कथित अकथित

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और राजद्रोह कानून

 

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार लोकतन्त्र की आवश्यक शर्त है। इस अधिकार के बिना लोकतन्त्र की कल्पना हो ही नहीं सकती। यह अधिकार विपक्ष, मीडिया, बुद्दिजीवियों और आम जनता को सरकार के कामकाज की समीक्षा करने, अपने सुझाव देने, आवश्यकता पड़ी तो आलोचना करने और यहाँ तक कि शान्ति पूर्ण ढंग से आन्दोलन करने का भी पूरी तरह से अधिकार देता है। सरकार में कामकाज में जनभागीदारी इसी अधिकार से सुनिश्चित होती है। ऐसे में क्या किसी ऐसे कानून के अस्तित्व को उचित ठहराया जा सकता है जो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार पर सीधे-सीधे कुठाराघात करता हो।

 राजद्रोह के कानून की शब्दावली अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार के साथ सीधे टकराव की स्थिति में है। राजद्रोह का कानून भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए में समाहित है और  इसका सीधा आक्रमण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर है, चाहे वह वाणी द्वारा हो या लेखनी के माध्यम से, संकेतों के सहारे की जा रही हो या दृश्यांकन की मदद से या फिर  किसी अन्य तरीके से। इस प्रकार यह कानून अभिव्यक्ति के हर माध्यम, हर शैली को अपनी गिरफ्त में ले लेता है,  यदि कोई अभिव्यक्ति विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना पैदा कर रही हो, अथवा अप्रीति को उकसा रही हो या फिर उकसाने का प्रयत्न कर रही हो।

इस प्रकार हम साफ तौर पर देखते हैं कि इस कानून का घेरा बहुत बड़ा है और यदि कोई सरकार चाहे तो अपने किसी भी निन्दक को बड़ी आसानी से इसमें समेट ले सकती है। अपराध प्रमाणित होने की स्थिति में तीन साल से लेकर आजीवन कारावास, जुर्माना अथवा दोनों ही आरोपित किए जा सकते हैं। यह अलग बात है कि राजद्रोह के मामलों में बहुत कम लोगों को अन्ततः सजा मिलती हैं, लेकिन मुकदमा चलने की प्रक्रिया भी किसी सजा से कम नहीं होती। मुकदमा दायर होते ही आरोपी तुरन्त गिरफ्तार हो जाता है, और काफी कानूनी जद्दोजहद के बाद जमानत मिल पाती है। भारतीय न्याय व्यवस्था की सीमाओं और समस्याओं को देखते हुए आरोपी के सिर पर वर्षों वर्षों तक तलवार लटकती रहती है।

यह कानून अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पहले पहल 1870 में लाया गया था और 1898 में इसमे संशोधन किए गए। इरादा था सरकार के विरुद्ध की जाने वाली किसी भी टिप्पणी, आलोचना या निन्दा का गला घोटना। अंग्रेजी सरकार इसे अपनी एक रक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले हथियार के रूप में देखती थी। आगे चल कर स्वतन्त्रता आन्दोलन को दबाने के लिए इस कानून का जम कर इस्तेमाल किया गया। तिलक और गाँधी जैसे नेता इसी कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किये गए थे। गाँधी ने तो इस कानून पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह कानून अंग्रेजों द्वारा राजनीतिक कारणों से इस्तेमाल किये जाने वाले अन्य सभी कानूनों का सरताज  है। स्वाभाविक रूप से स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुड़े सभी नेताओं के बीच आम सहमति यही थी कि आजादी मिलते ही इस कानून को समाप्त कर दिया जाएगा।

आजादी मिलने के बाद 26 जनवरी 1950 को प्रभाव में आए भारतीय संविधान में सम्भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1) (ए) के अन्तर्गत मूलभूत संवैधानिक अधिकार का दर्जा दे दिया गया। परिणामस्वरूप राजद्रोह के कानून की वैधानिकता स्वतः ही समाप्त हो गई और उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मगर भारतीय दण्ड  संहिता में उसे औपचारिक रूप से हटाया नहीं गया और वह अपनी वैधानिकता खोकर भी संहिता के अन्दर बना रहा।

परन्तु राजद्रोह कानून का निर्वासन अल्पकालीन ही था। सन 1951 में किये गए पहले संविधान संशोधन के प्रावधान द्वारा  वैसे मौजूदा कानूनों की वैधानिकता को बहाल कर दिया गया  जो सम्भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार पर वर्णित कारणों, जैसे भारत की एकता और अखण्डता,  देश की सुरक्षा, अन्य देशों से मित्रता पूर्ण सम्बन्ध, लोक व्यवस्था और शिष्टता तथा नैतिकता के हित में, अथवा न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराधों को उकसाने के संदर्भ में युक्तिसंगत पाबन्दी लगाते हैं। इस प्रकार राजद्रोह कानून का निर्वासन समाप्त हो गया और वह चोर दरवाजे से दुबारा अन्दर प्रवेश कर गया।

यहाँ एक दिलचस्प तथ्य की ओर इशारा करना ज़रूरी लगता है। 1776 में स्वतन्त्रता के बाद जब अमरीकी संविधान प्रभाव में आया तब उसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का कोई प्रावधान नहीं था। 1791 में अमरीका में इस भूल में सुधार करने का निर्णय हुआ और जो पहला संविधान संशोधन हुआ उसके अन्तर्गत संविधान में अभिव्यक्ति के अधिकार को समाहित कर लिया गया। भारत में स्थिति लगभग उलटी रही। 1950 में जब संविधान लागू हुआ तब उसमें सम्भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार को निर्बाध रूप से शामिल कर इसे मूलभूत अधिकार का दर्जा दिया गया था मगर जब पहला संविधान संशोधन हुआ तब इस मूलभूत अधिकार पर बन्धन लगा दिये गए। शायद दोनों देशों की अलग-अलग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियाँ इस विरोधाभास का कारण रही होंगी।

राजद्रोह के कानून को एक करारा झटका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1959 में दिया। राम नन्दन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य नामक मुकदमे में दिए गए अपने फैसले में अदालत ने घोषणा की कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए मूलतः एक ऐसा हथियार थी जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक हुक्मरानों द्वारा अपने विरुद्ध फैले असन्तोष को दबाना था। इस प्रकार इलाहाबाद न्यायालय ने राजद्रोह कानून को असंवैधानिक करार दिया।

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लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 1962 में दिए गए अपने एक फैसले में राजद्रोह कानून को पुन: जीवनदान दे दिया मगर कतिपय बन्धनों के साथ। केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य  नामक इस मुकदमें में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय पीठ ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को फिर से बहाल कर दिया और यह भूलुण्ठित कानून अपनी धूल झाड़ते हुए फिर से उठ कर खड़ा हो गया। मगर कोर्ट ने यह ध्यान में रखते हुए कि इसका दुरुपयोग न हो और यह कानून सम्भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर युक्तिसंगत संवैधानिक बन्धन से अधिक नहीं लगा पाए, इस कानून के इस्तेमाल के लिए कतिपय मानदण्ड निर्धारित कर दिए।

न्यायालय ने स्थापना दी कि सामान्य तौर पर सरकार की आलोचना को राजद्रोह की परिधि में नहीं रखा जा सकता। राजद्रोह कानून तभी हरकत में आएगा जब कोई अभिव्यक्ति हिंसा के लिए आह्वान कर रही हो या उकसावा दे रही हो। दूसरे शब्दों में, यदि कोई अभिव्यक्ति लोक व्यवस्था को भंग करने के लिए उकसा रही हो तभी राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

दिलचस्प बात यह है कि राजद्रोह कानून के मूलपाठ में लोक व्यवस्था जैसा कोई शब्द नहीं है। यह शब्द सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के नए अर्थान्वय और संविधान के प्रथम संशोधन को ध्यान में रखते हुए जोड़ा।

केदारनाथ मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला साठ साल बाद भी अपनी जगह पर कायम है। न्यायालयों के समक्ष राजद्रोह से जुड़ा कोई मुकदमा इस दौरान जब भी सामने आया तब उसका निपटारा इसी फैसले के आधार पर किया गया। मगर इस फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में इस सम्बन्ध में कई याचिकाएँ दायर की गईं और केन्द्र सरकार ने न्यायालय को आश्वासन दिया है कि वह इस कानून पर पुनर्विचार करेगी।

केन्द्र सरकार के आश्वासन के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि जब तक पुनर्विचार की कारवाई पूरी नहीं हो जाती, राजद्रोह से सम्बन्धित कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जाए और दर्ज किए गए मुकदमों की छानबीन भी रुकी रहे। न्यायालय ने यह भी कहा है कि जिन अदालतों में राजद्रोह से सम्बन्धित मुकदमे चल रहे हैं वहाँ फिलहाल अदालती कारवाई को लम्बित रखा जाए।

यह विचारणीय है कि राजद्रोह कानून को ब्रिटेन ने 2009 में निरस्त कर दिया और ठीक अगले वर्ष 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भी यही किया। अमरीका में यह कानून अत्यन्त  सीमित रूप में अभी भी अस्तित्व में है और पिछले वर्ष जनवरी में राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद ट्रम्प के समर्थकों ने अमरीकी संसद के समक्ष जो हंगामा मचाया था उसके आरोपियों पर इसी कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है।

मौजूदा केन्द्र सरकार की नीति औपनिवेशिक दौर के सभी कानूनों पर विचार करने और आवश्यकता होने पर उन्हें निरस्त करने या उन्हें संशोधित करने की रही है। पिछले आठ वर्षों के दौरान औपनिवेशिक दौर के सैकड़ों कानून आवश्यक समीक्षा के बाद अभी तक निरस्त किए जा चुके हैं। यह आशा की जानी चाहिए कि स्वतन्त्रता के 75 वें वर्ष में, जिसे अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है, राजद्रोह का औपनिवेशिक कानून इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाएगा

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धीरंजन मालवे

लेखक प्रसिद्द मीडियाकर्मी हैं। सम्पर्क +919810463338, dhiranjan@gmail.com
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