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घरेलू कामगार महिलाओं के मान और सम्मान का सवाल

 

शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ता जा रहा है. पलायन करने वाले ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है जिसके चलते महिलाओं को भी काम करना पड़ता है. ज्यादातर महिलाएं शिक्षा से वंचित होती हैं. उन्हें ऐसा कोई कौशल भी नहीं आता जो रोजगार दिलवा सके. अतः रोजगार के बहुत कम विकल्प ही रह जाते हैं. जिसमें से घरेलू काम भी एक है. अंततः यही कार्य करने को मजबूर होती हैं.

देश में बड़ी संख्या में घरेलू कामगार हैं. ज्यादातर महिलाएं. ये हैरान करने वाली बात है कि इन्हें अभी तक कामगार का दर्जा नहीं दिया गया है. उसका प्रमुख कारण इनके काम को काम न मान कर इनकी भूमिका को एक सहयोगी के रुप में देखा जाता है.

जिसके चलते घरेलू कामगारों को सबसे बड़ा नुकसान आर्थिक रुप से उठाना पड़ रहा है. इसी वजह से उनका कोई वाजिब और एक सार मेहनताना ही तय नहीं होता. ये घरेलू काम करने वाली महिला के मोलभाव करने की शक्ति पर निर्भर करता है, जबकि इनके काम के घंटे बहुत ज्यादा होते हैं. और काम की सुरक्षा भी नहीं होती. घरेलू कामगार महिलाओं को काम पर रखते समय कोई अनुबंध नहीं होता, इस कारण इन्हें नौकरी से कभी भी निकाल दिया जाता है. निकालने से पहले कोई नोटिस नहीं दिया जाता है. कई बार नियोक्ता द्वारा इसका कोई वाजिब कारण भी नहीं बताया जाता. अनेक प्लेसमेंन्ट एजेंन्सियों द्वारा भी घरेलू कामगार महिलाओं का शोषण किया जाता है. ये एजेंन्सियां इनको और इनके परिवारों को झूठे सपने दिखाती हैं और जब ये एजेंन्सियों के शिकंजे में फंस जाती हैं तो न केवल इनका आर्थिक बल्कि कई बार दैहिक शोषण भी होता है.

घरेलू काम को अन्य कामों की तरह नहीं समझा जाता और समाज में इज्जत भी नहीं मिलती है. समाज घरेलू कामगार महिलाओं के प्रति ना ही संवेदनशील है और ना ही इन्हें सम्मान देता है. घरेलू कामगार महिलाओं को नियोक्ता एहसान जताते हुए कभी-कभी खाद्य सामाग्री और सामान देते हैं लेकिन यह उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है. पर इसे नीयति मान कर वो चुपचाप सहन कर जाती हैं. जो घरेलू कामगार महिलाएं दलित समुदाय से होती हैं उनके साथ ज्यादातर जातिगत भेदभाव भी होता है. घरेलू कामगार महिलाओं को रोज बहुत मेहनत करनी पड़ती है तब जा कर माह के अंत में आजीविका लायक आय बड़ी मुश्किल से प्राप्त कर पाती हैं. इनकी दिनचर्या बहुत लम्बी और थकाने वाली होती है. इन्हें सुबह से शाम तक सतत् कार्य करना पड़ता है, दूसरों के घर में काम के साथ साथ अपने घर में भी वही सारा काम करना पड़ता है, किसी को भी सुस्ताने का अवकाश नही मिलता है जिससे हमेशा आलस्य, थकान और शरीर में दर्द बना रहता है. व्यस्तताओं के कारण ये सामाजिक संबंधों को समय नही दे पाते हैं जिससे इनकी जिंदगी उबाऊ और नीरस हो जाती है.

अध्ययनों से यह बात सामने आयी है कि घरेलू कामगार महिलाओं में से अनेक महिलाओं के रक्त में हीमोग्लोबीन की मात्रा 3 ग्राम ही पाई गई जबकि महिलाओं में इसका सामान्य स्तर 11.5 ग्राम से 15.5 ग्राम होता है. स्वास्थ्य खराब होने पर भी इनके लिए चिकित्सा प्राप्त करना कठिन होता है क्योंकि काम के व्यस्तता के कारण सार्वजनिक अस्पतालों में लगने वाला समय उनके पास नहीं होता एवं प्रायवेट डाक्टर के पास जाने के लिए इनके पास पैसे नहीं होते हैं. बीमार पड़ने पर भी मजदूरी कटने के डर से ये महिलाएं छुट्टियां नहीं ले पाती हैं और रोग बढ़ता जाता है जो बाद में विकराल रुप ले लेता है. कार्यस्थलों में अगर कोई दुर्घटना हो जाये तो नियोक्ता उसके इलाज का खर्चा नहीं देते हैं. उल्टा अगर कामगार महिला इस दुर्घटना के कारण ज्यादा दिन काम पर नहीं आ पा रही है तो कई बार नियोक्ता उसे काम से निकाल कर अन्य किसी महिला को घरेलू कामगार के रुप में लगा लेती हैं.

इन महिलाओं को घरेलू हिंसा के साथ साथ कई बार कार्यस्थल में भी हिंसा का सामना करना पड़ता है, अनेक महिलाओं के पति अपनी मजदूरी से शराब का सेवन करते हैं और फिर उनके साथ मारपीट करते हैं. इससे पूरे घर को चलाने की जिम्मेदारी इन महिलाओं के कंधे पर आ जाती है. वही अगर कार्यस्थल में इनके साथ यौन उत्पीड़न की घटनाऐं हो जाये तो समाज भी इन्ही को दोषी मानता है क्योंकि समाज भी पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रस्त है और वो यही मानता है कि महिला ने ही उकसाया होगा तभी उसके साथ इस तरह की घटना हुई है. घरेलू कामगार महिलाओं के साथ हिंसा, अत्याचार, दुर्व्यवहार करने में ना केवल राजनेता बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, बैंक, बीमा कर्मचारी, प्रोफेसर, चिकित्सक, इंजीनियर, व्यापारी, सरकारी अधिकारी इत्यादी सभी शामिल हैं जिनके बारे में आये दिन समाचार पत्रों में खबरें आती रहती हैं.

सरकार के प्रयास

घरेलू कामगार महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने को लेकर 1959 से प्रयास चल रहे हैं. 1959 में डोमेस्टिक वर्कर्स (कंडीशन्स ऑफ इम्प्लॉयमेंट) नामक विधेयक बना था, परंतु यह विधेयक व्यवहार में न आ सका. इसके बाद लगातार कई कोशिश की गयीं जो आज भी अनवरत् जारी हैं. पिछले सालों में सरकार द्वारा घरेलू कामगारों को कानूनी व सामाजिक सुरक्षा देने के लिए कुछ कदम उठाये गये हैं जैसे  असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कानून 2008,  राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और ‘‘कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ लैगिंक उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’’ में घरेलू कामगारों को शामिल किया गया है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 16 जून 2011 को घरेलू कामगार सम्मलेन में घरेलू कामगारों के अधिकार, नीति व सिद्धांत की घोषणा की है, इस सम्मेलन को घरेलू कामगार कन्वेंशन 189 के नाम से भी जाना जाता है. यह घरेलू कामगारों के मूलभूत अधिकारों की पुष्टि करता है. वर्तमान में देश के सात राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा और राजस्थान में घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की गई है.

लेकिन सरकार द्वारा घरेलू कामगारों के लिये किये जा रहे प्रयास अपर्याप्त हैं. घरेलू कामगारों की स्थिति को सुधारने के लिए गंभीरता के साथ कई कदम उठाने की जरुरत है. देश के कुल उत्पादन का 3 फीसदी हिस्सा असंगठित कामगारों की सामजिक सुरक्षा के लिए अलग से रखा जाना चाहिए, घरेलू कामगारो के लिए जो राष्ट्रीय नीति का प्रारुप तैयार है वो राजनीतिक इच्छा शक्ति के कमी के चलते अभी तक संसद में पास नहीं हो पाया है, इस राष्ट्रीय नीति को संसद में तत्काल पास करवाया जाना चाहिए. घरेलू काम को भी बकायदा एक नौकरी के रुप में देखते हुए नियोक्ता व घरेलू कामगार के बीच अनुबंध होना चाहिए जिसमें इनके काम के घंटें, मजदूरी, छुटटी व अन्य सुविधाओं का उल्लेख होना चाहिए. प्रत्येक घरेलू कामगार महिला को कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न को लेकर बने कानून और स्थानीय शिकायत निवारण समिति के पदाधिकारियों के नाम, फोन नं की जानकारी अनिवार्य रुप से दी जानी चाहिए. घरेलू कामगारों को अपने हक़ की लड़ाई के लिए संगठित होना चाहिए और मज़दूरों के व्यापक संघर्ष के साथ अपने को जोड़ना होगा

लेकिन असली लड़ाई तो सामंती सोच की है जिसे खत्म कर अमीर गरीब, मालिक नौकर का भेद खत्म करना होगा। तभी समाज में समानता आएगी. सभी काम को सम्मान मिलेगा. इसके लिए समाज के सभी तबकों और सरकार को मिलजुल कर प्रयास करना होगा.

उपासना बेहार

लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, महिला मुद्दों को लेकर मध्यप्रदेश में सक्रिय हैं.

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उपासना बेहार

लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं, महिला मुद्दों को लेकर मध्यप्रदेश में सक्रिय हैं। सम्पर्क - upasanabehar@gmail.com
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