मुद्दा

क्या क्या कागज दिखाएँ 

 

  • यादवेन्द्र

 

कितने निर्दोष और सरल हैं ये लोग जो थोड़े थोड़े अंतराल पर चुपके से यह बुदबुदा देते हैं कि नागरिकता संशोधन विधेयक पर कभी मन्त्रिमण्डल में बात ही नहीं हुई – राष्ट्रपति से लेकर देश के प्रधान मन्त्री, गृहमन्त्री और अनेक अन्य मन्त्री भी पर  जनता है  कि यकीन करने को तैयार नहीं है। दरअसल उनको अंदेशा है कि थोड़ी देर के लिए भले ही सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग एनआरसी की बात पर चुप्पी साधे रहें पर उचित अवसर देख वे दुगुनी ताकत के साथ घात लगा कर आक्रमण करेंगे। 

वैसे इस मामले में दिल्ली के चुनाव में बीजेपी का दाँव खाली गया पर हाल में देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपी कुछ घटनाएँ कुछ अलग ही कहानी बयान करती हैं  – लखनऊ के एक कॉलेज में पढ़ाने वाले आलोक चंतिया के बारे में हिंदुस्तान टाइम्स समेत अनेक अखबारों में यह खबर छपी कि उनके एक आरटीआई में माँगी गयी सूचनाएँ लखनऊ विश्व विद्यालय यह कहते हुए देने से मना कर रहा ही कि वे पहले अपनी भारतीय नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करें – आरटीआई नियमों के अनुसार इसकी कोई बाध्यता नहीं है। हार कर आलोक ने प्रधान मन्त्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी पर उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। 

दिल्ली चुनाव की रिपोर्ट छापते हुए “न्यू इंडियन एक्सप्रेस” ने बताया कि अनेक मतदाताओं ने वोट डालने वाली पर्चियाँ संभाल कर रखने की बात बताई जिससे वे साबित कर सकें कि वे बहरी घुसपैठिये नहीं बल्कि भारतीय नागरिक हैं। डर और आशंका के इस माहौल में बढ़ोतरी करने वाली ख़बरें लोग पढ़ते सुनते आये हैं कि पूर्व राष्ट्रपति के परिजन और सेना में विशिष्ट कार्यों के लिए सम्मानित अफसर को भारतीय नागरिक नहीं माना गया। From hundreds of crores to ₹200, Dileep's fortune reverses in jail

ऐसे में लगभग चालीस साल पहले देखी  एक फ़िल्म याद आयी – मैंने पहली बार सेनेगल के ओस्मान सेंबेने का नाम सुना और उनकी फिल्म मनी ऑर्डर‘ देखी – उन्हें कुछ फ़िल्म समीक्षक अफ्रीका का सत्यजीत राय कहते हैं। यह फिल्म 1968 में बनाई गई थी। इस कहानी का मुख्य किरदार बेरोजगार डिएंग एक सीधा सादा इंसान है जिसकी दो पत्नियाँ हैं और ढेरों बच्चे। उसका एक रिश्तेदार काम करने सेनेगल से पेरिस जाता है और वहाँ कुछ दिनों तक काम करके जो पैसे बचाता है वह उसे अपने देश भेजता है –  वह उस व्यक्ति का भांजा है –  अपने मामा के लिए, अपनी माँ के लिए और कुछ रिश्तेदारों के लिए वहाँ से पैसे भेजता है मनी ऑर्डर से। पोस्टमैन आकर मनी ऑर्डर की सूचना देता है –  यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। अगले दिन वह रकम लेने पोस्ट ऑफिस जाता है पर वहाँ पहुँच कर उसके सामने एक बड़ी मुसीबत आ खड़ी होती है जब पोस्ट मास्टर कहता है:  पैसे लेने के लिए आपको अपनी पहचान (आईडेंटिटी) का कोई प्रमाण देना होगा।

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अपने इलाके में बेहद प्रतिष्ठित इंसान के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था, दस्तावेज के अभाव में वह एकदम से वह पहचान रहित (नॉन पर्सन) बन गया।  उसके पास कोई आईडी नहीं था, गाड़ी नहीं थी सो ड्राइविंग लाइसेंस का सवाल नहीं। जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं था।  वह पूछता है कि पहचान पत्र बनवाने के लिए क्या करना होगा तो डाकघर वाले बताते हैं उसके लिए आपको जन्म का प्रमाण पत्र देना होगा। बर्थ सर्टिफिकेट के लिए जन्म की तारीख चाहिए, वह उसको मालूम नहीं थी। वह उनसे मिन्नतें करता रहता है,वे  उसको जानते भी हैं पर नियम तो नियम है।

इस बीच उसकी उसकी दोनों पत्नियाँ तमाम फरमाइशें  करती हैं … जब इतने पैसे मिल गए हैं तो हम लोगों की ख्वाइशें पूरी करो। बच्चों को बहुत सारी चीजें चाहिए होती हैं… सालों साल से लदे हुए कर्ज के तगादे बढ़ते जाते हैं। यह खबर पत्नियाँ अति उत्साह में आस पास के पड़ोसियों तक और अपने मायके तक पहुँचाती हैं। हर किसी को इस काम या उस काम के लिए पैसे चाहिए। आसपास के गाँवों में जो मस्जिद हैं वहाँ से लोग चले आते हैं मदद माँगने के लिए। स्वभाव से वह लोगों की मदद करने वाला व्यक्ति था सो मनी ऑर्डर पर भरोसा रख के लोगों को कुछ न कुछ देता रहता है।लूट खसोट के दिन बीतते जाते हैं पर पैसे मिलने की सूरत दिखाई नहीं देती।

तभी पहले कभी शक्ल न दिखाने वाला उसका कोई तेज तर्रार भतीजा  अचानक  चाचा के पास प्रकट होता है और मदद करने की पेशकश करता है… कहता है कि मैं सारी चीजें ठीक कर दूँगा …. मैं आपका पहचान पत्र बनवा देता हूँ या आप उसकी पॉवर ऑफ़ अथॉरिटी मुझे दे दो जिस से  मैं पैसे निकाल कर  आपको दे दूँ। यह सारी खींच तान चलती रहती है और अंत तक पैसे उसको नहीं मिलते… पैसे की जहाँ तक बात है वह तो नहीं ही मिले पर उम्मीद जिस पर यह सब कुछ कायम था वह बुरी तरह से टूट गयी। दूसरी बात यह हुई कि इस उम्मीद के नाम पर उसकी थोड़ी बहुत जमा पूँजी का बहुत सारा पैसा इधर उधर लूट खसोट और फिजूलखर्ची में ऐसे लोगों के पास चला गया जिन्होंने उसकी सरलता और नेकी का फायदा उठाया। 

आज के समय में भारत जैसे देश में जनता की सरलता का फायदा उठा कर समृद्धि और विकास का फर्जी रूपक गढ़ने का खेल देखें तो शब्दशः लागू होता हुआ दिखाई दे रहा है। इस चालबाजी के प्रति जनता को सावधान रहना ही चाहिए। 

लेखक सीएसआईआर के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक और साहित्यकार हैं|
सम्पर्क- +919411100294, yapandey@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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