मुद्दा

उत्तर-कोरोना काल में स्कूली शिक्षा की चुनौतियाँ

 

  • सर्वेश कुमार मौर्य

 

आज हम जिस दौर में हैं, वह चुनौतियों से भरा दौर है. कोरोना वायरस ने हमारे समय, समाज और परिस्थितियों को आमूल-चूल बदल दिया है. पूरी दुनिया नए सिरे से हर एक प्रश्न, समस्या और उसके समाधान पर विचार कर रही है. कहा जा रहा है, यह एक अटल सत्य है कि हमें कोरोना के साथ ही आगे का जीवन जीना है. कोरोना के एकदम समाप्त होने की सारी संभावनाएं दम तोड़ चुकी हैं. ऐसे में अब के बाद का जो भी समय होगा उसे ‘उत्तर-करोना काल’ कहा जा रहा है. मैं यहाँ ‘उत्तर-कोरोना काल’ शब्दबंध का इस्तेमाल इसी खास अर्थ में कर रहा हूँ. यहाँ उत्तर से मेरा अर्थ ‘बाद’ से है और ‘उत्तरकाल’ से अर्थ है ‘बाद का समय’.

इसी हफ्ते केरल के मल्लपुरम जिले की दसवीं कक्षा की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली. आत्महत्या का कारण 01 जून से शुरू होने वाली ऑनलाइन क्लासेज को बताया जा रहा है, जिसके लिए उस बच्ची  पास घर में न टीवी था न ही स्मार्टफ़ोन. इस घटना का विरोध कर रहे सामाजिक संगठन अब इस बात की मांग कर रहे हैं कि केरल सरकार ऑनलाइन क्लासेज तब तक सस्पेंड करे जब तक यह सुनिश्चित न हो जाये की सारे बच्चों के पास इसके उपयोग की सुविधा है. यह घटना आसन्न संकट की ओर संकेत भर है.

ये भी पढ़ें कोरोना काल और समाज

आज जैसे हमें अपने जीवन के सभी क्षेत्रों के बारे में पुनर्विचार करने की जरूरत आन पड़ी है, ठीक वैसे ही उत्तर-कोरोना काल में स्कूली शिक्षा पर भी विचार करने की सख्त जरुरत है.  अब ‘पूर्व-कोरोना काल’ की तरह न स्कूल होंगे, न अध्यापक, न विद्यार्थी और न ही स्कूली शिक्षा पद्धति. उत्तर-कोरोना काल में पुरानी समस्यायों के साथ उत्तर-कोरोना काल की समस्याएं भी जुड़ गयी हैं. इससे हमारा संकट दोहरा हो गया है.

इन संकटों को न टाला जा सकता है, न ही इससे मुंह चुराया जा सकता है. इनसे दो चार होना, लड़ना, इनका समाधान करना हमारी मजबूरी है. इससे निपट करके ही स्कूली शिक्षा को पटरी पर लाया जा सकता है. हमारी पहली और सबसे बड़ी चुनौती है कोरोना के साथ जीने की कला का विकास करना अन्यथा हमारा जीवन संकट बढ़ेगा. जब तक हम इस परिस्थिति में जीने की कुशलता हासिल नहीं कर लेते, भविष्य की राह आसान नहीं होगी. ऐसी स्थिति में ‘पुरानी शिक्षण पद्धति’ में बदलाव की बेहद जरूरत हैं.

पुराने ‘चॉक-टॉक क्लासरूम टीचिंग वाले मेथड’ की जगह पर ‘ई लर्निंग और ऑनलाइन क्लासेस’ की ओर जाना होगा, जिससे सोशल डिसटेन्सिंग के साथ टीचिंग-लर्निग को संभव किया जा सके, जिसकी शुरुआत हो भी चुकी है, लेकिन असल चुनौती इसे भारत जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता वाले देश में सामान रूप से लागू करना है. भारत जैसे देश में जहाँ कुल जनसंख्या का 25% से अधिक लगभग 30.5 करोड़ [2011 की जनगणना के अनुसार] स्कूल जाने वाली हो, 44 लाख अध्यापन करने वाली हो, अलग-अलग धर्म, जाति, संप्रदाय, संस्कृतियां वाली हो वहां यह खासा चुनौतीपूर्ण होगा.

दूसरी बड़ी चुनौती आधारभूत ढांचे [इन्फ्रास्ट्रक्चर] की है. इसको ठीक से समझने के लिए पूर्व-कोरोना काल की विषम स्कूली स्थितियों का स्मरण करना होगा. प्राइवेट और पब्लिक स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर में जो अंतर भारी था, वह आज भी बना हुआ है. शहरों और कस्बों को छोड़ भी दें तो भी ग्रामीण भारत जहाँ भारत का बहुसंख्यक तबका आज भी रहता है, की स्थितियाँ जस की तस हैं. आज भी ऐसे ग्रामीण स्कूल हैं जहाँ कमरों व डेस्क-बेंच जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं. बहुत से स्कूलों में बच्चे बरामदों व पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ते नज़र आते हैं. गर्मी के मौसम में बच्चों को पीने के पानी के लिये भी दर-दर भटकना पड़ता है।

शौचालयों की हालत भी अच्छी नहीं है. शौचालय स्कूलों में बनाए अवश्य गए हैं, लेकिन बिजली पानी के अभाव में उनमें साफ-सफाई रख पाना मुश्किल हो जाता है. देश के बहुत से ग्रामीण स्कूल ऐसे हैं जहाँ बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से एडूसेट के उपकरण लगाए गए थे लेकिन भारी-भरकम खर्च से लगाए गए ये उपकरण अधिकांश स्कूलों में मात्र शो-पीस बनकर रह गए हैं. ग्रामीण सरकारी स्कूलों की छवि गरीबों और अशिक्षितों के बच्चों के स्कूल वाली बन गई है, जो पूरी तरह शिक्षकों की दया पर निर्भर हैं.

एक तो विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है ऊपर से जो अध्यापक स्कूलों में तैनात है, उनकी स्कूलों में बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थिति मामले को गंभीर बन देती है. आंकड़े बताते हैं विश्व में बिना अनुमति अवकाश लेने वाले अध्यापकों की संख्या भारत में सबसे अधिक है. चार में से एक सरकारी स्कूल में रोज कोई-न-कोई अध्यापक छुट्टी पर लेता है. इस दशा और छवि को सुधारना उत्तर-कोरोना काल की चुनौती है. 

तीसरी बड़ी चुनौती है- निरंतर बढ़ती आर्थिक विषमता की खाई. पूर्व-कोरोना काल के मुकाबले उत्तर-कोरोना काल में यह खाई तेजी से बढ़ रही है. बहुसंख्यक जनता का जीवन पटरी से उतर गया है. इस दौरान बहुत सारे लोगों ने अपनी नौकरियां गवां दी हैं. हताशा-निराशा के चलते घरेलू हिंसा के मामलों में भारी बढ़ोत्तरी हुई हैं, जिसका सीधा असर बच्चों और स्कूली शिक्षा पर होने जा रहा है. इसका सबसे बुरा असर बच्चियों की शिक्षा पर हो सकता है.

यदि रोजी-रोजगार ही नहीं रहेगा तो बहुसंख्यक जनता अपने बच्चे- बच्चियों को शिक्षित करने में कैसे सक्षम होगी? ‘स्कूल ड्राप-आउट’ की समस्या उत्तर-कोरोना काल में तेजी से बढ़ सकती है. यह एक गंभीर प्रश्न है. यह पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि बहुसंख्यक जनता का जन-जीवन को नॉर्मल किया जाए, रोजी रोजगार के अवसर बढ़ाये जायं और लोगों की जिंदगी थोड़ी खुशहाल किया जाय, जिससे हमारे बच्चे स्कूलों तक पहुँच सकें और शिक्षा ग्रहण कर सकें. इसी मुद्दे के हल होने पर शिक्षा संबंधी अन्य प्रयासों की सफलता टिकी हुई है.

चौथी बड़ी चुनौती ‘ग्रेट डिजिटल डिवाइड’ की है. भारत के गांव, कस्बे और शहर में अलग-अलग आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन स्तर के चलते डिजिटल माध्यमों के उपयोग में एक बड़ा गैप है. आंकड़े बताते है कि भारत में इंटरनेट पेनिट्रेशन कुल आबादी का मात्र 36 प्रतिशत है. उसमें भी इंटरनेट प्रयोग करने वालों का आंकड़ा प्रति 100 व्यक्तियों पर मात्र 78 है. तथा फिक्स्ड ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन की स्थिति प्रति 100 व्यक्तियों पर मात्र 1.34 ही है. इसमें शहर, कस्बे और गाँव के प्रतिशत में काफ़ी अंतर दिखता है. अगर स्मार्टफ़ोन, अन्य डिजिटल संसाधनों और पॉवर सप्लाई की बात करें तो इनमें भी काफ़ी अंतर है. इस अंतर को अचानक ख़त्म करना मुमकिन नहीं.

इसका सीधा अर्थ है भविष्य में ऑनलाइन टीचिंग की राह आसान नहीं है. जहाँ तक टेलीविजन चैनल के माध्यम से उत्तर-कोरोना काल में शिक्षा को बढ़ावा देने की बात है यह रास्ता भी काफ़ी कठिन है क्योंकि भारत में टेलिविजन उपयोगकर्ताओं का प्रतिशत कुल जनसंख्या का 46 प्रतिशत ही है. आंकड़ों में थोडा हेर-फेर कमी-बेसी हो तब भी यह निष्कर्ष आसानी से निकला जा सकता है कि डिजिटल डिवाइड बड़ा है और ऑनलाइन टीचिंग-लर्निंग का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसे कम करना ही होगा. 

पांचवी सबसे बड़ी चुनौती है- ‘ई-टीचिंग-लर्निंग’ माध्यमों से अपरिचय. विद्यार्थियों, अभिभावकों और अध्यापकों सभी के लिए ये माध्यम नए हैं. ज्यादातर का इससे अपरिचय है. जो थोडा बहुत जानते हैं उन्हें भी इस माध्यम में दक्षता के लिए ट्रेनिंग की खासी जरुरत होगी. सीमित समय में इस जानकारी और दक्षता को बढ़ाना, प्रशिक्षित करना बड़ी चुनौती होगी.

छठीं और अंतिम चुनौती उत्तर-कोरोना काल में पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम के साथ आकलन व मूल्यांकन की पद्धतियों में नवीनीकरण की है. पूरी पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम की अंतर्वस्तु में नए समय और जरुरत के मुताबिक बदलाव करने होंगे क्योंकि ई टीचिंग-लर्निंग के लिए हमें नए सिरे से इन्हें परखना होगा, इनमें नया जोड़ना होगा. साथ ही साथ आकलन व मूल्यांकन के नए तरीके तलाशने होंगे.

स्कूलों के खुलते ही नयी सामग्री, नए माध्यम के साथ मुस्तैद होना होगा. लेकिन साथ ही इसमें भारी सावधानी बरतनी होगी यदि यह सब हड़बड़ी में हुआ तो हमें गुणवत्ता से समझौता करना पड़ सकता है, जो उत्तर-कोरोना काल की शिक्षा व्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा. और इन चुनौतियों को हल करने के लिए हमें समय, संसाधन, अच्छे मन और दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ेगी.

sarvesh mouruya

लेखक एनसीईआरटी में असिस्टेंट प्रोफेसर है|

 

Show More

सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
3 2 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
1
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x