सिनेमा

इंसानियत की जिंदा मिसाल ‘पट्ट द साउंड’

 

लेखक, निर्देशक – मनीष उप्पल
कास्ट – मनीष उप्पल, रोशनी जीत बैरेट
अपनी रेटिंग4.5 स्टार

 

चीन से एक भयानक वायरस फैला जिसे कोरोना कहा गया। और इस वायरस ने किसी जैविक हथियार से ज्यादा घातक काम किया। लाखों लोग मारे गये। अमूमन पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी। भारत की अर्थव्यवस्था भी ऋणात्मक 24 पर आ गयी। अचानक से लगाया गया लॉक डाउन, बिना किसी पूर्व व्यवस्था के आनन-फानन में उठाए गये कदम जितने सुरक्षित साबित हुए उतने ही ये कदम घातक भी रहे। हजारों- लाखों लोग जब साधन नहीं मिले तो मीलों का सफर पैदल ही काट गये। आपने-हमने इनकी खबरें देखी, पढ़ी, सुनी औरों को सुनाई। लेकिन… लेकिन… लेकिन

इस बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जो गुप्त तरीके से लोगों की मदद करते रहे। उन्हें खाना खिलाना, आराम की व्यवस्था करना, राशन बांटना जैसे कई काम किए। जबकि यह काम सरकारों का होता है कि वह अपनी जनता को इस तरह के संकटों में न डाले और अगर डाल दे तो उनका उचित उपाय, निवारण भी ढूंढे, खोजे।

खैर जब लॉक डाउन लगा तो इस लॉक डाउन ने बहुतेरे लोगों की रचनात्मकता में वृद्धि की कोई साहित्यकार बनकर फेमस हुआ, कोई यूट्यूबर, कोई फिल्में बनाकर तो कोई कैसे। इधर आज बात करूँगा मनीष उप्पल की और उनकी फिल्म ‘पट्ट- द साउंड’ की। लगभग 15 मिनट की यह शॉर्ट फिल्म दिल जीत लेती है। फ़िल्म की कहानी में लेखक, निर्देशक खुद ही एक्टर भी बने हैं, खुद ही एडिटर हैं सबकुछ उन्होंने ही किया है। और क्या खूबसूरत किया है।

हर काम में कोई इतना परफेक्ट हो सकता है भला हाँ भी ना भी। फ़िल्म की कहानी एक खबर से शुरू होती है जहाँ घर में बैठी मोहिनी अपनी एक सहेली के साथ खबर देख रही है। यह सहेली दरअसल सुमन है जिसे मोहिनी ने कभी सहारा दिया था, रहने को छत दी थी, अपने पैरों पर खड़ा होने में उसकी मदद की थी। खबर बताई जाती है कि गुजरात बॉर्डर तक पैदल पहुंच चुके लोगों को पुलिस की ओर से वापस भगा दिया जा रहा है। और कुछ जगह कई पैदल मजदूर यात्री मारे जाते हैं। अब मोहिनी उनकी मदद किस तरह करती है और उसका उसे क्या फायदा या नुकसान होता है उसके द्वारा मदद करते समय कोई तकलीफ आई या लोगों के दिलों से इस समाज के प्रति घृणा भाव कम हुआ। इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए आपको यह फ़िल्म देखनी होगी।

महीने भर तक पैदल चलने वाले इन हजारों लोगों की मदद कई संस्थाओं ने की उसमें से एक किन्नर समुदाय भी था। मैंने इधर किन्नर समुदाय पर काफी कुछ पढ़ा, देखा , सुना है लेकिन बहुत ही कम बार ऐसा हुआ कि मैं प्रभावित हो पाया। लेकिन मनीष की इस फ़िल्म ने दिल जीत लिया। इससे बेहतर बात यह कि यह फ़िल्म 40 से ज्यादा नेशनल, इंटरनेशनल अवार्ड विभिन्न कैटेगरी में अपने नाम दर्ज करवा चुकी है। मनीष भाई एक ही दिल है कितनी बार जीतोगे यार।

लॉक डाउन, क्लोज टू जा, वडरिंग सोल जैसी छोटी-छोटी लेकिन मारक फिल्में उनके तरकश से निकली है। और ये सभी तीर उन्होंने बिना किसी बड़े कैमरे या बड़े संसाधन के माध्यम से निकाले हैं। इसे कहते हैं फ़िल्म निर्माण, इसे कहते हैं सिनेमेटोग्राफी, इसे कहते हैं सधा हुआ कैमरा एंगल, इसे कहते एडिटिंग।

मनीष उप्पल फ़िल्म निर्देशक, एक्टर, राइटर

एक्टिंग की बात करूं तो डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, एडिटर हर क्षेत्र में हाथ आजमाने वाले मनीष ने इस फ़िल्म में तीन किरदार निभाए हैं। काशी मौसी, मोहिनी और न्यूज एंकर का तीनों ही किरदार में जमे हैं। हालांकि दूसरी ओर सुमन ज्यादा कुछ करती दिखाई नहीं देती लेकिन जितनी बार पर्दे पर आती है अपना स्वाभाविक सा अभिनय करके फ़िल्म के साथ दर्शक को बांधे रखने की कोशिश करती रहती है। फ़िल्म बताती है कि वर्तमान में करीबन एक लाख से ज्यादा किन्नर हमारे देश में हैं जो अपने लिए भारत का नागरिक होने के नाते समान अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। भले ही कानून ने इन्हें कुछ मान्यताएं दे दी हों लेकिन जब तक हम सामाजिक तौर पर या दिमागी तौर पर इन्हें संबल प्रदान नहीं करेंगे तब तक यह वर्ग उपेक्षित, भीख मांगने या नाच – गाकर पेट पालने को मजबूर और यौन सम्बन्ध में लिप्त रहेगा सम्भवतः इसी तरह अपना जीवन यापन करता रहेगा।

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क- +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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