सिनेमा

स्त्री निर्णय का सम्मान ‘सारा’ज़

 

5 जुलाई 2021 को अमेजन प्राइम पर मलयालम फिल्म सारा’ज़ रिलीज़ हुई जूड एंथनी जोसेफ द्वारा निर्देशित और अक्षय हरीश द्वारा लिखित फिल्म है जिसमें अन्ना बेन और सन्नी बेन मुख्य भूमिकाओं में हैं शान रहमान द्वारा रचित संगीत निमिष राव का छायांकन। फ़िल्म सारा’ज़ की कहानी बिना किसी नाटकीयता से बचते हुए सरल-सहज ढंग से ‘माय बॉडी माय चॉइस’ के स्त्रीवादी नारे के पक्ष में अपनी बात रख रही है।

प्राकृतिक कारणों से माँ बनने में असमर्थ स्त्री को जहाँ हमारे समाज में बाँझ कहकर कलंकित किया जाता है, उसका सामाजिक बहिष्कार तक किया जाता है, वह समाज जहां लड़का पैदा न कर पानेपर स्त्री को आजीवन सामाजिक-पारिवारिक उपेक्षा मिलती है, उसी पारंपरिक कट्टरता के बीच घोषित रूप में, सारा दृढ़तापूर्वक अपना निर्णय देती है कि उसे माँ नहीं बनना! भला पितृसत्तात्मक सोच कैसे स्वीकार कर सकता है?

फिल्म की कहानी सीधी-सरल है, सारा, जो बचपन से ही माँ नहीं बनना और अपनी जैसी सोच के प्रगतिशील पुरुष जीवन, जिसे बच्चे पसन्द नहीं वह शादी कर लेती है। लेकिन गर्भवती होने गर्भपात करवाना चाहती है उसपर पारिवारिक दबाव उसे कुछ समय तक तनाव ग्रस्त करता है लेकिन अंत में वह सभी को अपने निर्णय के पक्ष में लाने में सफल होती है और बिना किसी पारिवारिक झगड़ों के कहानी ख़त्म हो जाती हैं।

फिल्म के पहले ही दृश्य में किशोरी सारा एक लड़के के मुँह पर उंगली रखकर स्पष्ट संकेत दे रही है, बहुत हुआ! चुप रहो! जब लड़का कहता है कि ‘हम शादी करेंगे इस साल तुम पहला बच्चा पैदा करोगी फिर दूसरा बच्चा पैदा होगा’सारा  घबरा जाती है,सारा  जो माँ बनने की संकल्पना से परे बचपन से इस धारणा के साथ बढ़ी हो रही है कि उसे बच्चे पैदा नहीं करना, यह उसका डर है या अति-आत्मवश्वास अथवा स्त्री स्वतंत्र-चेतना से उत्पन्न उसका अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना या फिर उसे आत्मकेंद्रित भी माना जा सकता है। इसका फैसला तो “जाकी रही भावना जैसी” पर निर्भर करता है।

जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, सारा आपको मातृत्व के महत्व को नकारने वाली, सिर्फ अपने आप से प्यार करने वाली स्वार्थी लग सकती है, मातृत्व या सृजन का एकमात्र माध्यम ‘स्त्री रूप’ में सारा सृष्टि-सृजन कैसे खारिज कर सकती है? यह प्रश्न आपको विचलित कर सकता है पितृसत्तात्मक समाज जहाँ स्त्री को पल-पल यह है जताया-सिखाया जाता है कि उसके जीवन की सार्थकता माँ बनने में ही है, वहाँ बांझपन की संकल्पना किसी भी स्त्री को भीतर तक से हिला देती है ऐसे में यह निर्णय लेना कि मुझे माँ ही नहीं बनना, अपने आप में एक स्वतंत्रता की उच्छृंखल पराकाष्ठा के रूप में हमारे सामने आता है। लेकिन स्त्री विमर्श के चश्में से जब आप सारा के निर्णय को देखते समझतें हैं तो सारा  के साथ खड़े होते नज़र आयेंगे स्त्री विमर्श का नारीवादी चश्मा पहनना कितना सही या गलत है इसका निर्णय फिल्म देखकर, आपका विवेक ही करेगा।

अगर आपने इस्मत चुगताई की ‘छुई-मुई’ कहानी पढ़ी होगी तो फिल्म देखते हुए आपको वह भी याद आ सकती है जहां बच्चा पैदा करना फकीरनी की तरह इतना ही आसान है कि जितना …रेल पर सवार होना या उतरना जबकि भाभी जान के लिए उतना ही कठिन। लेकिन सारा के लिए यह निर्णय सरलता और कठिनता का मामला ही नहीं है उसके अनुसार यह निर्णय उसके अधिकार में होना चाहिए ‘मेरा शरीर, मेरी पसन्द, मेरा निर्णय’ लेकिन पितृसत्ता इस निर्णय को पचा नहीं पायेगा, फिर चाहे वो स्त्री हो ,पुरुष। माय बॉडी माय चॉइस’ स्त्री विमर्श से जुड़ा नारा है जो स्त्री की शारीरिक स्वयत्ता और गर्भपात के आसपास के मुद्दों को उठाता है जहाँ स्त्री के यौन संबंधों, विवाह और प्रजनन विकल्पों के लिए अपने शरीर पर आत्मनिर्णय को महत्व दिया जाता है।

जबकि पितृसत्तात्मक मानसिकता स्त्री-देह को संपत्ति की तरह मानती है। यह नारा स्त्री की सहमति-असहमति के निर्णय के सम्मान की बात करता है। यह विडम्बना पूर्ण है कि यह एक ऐसी पंक्ति है जिसे अभी तक नहीं समझा ही नहीं गया और जब मातृत्व की बात आती है तो समझना चाहते भी नहीं। लेकिन सारा विंसेट बच्चे के सन्दर्भ में हमेशा असहमत थी क्योंकि उसका सपना एक फिल्म निर्देशक बनने का है।

सारा के माध्यम से यही ध्वनित हो रहा है कि वह माँ बनना ही नहीं चाहती, सारा  मातृत्व को बोझ नहीं मानती, उसका आत्मविश्वास हमें यकीन दिलाना चाहता है कि वह बच्चों को पालने पोसने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं, शायद हो भी न पाए दूसरी ओर वह अपने करियर को लेकर भी स्पष्ट है इसके लिए वह हर तरह से कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार है और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए पारिवारिक बन्धनों के दायरे में कैद, रूढ़ियों में जकड़ी स्त्री की भांति समझौता करने के लिए तैयार नहीं।

कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि मातृत्व के आनंद से सारा वंचित रहना चाहती है लेकिन एक स्त्री का आनंद किसमें है इसका फैसला कोई और कैसे कर सकता है? माँ बनने के लिए एक स्त्री को बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ती है नव निर्माण हेतु अपनी देह को तोड़ना पड़ता है। लेकिन सारा स्पष्ट है कि वह किसी ‘बचपन’ के साथ अन्याय करना नहीं चाहती क्योंकि इस जिम्मेदारी के लिए वह तैयार नहीं है।

सारा अपनी फिल्म-स्क्रिप्ट के कथानक और तथ्यों में वास्तविकता लाने के लिए वह फॉरेंसिक पैथोलॉजिस्ट डॉ. संध्या की सलाह लेती है और वही उसका सम्पर्क उसके भाई जीवन से होता है जो बाद में वैवाहिक संबंध में परिवर्तित होता है, गौर करने लायक है कि उनकी माँ और लड़की के माँ-बाप की जिद पर यह शादी होती है शायद दोनों शादी के लिए भी तैयार नहीं थे लेकिन जीवन की माँ दोनों को सामाजिक मर्यादाओं की दुहाई देती है तो दूसरी ओर सारा के माता-पिता भी उसको अल्टीमेटम दे चुके हैं कि छह महीने में अपने लिए लड़का देखो, नहीं तो हम अपने हिसाब से शादी कर देंगे।

समाज-परिवार व्यक्ति को वैवाहिक अनुशासन में बांधकर कहीं न कहीं उसकी व्यक्ति-सत्ता और स्वतंत्रता को आहत करता है शादी किसी भी समाज की अनिवार्य शर्त होती है और उसके दो-तीन महीने के भीतर पारिवारिक दबाव कि बच्चे कब होंगे, बच्चे भी महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य जिम्मेदारी है। फिल्म इस मान्यता पर भी अपने ढंग से बात रखती है कि हमारी जीवन शैली में परिवर्तन हो रहे हैं, इन मान्यताओं में परिवर्तन होना बहुत जरूरी है। आज का युवा स्वेच्छा से इस जिम्मेदारी को ग्रहण करना चाहता है अन्यथा उसे यह बोझ प्रतीत होता है, शादी टूटे इससे बेहतर वह मान्यताओं को तोड़ना पसन्द कर रहा है।

तिस पर बच्चों को पालने की जिम्मेवारी केवल स्त्री की ही होती है संयुक्त परिवारों में यह समस्या कभी बाहर न आ पाई लेकिन आज की कामकाजी स्त्री एकल परिवार की स्त्री ,को ही क्यों अपनी अतिरिक्त ऊर्जा लगानी पड़ती है और फिर अष्टभुजा देवी से तुलना कर उसका महिमामंडन किया जाता है ये कोई नहीं समझना चाहता कि कामकाजी महिलाएं किस तरह से दोहरा शोषण का शिकार हो रही है। इसे उनकी मजबूरी कह लो या स्वतंत्रता की असीम चाहना  कि वह इतने बोझ के साथ भी उड़ना चाहती है,स्वच्छंद विचरण करना चाहती है, लेकिन फ़िल्म मातृत्व के महिमामंडन का खंडनकरती है पर कहीं भी बच्चों को बोझ के रूप में नहीं प्रस्तुत करती।

इसी संदर्भ में फिल्म में इंडस्ट्री में महिलाओं के साथ जो भेदभाव होता है उस पर भी दृष्टि डाली गई है कि महिलाओं का वास्तविक काम तो बच्चे पैदा करना और उनकी परवरिश करना है अगर कामकाजी होगी तो बच्चों की परवरिश पर उसका बुरा असर पड़ेगा। एक प्रसिद्ध अभिनेत्री जो अपने कैरियर की सर्वोत्तम ऊँचाईयों पर पहुंचकर फिल्में इसीलिए छोड़ चुकी है क्योंकि उसे बच्चों की परवरिश करनी है। आज उसका पति उसे इतनी परमिशन  दे रहा है कि वह टीवी में कुछ एक विज्ञापन कर ले और रियलिटी शो में जज बन जाए उसे पैसा भी आ जाएगा और बच्चों की परवरिश भी पूरी होती रहेगी ‘इजाजत देना’ यह विडम्बना ही है कि स्त्रियों को इजाजत लेनी पड़ती है। लेकिन पिता बनने पर पुरुष को अपना कैरियर नहीं छोड़ना पड़ता, और न ही अपनी दिनचर्या में कोई बदलाव लाने होते हैं, किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है।

फिल्म से जुड़े सामाजिक सरोकार नये ढंग से सोचने और जीने की इच्छा जागृत करतें हैं। जैसे जनसंख्या विस्फोट के बावज़ूद एक सम्प्रदाय विशेष के नेता दूसरे सम्प्रदाय के साथ मुकाबला करते हुए अपनी महिलाओं को अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहे हैं ताकि उनका समाज अल्पसंख्यक न हो जाए, यह फिल्म उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करती है। फिल्म कहीं भी यह नहीं बता रही कि बच्चे पैदा करना गलत है या बच्चों का पालन पोषण करना एक बोझ है या फिर वह यह भी नहीं बता रही कि अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर सारा इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहते बल्कि सारा का आत्मविश्वास ही है कि वह जो भी करेगी बेस्ट ही करेगी और बेस्ट माँ बनने की अभी उसकी तैयारी पूरी नहीं है।

वह जानती है कि उसके पति को बच्चे पालना पसन्द नहीं, ऐसे में वह सहयोग की उम्मीद कर ही नहीं सकती जिसे इसे एक महत्त्वपूर्ण गौण कथा के माध्यम से बताया गया है जिसमें एक महिला के तीन बच्चे हैं चौथा होने वाला है, चेक-अप करवाने अकेले ही बच्चे को गोद में लिए हॉस्पिटल आई है, डॉ. उसे समझाता है कि और बच्चे तुम्हारे लिए रिस्क है पति को मना क्यों नहीं करती वो दबी आवाज़ में कहती है मैं कैसे मनाकर सकती हूँ? फिल्म का अन्तिम दृश्य वही महिला अपने रोते हुए बच्चे को टहलते हुए चौथे बच्चे को सुलाने का प्रयास कर रही है पति चैन से सो रहा है, इसी बीच दूसरा बच्चा मचलने लगता है वह बिना झुके हाथों से प्यार की थपकियाँ देने के बजाये, जिस तरह अपने एक पैर से थपकी देती है, आपको बच्चे के प्रति यह दृश्य बड़ा ही क्रूर लगता है।

तो फिल्म अपना निष्कर्ष दे रही है कि बच्चे को पैर से मार कर सुलाने से तो बेहतर है सारा का माँ न बनने का निर्णय। हम जानते हैं पितृसत्ता में बच्चों की परवरिश माँ की ही जिम्मेवारी रहती है, पिता चूँकि कमाने वाला है, इसलिए उसका सहयोग पहले ही बहुत बड़ा है बच्चे पालना क्या कठिन काम है। जब सारा का पति जीवन अचानक कहता है कि ठीक है मैं पहले बच्चे पसन्द नहीं करता था लेकिन अब पसन्द कर रहा हूँ यह ‘एक क्षण’ का फैसला था जो कि पारिवारिक दबाव में लिया गया था। लेकिन सारा अपने निर्णय पर अटल है। फिल्म के इस थीम को नारीवाद या फेमिनिज्म का विकृत रूप भी कहा जा रहा है, जिसमें यह माना जाएगा कि स्त्री का यह कौन सा ‘वाद’ है कि उसे मातृत्व से दूर कर रहा है।

सामान्यत: जब कोई स्त्री अनचाहे में गर्भवती हो जाती है तो दम्पति चुपचाप गर्भपात करवा आते हैं, किसी को पता भी नहीं चलता यह उनकी समझदारी है अथवा मजबूरी, हमारे जीवन में हम कई ऐसी दम्पतियों से परिचित होंगे जो एक बच्चे से ही संतुष्ट है क्योंकि वे मानते हैं कि एक ही बच्चा ठीक से पाल लें तो बेहतर है, सारा का निर्णय इस सोच का ही अगला कदम है जिसे आज नहीं तो आने वाले समय में सहजता से लिया जायेगा। फिल्म वास्तव में मातृत्व के सामाजिक मानदण्डों के माध्यम स्पष्ट करती है कि पारिवारिक हस्तक्षेप हमारे लिए अच्छा भी होता है लेकिन अधिकतर तकलीफदेह ही होता है, हमें भावनात्मक शोषण के बाद मानसिक यंत्रणाओं के साथ हमें ऐसी निर्णय लेने पड़ते हैं कि हमें उसे पूरी उम्र भुगतना पड़ता है।

लेकिन सारा चुपचाप नहीं बल्कि सबकी सहमति से यह निर्णय लेती है, उसका आत्मविश्वास और अधिकारों के प्रति सजगता, तर्क सहित बात रखने का तरीका और फिर सभी सारा के निर्णय में सहमति दे देंतें हैं। तब कहीं ना कहीं अचानक से वह पक्ष सामने आता है कि सभी के सभी एक अजन्में जीवन को मारने के लिए कैसे तैयार होते हैं? क्योंकि अंत तक हमारे भीतर रोमांचक जिज्ञासा बनी हुई थी, जबकि हम सकारत्मक अंत के लिए तैयार थे, सकारात्मक पक्ष का क्या मतलब है?

सकारात्मक पक्ष का मतलब यही है कि हमें इसी रूप में तैयार किया गया है कि सारा गर्भपात नहीं करवाएगी, सब ठीक चल रहा है, सारा बिल्कुल सही उम्र में माँ बन रही है, कोई समस्या नहीं है, तो क्यों सभी भ्रूण-हत्या को तैयार हो गए। हमें लगता कि सारा ने अपने गर्भ में एक निर्दोष जीवन को मारने का जघन्य अपराध किया है और बहुत आसानी से हम उसके विचारों से सहमत नहीं हो पाते, तब लगता है कि यह सृष्टि, सृजन और विकास का विरोध करने वाली फिल्म है।

लेकिन आप यह भी पाएंगे कि सारा के निर्णय में पूरा परिवार साथ है, प्रतीक रूप में पूरा समाज उसके साथ है और सारा के निर्णय में सामाजिक सहमति होने का अर्थ यह भी है कि हमें एक स्त्री के निर्णय का सम्मान करना सीखना होगा, वह निर्णय कठोर जरूर था लेकिन यह निर्णय सिर्फ एक प्रतीक के रूप में भी क्यों ना समझा जाए। इस पूरी प्रक्रिया में सारा के नाम पर‘माय बॉडी माय चॉइस’ के स्त्री पक्ष को दोष देने से पहले हमें उन सभी कन्या-भ्रूण हत्याओं पर भी विचार कर लेना चाहिए जहां पर एक लड़की को पैदा होने से पहले पूरे पारिवारिक सहमति से स्त्री की जान जोखिम में डालकर बार–बार चुपचाप गर्भपात करवाया जाता है। आज लिंगानुपात के डरावने सच से सभी वाकिफ हैं।

अपने निर्णय को तर्क सहित रखते हुए सारा अपनी सास से कहती है कि आपको क्या मिला दो बच्चे पैदा किए? इस आयु में इधर उधर भटक रही हो? कहीं ना कहीं यह प्रश्न पूरे समाज की माताओं से हैं जो अपने बच्चों का ख्याल रखती हैं, उनकी सेवा करती हैं और जब वृद्धावस्था में उन्हें उनकी आवश्यकता होती है तो वह बच्चे कहां होते हैं? यह कोई एक-दो की सच्चाई नहीं बल्कि ‘वृद्ध विमर्श’ का आरंभ इस यथार्थ का उदाहरण है। सारा भी कहती है कि ऐसा नहीं कि मुझे बच्चे पसन्द नहीं है लेकिन मेरे पास उन्हें संभालने की आदत नहीं है मेरे लिए एक व्यक्ति का अन्तिम उद्देश्य कुछ ऐसा योगदान देना चाहिए जिससे दुनिया आपको मरने के बाद रखे, ना कि केवल बच्चे पैदा करने और उनके द्वारा यानी बच्चों के द्वारा याद करने के लिए, लेकिन जीते जी तो बच्चे माँ बाप को याद नहीं रखते फिर मरने के बाद की क्या उम्मीद रखेगा कोई।

फिल्में देखेंगे तो पायेंगे कि फिल्म के स्त्री पात्र सारा  के निर्णय से सहमत नहीं जबकि पुरुष पात्र उसके पिता, पति और डॉक्टर उसका पूरा पूरा साथ देना चाहता है उसका डॉक्टर कहता है कि एक ‘बुरे माता-पिता होने की तुलना में माता-पिता ना होना बेहतर है’ पर बात सिर्फ स्त्री और पुरुष की नहीं है बल्कि उन सामाजिक मान्यताओं की जिसमे हमें गढ़ा गया है। मलयालम फिल्में एक प्रगतिशील फलक को लेकर चल रही हैं ग्रेट इंडियन किचन में भी इंडियन किचन पर व्यंग किया गया है जहां रसोई की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की है, पुरुष अखबार पढ़ता है, योगा करता है परिवार के नाम पर कोई घरेलू जिम्मेदारी नहीं, स्त्री को नौकरी इसीलिए नहीं करने दी जाती कि यदि नौकरी करेगी तो पारिवारिक जिम्मेदारियों को कौन संभालेगा माँ कौन बनेगा।

फिल्म शीर्षक ‘सारा’ज़‘ में जो ‘S’ लगा हुआ है वह उसके निर्णय के सम्मान में लगा हुआ है। फेमिनिज्म, नारीवाद, स्त्री विमर्श सब तो एक ही बात कह रहे हैं कि हमारे निर्णय की कद्र करें, हम पर विश्वास करें, हम जो फैसला कर रहे हैं वह सही ही होगा, पितृसत्ता की छाया में लिए गए फैसले उस स्त्री के लिए कितने सही होंगे जो उस पर थोपे जा रहे हैं। जिन सामाजिक राजनैतिक परिदृश्य में सारा बच्चा पैदा करने से मना कर रही है क्यों ना हम उसका संदर्भ उन स्थितियों से भी यहाँ जोड़ ले, जहां पर महिलाओं को बच्चा पैदा करने का कारखाना बना दिया गया है कि अपने को अल्पसंख्यक नहीं होने देना है,वही बच्चे पैदा करो वह मनुष्य नहीं बच्चा पैदा करने की मशीन हो गई।

वस्तुत: फिल्म एक पुरुष बना रहा है जो स्त्री के नजरिए से बात करता है, एक स्त्री के निर्णय प्रति सम्मान के लिए प्रेरित करता है। सारा’ज़ के निर्णय का सम्मान सम्पूर्ण स्त्री समाज का ही सम्मान है। फ़िल्म के कथानक को स्वीकार करना सहज नहीं इसे समाज विरोधी ही माना जाएगा लेकिन उसके लिए भी पितृसत्तात्मक मानसिकता ही जिम्मेदार है, जिसने हमें इसी रूप में परिपक्व किया है। फिल्म ‘माय बॉडी माय चॉइस’ के संदर्भ में अत्यंत ज्वलंत मुद्दे को हमारे सामने रखती है कि एक स्त्री के माँ बनने या न बनने का निर्णय वह स्वयं क्यों नहीं ले सकती?

क्यों उस पर सामाजिक दबाब डाले जाते हैं? जबकि कन्या भ्रूणहत्या रुकने का नाम नहीं ले रही, स्त्री को मात्र बच्चे पैदा करने की मशीन ही मानने की मानसिकता को बढ़ावा मिल रहा है, सारा के गर्भपात का निर्णय अपराध कैसे है? इसलिए मैं समझती हूँ कि माँ न बनने का निर्णय और यहाँ गर्भपात का निर्णय स्त्री अधिकारों के प्रति जागरूक करने के सन्दर्भों से जुड़ा है, क्योंकि स्त्री विमर्श निर्णय की स्वतंत्रता की बात करता है।

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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