स्त्रीकाल

आधी आबादी की व्यथा

 

 

  • विनय जायसवाल

 भारत में महिलाओं की स्थिति के बारे में बात करते समय हमेशा यह बात रखनी चाहिए कि जिस तरह से भारत में सामाजिक रूप से दो देश इण्डिया और भारत रहते हैं, उसी तरह से इण्डिया और भारत में अलग-अलग रहने वाली महिलाओं को साफ-साफ पहचाना जा सकता है। यह बात उन लोगों से शायद नहीं पचे जो यह मानकर चलते हैं कि पूरे देश में महिलाओं की एक जैसी स्थिति है। हम राजनीति में ऊंचे पद पर विराजमान महिला नेता की तुलना उस ग्रामीण महिला प्रधान से कैसे कर सकते हैं, जिसके सारे राजनीतिक निर्णय प्रधानपति लेता है। इसी तरह से एक गाँव में पढ़ाई से वंचित रह गई एक घरेलू महिला की तुलना महानगर और नगर की पढ़ी-लिखी हाउसवाइफ से कैसे कर सकते हैं। इसी तरह गाँव में अपने खेतों में काम करके या मजदूरी करके पूरे घर का कामकाज देखने वाली महिला की तुलना शहर की उस नौकरीपेशा महिला से भी कैसे कर सकते हैं, जो झाड़ू-पोछा, खाने बनाने से लेकर बच्चे संभालने तक के लिए मेड रखती है। यह वही महिला होती है, जो दिन भर में 5-6 घरों में काम करके भी अपने घर में वापस जाकर फिर से काम करती है। इसी तरह से सड़क पर चाय की दुकान पर बैठने वाली, गली-गली घूमकर सब्जी और अन्य सामान बेचने वाली महिलाओं की तुलना किसी कॉर्पोरेट की नौकरी करने वाली महिला अथवा अपना बड़ा बिजनेस संभालने वाली किसी महिला से भी कैसे कर सकते हैं। इस तरह से साफ है देश में महिलाओं की दो तरह की आबादी रहती है और विभिन्न रूपों में इनके बीच गहरी असमानता है।

आज भारत में महिलाओं की कामकाजी स्थिति परम्परवादी और आधुनिकता के संक्रमण के बीच फंसकर रह गई है। यह बिलकुल साफ है कि जो महिलाएं खुद के दम आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं, उनकी घर के निर्णयों के साथ ही सामाजिक और बाहरी मामलों में भी निर्णयात्मक स्थिति मजबूत हुई है। ऐसे में उन महिलाओं की निर्णायक स्थिति उतनी मजबूत नहीं है, जो उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद भी किसी तरह की आर्थिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले रही हैं। लेकिन उन महिलाओं की निर्णायक स्थिति और भी ज्यादा दयनीय है, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी हैं क्योंकि काम करने के बावजूद भी उनकी अपने घरों में कोई निर्णायक स्थिति नहीं होती है। इससे एक एक निष्कर्ष पर साफ तौर पर पहुंचा जा सकता है कि महिलाओं की निर्णायक स्थिति को तीन मुख्य बिन्दु निर्धारित हैं, पहला सामाजिक स्थिति, दूसरी शिक्षा और तीसरी कामकाजी स्थिति।

अगर सामाजिक रूप से देखें तो भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति के अनुसार कोई प्रामाणिक डाटा नहीं है। भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति को उसी रूप में देख सकते हैं, जिसे रूप में भारत में जातिवादी संरचना विद्यमान है। एक अनुमान के तौर पर देखें तो भारत की कुल महिला आबादी की करीब एक चौथाई आबादी दलित और आदिवासी है। यह आबादी दलितों और आदिवासियों के साथ हो रहे भेदभाव, अन्याय और शोषण के साथ उन देशों को भी साथ में झेलती है, जो एक महिला होने के कारण उसे झेलना पड़ता है। उसे दलित और आदिवासी वंचनाओं के साथ ही खुद दलित और आदिवासी समाज में ही महिला होने का दंश झेलना पड़ता है। इसके साथ ही इन्हें अपनी ऊपर की जातियों के न केवल पुरुषों के शोषण बल्कि महिलाओं के भी अमानवीय व्यवहार का शिकार भी होना पड़ता है। एक बहुत बड़ा सच यह भी यही कि सामाजिक ढांचे में सामाजिक शोषण के अलावा महिलाओं का महिलाओं द्वारा वर्गीय शोषण भी होता है। यही महिलाएं गांवों में लोगों के खेतों में काम करती हैं, मज़दूरी करती हैं, शहरों में लोगों के घरों में काम करती हैं और औद्योगिक मजदूर भी होती हैं। यही महिलाएं बलात्कार की शिकार भी सबसे ज्यादा हैं, जिनकी उस तरह कोई मीडिया रिपोर्टिंग नहीं होती है, जिस तरह अन्य महिलाओं के मामलों की होती है। जबकि करीब दो चौथाई अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाएं, वह आबादी हैं जिनमें शिक्षा होने के बावजूद भी घरों की चारदीवारी में ज्यादा कैद हैं। इस आबादी की बहुत कम फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जो आजीविका के लिए बाहर हैं या उच्च नौकरियों में हैं। इनमें कई अति पिछड़ी जातियाँ भी हैं, जिनकी सामाजिक स्थिति दलित और आदिवासी महिलाओं से कहीं से भी अलग नही है। बाकी करीब एक चौथाई महिलाओं को वह सामाजिक श्रेष्ठता के साथ ही वर्गीय श्रेष्ठता का अधिकार भी हासिल है। यह तबका आर्थिक तौर भी काफी मजबूत है, जिनके चलते इस वर्ग की महिलाओं को महिला सशक्तिकरण का सबसे अधिक फायदा मिला है। शिक्षा, नौकरी और राजनीति में इस वर्ग की महिलाएं इसलिए भी ज्यादा प्रगति कर पाई क्योंकि इन्हें अच्छे स्कूल, अच्छी सुविधाओं के साथ ही इन्हें, इनका काम निपटाने के लिए दलित, आदिवासी और अति पिछड़ी समुदाय की महिलाएं नौकर के रूप में मिली। जिस समय ये बड़े-बड़े स्कूल में पढ़ रही होती थी, उस दलित, आदिवासी और अति-पिछड़ी समुदाय की बच्चीयां इनके घर के काम निपटा रही होती थी। पिछड़ी समुदाय की लड़कियां या खुद के घर का काम करती थी या फिर बाहर निकलने पर आर्थिक स्थिति उनकी राह रोक लेती थी। इस तरह से दलित, आदिवासी और अतिपिछड़ी महिलाओं का सामाजिक पिछड़ापन, उन्हें और पीछे धकेलता जा रहा है और जातीय रूप से आगे एवं वर्गीय रूप से सशक्त महिलाओं के शक्तिकरण की राह को आसान करता गया है।

अब अगर शिक्षा के आधार पर देखें तो भारत में 85% पुरुषों के मुक़ाबले केवल दो तिहाई महिलाएं ही साक्षर हैं। जाहिर सी बात है कि शिक्षित महिलाओं की तादाद और भी कम होगी। एक आकलन के अनुसार दलित, आदिवासी और अतिपिछड़ी जातियों की लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर इस वर्ग के लड़कों के मुक़ाबले सबसे अधिक है। इसी के साथ ही इनके विवाह की औसत उम्र महज 15 से साल है, जिसके चलते इनके भविष्य की सारी संभवनाएं भी शून्य हो जाती हैं। पिछड़ावर्ग थोड़ा शिक्षित हुआ है लेकिन आर्थिक क्षमता, तकनीकी जानकारी तक पहुँच और जागरूकता के अभाव में, इस वर्ग महिलाएं उच्च वर्ग की महिलाओं से अभी भी बहुत पीछे हैं। विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में इनकी नाममात्र की उपस्थिति से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछड़ी जाति की महिलाओं की क्या स्थिति है।

इसी तरह से अगर कामकाजी स्तर पर देखें तो दलित, आदिवासी और अति पिछड़ी महिलाएं ज़्यादातर केवल निचले दर्जे के कामों में ही कार्यरत है। पिछड़े वर्ग की महिलाएं ऊंचे पदों पर पहुंची हैं लेकिन उनकी गिनती उँगलियों पर की जा सकती है। उच्च वर्ग की महिलाओं की भागीदारी ऊंचे और मध्यम वर्ग के पदों पर ही ज्यादा है। इस वर्ग की महिलाएं मजदूर और अन्य निचली श्रेणी के कामों में कम ही देखने को मिलती हैं। पिछड़े वर्ग की महिलाएं सामाजिक बाध्यताओं के चलते घरों में बैठना पसंद करती हैं लेकिन एक स्तर के नीचे के काम के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाती हैं। इस तरह सामाजिक स्थिति और आर्थिक बाध्यताएं कामकाजी स्तर को सीधे प्रभावित करती हैं। इस तरह से जहां यह सच है कि महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक एवं कामकाजी स्थिति तमाम प्रगति एवं बदलावों के बाद भी पुरुषों के मुक़ाबले बहुत कमतर है, उसी तरह से यह भी सच है कि उच्च सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति वाली महिलाओं के मुक़ाबले दलित, आदिवासी और पिछड़ी महिलाओं की सामाजिक और कामकाजी दशा बहुत ही सोचनीय है। यह आधी आबादी के अंदर की तीन चौथाई आबादी की व्यथा है। यह व्यथा आर्थिक और कामकाजी स्तर पर ही नहीं कई और मोर्चों पर साफ-साफ देखी जा सकती है, जैसे न्याय के मोर्चे पर। एक आकलन के अनुसार जेलों में बंद महिलाओं में दो तिहाई से भी अधिक दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय हैं। यह विमर्श दिखाता है कि किस तरह से महिलाओं की आबादी के बीच महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक वंचना के कई स्तर है। महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और कामकाजी अधिकार के साथ-साथ उनके न्यायिक हक को केवल महिला सशक्तिकरण के एक नारे के साथ नहीं लड़ा जा सकता है। सामाजिक स्थिति और आर्थिक वर्ग के आधार पर, उनकी सशक्तिकरण की लड़ाई को मजबूती देनी होगी क्योंकि कई बार यह भी सुनने में आता है कि कमजोर और असक्षम महिलाओं के लिए बनाए क़ानूनों के आधार पर, पढ़ी-लिखी महिलाएं, न्यायालयों में उसका दुरुपयोग करने लगती हैं, जिससे ऐसे कानूनों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठने लगते हैं। इसलिए महिलाओं के बीच के वर्गीय चरित्र को भी खूब समझना होगा और उसी के अनुसार सामाजिक न्याय और महिला न्याय की नई आधारशिला रखनी होगी।

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं. 9968605464  vinayiimc@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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