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निर्देशक – दीपांकर प्रकाश
स्टार कास्ट – यशपाल शर्मा, प्रगीत पंडित, श्वेता पड्डा, राजेन्द्र गुप्ता, ब्रजेन्द्र काला, आदि
बालू नाम का एक आदमी है जो दिमाग से पैदल है। बचपन में बैल ने उसे सींग मार दिया उसके सिर में, सो उसका दिमाग जाता रहा। गांव में उसके साथी किशन के साथ वह रहता है। इससे पहले एक कूड़ेदान में किशन की काकी को बालू पड़ा मिला तो वो उसे साथ ले आई। काकी के मरने के बाद किशन उसे संभाल रहा है। बालू इतना भोला है कि उसे खरगोश की कहानी के अलावा कुछ याद नहीं रहता। किशन उसे उलाहना देता है कि उसके चक्कर में उसने जिन्दगी खराब कर ली। वरना वो नौकरी करता, पैसे कमाता, ऐश करता। खैर किस्मत में लिखा था झेलना तो झेल रहा है। अब बालू और किशन की कहानी ‘मूसो’ का अंत क्या होगा? यह तो फ़िल्म देखने के बाद पता चलेगा।
बालू जिसे नरम, मुलायम चीजों को सहलाने में मजा आता है। मजे-मजे में उसके द्वारा सहलाई जाने वाली सजीव वस्तुएं निर्जीव हो जाती हैं। किशन और बालू घुमक्कड़ प्रवृति के हैं। एक जगह रुपए कमाते हैं फिर खा-पीकर दाना चुग करके उड़ चलते हैं। उनके सपने भी है जमीन लेने के, घर बनाने के, जानवर पालने के। अब देखना यह है कि क्या उनके सपने पूरे होंगे?

बालू (यशपाल शर्मा) और किशन (प्रगीत पंडित)
दरअसल यह फ़िल्म एक विदेशी साहित्यकार ‘जॉन स्टैनबैक’ के उपन्यास – ‘ऑफ़ माइस एंड मेन’ पर आधारित है। जिसके डायलॉग राजस्थान के चर्चित कथाकार ‘चरण सिंह पथिक’ तथा इस फ़िल्म के साथ पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में उतरे ‘दीपांकर प्रकाश’ के द्वारा लिखे गए हैं। स्क्रीनप्ले भी दीपांकर ने लिखा है और बहुत ही कसा हुआ लिखा है। फ़िल्म एक तरफ जहाँ बालू के बालमन को दिखाती है वहीं उसके साथ-साथ बबलू के भीतर की कुंठाओं को भी हमारे सामने लेकर आती है।
अभिनय के मामले में ‘यशपाल शर्मा’ , ‘प्रगीत पंडित’ , ‘ब्रजेन्द्र काला’ , ‘राजेन्द्र गुप्ता’ , ‘श्वेता पड्डा’ बेहतरीन लगे। लेकिन इन सबमें बाजी मारते हैं यशपाल शर्मा। यशपाल शर्मा का एक नया रंग, रूप और अंदाज इसमें आपको देखने को मिलेगा। जिस मासूमियत से उन्होंने मंदबुद्धि व्यक्ति का किरदार गढ़ा है लाजवाब लगता है। बालू के अलावा कुंठित बबलू के किरदार में इश्तेयाक खान खूब लगे लेकिन उससे कहीं ज्यादा वे शक्की मिजाज पुरुष के रूप में नजर आए। लेकिन बालू की उन कुंठाओं को दिखाते समय निर्देशक को चाहिए था कि इस किरदार को थोड़ा और गढ़ा जाना चाहिए था। वहीं किशन के रूप में प्रगीत पंडित भी उम्दा लगे। भगवान बने राजेन्द्र गुप्ता जब एक औरत को रांड कहते हैं और वहीं एक कुत्ते के मारे जाने पर बिफरते हैं, बुक्का फाड़कर रोते हैं वह दिखाता है कि हमारे समाज में इंसान से ज्यादा जानवरों के साथ मनुष्य सहृदय नजर आता है। भोगी बने ब्रजेन्द्र काला के पास ज्यादा करने को कुछ था नहीं लेकिन जब-जब वे पर्दे पर आए खूब लगे। वहीं श्वेता पड्डा दूसरे मर्दों की तलाश करती औरत के रूप में भी जंचती है।

रानी (श्वेता पड्डा) और बालू (यशपाल शर्मा)
कास्टिंग, कॉस्ट्यूम, म्यूजिक, बैकग्राउंड स्कोर, एडिटिंग सभी को मिलाकर यह मासूमियत और कुंठाओं की कहानी ढूंढाड़ी और ब्रज भाषा में अच्छी लगती है। लोक गीत सुनने में सुहाने लगते हैं। दरअसल एडिटिंग में सागर चोरत का किया गया कमाल ही है कि यह मूसो फ़िल्म इतनी खूबसूरत बन सकी। अनुपम श्याम ओझा टाल (फैक्ट्री) के मालिक के रूप में कम समय पर्दे पर आए लेकिन रंग जमाया। अनुपम इससे पहले करीबन 40 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं। जिनमें बैंडिट क्वीन, स्लमडॉग मिलेनियर, हल्ला बोल, परज़ानिया, हजारो ख्वाहिशें ऐसी प्रमुख हैं। हाल में वे ‘दास कैपिटल’ फ़िल्म में सिनेमा के दिगज्ज कलाकार यशपाल शर्मा के साथ भी नजर आए हैं। यह फ़िल्म दास कैपिटल भी अभी फेस्टिवल में चल रही है।
मूसो फ़िल्म कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा रही है। जहाँ इसे कई अवॉर्ड भी मिले हैं। मूसो फ़िल्म के बारे में जब सुना था तो यह जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह इस तरह की फ़िल्म होगी। लेकिन फेस्टिवल्स की राह में खूब दौड़ रही इस फ़िल्म को जब, जहाँ जैसे देखने का मौका मिले देख डालिएगा। क्योंकि ऐसी फिल्में थियरेट में भले कमाल कर पाए या नहीं लेकिन फेस्टिवल्स और आम जनमानस पर बहुत असरदार साबित होती हैं।
अपनी रेटिंग – 4 स्टार
तेजस पूनियां
लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com
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