सिनेमा

चाशनी सी घोलती ‘पगलैट’

निर्देशक – उमेश बिष्ट
स्टार कास्ट – सान्या मल्हौत्रा, आशुतोष राणा, श्रुति शर्मा, सयानी गुप्ता, रघुबीर यादव, शीबा चड्ढा, नताशा रस्तोगी, भूपेश पंड्या, राजेश तैलंग, मेघना मलिक, नकुल रोशन सहदेव, अश्लेषा ठाकुर, सचिन चौधरी आदि
अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

एक सीन देखिए जिसमें पंडा कहानी सुना रहा है। ‘एक बार एक आदमी था बहुत दुष्ट, लोभी, कपटी, पराई स्त्रियों पर नजर रखने वाला। एक दिन वो जंगल गया और शेर का शिकार हो गया। तुरन्त यमदूत पहुंचे और उसकी आत्मा को लेकर यमलोक चल दिये। उधर यमलोक में चित्रगुप्त जी ने उस व्यक्ति के कुकर्मो का हिसाब लगाना शुरु किया। उसे एक से एक नरक की सजा सुनाई। सांपों से कटवाना , ख़ौलते तेल में डुबो देना, कोड़े लगवाना। मतलब यातना ही यातना। इधर धरती पर उस व्यक्ति का मृत शरीर पड़ा हुआ था। अचानक आसमान से एक बाज आया और उस व्यक्ति की एक हड्डी चोंच में लेकर उड़ गया। दूसरे बाज ने जब उसकी चोंच में हड्डी देखी तो उस हड्डी के लिए उस बाज पर झपटा। लड़ते -लड़ते दोनों बाज गंगा नदी के ऊपर आ गए और इन दोनों की लड़ाई में बाज की चोंच से हड्डी गंगा जी में गिर पड़ी। तो जैसे ही हड्डी गंगा जी में गिरी तो वहां यमलोक में उस आदमी के सारे पाप धुल गए और यमराज को उस आदमी को स्वर्गलोक भेजना पड़ा तो यह महत्व है गंगाजी में अस्थि विर्सजन करने का।’

दूसरा सीन देखिए। इस कहानी को जब एक पात्र घर में आकर सुनाता है तो मरने वाले की बेवा कहती है। ‘जिंदगी भर चोरी, डकैती, रेप सब करो और अंत में अस्थियां गंगाजी में बहा दो स्वर्ग में सीट पक्की।’

है न दो विचारधारा एक ही फ़िल्म में। दरअसल फ़िल्म की कहानी है कि आस्तिक नाम का हीरो है जो मर चुका है जिसे कहीं भी फ़िल्म में दिखाया नहीं गया है बस उसका क्रिया कर्म किया जा रहा है। उसके बाद उसकी बीवी रो तो नहीं रही उल्टा उसे पेप्सी चाहिए, गोल गप्पे चाहिए। मां उसकी नजर उतारती है। मरने वाले की गर्लफ्रैंड भी थी जो उसी के साथ अच्छी तनख्वाह पर काम कर रही थी। छोटा भाई कहता है भाई ने किया ही क्या। जबकि आस्तिक जो मरा है वह सत्तर हजार कमाने वाला, घर बनाकर देने वाला बढ़िया लड़का था। उधर एक देवर विधवा भाभी से प्यार करता है। बस एक मां-बाप है लगता है बस इन दोनों को ही सबसे ज्यादा गम और दुख है बेटे के जाने का। कहानी कुछ उत्तरआधुनिक सी लगती है। लेकिन काफी सोच भी बदलती है। वैसे भी कौन ज्यादा दिन गमी में रहता है। आजकल तो लोग तीसरे दिन तीये की बैठक के साथ ही सारा काम तमाम कर देते हैं। पगलैट फिल्म रिव्यू | Pagglait film review starring Sanya Malhotra | Netflix Pagglait movie review - Hindi Filmibeat

उमेश बिष्ट की कहानी अच्छी है। उनकी पिछली फिल्में भी अच्छी रही हैं। औऱ उनका कहन स्तर भी अच्छा है। पिछले दिनों आई सीमा पाहवा की ‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ फ़िल्म की याद भी दिलाती है यह फ़िल्म। अच्छा-अच्छा और चाशनी में घुली सी यह कहानी कुछ और कुछ और की मांग भी करती है। फ़िल्म रोचक है कुछ कुछ तो कुछ कुछ सपाट भी है। स्क्रिप्ट में थोड़ी कसावट की गुंजाइश बाकी रह जाती है।

छोटे शहर की कहानी का दमदार बैकग्राउंड, बड़ा सा परिवार, परिवार में समस्याएं छोटी-छोटी लेकिन गम्भीर और कई बार हास्यास्पद। लेकिन फ़िल्म के अंत में इन सबका बढ़िया सा उपचार। संवाद कुछ एक बेहतर बन पड़े हैं। शायद यह फ़िल्म उन पगलैट लड़कियों के लिए ही बनी है जो वास्तव में कुछ हटकर हैं। ‘लड़कियों की सब फिक्र करते हैं, लेकिन लड़कियां क्या सोचती हैं, इसकी फिक्र कोई नहीं करता।’ इस बात को, संवाद को यह फ़िल्म सार्थक करती है।

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लीड रोल में संध्या के किरदार में सान्या मल्हौत्रा एक बार फिर से अपनी एक्टिंग से छाप छोड़ती हैं। श्रुति शर्मा, सयानी गुप्ता, रघुबीर यादव, शीबा चड्ढा, नताशा रस्तोगी, भूपेश पंड्या, राजेश तैलंग, मेघना मलिक, नकुल रोशन सहदेव, अश्लेषा ठाकुर, सचिन चौधरी आदि तमाम कलाकारों ने अपना भरपूर दमखम दिखाया है। इन सबमें गमजदा बाप बने आशुतोष राणा पूरी फिल्म में छाए रहे जैसे किसी बड़े पेड़ की छांव तले बाकी लोग आराम फरमा रहे हों कुछ वैसी भूमिका रही आशुतोष की। गीत-संगीत औसत है लेकिन जितना भी है धीमा सा है और सुनने में अच्छा लगता है। रफी महमूद का सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। प्रेरणा सहगल की एडिटिंग के लिए तारीफ करनी चाहिए। फ़िल्म में कलर थीम , रंगों का इस्तेमाल भी अच्छा लगता है सब कुछ जीवंत सा, असलियत का आभास कराता है।

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क- +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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