। इसके बहाने लेखिका शादीशुदा स्त्री और स्वतन्त्र मिजाज की स्त्री के प्रति पुरुष के नजरिये को प्रस्तुत करती हैं। वैष्णवी निर्मल को आकर्षक लगती है क्योंकि वह टिपिकल लड़कियों से अलग एक ‘मॉडर्न’ छवि का निर्माण करती है। वहीं उसे अपनी पत्नी कनु बोरिंग लगती है क्योंकि वह उसके हर आज्ञा का पालन करती है। वह हर काम परफेक्शन में करती है। उसे लगता है कि यह पत्नी ‘टाइप’ हो गयी है जबकि उसे प्रेयसी चाहिए थी। पुरुष प्रायः इसी सोशलाइजेशन के शिकार हैं। वे पत्नियों और प्रेमिकाओं के लिए अलग मापदण्ड बनाए बैठे हैं।

निर्मल जितनी शिद्दत से वैष्णवी का इंतजार करता है, उससे इजहार करता है, वादा करता है पत्नी के सामने जाने के बाद बस आज्ञा देता है। उसने कभी कनु को ‘खास’ होने का एहसास ही नहीं कराया और नहीं तो उसके कामों के प्रति निष्ठावान होने के स्थान पर उसे खट्टापन महसूस होता है। इस नजरिए के मूल में है पहले से बनाए गए पूर्वाग्रह और छवि निर्माण की चरणबद्ध प्रक्रिया। इसलिए इस कहानी के पात्रों के मिजाज को समझने के लिए मनोविज्ञान की आधारभूत जानकारी जरूरी है।

   कनु एक परम्परावादी परिवार में सोशलाइज हुई है। पति ही उसके लिए सबकुछ है। 17 साल की उम्र में ब्याह दी गयी है और 18 पूरे होने के पहले ही उसे बेटी को जन्म देना पड़ा। लोग कहते हैं निर्मल उसका भरपूर ख्याल रखता है। वह सोचती है कि ख्याल के नाम पर उसे आकृति के जन्म के बाद केवल छह दिन का आराम मिला। लोग इसे ही ‘ख्याल रखना’ कहते हैं! इतिहास गवाह है ऐसा ही ख्याल शाहजहाँ ने मुमताज का रखा था। फलस्वरूप, 14वें बच्चे को जन्म देते हुए गुजर गयीं। दुनिया इसे अमर प्रेम कहती है। आज के समय में मैरिटल रेप की श्रेणी में होता यह। क्या मरने के बाद कोई इमारत बना देना प्रेम की निशानी हो सकती है? 

  शादी के बाद लड़कियों का जीवन बदल जाता है इतना कि उनके सपनों का कोई मोल नहीं रह जाता है। यहाँ तक कि वे अपनी पहचान तक खो देती हैं। यह भारतीय समाज का हर जागरूक व्यक्ति जानता है। कनु के मन में भी यह कसक है कि उसके सारे सपने शादी के संदूक में दफन कर दिए गए। घर की नींव उसके अधूरे अरमान पर टिके हैं। उसे इस बात से घोर आपत्ति है कि क्यों इच्छाएँ केवल पुरुष की पूरी होनी चाहिए? स्त्रियों का कोई स्थान क्यों नहीं है?

यह सवाल भारत के हर गृहिणी का है जो आर्थिक रूप से असक्षम है, जो घर और पति को छोड़ने की स्थिति में नहीं है। वह गृहस्थ जीवन में एक कामगार की तरह है प्रेयसी की तरह नहीं। कनु की कसक दुनिया के तमाम हाउसवाइफ का ‘वैश्विक सवाल’ है। यह विवाह संस्था पर एक बड़ा सवाल है। पितृसत्तात्मक विवाह संस्था को इसी कारण समाजशास्त्रियों ने ‘कानूनी रूप से वैध वेश्यालय’ तक कहा गया। यह सच भी है। साल भर पहले जब राजगीर घूमने मैं दोस्तों के साथ गया तो बातचीत के दौरान ड्राइवर ने बड़ी निर्लज्जता से कहा कि ‘मेहरारू का काम दिन में भोजन और रात में संभोग (संभोग के लिए उसने दूसरा शब्द प्रयोग किया था) करना है।’ 

   वैष्णवी की सामाजिक स्थिति दूसरी है। वह स्वतन्त्र विचार की है। इसका कारण उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से मिली स्वतन्त्रता है। बच्चियों के जीवन में परिवार द्वारा दी गयी स्वतन्त्रता उसे आत्मविश्वास देता है। वैष्णवी के पास वह है। इसका वह भरपूर प्रयोग भी करती है। ऑस्ट्रेलिया तक जाने का मौका मिलता है पर पिता के बाद भाई-बहनों की जिम्मेदारी के कारण नहीं जाती है। उसका खुलापन लोगों को आकर्षित करता है। निर्मल और वैष्णवी के रिश्ते का आधार भी यही खुलापन है। परन्तु, वैष्णवी को इसका एहसास है कि यह रिश्ता उसके खुलापन को बाँधेगा। इसलिए वह नदी के तट पर घूमते हुए कहती है “नदियों का उछाह बहुत पसन्द है मनुष्यों को। पर फायदा उसे बाँध देने में है। एक नदी किलसती है तो घर रौशन होते हैं।” यह नदी को देखने का स्त्रीवादी नजरिया है।

यह स्त्री भाषा है जो परम्परा से चले आ रहे बिम्ब को नए अर्थ और संवेदना प्रदान कर रहे हैं। परिवेश और मनःस्थिति के तनाव को प्रस्तुत करने के लिए इससे बेहतर कहन शैली शायद ही हो! यह शैली ही कहानी को खास बनाती है। प्रेम और गृहस्थी पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों को बाँधते ही है। उनकी स्वतन्त्रता की कीमत पर ही घर-परिवार से जुड़े लोगों का उत्थान निहित होता है।

असल में पूँजीवादी और घनघोर पितृसत्तात्मक समाज में तथाकथित सच्चा प्रेम सम्भव ही नहीं है। क्योंकि उत्पादन के साधन, वितरण और उससे जुड़े लाभ पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पोषकों के नियन्त्रण में है। फलस्वरूप महिलाएँ श्रमिक वर्ग की तरह हो जाती हैं और पुरूष मालिक की तरह। मालिक और श्रमिक में क्या समानता होगी वह भी गृहस्थी के ढाँचे में तो और भी सम्भव नहीं है। ‘प्रेम, परम्परा और विद्रोह’ पुस्तक में कात्यायनी इस दृष्टि से गम्भीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। 

वैष्णवी इन परिस्थितियों को समझती है। उसे जैसे ही पता चलता है कि निर्मल को रिश्ते से ज्यादा अपने सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता है, वह तुरन्त उस रिश्ते के मधुर यादों के साथ अपने को अलग कर लेती है। निर्मल को उसका सबकुछ अच्छा-अच्छा कर लेने और सब संभाल लेने के अहंकार ने उसे अकेला कर दिया और दो स्त्रियों के जीवन में भी उथल-पुथल मचा दी।

     आकृति, कनु और वैष्णवी के अधूरे सपनों की सफल और सार्थक छवि है। वह बहनापे के वैचारिकी की वाहक है जिसे गढ़ने में कनु और वैष्णवी दोनों ने अपना जीवन झोंक दिया। लेखिका ने इसे प्रस्तुत करने में शत-प्रतिशत सफतला प्राप्त किया है। प्रेम त्रिकोण में प्रायः पितृसत्ता दो स्त्रियों को एक दूसरे के खिलाफ करने में सफल हो जाता है। चरित्रहीनता का आरोप प्रायः स्त्रियों पर लगता है और पत्नी को लाँछन झेलना होता है कि वह पति को खुश नहीं कर पायी।

लेखिका ने पितृसत्ता के इस पूरे साजिश के इतर बहनापे का सिद्धांत दिया है। आकृति के सवाल का जवाब देते हुए कनु कहती है कि ‘पापा को छोड़कर माँ कहाँ जाती?’ इसलिए कनु ने आकृति को वैष्णवी जैसा बनाया मजबूत, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी। यहाँ कनु और वैष्णवी के दूसरे के खिलाफ न होकर एक दूसरे के पक्ष में हैं। इन दोनों स्त्रियों के बहनापे का परिणाम है सशक्त नयी स्त्रीवादी पीढ़ी आकृति। वे अपने बहनापे का उत्सव मनाते हैं पहाड़ों पर। यह काम वो  हंगामे, नारेबाजी और प्रतिशोध के बिना करते हैं।

लेखिका पीढ़ियों के परिवेशगत रुचि का और उसके अंतर्द्वंद्व को बारीकी से जानती हैं। वैष्णवी की पीढ़ी कोसी, बाराह के लोक सौंदर्य को पसन्द करती है। प्रेम की पीड़ा का विरेचन हिन्दी गानों और शायरियों में खोजती है वहीं आकृति की पीढ़ी विदेशी संगीत, जूलिया रोबर्ट और अपने समय के कलात्मक प्रगति में अपने विचार का सामंजस्य ढूँढ़ती है।

यही इस कहानी के शिल्प और विचार दोनों की सफलता और सार्थकता है। यह कहानी लेखन में सार्थक प्रयोग है जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों के प्रेम के लिए लड़ती नहीं है बल्कि बहनापे की अपनी दुनिया ही बना लेती हैं

अणुशक्ति सिंह की कहानी ‘स्टापू’ को bynge एप्लीकेशन पर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में स्नातकोत्तर (हिंदी विभाग) छात्र हैं। सम्पर्क +917050869088, manishpratima2599@gmail.com

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