इरोम शर्मिला
शख्सियत

‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला

आजाद भारत के असली सितारे-50

  दुनिया की सबसे लम्बी अवधि तक अनशन करने वाली ‘आयरन लेडी’ के रूप में मशहूर इरोम शर्मिला चानू (जन्म-14.3.1972) की उम्र उस समय 28 साल की थी, जब उन्होंने 4 नवम्बर सन 2000 को अनशन शुरू किया था। इसके ठीक दो दिन पहले मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैंड पर सुरक्षा बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये थे।

वैसे यह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं थी, लेकिन इरोम शर्मिला को इस घटना ने निर्णायक कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। पहले से ही वे अफ्स्पा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) का विरोध कर रहीं थीं। इस हादसे के चलते इरोम ने अफ्स्पा एक्ट नहीं हटने तक कुछ नहीं खाने, पीने और बालों में कंघी नहीं करने का प्रण कर लिया और अनशन पर बैठ गईं। उसके बाद की उनके अनशन की कहानी बेहद कारुणिक है। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके ले गई और 21 नवम्बर को रिहा कर दिया। हालत बिगड़ने के बावजूद अपनी प्रतिज्ञा पर अड़े रहने के कारण अगले दिन फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे 30 दिसम्बर 2000 को फिर रिहा हुईं और जनवरी 2001 में फिर गिरफ्तार हो गईं।

इसके बाद उन्हें ‘आत्महत्या के प्रयास’ के अपराध में एक साल कैद की सजा मिली। इरोम की जान बचाए रखने के लिए जेल तथा अस्पताल कर्मियों को उनके साथ जरा भी नरमी न बरतने का सख्त आदेश था।  21 नवम्बर 2001 को वे फिर रिहा हुईं और चार दिन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद 2002 में फिर रिहा हुईं और एक साल बाद फिर गिरफ्तार हुईं। जेल में इरोम के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जाता था उसके बारे में उनके संघर्ष पर पुस्तक लिखने वाले शशिधर खान लिखते हैं,

“इरोम की जान बचाने के लिए उन्हें इंफाल में जिस अस्पताल में रखा गया है, वह एक प्रकार से उप-जेल में तब्दील है। अस्पताल के अंदर–बाहर कड़ा पहरा है और आस-पास किसी सिविलियन को फटकने नहीं दिया जाता। इरोम को किसी से मिलने-जुलने या बातचीत करने नहीं दिया जाता है। यहाँ तक कि इरोम की माँ, उनके भाई-बंधु और परिजनों को भी उनसे मिलने की इजाजत नहीं है। अस्पताल में डॉक्टर–नर्स से ज्यादा इरोम को हर समय पुलिस कर्मी घेरे रहते हैं और ये भी उनसे बात नहीं करते। अर्थात ‘देखभाल’ का सारा इंतजाम इरोम को मानसिक रोगी बना देने के लिए किया गया है।” (इरोम शर्मिला और आमरण अनशन, शशिधर खान, पृष्ठ- 104)

कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके साथ हो रहे इस तरह के व्यवहार और न्याय-प्रक्रिया की कमजोरियों को लेकर वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट गए जहाँ से उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने का निर्देश मिला। दूसरी ओर, शर्मीला के एक साथी ने भी गुवाहाटी हाईकोर्ट में उनकी रिहाई के लिए याचिका डाली थी। हाईकोर्ट ने मणिपुर सरकार को नोटिस भेजा। उसकी नोटिस पर मणिपुर सरकार का जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने पर कोर्ट ने इरोम को रिहा करने का आदेश दिया। चकित करने वाली बात यह कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन और उसका उलंघन साथ-साथ हुआ। रिहाई के हफ्ते भर बाद ही इरोम को फिर हवालात के अंदर कर दिया गया। इस तरह इरोम का अनशन और उनके ऊपर मुकदमा साथ-साथ चलता रहा।

नवम्बर 2000 में जब इरोम ने अनशन शुरू किया तो सबसे पहले केन्द्रीय राज्यमन्त्री विजय चक्रवर्ती ने उनसे अनशन तोड़ने के लिए कहा। इसके बाद 2001 में मणिपुर के मुख्यमन्त्री राधागोविन्द कोइजाम ने वही बात दुहराई, लेकिन 2005 में मुख्यमन्त्री ओकरम इबोबी सिंह ने इसे अनशन मानने से ही इनकार कर दिया। उन्होंने इसे सीधे अपराध घोषित करके शर्मिला के जिद्दी व्यवहार को दुर्भाग्यपूर्ण बता दिया। उनके अनुसार आफ्स्पा ऐक्ट निरस्त करने की इरोम शर्मिला की जिद राज्य और केन्द्र-दोनों सरकारों को स्वीकार नहीं है। इस बीच उन्हें 2014 में आम आदमी पार्टी की ओर लोकसभा का चुनाव लड़ने का आमन्त्रण भी मिला था, जिसे आम आदमी पार्टी के प्रशान्त भूषण ने दिया था। उस प्रस्ताव को इरोम ने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था।

 निस्संदेह इरोम शर्मिला के अनशन के पीछे कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। उनकी कोई राजनीतिक आकांक्षा भी नहीं थी। आन्दोलन, प्रदर्शन जैसे आमतौर पर चलने वाले विरोध के उपायों से अलग एक छोटे से प्रदेश के अपने भाई-बंधुओं को गुलामी में डालने वाले कानून की ज्यादती से छुटकारा दिलाने के लिए इरोम शर्मिला ने अनशन शुरू किया और अपनी जिन्दगी दाँव पर लगा दिया।

इरोम चानू शर्मिला का जन्म मणिपुर की राजधानी इंफाल के कोंगपाल नामक स्थान पर 14 मार्च 1972 को हुआ था। उनकी माँ का नाम इरोम ओंग्बी सखी और पिता का नाम इरोम नंदा है। बचपन से ही एकांत पसन्द, कविताएं लिखने वाली और अपनी माँ को अपना प्रेरणास्रोत मानने वाली इरोम शर्मिला मणिपुर की राजधानी इंफाल के एक पशु चिकित्सालय में एक अनपढ़ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की 9 संतानों में से सबसे छोटी संतान थीं और क्लास में सबसे पीछे बैठती थी। किन्तु अन्याय से लड़ने का संस्कार उन्हें बचपन से ही मिला हुआ था। सामाजिक जुर्म के खिलाफ लड़ने का जज्बा उनके खून में है।

       इरोम शर्मिला का लम्बा अनशन हमें इस बात पर पुनर्विचार के लिए भी मजबूर करता है कि गुलामी के दिनों में महात्मा गाँधी द्वारा अहिंसात्मक आन्दोलन का यह हथियार आजाद भारत में कितना कारगर है? यह हथियार किस तरह अपना प्रभाव खो चुका है? इरोम ने अपना अनशन लगभग 16 साल बाद 9 अगस्त 2016 को तोड़ा। उन्होंने यह घोषणा अचानक की और अपने इस निर्णय का कारण आम जनता की उनके संघर्ष के प्रति बेरुखी को बताया। अपना अनशन तोड़ने के साथ उन्होंने राजनीति में आने की भी घोषणा की ताकि अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए वे राजनीति के माध्यम से मणिपुर की मुख्यमन्त्री बन सकें और इस तरह वे अपने मुद्दों को राजनीति के जरिए प्रभावी ढंग से उठा सकें।

सोलह साल के इस आमरण अनशन में उन्होंने खुद कुछ नहीं खाया। इसके कारण उनकी आवाज बेहद धीमी हो गई। इस दौरान अधिकारीगण उन्हें रबर पाइप की मदद से नाक के जरिये विटामिन, खनिज, प्रोटीन सहित अन्य सामग्री देने पर मजबूर थे क्योंकि इस संघर्ष की वजह से अगर इरोम की जान चली जाती तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए कई परेशानियाँ पैदा कर सकता था। इसलिए डरा हुआ राज्य 16 साल तक इरोम की नाक में एक ड्रिप लगा कर उसे जबरन रसाहार देकर जीवित रखे रहा।

मणिपुर का नाम लेते ही सैन्य बलों द्वारा वहाँ की महिलाओं का बलात्कार, बेवजह नागरिकों की हत्या के खिलाफ असम राइफल्स के मुख्यालय पर नग्न प्रदर्शन करती महिलाओं की तस्वीर सामने आ जाती है। यही कारण थे, जिनके कारण इरोम शर्मिला अनिश्चितकालीन अनशन करने को मजबूर हुई थीं। वहाँ अफ्स्पा नाम का काला कानून 22 मई 1958 से लागू है। यह फौजी कानून डिस्टर्ब क्षेत्रों में लागू किया जाता है और सुरक्षा बलों और सेना को आरोपी की मृत्यु हो जाने तक बल प्रयोग का अधिकार देता है। इस कानून के अनुसार विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषा, क्षेत्रीय समूहों, जातियों, समुदायों के बीच मतभेद या विवादों के कारण राज्य या केंद्र सरकार किसी भी एक क्षेत्र को “डिस्टर्ब” घोषित कर सकती हैं।

 कहना न होगा, कानून जनता को न्याय देने के लिए होता है, अन्याय को संरक्षण देने के लिए नहीं। आफ्स्पा से लैस सेना और अर्धसैनिक बलों को सिर्फ संदेह होने पर ही किसी को भी गोली मार देने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

 यह बिल जब सदन में रखा गया था तब भी इसका जमकर विरोध हुआ था। बहस में हिस्सा लेते हुए मणिपुर के तत्कालीन सांसद एल. अचाबू सिंह ने अपने लम्बे भाषण में कहा था कि, “यह बिल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और प्रतिक्रियावादी कदम है। यह काला कानून है और साथ में यह सरकार की ओर से ही उकसाने वाला काम है, जिसकी जिम्मेदारी ऐसी प्रवृत्ति पर रोक लगाने की है। हम सोच कैसे सकते हैं कि सैनिक अधिकारियों को किसी को भी गोली मार देने और बिना वारंट के किसी के भी घर में घुसकर तलासी लेने तथा गिरफ्तार करने की इजाजत कानून दे। इस बिल का मसौदा ही गैर कानूनी है और आफ्प्सा कानून पूर्णतया विधिविहीन है। मुझे इस बात की आशंका है कि ऐसे उपाय़ से सिर्फ इतना होगा कि लोगों के अधिकार छिन जाएंगे, भोले-भाले शांतिप्रिय आदिवासियों को अकारण डराया-धमकाया जाएगा, उनके साथ ज्यादती की जाएगी, हालात और बिगड़ेंगे।” ( उद्धृत, इरोम शर्मिला और आमरण अनशन, शशिधर खान, पृष्ठ-93)

मणिपुर की बहुचर्चित मनोरमा देवी बलात्कार / हत्याकाण्ड की जाँच रिपोर्ट में जस्टिस बी.पी. जीवन रेड्डी ने कहा है, “यह ऐक्ट बहुत ही गंजा, अधूरा और सतही है। इसके प्रावधान ही भेदभावपूर्ण  और कठोरता के परिचायक हैं। इसलिए यह ऐक्ट दमन और उत्पीड़न का प्रतीक बन गया है। इससे चारो तरफ जनता में नफरत, भेदभाव और लम्बे हाथवालों की मिलीभगत की भावना फैली है। जनभावनाओं को कुचलने वाले कानून के रूप में मणिपुर के लोग इसका परिचय देते हैं। इसलिए आफ्स्पा को निरस्त करने की तत्काल जरूरत है।” ( उदृत, उपर्युक्त, पृष्ठ 94) 

16 साल के लम्बे संघर्ष के बावजूद सरकारें आफ्स्पा जैसी जनविरोधी कानून पर पुनर्विचार करने को तैयार नहीं थी। सत्ता के इस असंवेदनशील रवैये ने इरोम को अनशन छोड़ने और सक्रिय राजनीति में आने को मजबूर कर दिया। इस निर्णय में उनके दोस्त और भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक डेसमंड कुटिन्हो की अहम भूमिका थी।

सबसे लम्बी अवधि तक अनशन करने वाली महिला अगर अचानक अपना आन्दोलन खत्म करने का फैसला करे, तो यह उसकी हताशा ही दर्शाती है, साथ ही यह इस बात का प्रमाण भी है कि उनका अनशन पर बैठे रहना केवल एक रूटीन खबर थी। इसका सरकार पर कोई नैतिक दबाव नहीं बन रहा था जिससे सरकार उनकी माँग मानने के लिए प्रेरित होती। इसके मद्देनजर उनका सक्रिय राजनीति में आने और चुनाव लड़ने के फैसले को संघर्ष की रणनीति बदलने के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

इरोम शर्मिला

उन्होंने अपना अनशन खत्म करने के समय ही राजनीति में उतरने के लिए इंफाल में पीपुल्स रिसर्जेंस जस्टिस एलायंस (प्रजा) नामक पार्टी की घोषणा की और मणिपुर की विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेने का ऐलान कर दिया। उस वक्त उन्होंने कहा था कि वह मणिपुर के मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं ताकि राज्य से आफ्स्पा खत्म किया जा सके।

उन्होंने थउबल सीट से मुख्यमन्त्री ओकराम ईबोबी सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़ा, लेकिन उन्हें मात्र 90 वोट ही मिल सके। इस घटना से उनका मनोबल टूट गया। उन्हें इस तरह की उम्मीद हर्गिज नहीं थी। चुनाव परिणाम पर उस वक्त की समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर ने ट्वीट किया था कि ‘कम से कम 90 लोगों में कुछ नैतिकता और कुछ आशा बची थी।’

इरोम ने लम्बे समय से अपने मित्र रहे ब्रितानी नागरिक डेसमंड कुटिन्हो से विवाह कर लिया इरोम के इस फैसले से जहाँ उनके घरवाले, मित्र और शुभचिंतक हैरत में आ गए वहीं सरकार व सुरक्षा एजेंसियों ने राहत की साँस ली इरोम ने पहले किसी से इस फैसले के बारे में सलाह-मशविरा नहीं किया था निश्चित रूप से उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने में उनके प्रेमी और भारतीय मूल के ब्रिटिश उक्त नागरिक की अहम भूमिका रही

सब-रजिस्ट्रार राधाकृष्णन की उपस्थिति में विवाह सम्पन्न हुआ, कुटिन्हो ने शर्मिला को अंगूठी पहनायी। यह एक बेहद सादा समारोह था जिसमें दूल्हा-दुल्हन के परिवार के सदस्य भी मौजूद नहीं थे।इससे पहले इस जोड़े ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया था। अंतर-धार्मिक विवाह होने के कारण सब-रजिस्ट्रार ने उन्हें विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह पंजीकरण कराने के लिये कहा था। यह विवाह कोडईकनाल में हुआ था। शर्मिला ने संवाददाताओं को बताया कि कोडईकनाल (तमिलनाडु) एक शांतिपूर्ण स्थान है और शांति के लिये उनकी तलाश यहाँ आकर पूरी हुई।

हालांकि इरोम के इस फैसले से उनके घर वाले खुश नहीं थे, लेकिन अपने अधिकारों के लिए उनकी यह लड़ाई हर भारतीय के दिल में उनके प्रति सम्मान और कुछ कर गुजरने का जज्बा दिखाती है। इरोम का राजनीति में आने का फैसला गलत नहीं कहा जा सकता किन्तु भारतीय राजनीति की दशा को देखते हुए राजनीति के क्षेत्र में उनके लिए कोई मुकाम बनाना निश्चित ही कठिन है। भारत की जिस राजनीति में धनबल, बाहुबल, छलबल और धूर्तता का ही बोलबाला हो, वहाँ ईमानदारों के लिए भला कहाँ जगह हो सकती है? इरोम का इस तरह का कोई अकेला उदाहरण नहीं है। बहुत पहले आजादी के लिए आई.सी.एस. की नौकरी छोड़कर राजनीति में आने वाले प्रख्यात शायर रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी भी चुनाव हार गए थे और अभी कुछ वर्ष पहले कन्हैया कुमार जैसा संघर्षशील युवा भी चुनाव में पराजित हो गया, जिसमें विपक्ष की राजनीति को दिशा देने की क्षमता थी।

फिलहाल, कहा जाता है कि कोई भी आन्दोलन व्यर्थ नहीं जाता। उसका कुछ न कुछ प्रभाव जरूर पड़ता है। इस दृष्टि से देखें तो इरोम के संघर्ष का ही नतीजा है कि उनका अनशन तोड़ने के कुछ ही दिन बाद मणिपुर में एक फर्जी मुठभेड़ के मुकदमे की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि अफ्स्पा के तहत अशांत घोषित क्षेत्रों में उग्रवाद के खिलाफ कार्रवाई के दौरान सेना अत्याधिक बल प्रयोग नहीं कर सकती है। निस्संदेह इरोम की मेहनत रंग लाने में कुछ हद तक जरूर कामयाब हुई है।

इरोम शर्मिला का नया ठिकाना बेंगलुरु है। यहाँ वे अपने पति डेसमंड कुटिन्हों के साथ दांपत्य जीवन जी रही हैं। इरोम कहती हैं उनकी जिन्दगी अब शांत नदी जैसी है, जिसमें उफान की कोई संभावना नहीं। वे कहती हैं कि 16 साल के अनशन में उन्होंने कभी ऐसी जिन्दगी नहीं देखी, लेकिन अब वे खुश हैं और कहती हैं कि मानवाधिकार के लिए उनका संघर्ष आगे भी जारी रहेगा लेकिन वे राजनीति से दूर रहना चाहेंगी। चुनाव हारने के बाद इरोम आज की राजनीति को एक दलदल मानती हैं। वह उस दलदल में दोबारा नहीं धंसना चाहती हैं।

क्या इरोम ने अपना अनशन सिर्फ शादी की वजह से खत्म तोड़ दिया? इस प्रश्न के जवाब में वे कहती हैं, “यह सच नहीं है कि शादी की वजह से मैंने लड़ाई छोड़ दी। 16 वर्षों के अनशन के दौरान मैंने जो भी महसूस किया, उन हालात की वजह से मैंने यह लड़ाई रोकी और अनशन तोड़ा था। मेरे साथी जो अनशन के वक्त दिन-रात मेरे साथ थे, वे आज भी मेरे जेहन में हैं। इंसान की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वे केवल एक दूसरे के जरूरत के साथी होते हैं। अनशन के बदले में मैंने जिस प्यार और अपनेपन की उम्मीद की थी, वह शायद अब तक अधूरी है। हालांकि, वक्त और हालात ने चाहा तो मैं इस बारे में जरूर सोचूंगी।”

इस सवाल पर कि क्या अनशन खत्म करने का उन्हें कोई अफसोस है? के जवाब में वे कहती हैं, “अफसोस इस बात का है कि जो सोचकर अनशन शुरू किया था वह मकसद पूरा नहीं कर सकी, लेकिन इन 16 वर्षों में मैंने जो अनुभव लिए हैं, वे मेरे लिए अनमोल हैं। मैं आम इंसान हूँ और आगे वैसे ही जीना चाहती हूँ।” 

इरोम शर्मिला के जीवन व संघर्ष पर मिनी वैद्य द्वारा लिखित एक दूसरी पुस्तक ‘आयरन इरोम: टू जर्नीज’ भी प्रकाशित है। इरोम का अनशन, किसी स्त्री द्वारा सामाजिक हित में शायद दुनिया का सबसे लम्बे समय तक किया गया अनशन है।

इरोम शर्मिला चानू कवयित्री हैं और उन्होंने अपने सबसे कठिन वक्त में कोमल भावनाओं से लबालब कविताएं रची हैं। यहाँ उनकी एक कविता का सरल हिंदी भावानुवाद प्रस्तुत है,

“जब जीवन अपने अंत पर पहुँच जाएगा
तब तुम मेरे इस बेजान शरीर को
ले जाना और कोबरू बाबा की मिट्टी पर रख देना
मेरे शरीर को आग की लपटों के बीच
अंगारों में तब्दील करने के लिए
कुल्हाड़ी और फावड़े से उसके टुकड़े-टुकड़े करना
मेरे मन को वितृष्णा से भर देता है
ऊपरी खोल को एक दिन खत्म हो जाना ही है
इसे जमीन के नीचे सड़ने देना
आने वाली नस्लों के काम का बनने देना
इसे बदल जाने देना किसी खदान के अयस्क में
मैं शान्ति की सम्मोहक खुशबू फैलाऊँगी
काँगलेई से, जहाँ मैं पैदा हुई थी
जो गुजरते वक्त के साथ
सारी दुनिया में फ़ैल जाएगी।”

आज जन्मदिन के अवसर पर अपने समाज की महिलाओं की बेहतरी के लिए इरोम शर्मिला द्वारा किए गए के अतुलनीय संघर्ष का हम स्मरण करते हैं उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं। हमें उम्मीद है कि वे हार न मानते हुए अपने संघर्ष को आगे भी जारी रखेंगी

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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