एतिहासिकयत्र-तत्र

भारतेन्दु-युग में स्वच्छंद चेतना का प्रवेश

 

हिंदी प्रदेश में नवजागरण के रूप में उन्नीसवीं सदी के बौद्धिक उन्मेष की पहचान करते हुए प्रायः उस दौर की प्रबल यथार्थ-चेतना और समकालीन बोध को रेखांकित किया जाता है, लेकिन यह तथ्य अलक्षित रह गया है कि उसके भीतर रोमांटिक नवोन्मेष भी किसी हद तक सक्रिय और गतिशील था। ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनाओं से गुज़रते हुए यह अनुभव किया जा सकता है कि उन्नीसवीं सदी के पुनर्जागरण का मानवतावाद कोरे यथार्थवादी मुहावरे में ही आकार नहीं ले रहा था, किंचित रोमेंटिक स्वर में भी ध्वनित हो रहा था। नवजागरणकालीन भारतीय आधुनिकता का यह भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू है, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिये। इस तथ्य की ओर सबसे पहले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ध्यान दिया था।

निस्संदेह परिवेश के प्रति सजगता आधुनिक युग का अनिवार्य गुणधर्म है। इसके  प्रभाववश साहित्य में ही नहीं, उन्नीसवीं शताब्दी के सामान्य जीवन में भी अपने समय के प्रति जागरूकता विकसित हुई थी। यूरोपीय प्रभाव और औपनिवेशिक बौद्धिक तंत्र ने भारतीय मानस के भीतर कालबोध के एक भिन्न आयाम को स्थापित कर दिया था। यह ऐतिहासिक समय का तीव्र बोध था जो शिक्षित भारतीय मानस पर धीरे-धीरे आच्छन्न हुआ था। परिवेश के प्रति सजगता इसका परिणाम था। इसके चलते साहित्य में यथार्थ-बोध प्रविष्ट हुआ। भारतेन्दु-युग की यथार्थ-चेतना को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिये। भारतेन्दु मण्डल के लेखकों में यह अत्यंत मुखर है। इसलिये उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध हिंदी में यथार्थबोध का प्रवेश-काल माना जाता है। मगर तब का बौद्धिक परिदृश्य कोरमकोर यथार्थवादी बोध से परिचालित नहीं था- पश्चिमी बौद्धिकता का रोमेंटिक स्वर, कहीं क्षीण-सा ही सही, उसके भीतर गूँज रहा था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में खड़ी बोली कविता में यह स्वर अपेक्षाकृत तीव्र हुआ- ख़ासकर श्रीधर पाठक की कविता और उनके किये अंग्रेज़ी कविता के अनुवादों में। लेकिन श्रीधर पाठक के स्वच्छंद काव्य में या तदनन्तर छायावाद में प्रकृति और रूमानी कल्पना की उपस्थिति का स्मरण करने से पहले इस तथ्य को भूलना नहीं चाहिये कि ठाकुर जगमोहन सिंह की कविता में, और उनके गद्य में भी, प्राकृतिक सौंदर्य के विलक्षण बिम्ब पहले ही, उन्नीसवीं शताब्दी के सातवें दशक में प्रकट हो चुके थे। महत्त्वपूर्ण यह है कि ये पश्चिमी स्वच्छंदतावाद के प्रभाववृत्त में गढ़े गये, आयातित या उत्प्रेरित संवेदना के बिम्ब नहीं थे, बल्कि देशाटन-प्रेमी जगमोहन सिंह के हृदय में प्रकृति के प्रति सहज अनुराग की अभिव्यक्ति थे। इसलिये जीवंत और सगुण बिम्ब थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह के साहित्य के इस वैशिष्ट्य को लक्ष्य करते हुए उचित ही लिखा था कि भारतेंदु और अन्य कवियों-लेखकों की ‘दृष्टि और हृदय की पहुँच मानव क्षेत्र तक ही थी, प्रकृति के अपर क्षेत्रों तक नहीं।  पर ‘ठाकुर जगमोहन सिंह ने नरक्षेत्र के सौंदर्य को प्रकृति के और क्षेत्रों के सौंदर्य के मेल में देखा है।’

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि रोमेंटिक नवोन्मेष सिर्फ काव्य तक सीमित न रह कर ठाकुर जगमोहन सिंह की ‘श्यामा स्वप्न’ जैसी गद्य-कृति में भी व्यक्त हो रहा था। दरअसल उनकी संवेद‌नात्मक बनावट में रोमेंटिक भावबोध की मौजूद‌गी ऐसी अतिक्रामक है कि उनका गद्य भी, उपन्यास के कलेवर में गठित होने की जददोजेहद के बावजूद ख़ासा काव्यात्मक मालूम पड़ता है। सच पूछा जाये तो ठाकुर जगमोहन सिंह हिंदी में काव्यात्मक गद्य और रोमांसवाद के प्रणेता हैं।

ठाकुर जगमोहन सिंह
ठाकुर जगमोहन सिंह (1857-1899)

ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनात्मक संवेदना में प्रकृति के साथ ही प्रेम की उपस्थिति केंद्रस्थानीय है। यह प्रेम और उदग्र ऐंद्रिकता, जिसकी अभिव्यक्ति रीतिकाव्य में रूढ़िबद्ध तरीके से मिलती है, ठाकुर जगमोहन सिंह के यहाँ अकुण्ठ और उन्मुक्त सहजता में उन्मोचित है। यहाँ रीति-चेतना का समाहार और प्रकृति-चेतना का समारम्भ साथ-साथ घटित होता है। इस तरह ठाकुर जगमोहन सिंह का साहित्य भारतेंदु युगीन सृजनशीलता के अनखुले आयामों की ओर इंगित करता है।

लाला श्रीनिवास दास के ‘परीक्षागुरु’ के साथ 1882 में हिंदी का पहला उपन्यास लिखा जा चुका था। उसके तीन वर्ष बाद ठाकुर जगमोहन सिंह का ‘श्यामास्वप्न’ (1885), फिर अंबिकादत्त व्यास का ‘आश्चर्य वृत्तान्त’ (1893) और ब्रजनन्दन सहाय का ‘सौन्दर्योपासक’ (1911) लिखे गये। ये यथार्थवादी ढंग के उपन्यास नहीं हैं, यद्यपि उपन्यास और यथार्थवाद एक-दूसरे के साहचर्य में, बल्कि लगभग पर्याय के रूप में, विकसित हुए हैं। लेकिन अपने पूर्णतः रोमेंटिक प्रकृति के बावजूद इन्हें उपन्यास ही कहा गया। बच्चनसिंह ने ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में इन्हें ‘स्वच्छन्दतावादी उपन्यास’ निरूपित करते हुए एक अलग श्रेणी में गिना है। लेकिन इस पर भी वह पूर्णतः आश्वस्त नहीं हैं। तीनो ‘उपन्यासों’  पर रीतिवादी सौंदर्य-दृष्टि और ऐंद्रिक बोध के गहरे  प्रभाव को वे अलक्षित नहीं कर पाते, जबकि इस प्रभाव को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास में नज़रअंदाज़ कर दिया था, और वह इन कृतियों में, ख़ास तौर पर ‘श्यामास्वप्न’ में प्रकृति की सौंदर्य के चित्रण पर ही विस्मय-मुग्ध रह गये थे।

लेकिन आचार्य शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह की कविताओं में संस्कृत के प्राचीन कवियों- वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति की तरह प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण के फलस्वरूप उत्पन्न विलक्षण सौंदर्य को रेखांकित किया है, जिसका स्वयं बाद के संस्कृत कवियों में अभाव दिखाई देता है। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया है कि ‘प्राकृतिक दृश्यों की ओर प्यार-भरी सूक्ष्म दृष्टि संस्कृत-काव्य की ऐसी विशेषता है जो फ़ारसी या अरबी के काव्य-क्षेत्र में नहीं पाई जाती।’ उन्होंने ग़ौर किया कि यह बाद में यूरोप की रोमांटिक कविता में ही पायी गयी है। हिंदी में रीतियुग की कविता ने संस्कृत की परवर्ती परम्परा से प्रेरित होकर प्रकृति की उपस्थिति को उद्दीपन के तौर पर ग्रहण किया।  इस प्रवृत्ति को शुक्लजी ने  श्रेयस्कर नहीं माना।

आचार्य शुक्ल की दृष्टि में ठाकुर जगमोहन सिंह ने संस्कृत के प्राचीन कवियों के प्रकृति-वर्णन की परम्परा के अनुरूप हिंदी-कविता के पुनर्संस्कार का जो उल्लेखनीय कार्य किया, वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेकिन वह खेद व्यक्त करते हैं कि ‘उसकी ओर किसी ने ध्यान न दिया।’ अँगरेज़ी साहित्य में वईसवर्थ, शेली, मेरेडिथ आदि में उसी पद्धति में प्रकृति के सूक्ष्म चित्रण का उपक्रम आचार्य शुक्ल को आकृष्ट करता है। मगर शुक्लजी प्राचीन संस्कृत कवियों और आधुनिक रोमेंटिक कवियों के दृश्यावलोकन और सौंदर्य-निरूपण की पद्धति में अंतर को भी लक्ष्य करते हैं। वह लिखते हैं-भारतीय प्रणाली में कवि के भाव का आलंबन प्रकृति ही रही है, अतः उसके रूप का प्रत्यक्षीकरण ही काव्य का एक स्वतंत्र लक्ष्य दिखाई पड़ता है। पर योरोपीय साहित्य में काव्य-निरूपण की बराबर बढ़ती हुई परंपरा के बीच धीरे-धीरे यह मत प्रचार पाने लगा कि ‘प्राकृतिक दृश्यों का प्रत्यक्षीकरण मात्र तो स्थूल व्यवसाय है, उनको लेकर कल्पना की एक नूतन सृष्टि खड़ी करना ही कविकर्म है।’ उक्त प्रवृत्ति के अनुसार कुछ पाश्चात्य कवियों ने तो प्रकृति के नाना रूपों के बीच व्यंजित होनेवाली भावधारा का बहुत सुंदर उद्घाटन किया, पर बहुतेरे अपनी बेमेल भावनाओं का आरोप करके उन रूपों को अपनी अपनी अंतर्वृत्तियों से थोपने लगे। अब इन दोनों प्रणालियों में से किस प्रणाली पर हमारे काव्य में दृश्य वर्णन का विकास होना चाहिए, यह विचारणीय है।”

ज़ाहिर है, यूरोप के रोमेंटिक काव्य में प्रकृति के प्रत्यक्ष वर्णन पर एकाग्र काव्य को तो शुक्लजी ने स्वीकार किया लेकिन प्रकृति पर कवि की वैयक्तिक अनुभूतियों के आरोपण से उत्पन्न काव्य-सौंदर्य को वह स्वीकार न कर सके। उन्हें यह प्रकृति के शुद्ध सौंदर्य के साथ खिलवाड़ प्रतीत हुआ, इसलिए अवांछित जान पड़ा था। वह मानते थे कि “अनंत रूपों से भरा हुआ प्रकृति का विस्तृत क्षेत्र उस ‘महामानस’ की कल्पनाओं का अनंत प्रसार है। सूक्ष्मदर्शी सहृदयों को उसके भीतर नाना भावों की व्यंजना मिलेगी। नाना रूप जिन नाना भावों की सचमुच व्यंजना कर रहे हैं, उन्हें छोड़ अपने परिमित अंतः कोटर की वासनाओं से उन्हें थोपना एक झूठ खेलवाड़ के ही अंतर्गत होगा।” उन्होंने स्पष्ट लिखा कि ‘मनुष्य ही सब कुछ नहीं है। प्रकृति का अपना रूप भी है।’

आचार्य शुक्ल का यह दृष्टिकोण प्रकृति की वस्तुसत्ता को मनुष्य-सत्ता के समतुल्य स्थान देता है। इस दृष्टिकोण का संकेतार्थ यह भी है कि आधुनिकता की मानवकेन्द्रिक अवधारणा अपने-आप में समस्याग्रस्त है। ‘प्रकृति की ओर वापसी’ के नारे के साथ प्रारम्भ हुई रूमानी चेतना के केंद्र में दरअसल मानव ही है, प्रकृति की उपस्थिति हाशिये पर है। औद्योगिक क्रांति और उसकी कोख में पली नागर सभ्यता से उकताकर निरापद शरणस्थल के रूप में प्रकृति के ‘उपयोग’ का विचार व्यावहारिक (प्रैग्मेटिक) दृष्टिकोण से उपजा है। जिस सीमा तक रोमांटिक कविता प्रकृति को अनुभूतियों के प्रक्षेपण के माध्यम के तौर पर बरतती थी, उस सीमा तक प्रकृति उसके लिये ‘उपयोग का साधन’  बन गयी थी। इस रूप में, कहने की आवश्यकता नहीं कि, कविता में भी प्रकृति अपनी स्वायत्तता से वंचित हो उठती है।

ठाकुर जगमोहन सिंह के साहित्य में प्रकृति की सहज-स्वतंत्र उपस्थिति को रेखांकित कर दरअसल शुक्लजी हिंदी स्वच्छंदतावाद के विकास की वांछित परिणति की ओर, उसकी सहज-स्वाभाविक दिशा की ओर, इशारा कर रहे थे। छायावाद से शुक्लजी के असंतोष के वास्तविक कारण इस दिशा से उसके विचलन में ढूँढ़े जा सकते हैं—उसकी रहस्यवादी परिणति से वह असहमत रहे। (दिलचस्प है कि शुक्लजी  ‘महामानस की कल्पनाओं का अनंत प्रसार’  तो प्रकृति में देख रहे थे, लेकिन महामानस को प्रकृति के माध्यम से संबोधित करने के छायावादी उपक्रम पर उन्हें आपत्ति थी।) ज़ाहिर है, आगे चलकर यूरोपीय स्वच्छंदतावाद से वैचारिक प्रेरणा लेने के बावजूद, छायावाद जिस मार्ग पर चला उसमें प्रकृति की भूमिका निपट उपकरण के रूप में रह गयी थी, जैसी  कि रीतिकाव्य में थी। फ़र्क़ सिर्फ़ यह था कि कविता ने रीतियुग से आधुनिकता की भूमि पर क़दम रखने के साथ ही ‘उद्दीपन’ से ‘आलम्बन’ में आश्रय पा लिया। दोनों ही काल की रचनाओं में स्वयं प्रकृति कविता का विषय या लक्ष्य नहीं थी। ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनाओं में प्रकृति का स्वतंत्र वर्णन मिलता है। वह स्वयं में कविता का विषय है, कवि की अनुभूतियों के प्रक्षेपण का माध्यम-भर नहीं।

उनके गद्य पर विचार करते हुए उसमें प्रकृति-सौंदर्य के स्वतंत्र निरूपण पर आचार्य शुक्ल का ध्यान उचित ही गया था। जगमोहन सिंह के रचनात्मक मानस पर रीतिकाल की संवेदना के अवशिष्ट प्रभाव की तरफ़ भी शुक्लजी का ध्यान जाना चाहिये था, लेकिन उन्होंने उसकी अनदेखी की। जगमोहन सिंह के प्रकृति-बोध पर तो उन्होंने विचार किया, उनके रीति-बोध की तरफ़ उनका  ध्यान नहीं गया, जबकि उनके यहाँ रीतिबोध अत्यंत मुखर है।

जगमोहन सिंह की कविता में प्रकृति की सगुण उपस्थिति का मुग्ध चित्रण हुआ है। शिवरीनारायण में जहाँ वह तहसीलदार के रूप में 1885 में पदस्थ थे, भीषण बाढ़ आई थी जिस पर उन्होंने ‘प्रलय’ शीर्षक कविता लिखी। इसमें प्रकृति का उसी रीति से वर्णन है, जिसका उल्लेख शुक्लजी ने किया है। ‘श्यामा स्वप्न’ के प्रकृति-चित्रण की भी यही पद्धति है। लेकिन ‘श्यामा स्वप्न’ के स्वप्निल और कल्पनापूर्ण गद्य में प्रकृति के साथ प्रेम की रम्य उपस्थिति ध्यान खींचती है। प्रणय भाव की अभिव्यक्ति की उनकी शैली अपनी उच्छल ऐन्द्रिकता और स्फूर्त मांसलता में रीतिकाव्य का स्मरण कराती है। ज़ाहिर है, भारतेन्दु-युग में बचा-खुचा रीतिवाद केवल ब्रजभाषा में काव्य-रचना की परिपाटी के रूप में ही नहीं, प्रेम की लम्पट अभिव्यक्ति में भी व्यक्त हो रहा था। ‘श्यामा स्वप्न’ की प्रेमाभिव्यक्ति इसका साक्ष्य है।

शुक्लजी के अनुसार ठाकुर जगमोहन सिंह ने ‘भारतीय ग्राम्य जीवन के माधुर्य’ का अनुभव करते हुए जो गद्य रचा, उसके पीछे ‘प्राचीन संस्कृत साहित्य के अभ्यास और विंध्याटवी के रमणीय प्रदेश में निवास के कारण विविध भावमयी प्रकृति के रूपमाधुर्य की  सच्ची परख, सच्ची अनुभूति’ थी। वह विन्ध्यवासी थे, लेकिन उनकी रचनाओं में चित्रित प्रकृति का सौंदर्य छत्तीसगढ़ से सम्बंधित है। वह छत्तीसगढ़ के धमतरी और शिवरीनारायण में तहसीलदार और मजिस्ट्रेट थे। ‘श्यामा स्वप्न’ (1885)और ‘प्रलय’ (1887) जैसी कृतियाँ उन्होंने शिवरीनारायण में लिखी थीं। कहा जाता है कि शिवरीनारायण में उन्हें श्यामा नाम की स्त्री से प्रेम हो गया था, जिसकी अभिव्यक्ति ‘श्यामा स्वप्न’ में हुई है। यहीं उन्होंने ‘श्यामलता’, ‘श्यामा सरोजनी’ तथा सज्जनाष्टक’ काव्य की भी रचना की। वह विजयराघवगढ़ रियासत के राजा ठाकुर सरयूसिंह के पुत्र थे। क्वींस कॉलेज, बनारस से शिक्षा प्राप्त की। बनारस में शिक्षाकाल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के संपर्क में आयेऔर उनके घनिष्ठ मित्र हुए। क्वींस कॉलेज में अध्ययन के समय से ही उनकी बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा का उन्मेष होने लगा था। 1878 में अध्ययन समाप्त कर दो वर्ष घर पर बिताने के बाद सरकारी नौकरी में आये। वह 1880 से 1882 तक धमतरी में और सन् 1882 से 1887 तक शिवरीनारायण में पदस्थ थे। दोनों स्थान महानदी के पास स्थित हैं। धमतरी के समीप महानदी का उद्गम सिहावा है। उन्होंने इन क्षेत्रों का और शिवरीनारायण के समीप हसदेव के जंगलों का व्यापक भ्रमण किया। उनके साहित्य में इन स्थानों की गूँज है। उन्होंने ‘मेघदूत’, ‘ऋतुसंहार’ तथा ‘कुमारसंभव’ के अलावा अंग्रेज़ी कवि बायरन की कविता ‘प्रिज़नर ऑफ़ शिलन का अनुवाद किया। माना जाता है कि किसी अंग्रेज़ी रोमेंटिक कवि का यह पहला हिंदी अनुवाद था। भारतेन्दु मण्डल की तरह उन्होंने शिवरीनारायण के आठ नवोदित कवियों को एकत्र कर ‘जगमोहन सिंह मण्डल’ की स्थापना की। उनका ‘सज्जनाष्टक’ नामक काव्य इन आठों कवि मित्रों को सम्बोधित है। इनमें यदुनाथ ‘भोगहा’, अर्जुनदास, गौतमदास, ऋषि राम, माखन साहू, हीराराम, मोहन और रमानाथ आदि कवि शामिल थे। 

ठाकुर जगमोहन सिंह का योगदान इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि भारतेंदु-युग की यथार्थ-चेतना के भीतर उन्होंने प्रकृति, कल्पना, सौंदर्य और प्रेम की उजली चमक उत्पन्न कर हिंदी-आधुनिकता के गठन में रूमानियत की भूमिका सुनिश्चित की। यह और बात है कि आगे चलकर यथार्थवाद और रूमान का सह-अस्तित्व खंडित हो गया। फलस्वरूप द्विवेदी-काल में जहाँ रूमानी भावबोध का पूर्ण बहिष्कार और एक तरह की नैतिक मर्यादा और सामाजिक चेतना में उसका विसर्जन अनिवार्य हो उठा, वहीं आगे चल कर छायावाद में यथार्थ-बोध के निष्कासन के चलते सृजनात्मक कल्पना और कविता की स्वायत्तता की अपूर्व प्रतिष्ठा हुई। कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी-काल की मर्यादित यथार्थवादी दृष्टि और छायावाद के रूमानी भावबोध को व्यवहार में परस्पर विरोधी युग्म के रूप में देखा गया। ठाकुर जगमोहनसिंह की रूमानियत, कल्पनाशीलता, सौंदर्य-बोध को उनके समकालीनों ने अपनी सृजन-चेतना में निहित समाज-बोध के प्रतिपक्ष के रूप में नहीं देखा; न ही आचार्य शुक्ल ने ऐसा माना। हिंदी कविता में यथार्थ और रूमान के बीच यह फाँक क्यों पैदा हुई, इस पर विचार किया जाना चाहिये।

‘श्यामा स्वप्न’ में एक ब्राह्मण कन्या और क्षत्रिय युवक के स्वच्छंद प्रेम का वर्णन क्या उन्नीसवीं शताब्दी के समाज में सहजग्राह्य था? कहने की ज़रूरत नहीं कि यह जाति-प्रथा को चुनौती देने का साहसिक या रूमानी प्रयत्न था। प्रकृति के स्वच्छंद चित्रण के बीच गुँथी प्रणय की रीतिवादी अभिव्यक्ति—नायक-नायिका के आलिंगन-चुंबन, विरह-निवेदन, श्रृंगारिक चित्र, ऋतु-वर्णन—यहाँ गद्य के माधुर्य और लालित्य में व्यवधान पैदा करती है, और बेमेल जान पड़ती है। गद्य का स्वच्छन्दतावादी चरित्र, और स्वयं उपन्यास का ढाँचा  बिखरने लगता है, बल्कि अधबना रह जाता है। उसका यथार्थवादी रूप भी सुस्पष्ट कथानक के अभाव में टूटने लगता है। वह यथार्थ और रोमान्स- प्रकृति के यथार्थ और प्रेम के रीतिवाद के बीच कहीं फँसा रह जाता है।

इस उपन्यास में नायक-नायिका, श्यामसुंदर और श्यामा, सगुण-साक्षात् व्यक्ति हैं। दोनों सामान्यीकृत चरित्र नहीं हैं, उनका वैशिष्ट्य व्यक्ति रूप में उनके अस्तित्व में है। ज़ाहिर है, उन्नीसवीं शताब्दी के औपनिवेशिक वातावरण में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का प्रसार होने के साथ व्यक्ति की स्वातन्त्र्य-चेतना का अंतर्जातीय प्रेम के रूप में यह रूपांतरण भारतेन्दु-युग के गति-बोध के अनुरूप है। ‘श्यामा स्वप्न’ का स्वच्छंद गद्य भले ही उस युग के अनुरूप न जान पड़े

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जय प्रकाश

लेखक साहित्य-संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर पिछले 25 वर्षों से लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919981064205, jaiprakash.shabdsetu@gmail.com
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